अपनी बात

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Sunday, December 4, 2016

बूढ़े पेड़ की चिड़ियाँ और गिलहरियाँ

र के सामने एक कटहल का पेड़ है; भरा-भरा, घना-घना, चमकदार पत्तों वाला| पेड़ के डालियों पर कुछ मिट्टी के बर्तन टंगे हुए हैं जिनमें पानी और कुछ दाना मुसलसल पड़ा रहता है| सुबह के समय तोते आते हैं, टें-टें करते हुए दाना चुगते हैं| उनके बाद गौरैय्या, कौए और जंगली फाख्ता आसपास मंडराते रहते हैं|| शाम के समय तो नज़ारा और भी कमाल का हो उठता है| गिलहरियाँ चिक् चिक् करती हुई भागदौड़ करती रहती हैं| यूँ तो लगभग सभी परिंदों से उनकी ठनी रहती है, पर तोतों के साथ उनकी अदावत का तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं| गिलहरी अकेली हो तो तोते उसे पास फटकने नहीं देते और तोता अकेला हो तो गिलहरियाँ उसे दाने पर चोंच मारने नहीं देती| दिन भर खूब रौनक बनी रहती है|

जब भी इस पेड़ पर होती हुई हलचल को देखता हूँ तो बचपन फिर से ज़िंदा हो जाता है; भागदौड़, किलकारियाँ, हँसी-ठिठोली, बेसिर-पैर की लम्बी लम्बी बातों का अथक सिलसिला| गज़ब के दिन थे| सुबह तो उतनी प्रिय नहीं होती थी लेकिन पता नहीं क्यों, पर उस जमाने में शामें बहुत शानदार हुआ करती थीं| ऐसा भी नहीं था कि शाम किसी एक ही ख़ास तरीके से गुजारी जाती हो| कोई तयशुदा नियम नहीं था| सब मन-मर्जी पर आधारित था| कभी किसी दोस्त के घर के बाहर चबूतरे पर बैठ कर दुनिया जहान की बाते छौंका करते तो कभी ‘चौड़ी गली’ के चक्कर लगा आया करते थे| जब बचपन अपने आखरी चरण में पहुँचाने लगा तब बातचीत का विषय कई बार प्रेम-प्रसंग हुआ करते थे| इसमें कोई छिपाने वाली बात है नहीं कि मैं उस उम्र की बात कर रहा हूँ जब प्रेम अक्सर इकतरफा ही हुआ करता था| प्रेम की मर्यादा का भी कोई ख़ास ख्याल नहीं होता था| प्रेम की अलग-अलग गलियों में न जाने कितने चक्कर लग जाया करते थे| आस-पास ही नहीं दूर-दूर तक बसने वाली परियों सरीखी सूरतों के बारे में अधिक जानकारी रखने वाले साथी, दोस्तों के समाज में विशेष सम्मान के साथ देखे जाते थे| कभी-कभी तो उनके प्रति सम्मान से ज्यादा ईर्ष्या का भाव मन में जड़ें जमा लेता था| गली-मौहल्ले की साथिनें जिनके साथ छोटेपन में इक्कल-दुग्गल खेला करते थे, उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचते पहुँचते दूरी सी बनाए रखने लगती थीं| छोटे-छोटे झुण्ड बनाए गली में से बेपरवाह निकल जाया करती थीं| उनकी दबी-दबी हँसी दूर जाते जाते उत्फुल्ल खिलखिलाहट में बदल जाया करती थी| किसी छोटे मोटे काम के बहाने कहीं उनके घर जाने का अवसर मिल जाता तो दिन बन जाया करता था|

अच्छा, एक कमाल की बात यह थी कि अपने से ज्यादा दूसरों के प्रेम की जानकारी रखना महत् कार्य माना जाता था| मौहल्ले के ‘बल्लू’ चचा का तीसरी गली में रहने वाले ‘चंदू’ मुनीम के घर काफी आना-जाना रहा करता था| यह आना-जाना मुनीम जी के दूकान पर जाने के बाद ही संपन्न हुआ करता था| लड़कों को जल्दी ही इस बात की भनक लग गयी| बल्लू चचा आसपास से निकलते तो मौहल्ले के नालायक लड़के जिनमें खाकसार का नाम भी शुमार होता था, एक दूसरे को ललकार कर एक ही साँस में ‘चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को, चांदनी रात में, चांदी की चम्मच से, चटनी चटाई’ का जाप करने के लिए कहा करते थे| ‘बल्लू’ चचा भी कभी-कभी रुककर, मुस्कराकर लड़कों के इस खेल में शामिल हो जाया करते थे| लड़के एक दूसरे को कोहनी मारते और उनकी उपस्थिति से आनंदित होते|

‘चंदू’ मुनीम की घरवाली जो ‘मुनीमनी’ के नाम से जानी जाती थीं, जब चलती थीं तो उनके दोनों हाथ कोहनी के आगे से दायें-बाएँ हवा में फैल जाया करते थे| ऐसा लगता था जैसे वे हवाई जहाज बनकर हवा में उड़ने की तैयारी कर रहीं हों| लड़के आपसी बात-चीत में उन्हें ‘हवाई-जहाज’ ही कहा करते थे| ‘गिन्नू’ ने एक बार ‘बल्लू’ चचा से बहुत मासूमियत से पूछ लिया, “चचा, सुना है आजकल हवाई जहाज उड़ाना सीख रहे हो?”

‘बल्लू’ चचा ने उससे भी ज्यादा मासूमियत के साथ जवाब दिया, “हाँ बेटा, सीख तो रहा हूँ, इसके बाद हैलिकॉप्टर उड़ाना सीखूँगा|”

यह संवाद सुनकर आसपास बैठे सभी लोगो के पेट में हँसते-हँसते बल पड़ गए| ‘गिन्नू’ तो बस शरमाकर रहा गया| अच्छा, हैलिकॉप्टर वाला मामला ये था कि ‘गिन्नू’ की दादी का स्वर बहुत ही भयानक था| जब बोलती तो ऐसा लगता मानों कोई हैलिकॉप्टर उड़ने की तैयारी कर रहा हो| उन्हें आपसी हँसी मज़ाक में हैलिकॉप्टर कहकर ही पुकारा जाता था|

उस जमाने में स्कूलों में नैतिक शिक्षा भी पढ़ाई जाती थी लेकिन उसका अलिखित नियम यही था कि पुस्तकों का महत्त्व केवल परीक्षाओं तक सीमित होना चाहिए| लिहाजा, कक्षा से बाहर कोई उसकी ज्यादा परवाह करता नहीं था| गजेन्द्र प्रताप जैन उर्फ़ ‘गज्जू’ वकील लड़कों के लिए किसी खलनायक से कम नहीं थे| उसकी वजह यह थी कि जब भी गली के लड़के बीच सड़क पर विकेट बना कर क्रिकेट खेलते तो जाने अनजाने में गेंद उनके घर चली जाया करती थी| बात यह थी कि गज्जू वकील की एक हमारी हमउम्र पोती थी; दूध सी गोरी, छुईमुई सी नाज़ुक| रोज़ सुबह स्कर्ट पहन कर ‘होली एंजिल्स कान्वेंट स्कूल’ में पढ़ने के लिए जाया करती थी| किसी ने उसे न तो कभी भी किसी बात ही करते देखा था और न ही वह किसी की ओर देख कर कभी मुस्कराया ही करती थी| जी. आई. सी., ग्रेन चैम्बर और एस. डी. इंटर कालेज में पढ़ने वाले हममें से कुछ उसे ‘सय्याद की कैद में फँसी बुलबुल’ की तरह देखा करते थे तो कुछ न जाने क्यों उसके अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए जाने से बेचैनी महसूस करते थे| इसके पीछे ‘हिंदीवाद’ या ‘राष्ट्रवाद’ की भावना तो कतई नहीं थी, इतना तो विश्वास के साथ कहा जा सकता था|

जहाँ तक गेंद का बकील साहब के घर में जाने वाला मामला था, कुछ लोग अनाड़ियों की तरह उलटा सीधा बल्ला घुमाते हुए गेंद को उनके दालान में पहुँचा देते थे और कुछ मंजे हुए निशानची इस बहाने उनकी पोती के दर्शन पाने के उद्देश्य से जानबूझ कर कौशल दिखाया करते थे| कई बार उनके घर के शीशे भी इस चक्कर में शहीद हो जाया करते थे| वकील साहब खलनायक के रूप में इसलिए देखे जाते थे क्योंकि उनमें सहनशीलता कतई नहीं थी| धीरज भी नहीं था| दो पैसे के शीशे टूटने पर नित्य ही हमारे पिताओं से हमारी शिकायत करते जिसके चलते हर दूसरे दिन किसी न किसी घर से बेंत फटकारने की आवाजें आया करती थीं| अब आवाजों का क्या है, वे जितनी शिद्दत के साथ पैदा होती थीं उतनी ही शिद्दत के साथ वातावरण में विलीन भी हो जाया करती थीं| कोई भी समय ऐसा नहीं आया कि जब किसी ने भी अपने घर में बाबा, पिता, ताऊ या चाचा के हाथों होने वाली अपनी कुटाई को स्वीकार किया हो| यद्यपि कुटाई की घटना को सार्वजनिक रूप से माना तो नहीं जाता था तथापि बदले की सामूहिक भावना दिनों-दिन बलवती होती जाती थी|

आखिरकार दीवाली पर अवसर मिल ही गया| वकील साहब धन-तेरस के दिन हलके नीले रंग का नया स्कूटर लाये| उसे मंदिर ले गए| पंडित जी को दक्षिणा देकर उसपर स्वास्तिक का निशान बनवाया| उस समय तो हमने इस बात पर बिलकुल विचार नहीं किया कि जैन होने के बावजूद भी उन्होंने सनातन धर्म मंदिर के पुजारी से स्कूटर के सुख, शान्ति और सुरक्षा के लिए उसके हैंडिल पर कलावा क्यों बंधवाया था| अलबत्ता अब जरूर इस बात को सोच कर थोड़ा अजीब लगता है|

हुआ यह कि दीपावली के दिन लड़कों को वकील साहब का स्कूटर बाहर खड़ा मिल गया जिसे देख कर एक साथी के दिमाग में बहुत ही मौलिक विचार ने जन्म लिया| पप्पू की छत पर सबको इकट्ठा किया गया| थोड़े बहुत विचार विमर्श के बाद ‘काण्ड’ करने पर आम सहमति हो गयी| सबने एक-एक रुपया जमा किया| रुपया देना सभी के लिए आवश्यक था ताकि घटना में सभी की भागीदारी रहे और बात खुलने की संभावना को नकारा जा सके| जमा किये गए पैसों से मुर्गाछाप एटम-बम लाया गया| एक सिगरेट और माचिस भी खरीदी गयी| बम के पलीते को सिगरेट में जोड़कर सिगरेट सुलगाई गयी| मुन्नू ने सिगरेट की आग को तेज करने करने के लिए उसमें दो चार गहरे-गहरे कश भी लगा लिए| मन्नू का सिगरेट पीने का यह पहला मौक़ा था जिसका परिणाम यह हुआ कि वह खाँसते खाँसते बेदम सा हो गया| कुछ लोग थोड़े घबराए लेकिन पप्पू ने अपने हाथ से उसके मुँह को दबाकर ज्यों ही “साला, टीबी का मरीज” कहकर उसकी भर्त्सना की, उसकी खाँसी अपने आप ही रुक गयी| दो साथियों ने बम को प्लांट करने का जिम्मा लिया और ले जाकर स्कूटर के ‘स्पीडोमीटर’ के ऊपर स्थापित कर दिया| सभी साथी तितर-बितर हो गए और अलग-अलग ठिकानों पर छिप कर दम साधे हुए धमाके की प्रतीक्षा करने लगे| दिलों के धड़कने की आवाज़ अपने पास में खड़े साथी को भी साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी| मौसम में हल्की ठंडक के बावजूद कनपटियों पर पसीना चुहचुहाने लगा था| कुछ ही समय के बाद ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ स्कूटर के ‘स्पीडोमीटर’ के परखच्चे उड़ गए| ध्यान देने पर उसमें से लाल-नीले तार बाहर लटकते हुए दिखाई दिए| मन में कुछ वैसी भावना जागी जैसी राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव के मन में असेम्बली में बम विस्फोट के बाद जागी होगी| पर्चे फेंकने और नारे लगाते हुए अपनी गिरफ्तारी देने का न तो नैतिक साहस था और न ही उसकी कोई आवश्यकता ही प्रतीत हुई|

इस घटना को अंजाम देने के बाद सभी साथी एक-एक करके वहाँ से खिसक लिए और पहले से तय की हुई जगह यानि स्टेशन पर फिर से मिले| सभी काँप रहे थे; कुछ उत्साह से तो कुछ डर से और कुछ उत्तेजना से तो कुछ योजना की सटीकता और सफलता से जनमी प्रसन्नता से| बहुत देर तक इस घटना को तरह तरह से कई बार बखाना गया| एक दूसरे को कसमें देकर इस भेद को भेद ही बनाए रखने के लिए कहा गया लेकिन होनी को तो कुछ और मंजूर था| न जाने कैसे हमारे घर वापस पहुँचने से पहले ही हमारे अल्पजीवी राज का पर्दाफाश हो चुका था| उस दिन तो सभी के घर में धुंआधार आतिशबाजी हुई| खूब बम और पटाखे फूटे|

अगले दिन जब हम सब मिले तो किसी ने भी अपने शरीर पर पड़े ‘नील’ छुपाने की कोशिश नहीं की| वे हमारे प्रतिशोध के बदले में मिले हुए पदक जो थे|

कटहल का बूढ़ा पेड़ अपने भूरे मजबूत तने से टिका यूँ तो अक्सर ऊँघता सा रहता है, लेकिन परिंदों के पंखों की फड़फड़ाहट और गिलहरियों की उछलकूद से बीच-बीच में नींद से जाग भी जाता है और फिर देर तक हवा की ताजगी को अपने पत्तों की सिहरन में महसूस करता रहता है|




चित्र lesliepaints.wordpress.com से साभार

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