अपनी बात

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Monday, March 20, 2017

अतिथि लेखक: संजय शुक्ल

संजय शुक्ल नवगीत काव्य-विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं| उनकी कविता वर्तमान की विसंगतियों, विद्रूप और लिजलिजेपन को पूरी ईमानदारी के साथ प्रकट करती है| उनकी कविता अखबार नहीं है अपितु प्रकाशित पंक्तियों के बीच दबी-छिपी संवेदना को शिल्प के धरातल पर उकेर देने का सफल और स्तुत्य प्रयास है|
प्रस्तुत हैं हाल ही में अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद से प्रकाशित उनके प्रथम काव्य-संग्रह ‘फटे पाँवों में महावर’ से कुछ कविताएँ –
(फटे पाँवों में महावर, रचनाकार- संजय शुक्ल, संपर्क - +918130438474, प्रकाशक- अनुभव प्रकाशन, गाजियाबाद। प्रथम संस्करण- २०१६मूल्य-१६० रुपये, अड़सठ गीत, कुल पृष्ठ-१०४)

प्रभुता का अनुवाद
एक दिवस 
लघुता ने बाँचा
प्रभुता का अनुवाद।
घर न लगा
दड़बे-सा उस दिन
घिचपिच लगी न भीड़
नहीं उड़ाई गौरैया जो
बना रही थी नीड़
खेती-बाड़ी की
गमलो में
देकर पानी खाद।
में ही वादी
प्रतिवादी भी
मुंसिफ और वकील
उठी अदालत बिन बैठे ही
हुई न एक दलील
साथ रहा मैं
अपने लेकिन
हुआ न कुछ प्रतिवाद।
जिया अभी तक
कितना कैसा
भुला दिया अनुपात
भोला रहना, भला हमें
करना क्या हो निष्णात।
अख़बारों की
तहें न खोलीं
जिनमे भरा मवाद।

अनागत जलता है 
आगत का यह दृश्य भयावह 
सोते जगते छलता है
महानाश की लपटों में
खामोश अनागत जलता है!
घिरा हुआ नभमण्डल पुच्छल तारों से
मौन खड़े सप्तर्षि अवश लाचारों-से
ध्रुवतारों का धर्म सहम कर
ढूँढे अपनी स्थिरता है!
गंधहीन संकर सुमनों की क्यारी में
गंधक है,मकरंद नहीं फुलवारी में
सम्बन्धों की विमल त्रिवेणी
खोज रही निज शुचिता है!
हंस उड़ रहे कागों की अगवानी में
खलनायक ही नायक बने कहानी में
तुलसी बिरवा खड़ा उपेक्षित
कीकर का कुल पुजता है!
महानाश की लपटों में
खामोश अनागत जलता है!

मुनाफे की खटपट है
बहस चल रही है 'टी.वी'. पर
बुद्धिजीवियों का जमघट है।
विषय बहुत गंभीर चुना अब
संचालक की कोशिश जारी
बन जाये यह आग भयानक
जो है छोटी-सी चिंगारी
पक्ष न कोई ढूँढ रहा हल
बहुत मुनाफ़े की खटपट है!
उछल रहे हैं प्रश्न ज़मीनी
उत्तर जिनके मिले हवाई
दिखती कभी भक्ति बगुले की
कभी मगर की दिखी रुलाई
इधर चल रही है नौटंकी
उधर बनी बस्ती मरघट है!
आशय था कुछ और, मगर कुछ
अर्थ निकाला गया अलग ही
लाख सफाई दी जाती पर
मुद्दा तो अब गया सुलग ही
और लगे कुछ शहर दहकने
ताज़ा-ताज़ा मिली रपट है !
देशकाल यह कैसा, जिसमें
घड़ी -घड़ी ब्रेकिंग न्यूज़है
कभी-कभी लगता है जैसे
लोकतंत्र का उड़ा 'फ्यूज' है
संविधान के माथे पर भी
पड़ी हुई मोटी सलवट है !
बहस चल रही है 'टी.वी'. पर
बुद्धिजीवियों का जमघट है।

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