अपनी बात

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Thursday, April 6, 2017

सुनो भाइयों!

जीवन का खेल खेलते हुए जब सालों का अर्ध-शतक हो गया तब जाकर बात समझ में आई कि खेल जीवन के लिए कितने महत्त्वपूर्ण हैं| खेलों का असर हमारी जिंदगी में खूब दिखाई देता है। कभी हमारे लड़के क्रिकेट जीत जाते हैं तो हमारा दिल बल्लियों उछलने लगता है और कभी हार जाते हैं तो खिलाड़ियों के घरों पर हम पत्थर फेंकने लगते हैं। उनके घरों में आग लगाने के लिए तैयार हो जाते हैं। खिलाड़ियों को बुरा भला कहने में हम एक मिनट भी नहीं लगाते। कभी हॉकी के सुनहरे अतीत को याद करते हैं, तो कभी वर्तमान की दुर्दशा पर पशेमान होने लगते हैं। कबड्डी में जीतते हैं तो अपनी ग्रामीण पृष्ठभूमि का गुणगान करने लगते हैं। फुटबॉल की बात आती है तो यह कहने में नहीं चूकते कि हमारी शारीरिक रचना इस खेल के लिए बनी ही नहीं। बैडमिंटन और कुश्ती में में लड़कियों की जीत हमारे लिए नारी सशक्तिकरण का एक मुद्दा बन जाता है। लड़कों की शामत आ जाती है, हर कोई उन्हें गिरी हुई नजरों से देखना शुरु कर देता है। कहने का मतलब यह है कि खेल हमारी जिंदगी का बहुत जरूरी हिस्सा होते हैं| खेल हमारी भावनाओं, हमारी सोच, हमारे चरित्र, हमारी सभ्यता और हमारी संस्कृति को भी प्रकाशित करते हैं।

हमारे देश में खेल कई सतहों पर खेले जाते हैं| लोगों की प्रतिक्रिया भी अलग अलग सतहों पर अलग-अलग हुआ करती है| टेनिस में हारें तो कोई बात नहीं| फुटबॉल की हार का तो पता भी नहीं चलता| हॉकी में हार जाएँ तो थोड़ा दुःख होता है| क्रिकेट में हर जाएँ तो बहुत दुःख होता है| कहीं अगर पाकिस्तान से गिल्ली-डंडे के खेल में भी हार जाएँ तो पूरा देश गम के सागर में डूब जाता है|

आजकल तो प्रीमियर लीग की खेल प्रतियोगिताएँ भी होने लगी हैं| उनमें हार-जीत का असर या तो टीमों के मालिकों पर होता है या फिर सटोरियों पर| कोई-कोई टीम के मालिक दुःख के जलसे को प्रायोजित भी करते सुने गए हैं| रुदालियों को हायर किया जाता है जिनके द्वारा कभी दिख कर तो कभी लिख कर रोने का कार्यक्रम चलाया जाता है|

यह तो हुई ऐसे खेलों की बात जो मैदान में खेले जाते हैं| जिनमें टीमें भी होती हैं और नियम भी| मैं तो असल में एक ऐसे खेल के बारे में चर्चा करने वाला था जिसके न तो नियम होते हैं| उसमें तयशुदा खिलाड़ी नहीं होते हैं| उसका न तो कोई सुनिश्चित मैदान ही होता है और न ही कोई समय| हमारे देश में इस खेल की घरेलू, मौहल्ला-स्तरीय, वार्ड-स्तरीय, नगरीय, प्रदेशीय और राष्ट्रीय प्रतियोगिताएँ चलती रहती हैं| विद्यालय-महाविद्यालय-स्तरीय प्रतियोगिताएँ भी होती हैं, जिनमें छात्र, प्रोफ़ेसर, क्लर्क, चपरासी सभी भाग लेते हैं|

जिसकी मैं आज बात करने जा रहा हूँ वह खेल अर्वाचीन काल में एक बड़े उद्योग का रूप ले चुका है| बड़े-बड़े घरानों को इसमें प्रायोजक की भूमिका का निर्वाह करने के लिए आमंत्रित किया जाता है| दलों को ‘लोगो’ भी मिलते हैं| नामी-गिरामी नागरिकों को अलग-अलग दलों की मानद सदस्यता दी जाती है| खिलाड़ियों की नर्सरी तैयार होती है| समय आने पर खिलाड़ियों की बाकायदा नीलामी होती है| इस खेल की ‘प्रीमियम-लीग’ को चलाने वाली कंपनियाँ खेल को निरंतर संचालित करती रहती हैं| वैसे तो सभी प्रबुद्ध भारतीय समझ ही गए होंगें कि यहाँ किस खेल की चर्चा की जा रही है फिर भी अति-समझदारों की सुविधा के लिए बात का खुलासा किए देता हूँ| यह खेल है विचारधारा का खेल|

विचारधारा ऐसी बला है जो पल-पल रूप बदलती रहती है| किसी को इससे ऐतराज न तो होता है और न ही होना चाहिए – ‘रवि की एक दिवस में, तीन अवस्था होय’| विचारधारा तो कुछ ऐसी है जैसे डॉमिनोज़ का पिज्ज़ा| कंपनी तो एक ही रहती है लेकिन देश-काल के हिसाब से उसका स्वाद बदलता जाता है| पंजाब में लगभग तला हुआ फ़ार्महाउस पिज्ज़ा चल सकता तो राजस्थान में मिर्चीला| दक्षिण भारत में बहुत से लोग पिज्ज़ा पर कड़ी-पत्ता डाल कर उसे नारियल की चटनी से खाना पसंद कर सकते हैं तो लखनऊ में उसकी मोटी-भदेस रोटी की जगह बारीक पापड़ का प्रयोग ज़्यादा पसंद किया जा सकता है| कुछ भी स्थिति हो, लेकिन पिज्ज़ा बनाने वाली कंपनी की ‘बल्ले बल्ले’ रहती है| बस यही विचारधारा के खेल में भी होता है| यह खेल खिलाड़ियों पर केन्द्रित नहीं होता| यहाँ तो खेल को प्रायोजित करने वाली कंपनियों का ही बोलबाला रहता है|

विचारधारा का खेल ऐसा होता है जिसमें किसी भी खिलाड़ी के लिए किसी एक नियत दल का सदस्य होना जरूरी नहीं होता| जिस तरफ ज्यादा मजबूती हो और नाम-पद-माल कमाने की अधिक गुंजाइश हो खिलाड़ी नि:संकोच भाव से उधर जा सकता है| यह कुछ-कुछ जवानी के प्रेम सा होता है जो कभी भी किसी से भी किया जा सकता है| एक बात और, यह भी कतई जरूरी नहीं है कि एक खिलाड़ी किसी एक ही दल की ओर से खेल रहा हो| अलग-अलग मैदानों में अलग-अलग दलों के लिए यह खेल खेला जा सकता है| सुनते हैं, सचिन तेंदुलकर को भी उनके कोच साहब एक ही दिन में कई-कई टीमों के लिए बल्लेबाजी करा दिया करते थे|

इस खेल की एक अन्य खासियत यह है कि खिलाड़ियों को दसों दिशाओं में बढ़ने की स्वतंत्रता रहती है| आगे की ओर बढ़ गए तो प्रगतिवादी या फॉरवर्ड कहलाएंगे| आने वाली नस्लें गुणगान करेंगी| कोर्स की किताबों में नाम छपेगा| नाम को अमर करने के लिए व्याख्यान-मालाएँ आयोजित की जाएंगी| विचारों को यद्यपि कोई मानेगा नहीं, तथापि सम्मान पूरा दिया जाएगा|

पीछे की ओर गए तो परम्परावादी या कंज़र्वेटिव के रूप में पहचाने जाएंगे| चौराहे पर मूर्तियाँ लगेंगी| मूर्तियों का माल्यार्पण और लोकार्पण होगा| याद को ताजा रखने के लिए जागरणों का आयोजन किया जाएगा| अलग-अलग सेवा दलों का नाम खिलाड़ियों के नाम पर रखा जाएगा| सड़कों के नाम उनके नाम पर रखे जाएंगे|

वाम पक्ष में बढ़े तो समाजवादी बन जाएंगे| समाजवाद आजकल पूरे फैशन में है| आजकल समाजवादी बनने के लिए गाढ़े का मैला चीकट कुरता, घिसी हुई जींस और फटी हुई चप्पल पहनने की जरूरत नहीं होती| अब तो शानदार थ्री पीस सूट और इटैलियन जूते पहन कर पैंतीस लाख की ऑडी में सवारी करते हुए भी समाजवादी बना जा सकता है| समाजवादी बन जाने का सबसे बड़ा फ़ायदा यह है कि गिनती सीधे-सीधे क्रांतिकारियों में होने लगती है| भविष्य के क्रांतिकारी कही हुई बात का उद्धरण अपने भाषणों में दिया करेंगे|

ग्रहचाल सही हुई और दाहिनी ओर बढ़ गए तो आजकल की परिस्थिति में सीधे सरकार में घुसने का जुगाड़ है| ज्यादा कुछ न भी हुआ तो विधायक तो बन ही जाएँगें| भाग्य ने जोर की छलाँग मार दी तो लैंडिग सीधे मंत्रीपद पर ही होगी| गद्देदार कुर्सियां और चमचों का हुजूम हमेशा सेवा में रहेगा| फॉरवर्ड, कंज़र्वेटिव और समाजवादी एक नजर पाने को लालायित रहेंगें| बाहर चाहे जितनी भी गाली-गुफ्तार करें, कमरे के अन्दर सीधे चरणों में ही बिछा करेंगें|

यह कहने में कोई अत्युक्ति नहीं है कि विचारधारा इस असार संसार में जीवन को सारवान बनाने का अद्भुत प्रयोग है| हर व्यक्ति जो इस खेल से चाहे खिलाड़ी के रूप में जुड़ा हो, या अम्पायर के रूप में, दर्शक या किसी अन्य रूप में; जीवन के सारतत्त्व को लगातार यहाँ से ग्रहण करता रहता है - भेड़ पै ऊन किसने छोड़ी| कभी-कभी तो भेड़ की ऊन के साथ-साथ उसकी खाल भी खिंच जाती हैं| खिंचती है तो खिंचती रहे|

विचारधारा के खेल की स्कोर-बुक भी होती है जिसमें खयालात का डाक्यूमेंटेशन करना जरूरी होता है| यह डोक्युमेंटेशन माइक के सामने चीख-चीख भी किया जा सकता है या रिसालों में लेख छपवा कर भी| खिलाड़ी के लिए यह बिलकुल ज़रूरी नहीं है कि उसके चिंतन और प्रवचन में समानता हो| दोनों सिरे से जुदा हो सकते हैं| हाल ही में एक साहित्य-सम्मेलन में एक दलित-विचारक को सुनाने का सौभाग्य प्राप्त हुआ| ग्यारह बजे की सभा में साढ़े ग्यारह के बाद पहुँचे और कुर्सी पर विराजते हुए बोले कि भई, रात पार्टी लम्बी चल गयी थी जिसकी वजह से देरी हुई| इसके बाद लगातार प्रलाप किया और दलितों की समस्याओं को छोड़कर हर बात पर अपना मत व्यक्त किया| यहाँ से मुझे भी इस बात का ज्ञान हुआ कि अगर पार्टीबाजी और मुफ्त की मदिरा का भोग लगाने का शौक हो तो दलित-विचारधारा का झंडाबरदार बनने का विकल्प हमेशा तैयार है|

समाजवाद के बाद दूसरी फैशनेबल विचारधारा महिलावाद या फेमिनिज्म है| इस दल का हिस्सा होने के लिए तन से स्त्री होना ज़रूरी है| लगातार गालियाँ बकने की योग्यता और पुरुषों की तरह व्यवहार करने के हिम्मत इस दल का सदस्य होने के लिए ज़रूरी है| इस दल की ओर से खेलने वाला खिलाड़ी जितनी जोर से चिल्लाकर बोल सकता है उसका महत्त्व दल में उतना ही ऊँचा हो सकता है|

बात शैतान की आँत सी लम्बी होती जा रही है| मैं कुछ-एक सुझाव विचारधारा का खेल खेलने वाले खिलाड़ियों के लिए दे रहा हूँ, जिनकी सहायता से इस खेल में नए कीर्तिमान रचे जा सकते हैं –

“देखिए, किसी भी विचारधारा को अपनाने के लिए समाज की सैद्धांतिक और व्यावहारिक समझ के पचड़े में सिर खपाने की कोई दरकार नहीं है| मन में यह विचार स्थिर कर लीजिए कि किसी भी विचारधारा के लिए प्रतिबद्धता प्रगति के मार्ग में रोड़े अटकाती है|”

“तर्क से ज़्यादा कुतर्क और उच्च-स्वर का प्रयोग हितकर माना जाता है| किसी विरोधी खिलाड़ी की काँव-काँव ज़्यादा ही परेशान करने लगे तो उसके आगे लालच का जाल फेंकिये – ‘भौंकते कुत्ते को रोटी का टुकड़ा’|”

“याद रहे विचारों के प्रकाशन में चमत्कारपूर्ण कलात्मकता का प्रयोग खेल के स्तर को ऊँचाइयों पर ले जाता है| विचारों के कार्यान्वयन की चिंता को हमेशा अपने सिर से दूर रखकर, तनावमुक्त होकर अपना खेल खेलना चाहिए| आज के समय में जनता इतनी समझदार हो चुकी है कि वह स्वयं ही किसी भी चिन्तक-विचारक से व्यावहारिक प्रयोग की उम्मीद नहीं करती|”

“पूर्वाग्रहों से बचने की कोशिश करने की कोई आवश्यकता नहीं होती| अपने पूर्वाग्रहों को अपनी विचारधारा में पूरा-पूरा स्थान देना चाहिए चाहे वे विचार नैतिकता से सम्बंधित हो, राजनीति से सम्बंधित हों, वर्ग-दल-सम्प्रदाय-धर्म या मूल्यों से जुड़े हों| ध्यान रहे ‘नंग बड़ा परमेश्वर से’, अत: किसी तरह की लज्जा की भावना से अपने को दूर रखना चाहिए|”

तो मित्रों, ध्यान रहे कि आपका अंतिम लक्ष्य स्वयं का उद्धार करना है| पुराणों में भले ही परोपकार को पुण्य के लिए कहा गया हो, इस खेल में परोपकार के चक्कर में पड़ने वालों दुर्गति होना तय है| माओवादी, लेनिनवादी, अम्बेडकरवादी, गांधीवादी, मार्क्सवादी, साम्यवादी, उदारवादी, रूढ़िवादी, आदर्शवादी, फासीवादी, जनवादी, कुलीनातावादी, सत्तावादी, अराजकतावादी, भाषावादी या किसी भी दूसरे दल की ओर से खेलें पर यह अच्छी तरह समझ लें कि आसक्ति विनाश का स्रोत है; खेल में निसंग भाव से लगे रहें| दूसरे दल में शामिल होने के प्रति संकोच का भाव मन में कदापि न आने दें| एक न एक दिन मानव इतिहास के महानतम व्यक्तियों में आपकी गिनती ज़रूर हो जाएगी|

चित्र http://hindi.oneindia.com/ से साभार

1 comment:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’सौन्दर्य और अभिनय की याद में ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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