अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Friday, December 9, 2016

मौहल्ले में क्रान्ति

श्राद्धों का मौसम चल रहा था|
कुत्ते दावतें उड़ाने में व्यस्त थे| पंडित जी अपना झोला लिए किसी घर की ओर बढ़ते दिखाई दिए नहीं कि श्वानवृन्द ऊर्ध्वकर्ण होकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ता| इधर पंडित जी सांकल खड़खड़ा कर दरवाजा खुलने का इंतज़ार करते और उधर पूँछ-संचालन का कार्य अबाध गति से प्रारम्भ हो जाता| पंडित जी दरवाजा खोलने वाले जजमान के लिए हाथ उठाकर आशीर्वचनावली का गान करते और पीछे से कूँ कूँ का स्वर उनकी संगत देता| अन्दर से मन्त्र पढ़ने की आवाजें आती तो बाहर रसीले व्यंजनों के स्मरणमात्र से चलायमान जिह्वाओं के लपलपाने की ध्वनि| इसके बाद खानपान का कार्यक्रम प्रारम्भ होता| गलियों में घूमते हुए कुत्तों का दल चबूतरे पर रखे भोज्य-पदार्थों की ओर लपक पड़ता| आपस में खूब कहासुनी होती| छीना-झपटी के दौर चलते| दन्त-नखक्षतों का आदान-प्रदान होता| भागदौड़ होती| लड़ाई-झगड़े होते| विविध स्वरों में एक-दूसरे पर दोषारोपण होता| देखने वाले उस दिव्य दृश्य का भरपूर आनंद लेते और हँस-हँसकर उनकी चित्र-विचित्र भाव-भंगिमाओं का सांगोपांग बखान करते|
कुत्तों में कुछ नेतानुमा कुत्ते भी थे| वे लड़ते-झगड़ते थे| छीना-झपटी करते थे| काटते-खसोटते थे| खाना देने वाले के सामने दो पैरों पर खड़े होकर पूँछ भी हिलाते थे और साथ ही अपने साथियों पर यह भी जताते थे कि उन्हें वह सब पसंद नहीं|
एक दिन की बात, खाना देने वाले ने खाना दिया| कुछ को मिला कुछ को नहीं मिला| जिन्हें मिला उन्होंने थोड़ा और पाने के लिए और जिन्हें नहीं मिला उन्होंने सिर्फ पाने के लिए पेट दिखाकर और उछलकूद कर देने वाले की चिरौरी करना प्रारम्भ किया| अन्नदाता शायद बुरे मूड में था| उस दिन उसे वह सब अच्छा नहीं लगा| यह आवश्यक तो नहीं कि जो अच्छा हो वह अच्छा ही लगे| वैसे आवश्यक तो यह भी नहीं कि जो अच्छा हो वह ही अच्छा गले| कारण कुछ भी रहा हो, पर हुआ यह कि उसने एक कुत्ते के पेट पर जमाकर पादप्रहार किया| दो-चार उच्च गुणवत्ता की गालियाँ दीं| उन्हें उनके जातिनाम से संबोधित किया| और भविष्य में आस-पास न दिखाई देने की ताकीद भी कर दी|
चोटिल कुत्ते ने अपने नेताओं से शिकायत की| शिकायत हुई तो नेताओं के लिए भी कुछ न कुछ करना अनिवार्य हो गया| उन्होंने सिर जोड़कर आपातकालीन सभा की| स्वाभाविक बात थी कि एजेंडा ‘कुत्तों के आत्मसम्मान की रक्षा’ ही था| विचार-विमर्श हुआ| उस दौरान चमत्कारिक रूप से न कोई झगड़ा हुआ और न ही किसी बात पर किसी ने असहमति व्यक्त की| जन्म-जन्म के शत्रु कुत्ते एक दूसरे को अत्यंत सम्मानजनक संबोधनों से पुकार रहे थे| भाई-चारा अपने चरम पर था| कुत्तावाद नेताओं की रगों में खून बनकर बहने लगा था|
काफी लम्बे विचार-विमर्श के बाद एक छुटभैये नेता ने सुझाव दिया –
“हमें अपना प्रतिनिधिमंडल गृहस्वामी के पास भेजना चाहिए और उसे सूचित करना चाहिए कि उसकी यह हरकत हम कुत्तों पर नागवार गुज़री है| भले ही हम कुत्ते हों पर खून हमारा भी लाल ही हैं| भले ही शक्ल न मिलती हो पर उसके और हमारे कुछ गुण तो अवश्य ही मिलते हैं| सच्ची बात तो यह है कि आदमी हमारा गुरु है| हमने पूँछ हिलाना उससे सीखा, पूँछ दबाना उससे सीखा, दांत दिखाना उससे सीखा, खीसे निपोरना उससे सीखा और अगर अतिशयोक्ति न समझें तो हमने अधिकांश कुत्तापन ही उससे सीखा है|”
“भाइयों, नेता जी ने जो कहा है अपनी ओर से सोच-समझ कर ही कहा होगा, पर मेरा मत कुछ और है| मेरी बात सुनने में कठोर अवश्य लगेगी लेकिन सच्चाई यही है कि अब कुतागिरी पर उतर आने का समय आ चुका है| अगली बार जब घर का मालिक खाना देने आता है तब रोटी पकड़ने के स्थान पर उसका हाथ ही धर-दबोचा जाए|” – युवा-श्वानसंघ के गतयौवन महामंत्री ने राय दी|
दलित कुक्कुर-प्रकोष्ठ का कार्यकारी सचिव जो युवा-श्वान-संघ के महामंत्री-पद पर कई महीनों से नज़रें जमाए था, बोला –
“हमें इतना ऊपर उठने की क्या आवश्यकता है? सबसे आसान तो यह है कि उसका पाँव ही पकड़ लिया जाए| चार दांत गड़ा दिए जाएँ| बदला भी पूरा हो जाएगा और उस आततायी को सबक भी मिल जाएगा|”
एक मंझोले नेता ने कहा –
“बात तो पते की है लेकिन इससे होने वाले लाभ के साथ-साथ हानि पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए| हमने उस आदमी की बदौलत बहुत दावतें उड़ाईं हैं| अगर हमने उसे हानि पहुँचाने की कोशिश की तो ध्यान रहे, भविष्य में एक-एक टुकड़े के लिए मोहताज हो जायेंगें| कुछ ऐसी जुगत सोचो जिसमें हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा|”
एक बुजुर्ग नेता बहुत देर से चुपचाप बैठा था| उसके गले में एक पट्टा पड़ा हुआ था जिसे वह व्यवस्था से विद्रोह का चिह्न कहा करता था| वैसे कुछ शरारती कुत्ते उसे भूतपूर्व पालतू कुत्ता भी कहा करते थे जिसे उसकी नाफरमानियों की वजह से उसके मालिक ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था| वह बुजुर्ग नेता अचानक ऊँचे स्वर में बोला –
“हमारे सामने चार प्रश्न हैं – किससे बदला लेना है, क्यों बदला लेना है, कैसे बदला लेना है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसका बदला लेना है? जब तक इन चार प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तब तक हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं| इन चार में से दो के जवाब तो मेरे पास हैं| हमें आदमी से बदला लेना है| बदला इसलिए लेना है क्योंकि आदमी ने हमारे एक भाई के पेट पर लात मारी है| कैसे बदला लेना, इस विषय पर विचार चल ही रहा है| अब सवाल यह है कि हमें किसका बदला लेना है?”
“अपने भाई का बदला लेना है|” – युवा नेता तपाक् से बोला|
“बौड़मपने की बात क्यों कर रहे हो जी? अपनी इस समझ की वजह से ही तो आज तक घास काट रहे हो| व्यक्तिगत झगड़े को सामुदायिक रंग देने का क्या अर्थ है? बदला मुझे या तुम्हें लेने की जरूरत क्या है? क्या लात तुम्हें पड़ी है? नहीं न! तो फिर? मैं तुमसे बड़ा कुत्ता हूँ इसीलिये कहता हूँ कि दूसरों के फटे में टांग अड़ाने की कोशिश मत करो| क्रांतिकारियों की तरह सोचने में अपना समय ज़ाया न करो| नेता हो, नेताओं की तरह सोचो, नेताओं की तरह|” – बुजुर्ग नेता ने उत्तर दिया|
सभा में थोड़ी देर चुप्पी छाई रही| सभी छोटे-बड़े, मंझोले-छुटभैय्ये, नए-पुराने, कुत्तावादी-रोटीवादी नेता इस बात को आत्मसात करने में जुट गए| जो अभी तक दूसरे के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार को लेकर चिंतित थे, अचानक सच्चे योगियों की तरह बाह्य से अंत: की ओर उन्मुख हो गए| कुछ काल की नितांत चिंतनपूर्ण चुप्पी के बाद एक श्वान-शिरोमणि ने प्रस्ताव रखा कि अनुभव और वरिष्ठता की कद्र करते हुए अंतिम निर्णय करने का अधिकार बुजुर्ग कुत्ते को ही सौंप दिया जाए| सभी ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया तथा सहमति में अपनी पूँछें लहराईं| यद्यपि कुछ पूँछें ज्यादा ऊँची नहीं उठी थी तथापि अंतिम निर्णय का अधिकार बुजुर्गवार को दे दिया गया|
बुजुर्ग नेता ने रात के समय आमसभा बुलाई| मौहल्ले के कोने-कोने से तरह तरह के कुत्ते सभा में शिरकत करने के लिए आने लगे| रामल्ला हलवाई की भट्ठी के पीछे कुत्तों का जमावड़ा हो जाने के बाद बुजुर्ग नेता अपने चेले-चपाटों के साथ आ पधारे| चेलों ने किंकिया-किंकिया कर कुक्कुर जाति की प्रतिष्ठा में नारे लगवाए| सम्मान प्रदर्शित करने के लिए नेताजी के पट्टे को बार-बार चाटा| नेताजी की प्रशस्ति में कूकरी-गान का आयोजन हुआ| इसके बाद पूरे तामझाम के साथ नेताजी भट्ठी पर चढ़ गए| उन्होंने एक बार पुन: जाति का जयघोष किया फिर गला खँखार कर बोले –
“भाइयों और भगिनियों, आज के ऐतिहासिक अवसर पर इतने श्वान-सम्मर्द को देखकर मेरा ह्रदय गद्गद् हो गया है| अब मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारी जाति की सम्मान-रक्षा कठिन नहीं है| जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि एक मनुष्य ने हमारे स्वत्व को ललकारा है| हमारी खुद्दारी को गाली दी है| यह एक मनुष्य और एक कुत्ते के बीच जन्मा कोई साधारण विवाद नहीं है| यह तो टकराव है बुर्जुआ प्रवृत्ति और सदियों से दबाई-कुचली जा रही आम जनता की आवाज का| समय आन पहुँचा है कि जब हमें अपनी थूथनी को ऊँचा उठाकर अपने वंशजों के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार का प्रतिकार करना होगा| हे युगकर्णधार, कुक्कुर-समाज! अगर तू आज इस विष को पी गया तो तेरी आने वाली नस्लें गुलामी के अभिशाप को हर पल भोगेंगी| साथियों, अगर आज आप लोग चुप्पी साध गए तो कभी भी बोल न पाओगे| मेरा विश्वास मानो, आने वाले समय की अदालत में आप लोग हाथ बांधे अपराधियों की तरह कटघरे में खड़े किये जाओगे|”
चारों ओर से हुंकारें भरने की आवाजें आने लगीं| सदियों से टांगों के बीच में घुसी हुई पूँछें अचानक ऊपर उठकर बड़े वेग से लहराने लगीं| कोई-कोई वीर तो मारे जोश के अपने पिछले पंजों से जमीन खुरचने लगा| नाक सिकुड़ कर ऊपर की ओर चढ़ गईं और दांतों के किनारे सड़क के खम्भे पर लगी जलती-बुझती ट्यूब की रोशनी में चमचमाने लगे| लगा कि क्रान्ति मौहल्ले की सीमा तक आ पहुँची है|
बुजुर्ग नेता ने एक बार चारों ओर नजरें घुमाकर सामने सामने बैठे कुत्तों पर अपनी बात के असर को परखा और फिर संतोष के साथ आगे कहना प्रारम्भ किया-
“हमारे सामने एक ही रास्ता है और वह है असहयोग का| पितृपक्ष चल रहा है| कल भी कोई न कोई दुष्ट मनुष्य खाना देने आयेगा| आजा-आजा, ले-ले, तो-तो की ध्वनि के साथ हमें पुकारेगा| हमें अपने मन पर काबू रखना होगा| मन कहीं भटक न जाए इसलिए किसी ऐसी जगह जा छिपाना होगा जहाँ से न तो वह हमें दिखाई दे और न ही हमें उसकी आवाज सुनाई दे| एक न एक दिन मजबूरी का मारा मनुष्य अवश्य जी हमारे पास आयेगा और हमसे खाने के लिए मिन्नतें करेगा| उस समय हमारा पलड़ा भारी होगा और हम अपनी शर्तों पर उसे नचाएंगे| बोलो, है मंजूर?”
चारों ओर से आवाजे आने लगीं –
“मंजूर है, मंजूर है| आपकी बात बिलकुल सही है| ऐसा ही होगा|”
इसके बाद सभा समाप्त हुई| नेताजी की जयजयकार हुई| कुत्ते छोटे छोटे दलों में अपनी भावी विजय पर चर्चा करते हुए प्रस्थान कर गए| सड़क के खम्भे पर लगी ट्यूब और भी तेजी के साथ जलने-बुझने लगी|
अगला दिन आया| कुत्ते मनुष्यों के घरों के आसपास ही घूमते रहे| वे मनुष्य के सामने ही उसकी रोटी छोड़कर जाना चाहते थे| वे अपने असहयोग को यथाशक्ति अभिव्यक्त करना चाहते थे| जैसा कि नेताजी समझाया था, उनके लिए यह अस्मिता का प्रश्न था| मान-सम्मान का प्रश्न था| कुत्तों के दिमाग में यह बात घर करा दी गयी थी कि उनका भविष्य दाँव पर है| अतीत की कालिख से निकलकर वर्त्तमान की रोशनी में आने जो अवसर उन्हें नेताजी की अनुकम्पा से मिला था उसे किसी भी कीमत पर वे खोना नहीं चाहते थे|
कुत्तों की दृष्टि द्वारों पर टिकी थी| धीरे-धीरे परीक्षा की घड़ी आन पहुँची| एक दरवाजा खुला| हाथ में भोज्य-पदार्थ लिए मनुष्य बाहर निकला| उसने कुत्तों को पुकारा| तय योजना के अनुसार कुत्ते मुँह फेरकर वहाँ से चलते बने| मनुष्य ठगा सा यह दृश्य देख रहा था| उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे|
तभी उसने एक बूढ़े कुत्ते को अपनी ओर आते देखा| उसके गले में पट्टा पड़ा हुआ था| उसकी पूँछ बड़ी तेजी के साथ हिल रही थी| उसकी आँखों में खुशामद की चमक भरी थी| कुत्ते ने आते ही जमीन पर लेटकर अपना पेट दिखाया| कूँ कूँ की आत्मसमर्पणात्मक ध्वनि की| आदमी ने खाना उसके सामने फेंक दिया| कुत्ते ने क्षणभर में भोज समाप्त किया| कुछ बचे हुए टुकड़े उठाकर अपने चेलों-चमचों के लिए एक ओर छिपाकर रखे और योजना के उत्तरार्द्ध का पालन करते हुए किसी गुप्त स्थान पर छिपने के लिए चला गया|
यह एक ही दिन हुआ हो, ऐसा नहीं है| यह घटना रोज-रोज दोहराई जाने लगी| आज भी दोहराई जा रही है| बुजुर्ग नेताजी का स्वास्थ्य उत्तरोत्तर उत्तमता की ओर बढ़ता जा रहा है| असहयोग भी जारी है| सब योजना के अनुसार ठीक-ठाक ही चल रहा है|
बस मौहल्ले के कुत्ते थोड़े असमंजस में हैं कि क्रान्ति मौहल्ले की सीमा को पार करके भीतर क्यों नहीं आ रही है|

चित्र http://www.davidbellugi.com से साभार

No comments:

Post a Comment