अपनी बात

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Sunday, March 5, 2017

आज का युगधर्म

हमारा देश एक भिक्षा-प्रधान देश है|

भिक्षा के क्षेत्र में हमने अभूतपूर्व उन्नति की है| स्थिति यहाँ तक आ पहुँची है कि भिक्षा माँगना हमारे देश में मात्र एक कार्य नहीं रहा है, उसने तो यहाँ कला और विज्ञान का रूप धारण कर लिया है| इस वृत्ति की साधना में राजा से लेकर रंक तक सभी अपना योगदान सदैव तत्पर रहते हैं|

ध्यान रहे, हमारे देश में राजा बलि जैसे महान दानवीर हुए जिन्होंने अपना सब माल-मत्ता वामन के चरणों में धर दिया| भामाशाह भी हुए जिन्होंने अपना सर्वस्व महाराणा प्रताप को सौंप दिया| कहते हैं कि वह राशि इतनी अधिक थी कि पाँच हजार सिपाहियों को बारह साल तक दिहाड़ी दी जा सकती थी| कर्ण ने अपने जीवन-रक्षक औजार इंद्र को सौंप दिए थे| कभी सोचा है कि इन दानवीरों का नाम किनकी कृपा से इतने आदर के साथ लिया जाता है? मैं बताता हूँ, असल में माँगने की ऐतिहासिक विदग्धता के चलते ही ऐसा हो पाया| माँगने वाले न होते, तो देने वाले ही कहाँ होते? कारण के बिना कार्य होना कैसे संभव है?

कहना न होगा कि हमारा देश एक से एक महान भिखारियों से अटा पड़ा है| हमारे परम मित्र चकौड़ी दास कुछ दिन पहले मुम्बई के बिस्सा के बारे में बता रहे थे| मलाड इलाके में रहने वाला यह अनुकरणीय महापुरुष सायं सात बजे नित नियम से घर से निकलता है| उसकी सफ़ेद पोशाक हमारे नेताओं को शर्मिन्दा करने वाली होती है| रास्ते में किसी स्थान पर वह अपने धंधे की वेशभूषा अर्थात् मैले-चीकट वस्त्र पहन लेता है| फिर, सारी रात नाइट-क्लबों के बाहर भिक्षावृत्ति करके पौ फटने से पहले ऑटो पकड़कर घर की ओर रवाना हो जाता है| इस बीच में वह चाय-पानी या दोस्तों से गपियाने के लिए एक क्षण का भी अवकाश नहीं लेता| सुनने में आ रहा है कि उसके पेशेवर रवैये से प्रभावित होकर सरकारी दफ्तरों में काम करने वाले कर्मचारियों के लिए ‘वर्कशॉप’ का आयोजन करने की योजना बनाई जा रही है| उम्मीद है, इस आयोजन के बाद इक्का-दुक्का लोग तो समय पर दफ्तर पहुँचकर पूरे दिन अपनी सीट पर टिके रह कर काम करना सीख ही जाएंगे| तो, इस तरह जन-प्रशासन के क्षेत्र में भी भिक्षुकों का योगदान बढ़ने वाला है|

लोक में बहुत से लोग ऐसे भी मिलते हैं जो इस धंधे को हीन मानते हैं| वे इस धंधे को हीन इसलिए मानते हैं क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे दो समय की रोटी तो मिल सकती है लेकिन उससे अधिक पाने की गुंजायश इसमें नहीं है| ऐसे लोगों के ज्ञान-चक्षु मेरठ के उन भिक्षुकवर की कथा से अवश्य खुल जायेंगें जिनकी मृत्यु के बाद उनकी पोटली में से बारह लाख से भी अधिक की मुद्रा बराबद हुई थी| यह राशि उस राशि से कहीं अधिक है जो सारी ज़िंदगी काम करने के बाद औसत हिन्दुस्तानी रिटायरमेंट के बाद फंड के रूप में प्राप्त करता है| भारत की जी.डी.पी. के लिए ग्रहण के राहु बने हुए गरीब-गुरबों की करनी को थोड़ा-बहुत प्रभावहीन करने में ऐसे परोपकारियों के योगदान को कम करके नहीं आँकना चाहिए| तो बंधुओं और भगिनियों, यह छोटा सा उदाहरण बताता है कि इस पेशे के सहारे न केवल वर्त्तमान बल्कि आने वाली पीढ़ियों की दरिद्रता को भी दूर किया जा सकता है| देश-विदेश में भारत को आर्थिक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करने में भी ये लोग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं|

भिक्षा एक ऐसा उद्योग है जिसमें कम से कम साधनों की आवश्यकता पड़ती है| थोड़े से फटे कपड़े, ज़रा सी अभिनय कला, चेहरे पर बेचारगी, सही ग्राहक की पहचान और अल्पीयसी मात्रा में धीरज के साथ करुणा की चास हो तो इस क्षेत्र में सफलता की असीम संभावनाएँ हैं| टैक्स और चालान का कोई झंझट नहीं, लाइसेंस के लिए जीवनपर्यंत प्रतीक्षा करने की आवश्यकता नहीं, पर्यावरण विभाग के क्लियरेंस के लिए बड़े साहब को भेंट-पूजा चढ़ाने की जरूरत नहीं, सरकार की सब्सीडी प्रदान करने वाली किसी योजना का इंतज़ार करने की दरकार नहीं और सबसे बढ़कर बात तो यह है कि भगवान को इस बात के लिए दोषी ठहराने का महापाप अपने सिर लेने की जरूरत नहीं बचती कि उसने किसी ऐसे समुदाय या वंश में जन्म नहीं दिया जहाँ आरक्षण का लाभ मिल पाता|

हमारे परिचय में संतलाल नामक सज्जन हैं| उन्होंने रिक्शा चलाने से लेकर सब्जी बेचने तक के सभी उद्योगों में हाथ आजमाया, पर अपने कैरियर को किसी अपेक्षित मुकाम तक न पहुँचते देख, अंतत: इस सरल और सुभग वृत्ति की ओर उन्मुख हुए| वे आजकल ‘नारायण हरि’ की पुकार लगाते हुए हर मंगलवार और शाविवार को बाकायदा दो-दो शिफ्टों में भिक्षा माँगते हैं| उन्होंने अपने कुछ चेले भी बना लिए हैं जो कि शेष दिनों में यह कार्य करते हैं| आय का नियमत: हिसाब रखा जाता है जिसका सप्ताहांत पर बँटवारा भी होता है| हमारा तो यहाँ तक मानना है कि समाजवाद के इस अनुपम उदाहरण को देखकर कार्ल मार्क्स की आत्मा भी सुख की गहरी साँस लेते हुए दमे के मरीज की शक्ल अख्तियार कर लेती होगी| फिलहाल, वे किसी सी.ए. की सलाह से अपनी आय का सही जगह निवेश करने के उपक्रम में लगे हुए हैं| तयशुदा बात है कि उनकी इस इच्छा को समाजवाद और पूँजीवाद के बीच के पुल के रूप में देखा जा रहा है जिसमें कार्यकर्ता शुद्ध समाजवाद और उनका नेता समाजवाद के पतंगी कागज़ में लिपटा शुद्ध पूँजीवाद बन जाता है|

जैसा कि हम पहले ही कह आये हैं कि भिक्षावृत्ति एक कला है| अनेक भिक्षुक इस कला के चरम तक पहुँच चुके हैं| संगीत के क्षेत्र में बिथोविन को और चित्रकला के क्षेत्र में पिकासो को जो मुकाम हासिल है वही महारत भिक्षुकों की राजधानी दिल्ली के कटरा लुहारान में रहने वाले रहमत ने भी प्राप्त किया है| चलिए, रहमत से पहले राजधानी की बात कर लेते हैं – दिल्ली में एक से बढ़कर एक भिक्षुक मिलते हैं| भिक्षा में दारू की बोतल से मुर्गा तक, वोट से लेकर नोट तक, अवार्ड से लेकर रिवार्ड तक, म्युनिसिपल कारपोरेशन के टिकट से राज्यसभा की सीट तक सब भिक्षा में लिए और दिए जाते हैं| जब ये सब अपनी जरूरत से ज्यादा हो जाते हैं, तब उनकी खरीद-बेच भी चालू हो रहती है| हाँ, तो भिक्षुकों की राजधानी दिल्ली के कटरा लुहारान में रहने वाले रहमत की बात चल रही थी जिसने भिक्षावृत्ति को नए आयाम दे दिए थे| उसने वेश-भूषा, अभिनय, वातावरण निर्माण, स्थान एवं अवसर का चुनाव तथा अन्य सहायक उपकरणों के प्रयोग पर एक पूरा शोध-प्रबंध ही लिख दिया है| उसका कार्य निपट चिंतन तक ही सीमित नहीं रहा, अपितु प्रायोगिक स्तर पर भी इन सभी को वृत्ति के आवश्यक उपादानों में स्थान दिलाया| सुना है आजकल तो रहमत मियाँ भिक्षावृत्ति के प्रशिक्षण संस्थान चला रहे है| बड़े-बड़े नेता, अभिनेता, उद्योगपति, विचारक, चिकित्सक, आई.ए.एस. आदि अपने विशिष्ट और व्यक्तिगत अनुभवों को प्रशिक्षुओं के साथ साझा करने के लिए संस्थान में पधारते हैं|

हमारे समाज ने इस कदर ताबड़तोड़ प्रगति कर ली है कि उसमें भिक्षावृत्ति एक कलंक न रह कर सामाजिक प्रभाव एवं वर्चस्व का मापदंड हो गयी है| सबसे बढ़िया बात तो यह है कि हम सभी इस काम में आगे निकलने की स्वस्थ प्रतियोगिता में लगे हुए हैं| “अरे भाई साहब, हमारी चंदौसी वाली मौसी के लड़के की शादी में ग्यारह लाख नकद मिले थे| हमारा लल्लू तो उनके बल्लू से ज्यादा कमाता है| इसकी शादी में उससे कम से कम दो गुना दान-दहेज़ तो मिलना ही चाहिए|” यह संवाद थोड़े बहुत परिवर्तन के साथ घर-घर में उस समय दोहराया जाता है जब लल्लू के लिए अपनी लल्ली का रिश्ता लेकर आये हुए भावी समधी साहब के हाथ में अदरक कढ़ी हुई चाय का प्याला पकड़ाया जा रहा होता है| बिचौलिया जी भी एकांत पाकर अनमने और किंकर्त्तव्यविमूढ़ से बैठे हुए भावी समधी साहब से कह उठते हैं, “भाई साहब, पैसा तो हाथ का मैल है और आप हैं कि उसके चक्कर में इतने सुन्दर रिश्ते को हाथ से निकल जाने दे रहे हैं|” इसे कहते हैं भिक्षा माँगना और वह भी अपनी शर्तों पर| अमरीका जैसे ताकतवर मुल्क भी इस मामले में हमारी बराबरी नहीं कर सकते|

भिक्षावृत्ति को हम नैतिक रूप से भी स्वीकार कर ही चुके हैं| इसके लिए बनाए गए सहस्र नामों में से कुछ पाठकों के ज्ञानवर्धन के लिए यहाँ दिए जा रहे हैं – नज़राना, डाली, घूस, रिश्वत, भेंट-पूजा, हलाल की, पैकेट, डिब्बा, लिफ़ाफ़ा, उपहार, संगत, सुविधाशुल्क, हरियाली, महात्मा गाँधी, मिठाई, बच्चों के लिए, मानदेय, चाय-पानी आदि| इन सभी नामों का प्रयोग लेने और देने वाले की हैसियत के अनुसार किया जाता है| एक समय था जब भिक्षा पाने के लिए माँगना होता था और आवश्यक रूप से घर-घर और दर-दर की ख़ाक छाननी होती थी, पर अब यह काम मोटी गद्देदार कुर्सियों पर अपने वजन को टिकाकर भी किया जाता है| नेत्रों में थोड़ी अन्यमनस्कता लाना काफी होता है| इसके बाद दानीजन स्वयं ही दुहरे हो हो कर अपने कर्त्तव्य और भिक्षुक की इच्छा को पूरा कर देते हैं| लेने वाले के चेहरे पर अधिकार का और देने वाले के चेहरे पर बेचारगी का भाव स्वत: आ जाता है| वर्ग समानता के प्रसार के लिए कितना अच्छा हो रहा है! समाजवाद जिंदाबाद!

हमारे देश के प्रधान भिक्षुक समय-समय पर भिक्षावृत्ति के लिए देश-विदेश के दौरों पर जाते हैं, जिससे सिद्ध होता है कि हमने इस क्षेत्र में आशातीत प्रगति कर ली है| हम नगरीय या प्रादेशिक स्तर के चवन्नी-अठन्नी छाप भिखारी न रहकर अन्तर्राष्ट्रीय स्तर के भिक्षुकों में शुमार होने लगे हैं जो सात सितारा होटलों में महंगी शराब के गिलासों पर हाथ साफ़ करते हुए माल कमाते हैं|

मनुष्य प्रयत्न करता है तो ईश्वर भी सहायक हो जाता है| हमारा देश इस विचार का जीता-जागता उदाहरण है| हर वर्ष प्रकृति भी अपने स्तर पर इस महान कार्य की सफलता में अपना योगदान देती है| कभी अतिवृष्टि के रूप में तो कभी अनावृष्टि के रूप में, कभी सुनामी के रूप में तो कभी भूचाल के रूप में, कभी महामारी के रूप में तो कभी बाढ़ के रूप में प्रकृति अपनी कृपा के अमृत से हमें सराबोर कर देती है| भिक्षा में प्राप्त धन से खजाने लबालब भर जाते हैं| हमारा देश जो कभी सोने की चिड़िया कहलाता था, अचानक सोने का कटोरा बन जाता है| हम बड़े अभिमान से उस सोने के कटोरे का नाम कभी ‘आपदा-कोष’ रखते हैं तो कभी ‘प्रधानमंत्री राहत-कोष’| कटोरे की कृपा से आपदाग्रस्तों को कितनी राहत मिलती है ये तो वे ही जाने अलबत्ता जो देश का बच्चा-बच्चा जानता है वह यह है कि उस कटोरे के प्रताप से कई घरों के आगे बड़े-बड़े गेट बन जाते हैं, गेटों के आगे लम्बी पूँछ वाली गाड़ियाँ, गाड़ियों के अन्दर सफ़ेद टोपियाँ और टोपियों के नीचे बुर्राक सफ़ेद पोशाकें सजने लगती हैं|

तो, प्रिय पाठकों, भिक्षावृत्ति के प्रति अपने मन किसी गलत धारणा को स्थान मत दो| यह तय है कि आज के युग में इस वृत्ति के बिना गुजारा नहीं है| पढ़ा-लिखा आदमी नौकरी माँगता है, मालिक काम माँगता है, श्रोता साहित्य माँगता है, कवि दाद माँगता है, नेता वोट माँगता है, जन-मन आश्वासन माँगता है, सताया हुआ न्याय माँगता है, न्यायालय सबूत माँगता है, भूखा रोटी माँगता है, छका हुआ चैन माँगता है, दबा-कुचला खुला आसमान माँगता है, समाज मर्यादा माँगता है, मरीज आराम माँगता है, डॉक्टर फीस माँगता है, भक्त दया माँगता है, ईश्वर श्रद्धा माँगता है और ईश्वर का ठेकेदार चढ़ावा माँगता है| सब तरफ मांगा-तांगी का बाजार गर्म है| वैसे भी ये तो पतीले से निकाले हुए जँचनी के चावल हैं| बाकी भीतर ही भीतर खुदबुदा रहे हैं| उस खुदबुदाहट को कान लगाकर अवधानपूर्वक सुनो| उसमें छिपे उपदेश को एकाग्र होकर ध्यान से आत्मसात करो| यह सब करने के बाद देखो कि आज का युगधर्म क्या है| समय का सत्य तुम्हारे सामने है| बाकी तुम जानो, तुम्हारा काम जाने|


चित्र http://navbharattimes.indiatimes.com से साभार 

4 comments:

  1. ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, "अरे प्रभु, थोड़ा सिस्टम से चलिए ... “ , मे आप की पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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    1. बहुत धन्यवाद! आपकी कृपा बनी रहती है|

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  2. Replies
    1. धन्यवाद! कृतकृत्य हूँ कि आपको रचना अच्छी लगी|

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