अपनी बात

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Sunday, February 26, 2017

नाम-महिमा


नाम एक ऐसा रत्न है जो मनुष्य के पास ता-उम्र रहा करता है| इसे चमकाया जा सकता है, बिगाड़ा जा सकता है, मिट्टी में मिलाया जा सकता है, डुबाया जा सकता है, ऊँचा उठाया जा सकता है, गिराया जा सकता है, खराब किया जा सकता है, कमाया जा सकता है, ताक पर रखा जा सकता है और यहाँ तक कि बदनाम भी किया जा सकता है लेकिन इसे समाप्त नहीं किया जा सकता| इंगलिस्तान में जन्मे शेक्सपीयर कहते हैं कि नाम में क्या रखा और इधर हमारे ज्योतिषी लोग नाम के आधार पर भविष्य बताने को तैयार रहते हैं| वे बड़े लेखक हैं, सही ही कहते होंगे, नाम में शायद कुछ नहीं रखा, पर अक्सर सोचता हूँ कि नाम क्यों रखा जाता है| और, इससे भी अधिक यह कि नाम कैसे रखा जाता है| यहाँ मेरी मुराद केवल उसी नाम से नहीं है जिसे माँ-बाप, नाते रिश्तेदार बड़े प्यार से रखा करते हैं, अपितु उन सभी नामों से है जो मनुष्य को अकारण-सकारण, समय-असमय, विधानपूर्वक-अवैध रूप से प्यार से, व्यंग्य से, चुभाकर, सहलाकर मिला करते हैं|

सबसे पहले माँ-बाप का दिया नाम सामने आता है जो बड़े तामझाम और आडम्बर के साथ रखा जाता है| पंडित बुलाया जाता है, हवन का आयोजन होता है और फिर शास्त्रोक्त ढंग से नामकरण संस्कार किया जाता है| नाम रखने के एवज में बुआ को बड़ा सा नेग मिलता है| नाना-मामा उपहार लेकर आते हैं| एक नाम राशि के आधार पर रखा जाता है, जिसका सामान्यत: प्रयोग नहीं किया जाता| रोजमर्रा के उपयोग के लिए दूसरा नाम रखा जाता है| यही नाम स्कूल में लिखाया जाता है, इसी नाम के लिए लोग मंदिर, धर्मशाला, प्याऊ और न जाने क्या क्या बनवाते हैं| इसी नाम के आगे बड़े दिखावे के साथ श्री, मिस्टर, महाशय और हजरत आदि लिखना-लिखाना शान और सम्मान की बात समझी जाती है| इसी नाम के आगे कुलनाम लिखा जाता है| धीरे-धीरे उपाधियाँ, शैक्षणिक योग्यताएँ, उपनाम और पिता काम आदि मूल नाम के साथ जुड़ते चले जाते हैं| जुड़ती तो सैंकड़ों अच्छी-बुरी बातें भी हैं, पर उन्हें लिखा नहीं जाता| नाम अपने संगी-साथियों के साथ रजिस्टरों में चढ़ते हैं, सरकारी कागजों में लिखे जाते हैं, मंदिर की सीढ़ियों पर खोदे जाते हैं, पार्कों की बेंचों पर उकेरे जाते हैं और यहाँ तक कि कभी-कभी तो प्रसाधन कक्ष की दीवारों पर इस तरह की इबारत के साथ अंकित किये जाते हैं – “नगर निगम द्वारा प्रायोजित मूत्रालय का उदघाटन अमुक तिथि को अमुक महानुभाव के हाथों अमुक दिन को संपन्न हुआ|” किसी दूकान का उद्घाटन हो तो उद्घाटनकर्ता फीता काटने के बाद दूकान से कुछ खरीदा भी करते हैं| परियोजना का उद्घाटन हो तो उद्घाटनकर्ता मशीन का बटन दबा कर उसका श्रीगणेश करते हैं| मेरे विचार में अब यह समझने में कतई मुश्किल नहीं होनी चाहिए कि इस तरह के निर्माण का उद्घाटन करने में उद्घाटनकर्ता को कितनी शर्मिन्दगी का सामना करना पड़ता होगा| नाम के लिए न जाने क्या-क्या करना पड़ता है|

कुछ अन्य नाम मिला करते हैं सगे-सम्बन्धियों, नाते-रिश्तेदारों से| प्राय: ये नाम असली नामों के प्राकृत रूप हुआ करते हैं| इस तरह के नामों की रचना बहुत आसान हुआ करती है, उदाहरण के लिए, वीरेन्द्र का ‘वीरू’, धीरेन्द्र का ‘धीरू’, अनुपम का ‘अन्नू’, चंद्रशेखर का ‘चंदू’, नंदकिशोर का ‘नंदू’ आदि| कुछ स्टैण्डर्ड नाम भी होते हैं जिन्हें रखने के लिए किसी आधार की तलाश नहीं करनी पड़ती जैसे - पप्पू, गप्पू, चप्पू, लल्लू, बिल्लू, मिंटू, राजू, टोनी, चुन्नू, चिंटू, बंटी, बंटू, टॉमी आदि| इस प्रकार के नाम बहुत आसानी से लोगों की ज़ुबान पर चढ़ जाया करते हैं| इन बहु-उपयोगी नामों का प्रयोग मनुष्यों के साथ-साथ कुत्ते-बिल्ली आदि जानवरों के लिए भी सामान सरलता और सहजता से हुआ करता है| कई बार इस तरह के नामों का आधार रंग-रूप और शारीरिक लक्षणों को भी बना लिया जाता है| हमारे पड़ौसी मालिक साहब बड़े लाड़ के साथ अपने पुत्र को ‘कल्लू’ और अपनी भैस को ‘भूरी’ कहकर पुकारते हैं| कारण सीधा सा है – लड़के का रंग कुछ गिरता हुआ है और भैंस का रंग कुछ उठता हुआ है|

कुछ नाम ऐसे होते हैं जो यार-दोस्तों, पड़ौसियों-परिचितों, सहकर्मियों-सहपाठियों अथवा किसी अन्य के द्वारा प्रशंसा या घृणा की भावना से अभिभूत होकर या कई बार बिना किसी भावना के सायास या अनायास ही रखे जाते हैं| असल में ये नाम नहीं होते, होते तो उपनाम ही हैं, पर देखा जाता है कि समाज में ये उपनाम, नाम से भी कही अधिक प्रसिद्धि पा जाया करते हैं| कई बार ये उपनाम माँ-बाप के नाम के आधार पर बनते हैं, जैसे हरीश ‘भूरे का’, संदीप ‘जोगी का’ आदि| निवास स्थान के आधार पर भी इस तरह का नामकरण होता देखा गया है जैसे, धीरेन्द्र ‘खतौली’, सुन्दर ‘कूकड़ा’ आदि|
आदतों के आधार पर भी इस प्रकार के नाम रखे जाते हैं| हमारा एक साथी जो छिप-छिप कर सिगरेट पिया करता था, सूरज ‘सुट्टा’ के नाम से जाना जाता है| लक्की शराबखोरी की आदत की वजह से लक्की ‘बाटली’ कहाने लगा और अनिल अपने बड़बोलेपन के कारण लोक में अनिल ‘बतोल्ला’ के नाम से प्रसिद्ध हुआ|

कई बार किसी चारित्रिक विशेषता के चलते भी इस तरह का नामकरण हो जाया करता है| हमारे बचपन के साथी पंकज ‘खटपटिया’ का नामकरण उनकी सारी दुनिया से झगड़ने की आदत के कारण ही हुआ था| हरीश अपने चारित्रिक अपकर्ष के कारण हरीश ‘लुच्चा’ तथा धीरेन्द्र अपने अनाड़ीपन के चलते धीरू ‘अनाड़ी’ कहलाए| जै किशन को बहुत धीरे बोलने की आदत है, सो उनका नामकरण हुआ जे के ‘फुसफुस’| दूसरी ओर जोर-जोर से बोलने वाले राजेन्द्र मिश्र महोदय को नाम मिला – राजेन्द्र ‘हल्ला’|

कुछ नाम खानदानी पेशे को ध्यान में रखते हुए भी दिए जाते हैं| इस तरह के नामों की कुछ बानगियाँ देखें – चिंटू ‘चूरन’, संजय ‘लाला’, अजय ‘परचून’, जै भगवान ‘कबाड़ी’ आदि| शारीरिक आकार-प्रकार भी इस श्रेणी के नामों के रखे जाने का कारण बनते हैं| बिट्टू भाई अपने छोटे और मोटे शरीर के कारण बिट्टू ‘बिटौड़ा’, हरेन्द्र कुमार शर्मा अपने नुकीले चेहरे की कृपा से हरेन्द्र ‘जूता’, अशोक खरे अपने अतीव गौरवर्ण के कारण अशोक ‘भूरा’, प्रमोद बिंदल अपनी चार फुट नौ इंच की काया की वजह से प्रमोद ‘खुंटा’, भुल्लन सिंह अपने भयानक रंग-रूप के कारण भुल्लन ‘भूत’ और राजसिंह बालियान अपनी हाथ हिला हिला कर बोलने की आदत के कारण राजू ‘चील’ कहलाते हैं| बाबू रामकिशोर अपने प्रागैतिहासिक साइकिल पर चलते चलते रामू ‘खटारा’ बन गए तो नलों के मरम्मत करने वाले प्रदीप भाई कब पद्दू ‘नलका’ में तब्दील हो गए, पता ही नहीं चला| रिटायर्ड सफाई इन्सपेक्टर मोहनलाल बरनावे वाले का पोता आजकल किशन ‘बरनावा’ के नाम से पुकारा जाता है| एकलोचन मुनेश का नाम मुनेश ‘डिप्टी’ किस आधार पर बना इस बात की विद्वज्जन में आज भी चर्चा है| कुछ नाम केवल मुखसुख के लिए भी रखे जाते हैं, जैसे – समीर ‘साहू’, चिंटू ‘चकोर’, चमन ‘चरखा’ आदि|

कुछ लोग, मुख्यत: कविजन स्वयं ही अपने नाम के आगे उपनाम लगा लिया करते हैं| नीरज, दिनकर, सुमन, इलाहाबादी, देवबंदी, पटाखा, मुरादाबादी, कुल्हड़, हुल्लड़, निजामी और भोंपू जैसे स्वनामधन्य कवियों के उपनाम इसी श्रेणी में आते हैं|

कतिपय लोक-प्रसिद्ध नामों के साथ कुछ अंतर्कथाएँ भी जुडी रहती हैं| हमारे मुबारक़ शहर मुज़फ्फ़र नगर में एक राजेश नामक महापुरुष रहते हैं| उनके बारे में प्रसिद्धि यह है कि जब उनके चचा साहब का विवाह हुआ तब वे अपने बालसुलभ कौतूहल के चलते रात में यह सुनने के लिए कि आखिर शादीशुदा लोग बात क्या करते हैं, चचा की खाट के नीचे जा छुपे और बदकिस्मती के मारे पकड़े भी गए| मौहल्लों के माहौल में बात खुलने में देर ही कितनी लगती हैं! पौ फटने से पहले गली के कुत्तों तक को इस बात की खबर लग लग चुकी थी| चुस्कियां ले लेकर सालों तक यह घटना सुनी-सुनाई जाती रही और राजेश का नया नाम पड़ा राजेश ‘खटोला’|

हरवेश जी भी हमारे शहर की नायाब हस्ती हैं| उनके दिमाग का पेंच थोड़ा ढीला माना जाता है| वैसे तो वे ठीक-ठाक दिखाई देते हैं, परन्तु कभी कभी अजीबोगरीब हरकत कर बैठते हैं| एक बार दशहरे के अगले दिन अपने भाई की लाइसेंसी बन्दूक उठा लाए और रामावतार हलवाई की छाती पर तान कर बोले, “क्यों बे चिमटे, बहुत शौक है समोसे तलने का, मेरे लिए घुइयाँ का समोसा बना नहीं तो निपटाता हूँ तेरा अखाड़ा|” रामावतार हलवाई घुइयाँ का समोसा तो क्या बनाते, बस एक हथेली में अपनी जान और दूसरी में धोती की खुली हुई लान दबा कर अपनी तोंद उछालते हुए वो बगटुट भागे कि क्या कहें! इसके बाद ये हजरत रामलीला मैदान में जा पहुँचे| वहाँ रामलीला मंडली वाले सामान समेट कर जाने की तैयारी कर रहे थे| हनुमान की भूमिका निभाने वाला कलाकार बस के पीछे वाली सीढ़ी पर चढ़ा हुआ छत पर सामान लदवा रहा था| उसके पीछे बंदूक की नाल टिकाकर कहने लगे, “कल लीला में सबके सामने बहुत उछल-कूद मचा रहा था, अब छलांग लगा तो जानूं|” बेचारे हनुमान जी डर के मारे बेहोश होकर धप्प से जमीन पर आ गिरे| इसी बीच कोई भागकर पास की चौकी से दरोगा को बुला लाया| दरोगा जी लष्टम-पष्टम करते आकर खड़े ही हुए थे कि बन्दूक की नाल उनकी छाती पर आ लगी| “तू दरोगा है, तो मैं मेजर हूँ| मैं मेजर हूँ तो तू पाकिस्तान है| चल लड़ाई लड़ाई खेलते हैं|” खैर साहब, बड़ी मुश्किलों से उन्हें काबू किया गया| दरोगा से उन्हें दो-चार चपत मिले और जनता-जनार्दन से नया नाम हरवेश ‘मेजर’|

इस चित्र-विचित्र संसार में एक से एक नाम सुनने को मिलते हैं| मुलायम सिंह को देखें| जो पहले से ही मुलायम है उसमें सिंहत्व का अभाव तो स्वत:सिद्ध है, लेकिन रखने वाले ने रख ही दिया| शेरसिंह और रतनलाल में पुनरुक्ति दोष होने पर भी ये नाम बहुतायत से मिलते हैं| काले, कुरूप रूपचंद के नाम की संगति उनके उनके व्यक्तित्व से कोई वेदांती बिठा ले तो बिठा ले, किसी आम सांसारिक आदमी के बस का तो यह खेल नहीं है| पहाड़ सरीखे राईचंद का नाम किस आधार पर रखा गया, उनके अभिभावक ही अच्छी तरह समझा सकते हैं| कमलनयन को जब ब्रेल-लिपि में लिखते देखता हूँ तो मन का दुःख दूना हो जाता है| सिगरटी टांगों के स्वामी अंगद सिंह, अंगूठाटेक ज्ञानचंद, सौ प्रतिशत नास्तिक भगतराम और लड़ाई के समाचार सुनकर थर-थर काँपते युद्धवीर अपने नामों से क्यों पुकारे जाते हैं, शोध का विषय है|

हमारे एक परिचित हैं – पठाणे साहब| उन्होंने तो बस यह समझ लीजिए कि नामों पर पूरी थीसिस ही लिख डाली है| एक दिन सुबह-सुबह अपना दमकता चेहरा लिए आ पहुँचे| हमने उत्फुल्लता का कारण जानना चाहा तो कहने लगे, “आज ऐसी खोज हो गयी है जिसे सुनकर बड़े-बड़े शोधार्थी भी पानी भरते नजर आयेंगें|” हमने कहा कि भई, हम भी तो सुने कि ऐसी क्या खोज हो गयी? पठाणे साहब संजीदगी से बोले, “देखो भाई, किसी और से मत कह देना| ऐसे विचारों के चोरी होने का भय रहता है|” हमारे आश्वासन देने पर उन्होंने जो बताया उसका सार यह था कि सभी नाम हिन्दी नामों को बिगाड़ कर ही बनाए जाते हैं, जैसे- आंद्रे अगासी बना औदुम्बर अगाशे से, डेमी मूर बना दमयंती मोरे से, आर्नोल्ड श्वार्त्नेगर बना अर्जुन से शिवाजीनागरे से, मोनिका सेलेस बना मेनका सोलंकी से, रोजर मूर बना राघव मोरे से, स्टीव वॉ बना सीताराम वाघ से और तो और जॉन वॉन जोवी भी जयभान जोशी से ही बना है| यह सब सुनके हमने इस महान खोजी की जय बोली और एक कप मसाले वाली चाय पिला कर विदा किया| बेपर की उड़ाने में हम हिन्दुस्तानियों का जवाब नहीं नही!

नाम अनंत हैं| उनकी महिमा अनंत है| नाम का जाप करते हुए बड़े-बड़े डाकू साधू बन जाते हैं| ‘नाम चलता रहे’ की मनोकामना के चलते देश की जनसंख्या बिजली की तेजी से बढ़ती चली जा रही है| नाम तो नाम है, पर उसके पूछने की कला का भी जवाब नहीं| एक बार एक उर्दूदाँ से मिले| पहली ही मुलाक़ात थी| तपाक से हाथ मिलाकर बोले, “हुजूर का इस्मेशरीफ़ क्या है?” हमने अजमेर शरीफ, नवाज शरीफ और पाक़ कुरान शरीफ का नाम सुना था, पर इस्मेशरीफ़ पर हम चक्कर खा गए| खैर, उस समय तो हें..हें.. करके बात टाल गए, लेकिन बाद में पता चला कि उन्होंने तो सिर्फ हमारा नाम पूछा था| इससे भी बुरी तो तब बीती थी जब एक दक्षिण भारतीय सज्जन ने नाम पूछे जाने पर लगभग काव्यपाठ ही करना प्रारम्भ कर दिया था|

बुजुर्ग कहते हैं कि नाम को संभाल कर रखिये| बैक वालों से अनुरोध है कि कोई ऐसा लॉकर भी तैयार करें जिसमें नाम को भी रखा जा सके और जरूरत पड़ने पर ही निकालकर उसका प्रयोग क्या जा सके|

||इति नाममहिमा संपूर्णम्||

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