अपनी बात

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Friday, March 17, 2017

डायरेक्ट मोक्ष


प्रातकाल खटिया से उठिकै, पियै तुरतै पानी|
कबहूँ घर मा वैद न अइहै, बात घाघ के जानि||

साफ़ है कि महाकवि घाघ ने सुबह उठने की बात तो चलाई, लेकिन सुबह का अर्थ खोल कर नहीं बताया| ज़ाहिर है, उन्होंने सभी को अपनी-अपनी सुबह अपनी-अपनी तरह परिभाषित करने की स्वतंत्रता दे दी है| वैसे भी आज के ज़माने में तो अपनी-अपनी परिभाषा बनाने का फैशन सा चल पड़ा है| ‘भक्त’ का अर्थ बदला, ‘राष्ट्रवाद’ का आशय बदला, ‘उस्ताद शब्द से तात्पर्य कुछ का कुछ हो गया, ‘नेता’ का मतलब कहीं से कहीं पहुँच चुका है; गरज यह कि सब अपने-अपने अर्थों और परिभाषाओं की गठरी अपनी-अपनी पीठ पर लादे घूम रहे हैं| बात-बात पर ‘परिप्रेक्ष्य’ और ‘दृष्टिकोण’ जैसे जबरदस्त लफ्जों को बीच में घुसेड़ना फैशन हो चुका है| ऐसे में अगर एक शरीफ आदमी अपनी सुविधा के अनुसार ‘सुबह’ का नया अर्थ तैयार कर लेता है, तो इसमें किसी को क्या परेशानी होनी चाहिए! पर नहीं, अपनी नाक बीच में घुसाने वाले कहाँ मानते हैं!

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि ‘भांजी मारने’ का चलन हमारे यहाँ की ऐसी सामाजिक परम्परा है जिसमें सभी धर्म, जाति, संप्रदाय, वर्ग, पेशे और उम्र के लोग पूरे दिल से रूचि लेते हैं| इस काम के उस्ताद गली-गली में मिलते हैं| शादी-ब्याह, प्रेम-मोहब्बत, जमीन की खरीद-बेच, नौकरी-व्यापार; मसला कुछ भी हो, दूसरे के काज की मिट्टी करने में इन्हें जो आनंद आता है, बस यह समझ लिया जाए कि या तो वह ‘गूंगे के गुड़’ सा होता है या ‘परमात्मा के दर्शन’ सा| दूसरे का काम खराब हो जाए तो ज़िंदगी में मौज आ जाती है| मिसाल के लिए, नोटबंदी की कृपा से अगले को कुछ मिले न मिले लेकिन दूसरों का माल बाहर आ जाए तो बाँछे खिल जाती हैं| हमने अपनी सुबह को दस बजे तक क्या फैला लिया कि ज़माने की छाती पर साँप लोटने लगे|

सही है कि सुश्रुत और चरक जैसे ऐतिहासिक वैद्यों से लेकर आज के ज़माने के डॉक्टरों तक, सबका मानना है कि मुँह-अँधेरे उठकर घूमना सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है| लेकिन मुझे तो तरस उन लोगों की बुद्धि पर आता है जो उनकी बात का भरोसा भी करते हैं| ज़रा सोचिए, जिनकी पेशेवर ज़िंदगी दूसरों की बीमारी पर आधारित होती है, वे भला मुफ्त में आरोग्य का नुस्खा क्यों देने लगे? दुनिया का कौन सा वकील यह सलाह देगा कि घर के झगड़े घर में सुलझाए जाने चाहिएँ| कौन कफ़न बेचने वाला लोगों की लम्बी उम्र की दुआएँ माँगेगा?

प्रभावकारी विद्या हमेशा गुप्त रखी जाती है| लाला सम्पतलाल ने अपने नंबर दो के खजाने को हमेशा गुप्त ही रखा था| हालात ने इस सीमा तक उनका इम्तहान लिया कि जब वे मर रहे थे, तब कुछ ऐसे परिचित आस-पास जमा हो गए जिन्हें वे आयकर वालों का मुखबिर मानते थे| नतीजतन, मरते समय वे उस खजाने का पता अपने लख्तेजिगर को भी न बता सके और खजाने के राज को अपनी रूह में छिपाए हुए ही इस दुनिया से कूच कर गए|

चलिए मान भी लिया जाए कि ‘प्रात:-भ्रमण’ स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है, पर अगर कोई हमसे पूछे कि हमें सबसे प्यारा कौन है तो हमारा बेहिचक जवाब होगा – ‘सुबह की नींद’| ध्रुव-सत्य तो यही है कि सुबह की मीठी-मीठी नींद से बढ़कर कुछ भी नहीं हो सकता| ब्राह्म मुहूर्त्त में चादर लपेट, तकिये में सिर घुसा कर निद्रा देवी की गोद में अठखेलियों का सुख भला हाथ में कुत्ते भगाने की छड़ी ले घर से निकल दर-ब-दर की ठोकरें खाने वाले क्या खाकर समझेंगे|

दुनिया में सबसे कमाल की चीज आलस्य है| बड़े बुजुर्गों से लेकर ऊँचे उपदेशकों तक, सभी ‘धैर्य’ की तारीफों के पुल बाँधे रखते हैं| ये शय है क्या? कभी सोचा है घ्यान से? धैर्य का मतलब ही आलस्य है| जो चल रहा है उस पर प्रतिक्रिया मत दो, यही तो धैर्य है| आलस्य भी इससे अलग कहाँ है| यह दीगर बात है कि कुछ अति-उत्साही लोग इस लाजवाब गुण को ‘काहिली’ के नाम से भी पुकारने लगते हैं| अब जो हो सो हो, लेकिन अपन ने तो इस गुण को पूरी तरह सिद्ध कर लिया है|

अच्छा, सुबह की सैर के फायदे तो देखे, लेकिन उसके नुक्सान का अनुमान लगाना भूल गए| हमारे पड़ौसी बाबू पल्टू राम शर्मा, जो कि पूछने पर अपना नाम मिस्टर पी. आर. शर्मा बताते हैं को सुबह घूमने जाने की बुरी आदत थी| एक दिन घर से निकले तो संयोग की बात; एक कौआ भी उसी समय जंगल-पानी के उद्देश्य से अपने घोंसले से बाहर निकला| कौओं के लिए रेलवे-लाइन के किनारों पर स्थान आरक्षित नहीं होता| इस अन्याय के चलते उसने एक पेड़ की डाल पर बैठकर ही नित्यकर्म से निवृत्त होने का निर्णय लिया| टाइमिंग देखिए, जिस समय बाबू साहब पेड़ के नीचे ताजा ऑक्सिजन लेने के लिए गहरी-गहरी साँसें ले रहे थे, उसी समय कौए ने डाल पर बैठ कर अपनी कार्रवाई को अंजाम दे दिया| कौए को तो स्वच्छता-अभियान की जानकारी थी नहीं, सो परिणाम यह हुआ कि उसने सीधे बाबू साहब के चिकने सिर को अपना निशाना बना डाला| बाबू साहब साफ-सफाई के ख्याल से फ़ौरन घर की ओर लौट पड़े| दोस्तों से चर्चा होने पर किसी ने उन्हें बताया कि जिसके सिर पर कौआ बींट कर दे, यमराज एक माह के अन्दर उसके ‘अनबेलेबल वारंट’ काट देते हैं| घबराए हुए बाबू साहब घर लौटे और आनन-फानन में तरह-तरह की जीवन-बीमा पॉलिसियाँ ले डाली| एक महीना तो क्या, आज साढ़े तीन साल हो गए लेकिन बाबू साहब को नज़ला तक नहीं हुआ| हाँ, पॉलिसियों का प्रीमियम भरते-भरते उनका दम जरूर निकल जाएगा, ऐसा वे अक्सर कहते हुए पाए जाते हैं|

हमारे एक पुराने मित्र हैं, सत्य प्रकाश ‘झिंझाने वाले’| उनकी गणना शहर के प्रतिष्ठित घुमक्कड़ों में होती है| क्या सर्दी, क्या गर्मी, क्या बरसात और क्या आंधी-तूफ़ान; किसी भी आपदा का कभी उन्हें उनके नित नियम से डिगाने का साहस नहीं हुआ| सुबह चार और तीस पर घड़ी की सुइयों का पहुँचना हुआ और उनका घर से बाहर निकलना हुआ| रास्ते में दिखने वाले आबालवृद्ध सभी को ‘राम राम जी’ और ‘राधे राधे’ की पुकार लगाते हुए गुड मंडी की सड़कों पर चकरदंड घूमा करते हैं| इलाके के बुड्ढे इतिहासकार बताते है कि शुरू में तो दो-चार बार गली के कुत्ते उन्हें देखकर भौंका भी करते थे, पर उसके बाद वे भी उनके भौंडे स्वर को सहन करने के अभ्यस्त हो गए थे| आजकल तो हाल यह यह है कि कभी बहुत हुआ तो उनींदी आँखों से अपनी थूथन उठाकर बस एक बार उनकी ओर देख भर लेते हैं|

एक बार वे हमारे घर पधारे और हमसे भी सुबह के समय घूमने चलने का इसरार करने लगे| कहने लगे, “रोजाना दस मील घूमना चाहिए| इससे दस साल उम्र और बढ़ जाती है|”

हमने समझाया, “देखो भाई, तुम्हारा गणित हमारी अक्ल से परे की चीज़ है| माना कि रोज घूमने से उम्र दस साल बढ़ जाती है, लेकिन भले मानस, इतना तो सोचो कि रोज़ दस मील घूमने और उस घूमने की थकान उतारने में बारह साल के बराबर समय खर्च भी तो हो जाता है| अंत में कुला जमा दो साल का नुक्सान ही हाथ लगता है|”

हम पर तो सत्य प्रकाश जी का जादू न चला, लेकिन हमारी श्रीमती जी उनकी बातों से बहुत प्रभावित हो गईं| जैसी कि पूरी पूरी संभावना थी, उनके बाहर का रास्ता देखते ही हम पर और हमारी नींद पर दूसरा आक्रमण हो गया| यूँ भी हम समाज के उस तबके से ताल्लुक रखते हैं जहाँ पत्नी के पास सबसे बड़े खैरख्वाह होने का जन्मजात लाइसेंस हुआ करता है| उन्होंने बड़े अपनत्व भरे ढंग से समझाने के लहजे में कहा, “सत्तो भाई साहब ठीक ही कह रहे थे| आप दिन चढ़े तक सारे घर को अपने खर्राटों से गुँजाते रहते हैं| अगर सुबह के समय थोड़ी देर के लिए घूम आया करें तो अच्छा ही रहेगा|”

हमने भी सरलता से पूछा, “अच्छा बताओ तो सही, हमें घूमने किस उद्देश्य से जाना चाहिए?”

“शरीर में जमा कैलोरी को जलाने के लिए|” उन्होंने अपना संचित संपूर्ण ज्ञान अपने उत्तर में झोंक दिया था|

“कैलोरी कहाँ से आती है?” हमने जिज्ञासु विद्यार्थी की तरह पुन: प्रश्न किया|

“भोजन से|” श्रीमती जी ने अपने जीव-विज्ञान को तली तक हिलाकर हमारी जिज्ञासा का समाधान किया|

“भोजन कहाँ से आता है?” हमने बात को आगे बढ़ाते हुए जानकारी चाही|

“पैसों से!” हमारे चटपटे प्रश्न का अटपटाते हुए जवाब दिया गया|

“और पैसे?” हमारी ओर से पुन: सवाल दागा गया|

“आप कमाते हैं|” इस बार उन्होंने हमें सम्मानित करने की ठानते हुए कहा|

“कैसे?” हमने फिर शंका प्रकट की|

“मेहनत करके|” श्रीमती जी ने हमारे अस्तित्व को पुचकारते हुए शंका का समाधान किया|

हम समझ गए कि निर्णायक क्षण आन पहुँचा है| हमने अपने भीतर के आलसी को अर्थशास्त्री का जामा पहनाया और उसे श्रीमती जी के भीतर के प्राकृतिक-चिकित्सक पर आखरी प्रहार करने की खुली छूट देते हुए कहा, “अरी भागवान, जब इतना समझती हो, तो काहे के लिए हमें अपनी ही मेहनत की कमाई जलाने के लिए कह रही हो?”

हमारी इस युक्ति का जवाब देवी जी के पास न था| हमारी बात सुनकर उनका मुँह खुला का खुला रह गया| यह तारीखी लम्हा हमारे वैवाहिक जीवन के उन इने-गिने पलों में शुमार होता है, जब हम अपनी श्रीमती जी को लाजवाब कर पाए| बाकी सब तो पंचों को पता ही है|

हमारे एक अन्य साहित्यिक मित्र हैं, भास्करानंद चतुर्वेदी| ‘तारीफ़’ उपनाम से कविताएँ और गज़लें लिखा करते हैं| पिछले दिनों उन्होंने ‘कम्प्यूटर’ और ‘इंटरनेट’ चलाने का प्रशिक्षण भी प्राप्त कर लिया है| इस प्रशिक्षण के बाद अचानक उनके विचारों में प्रखरता बढ़ गई है| रचनाओं के विषयों में भी वैविध्य आ गया है| बात-बात पर अंग्रेजी नाम वाले विचारकों के उद्धरण देने लगे हैं| एक दिन रविवार की सुबह उनका आगमन हुआ| दरवाज़े में घुसते हुए हुए अपने कवि-सुलभ कोमल स्वर में हिकारत की तान भरते हुए पुकारा, “कहाँ हो बंधु? क्या अभी तक चारपाई तोड़ रहे हो?”

अब कोई उनसे पूछे कि रविवार की सुबह एक भला आदमी चारपाई नहीं तोड़ेगा तो क्या शिवजी का धनुष तोड़ेगा| हम बिस्तर से निकले और उन पर यह जताने के लिए कि बस हम तो उठने ही वाले थे, उसे गोल-गोल लपेटने लगे| इसी बीच पल-भर को रुकते हुए उनसे हस्बेमामूल पूछ लिया कि सवारी कहाँ से आ रही है| हमारा सवाल पूरा होने पहले ही भास्करानंद जी का व्याख्यान शुरू हो गया| उन्होंने बताया कि सुबह की सैर से लौटते हुए उनकी हमारे प्रति शुभेच्छा जागी और हमें भी कल सुबह टहलने के लिए चलने का न्योता देने के लिए हमारे घर आन पहुँचे| इसी बीच बड़े लड़के ने मौक़ा ताड़कर हमारा बिस्तरा मजबूती के साथ लपेट कर चारपाई पाँयते की अदवायन पर टिका दिया| हम आँख के इशारे से उसे रोकते, इससे पहले ही नौकर ने हमारा बिस्तरा वहाँ से भी गोल कर दिया| पूरा ज़माना ही दुश्मन बना हुआ था|

हमने हमेशा की तरह इस मामले में ना-नुकुर करते हुए अपनी असमर्थता दिखाई तो उन्होंने उस दिन अपना राज़ हमारे सामने खोल ही दिया, “ये जो तुम अक्सर कहते हो कि आजकल हमारी रचनाओं में नए-नए विचार दिखाई दे रहे हैं, वो सब इस घूमने की वजह से ही है| सुबह के समय जैसे ही मैं घर के बाहर कदम धरता हूँ, मेरा मस्तिष्क विचारों और संवेदनाओं की खान बन जाता है| स्वयं वीणापाणी उपस्थित होकर मुझे वाणी और विचार का वरदान देती हैं| मेरी रचनात्मकता के वरवे के लिए सुबह का वातावरण खाद और पानी का काम करता है| तुम भी आलस्य त्यागो और प्रतिदिन सुबह टहलने का उपक्रम करो|”

मन तो बहुत हुआ कि उनसे साफ़-साफ़ कह दें कि इंटरनेट से चोरी की हुई रचनाओं को स्वयं अपने नाम से छपवाते हो और चोरी की ज़िम्मेदारी देवी सरस्वती पर थोपते हो, तुम्हें शर्म आनी चाहिए| फिर सोचा, आज के समय में सच्चाई इतनी बड़ी चीज़ नहीं रह गई, जिसके लिए एक अच्छे-खासे मित्र की मित्रता से हाथ धो लिए जाएँ| हमने तो बस इतना ही कहा –

“महाराज, आप माने या न माने, आलस्य ईश्वर का दिया हुआ वरदान है| इसे पाना उन प्राणियों के वश की बात नहीं है जो ईर्ष्या, लगाव और भय के जाल में फंसे छटपटाते हैं| इस आशीर्वाद को पाने के लिए बहुत त्याग करना पड़ता है| माया-मोह के जंजाल से विरत होना पड़ता है| लोभ-लालच के प्रपंच से छुटकारा पाना पड़ता है| इच्छाओं के बंधन से मुक्त होना पड़ता है| महत्त्वाकांक्षाओं की वासना को जीतना होता है| तब, कहीं जाकर ईश्वर का यह अनुपम वरदान फलता है| आलसी होना और वीतराग होना एक ही बात है| कहाँ ऋषि-मुनियों के परम्परा और कहाँ सुबह सुबह की शारीरिक और मानसिक आवारागर्दी| कहाँ डायरेक्ट मोक्ष में एंट्री का जुगाड़ और कहाँ स्वर्ग-नरक की धूल फाँकनें का उपक्रम...”

हमने देखा कि कविवर हमारा संवाद पूरा होने पहले ही कुर्सी छोड़कर खड़े हो चुके थे| उनके हाथ नमस्कार की मुद्रा में जुड़े हुए थे| हमने उनके नमस्कार को स्वीकार किया और दरवाजे तक उन्हें विदा करने के लिए चल दिए| दरवाजा बंद करके लपकते हुए अपने स्थान पर लौटे और अपनी चारपाई पर बिछ गए| अब केवल किसी को तकिया और चादर लाने के लिए पुकारना भर बाकी रह गया था|


चित्र http://isha.sadhguru.orghttp://perspectives.3ds.com से साभार

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "यूपी का माफ़िया राज और नए मुख्यमंत्री “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  2. Very well written.. पढ़कर मज़ा आ गया| पढ़कर मज़ा आ गया। वाकई, जीवन में कभी-कभी कुछ ना करने के वक़्त की भी बहुत महत्ता है!

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    1. बहुत धन्यवाद, दीपांश जी| आप जैसे सुधि पाठक उत्साह बढाते हैं तो लिखने की इच्छा चार गुनी हो जाती है|

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