अपनी बात

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Thursday, March 30, 2017

ये कुत्ता-पालक


एक ज़माना था जब महापुरुष वचन का पालन किया करते थे| राजा लोग अपनी प्रजा का पालन करते थे| साधु-महात्मा तपश्चर्या का पालन करने में लगे रहते थे| सज्जन सदाचार का पालन करते थे| साधारण लोग धर्म का पालन करते थे| बालक-बटुक माता-पिता और गुरु की आज्ञा का पालन किया करते थे|

समय बदला और इन सबका पालन थोड़ा मुश्किल होने लगा| प्रजातंत्र आया तो प्रजा को पालना भारी पड़ने लगा| प्रजा का राज्य है तो खुद प्रजा ही खुद को पाले, हम क्यों समस्या अपने सिर लें| साधु-महात्मा तप के रूखे और कठोर रास्ते को छोड़कर ऐश्वर्य और प्रभाव की राह पर चल पड़े| तपना है तो गरीब-गुरबे तपें, हर-पल हर-क्षण तपें; हम अपना जीवन बेकार की बातों में जाया क्यों करें| सदाचार को मूर्खता का पर्यावाची माना जाने लगा| कदाचार के साम्राज्य में सदाचार नक्कारखाने में तूती की आवाज की माफिक गुम हो गया| धर्म पड़ गया राजनीतिज्ञों के हाथ में जिन्होंने उसे अपनी उँगलियों पर इस कदर नचाना शुरू किया कि वो पंगु होकर आजकल सरकारी अस्पतालों के बाहर विकलांगता का प्रमाणपत्र बनवाने के लिए लाइन में लगा रहता है| साधारण लोगों का जब उस पर अधिकार ही न रहा तो उसे पालें कैसे? बालक-बटुक तो बालक-बटुक रहे ही नहीं| माँ-बाप, गुरुजन उनके लिए ज़ंजीर जैसे हो गए हैं| सवाल पूछना तो सीखा लेकिन सवाल चुनने और पूछने की कला को सिद्ध नहीं किया| विद्रोह, कुंठा, तनाव के चक्कर में पड़कर भूल गए कि जीवन का रस सहजता में है| आज्ञा के नाम से ही नफ़रत है तो उसका पालन कहाँ से हो?

एक और झंझट है, चूँकि सदियों से पालते आए है; इससे हुआ यह कि पालने की आदत सी पड़ गई| आदत तो आदत है, लग गई सो लग गई| गले पड़ा ढोल तो बजाना ही पड़ता है| और कुछ नहीं हुआ तो अपने-अपने हिसाब से अलग-अलग प्राणियों को पालना शुरू कर दिया| एक दौर था जब धार्मिक लोग गाय पालते थे| स्वास्थ्य और रोज़ी के लिए भैसें पाली जाती थीं| बादशाहों, नवाबों, राजाओं और ज़मींदारों के यहाँ शेर-चीते पलने लगे| शानो-शौकत के लिए हाथी पाले जाने लगे| सिपाहियों के यहाँ घोड़े और ऊँट पलने लगे| धोबी गधे पालने में लग गए| किसान बैल पालने लगे| रनिवासों में सुग्गे और मैना पाले जाने लगे| तीतर, कबूतर, मुर्गे, बत्तख भी पाले जाने लगे|

होते-होते आज का ज़माना आन पहुँचा, जब बड़े रोब-दाब के साथ एक पशु को पाला जाने लगा जिसे कुत्ता कहते हैं| अच्छा, कुता पालने के पीछे शायद सबसे बड़ा कारण यह था कि प्रजातंत्र के चक्कर में लोग अपनी औकात को ज़रा ज़्यादा ही बढ़ा हुआ मानने लगे| जिसका परिणाम यह हुआ कि समर्थ लोगों के पीछे भी पूँछ हिलाते हुए घूमने वाले लोगों का अकाल सा छाने लगा| सदियों पुरानी आदत थी, सो तन-मन को इस बदलाव से परेशानी तो होनी ही थी| इस कमी को पूरा करने के लिए श्वान को चुना गया| मज़े की बात यह है कि कुत्ता पालने वाले कुत्ते को कुत्ता कहना भी पसंद नहीं करते| वे या तो उसे डॉगी कहते हैं या उसके शुभनाम मसलन टॉमी, जॉनी आदि नामों से पुकारते हैं| भ्रम बना रहता है कि साक्षात् मानुष की जात ही इशारों पर नाच रही है|

जहाँ तक कुत्तों के नाम कई तरह के होते हैं :- रंग के आधार पर - कालू, भूरा, चितकबरा आदि, शरीर की चेष्टा और रचना के आधार पर - पूँछकटा, लंगड़ा, लैंडी वगैरा, मुद्रा के आधार पर - डॉलर, रूबल, सिक्का आदि, आदतों और उनके स्वभाव के आधार पर- स्लीपी, रास्कल, स्काउंड्रल आदि|

मनुष्यों के नाम के आधार पर भी कुत्तों के नाम रखे जाते हैं| हमारे एक परिचित ने मुगलों के प्रभाव में आकर अपने कुत्ते का नाम सलीम रख डाला है| और, सलीम के भी क्या कहने, वह अपने नाम की मर्यादा रखने के लिए मौक़ा लगते ही घर से भाग जाता है और अनारकली की तलाश में सारे शहर की अपनी सजातियों को सूँघता फिरता है| एक कुत्ते का नाम स्टालिन भी सुना गया है| कुछ नाम पशुओं के नाम के आधार पर रखे जाते हैं जिसका एक प्रसिद्ध उदाहरण है, शेरू| बताइए, कुत्ते को शेरू कहना शेर के नाखूनों को उखाड़ कर उसके जबड़े को तोड़ देना नहीं तो और क्या है? कहने का आशय यह है कि कुत्तों के नाम रखने के लिए काफी शोध किया जाता है| एक से एक अनोखे नाम का चयन किया जाता है| आदमियों को अरे, ओए, ए, कह कर पुकारने वाले अपने कुत्तों को अत्यंत सम्मानजनक तरीके से नाम लेकर पुकारते हैं|

कुत्तों के नामों की शानदार परम्परा में अपने योगदान को सुनिश्चित करने की नीयत से मैं देश-देशांतर में व्याप्त सभी कुत्ता-पालकों की ओर से आधुनिक काल के योग्य शोधकर्त्ताओं से यह विनम्र प्रार्थना करने की सोच रहा हूँ कि वे जहाँ-तहाँ से नकल मार कर तैयार किए गए शोध-प्रबंध के बल पर पीएच. डी. की उपाधि पाने का लालच छोड़ें और कुत्तों के नामों पर कार्य करने का मन बनाएँ| मेरा अटूट विश्वास है कि यह कार्य उनके प्रस्तावित विषयों और प्रबंधों से कहीं अधिक महत्त्व का साबित होगा और कुत्ता-पालकों के इस युग में उन्हें अक्षय कीर्ति का फल देगा| हाँ, अपने गाइडों के अत्याचार से उन्हें छुटकारा मिलेगा, इस बात की गारंटी कम से कम मेरे जैसा अदना लेखक तो नहीं ले सकता| ज्ञान के अभेद्य मठों को भेद कर भीतर चल रहे शिक्षा के याग को समझने की योग्यता अभी यह विद्वच्चरण चंचरीक नहीं पा सका है|

आज का समय उलट-बाँसियों का समय है| जिन्दगी के किसी भी रास्ते पर निकल जाइए, अंतर्विरोध और तरदीद आपका रास्ता रोके मिल जाएंगे| कुत्ता-पालन का सिद्धांत भी इससे अछूता नहीं है| यही कारण है कि कुत्तों को परिवारजन की तरह नहीं अपितु उनसे भी अधिक माना जाता है| भूरे साहबों को अपने बच्चों या अपने ड्राइवर का जन्मदिन याद हो या न याद हो लेकिन अपने कुत्तों का जन्मदिन ज़रूर याद रहता है| लोगों को अपनी नस्ल का पता हो या न पता हो, अपने कुत्ते की नस्ल का सांगोपांग विवरण अवश्य याद रहता है| अपने वंशवृक्ष का लेख तो भले ही कहीं धूल खाता हो, लेकिन अपने कुत्ते की वंश-परम्परा को लेखबद्ध करके फ़ाइल में लगाने के कतई कोताही नहीं करते| जिन लोगों ने कभी अपनी संतानों को लगाए गए टीकों का ध्यान नहीं रखा, वे भी अपने कुत्तों को दी गयी एक-एक दवाई और इंजेक्शन का नाम डायरी में नोट करना नहीं भूलते| पत्नी भले ही बोरोप्लस की एक ट्यूब के लिए झींकती रहे, लेकिन कुत्ते के लिए हर महीने विदेशी टेल्कम पाउडर का डिब्बा और शैम्पू की शीशी की व्यवस्था किया जाना अनिवार्य है| बात यह है कि कुत्तों के माध्यम से समाज में प्रतिष्ठा बनती है, औरों के माध्यम से क्या बनता है? बाबा जी का ठुल्लू!

देखिए, कुत्तों से मनुष्यों का लगाव जग-जाहिर है| अमरीका के एक श्वान-प्रेमी ने बीस लाख डॉलर की जमाराशि को अपनी ‘ट्रबल’ यानि मुसीबत नाम की कुतिया के नाम कर दिया था| ऐसा करके उन सज्जन ने इस कहावत को सही साबित कर दिया था कि हर कुत्ते का दिन आता है| पर, जैसा कि हमेशा होता आया है, उस धन के लालच में कुछ लोग बेचारी ‘ट्रबल’ की जान के पीछे पड़ गए| परिणाम यह हुआ कि ‘ट्रबल’ को चार अंगरक्षकों के हवाले कर भूमिगत कर दिया गया| संपत्ति और ‘ट्रबल’ का यह साथ मानवीय इतिहास में कोई नया भी नहीं है और न ही ‘ट्रबल’ को भूमिगत करके पालने की घटना ही कोई अनोखापन लिए हुए है| ऐसा तो हमेशा होता आया है, जब ‘ट्रबल’ को भूमिगत कर दिया जाता है या अंग्रेज़ी के मुहावरे में कहें तो कालीन के नीचे सरका दिया जाता है, तब वह चुपचाप पलती रहती है, मुटियाती रहती है और फिर समय आने पर अपने बाल-बच्चों सहित वापिस लौटती है|

कुत्तों के स्वभाव में काफी वैविध्य पाया जाता है| एक मित्र काफी रिसर्च के बाद इस इस परिणाम पर पहुँचे हैं कि कुत्तों का स्वभाव अक्सर उनके मालिकों जैसा हो जाता है| लेकिन हमारे परम मित्र चकौड़ी दास एक दूर की ही कौड़ी खोज कर लाये हैं| उनका मानना है कि स्थिति इससे बिलकुल ही उलट है| असल में कुत्तों के मालिकों का स्वभाव अपने कुत्तों जैसा हो जाता करता है| सच जो भी हो, इतना तो तय है कि कुत्तों और उनके मालिकों के स्वभाव में कोई न कोई तो सम्बन्ध होता ही है| कभी दोनों का स्वभाव एक जैसा हो जाता है तो कभी एक-दूसरे से पूर्णत: विपरीत होकर एक-दूसरे का पूरक|

कुत्तों के संसार में कुछ तो बेहद खूँख्वार होते हैं जो मौका लगने पर मालिक को भी चबा डालते हैं| मालिक को कोई हाथ भी लगा दे तो उसकी जान लेने पर उतारू हो जाते हैं| भौकते कम हैं, कटते ज़्यादा हैं| ये कुत्ते जब झुंडों में रहते हैं, तभी सुरक्षित महसूस करते हैं| अकेलापन उनमें असुरक्षा की भावना जगाता है और उन्हें काटने को आता है| आम तौर पर राजनीति से जुड़े लोग इसी तरह के कुत्ते पालने में विश्वास रखते हैं|

कुछ कुत्ते भौकने में माहिर होते हैं| वे इतनी तरह की आवाजों में और इतने सारे सुरों में भौकने की जन्मजात दक्षता-संपन्न से होते हैं कि मीडिया-समूहों के मालिकों की पहली पसंद बन जाते हैं, फिर वह चाहे वह इलैक्ट्रोनिक मीडिया हो या प्रिंट मीडिया|

कॉर्पोरेट क्षेत्र से जुड़े लोगों की पसंद ऐसे कुत्ते होते हैं जो सूँघने में काफी होशियार होते हों| इनकी नाक इतनी तेज़ होती है कि ज़मीन की सात परतों के नीचे छिपे राज़ भी ये कुत्ते आसानी से खोज लेते हैं| इस श्रेणी के कुत्ते काफी सामाजिक होते हैं| लॉबीइंग का कौशल इन्हें माँ के दूध के साथ पिलाया जाता है|

हमने देखा है कि कुछ कुत्ते बड़े शर्मीले और नखरीले स्वभाव के हुआ करते हैं| वे चुप-चाप पीछे-पीछे चलने में अपनी शान समझते हैं| उनकी पूँछ अक्सर पैरों के बीच में दबी रहती है| अगर उन पर कोई दूसरा कुत्ता आक्रमण कर दे तो उनकी रक्षा की ज़िम्मेदारी मालिक की हुआ करती है| प्रेमिकाएँ और दफ्तरों के बड़े अधिकारी ऐसे कुत्तों की तलाश में रहा करते हैं|

वैसे तो हमारे पूर्वज उस सनकी अमरीकी से भी चार कदम आगे थे| धर्मराज युधिष्ठिर अपने कुत्ते को साथ लिए स्वर्ग की यात्रा पर निकल पड़े थे| आज स्थिति यह हो गयी है कि स्वर्ग का सुख भोगना को तो कुत्तों की फ़ौज का साथ रहना ज़रूरी हो गया है| कुत्ते ही गुर्रा-गुर्रा कर और रुकावटों को क्षत-विक्षत कर स्वर्ग में जाने का रास्ता तैयार करते हैं| युधिष्ठिर से भी पहले सत्यव्रत महाराज हरिश्चंद्र ने दशाश्वमेध घाट पर पलने वाले अपने कुत्ते के साथ ही अपने सत्य की परीक्षा दी थी| वक्त के बदलाव ने अब इतना ज़रूर कर दिया है कि लोगों के स्थान पर उनके कुत्ते भौंक-भौंक कर उनके असत्य को सत्य में परिवर्तित कर देते हैं|

अक्सर सोचता हूँ कि अब मैं भी कम के कम एक कुत्ता पाल ही लूँ| सुना है कि बड़े बड़े फॉर्म-हाउसों में आजकल कुत्तों की ब्रीडिंग की जाती है| अपनी ज़रुरत के हिसाब से उनके गुण-धर्म तय कर दिए जाते हैं| मैं भी बैठ कर महनीय गुणों की एक सूची बनाता हूँ, जिन्हें मेरे कुत्ते में होना चाहिए| आपके पास भी कोई सुझाव हो तो अवश्य भेजिएगा|


चित्र http://www.practicalpaw.com से साभार

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