अपनी बात

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Sunday, October 30, 2016

दीपावली की मंगल-कामनाएँ

प्रिय पाठकों,

समय का चक्का घूम कर फिर वहीं आ पहुंचा है, जहाँ एक साल पहले था। बहुत कुछ बदला है और बहुत कुछ बदलाव की तरफ बढ़ा भी है। उठा-पटक जारी है जो काफी हद तक अच्छा लक्षण है। समय ठिठक कर रुक जाए तो साँस थमने लगती है। इतिहास ने हमें एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां हम न केवल अपने लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सही निर्णय ले सकते हैं। हमारे हाथ आने वाली नस्लों के सामने क्षमा याचना में जुड़े होंगे या आशीर्वाद में उठे होंगे, यह हमें तय करना है। 

सुन रहे हैं कि आजकल स्वतन्त्र चिंतन फैशन में है। अगर ऐसा है तो फिर फतवों की बाढ़ सी क्यों आयी हुई है? जिस सोच को दिमाग के काले अंधियारे कोनों में  जकड कर रखा गया है, उसे बाहर निकाला जा सके तो ही सच्ची दीपावली है।

वर्जनाओं और मर्यादाओं के उच्छृंखल विरोध को जरा सा टोक कर और जरा सा रोक कर भावना और तर्क के मिलेजुले सतरंगी प्रकाश में जीवन को देखा जाए तो ही यह प्रकाश का पर्व सार्थक हो सकता है।

रामराज्य, जो कभी आदर्श था आज झगड़े का कारण बन गया है। राजनीति जो कभी लोककल्याण की वाहक थी, स्वार्थकेंद्रित हो चुकी है। राजदंड जो रक्षा के लिए था, शोषण में लिप्त हो गया है। मार्ग जो लक्ष्य पर ले जाते थे, भूल-भुलैय्या में फंसा रहे हैं। ठीक है, बहुत कुछ गलत हो रहा है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम सही हैं। अपने सुधार की और हमारा ध्यान जाए तो ही यह उल्लास का पर्व, सत्य की असत्य पर विजय का पर्व जीवन में आनंद भर सकेगा। 

दीपावली संवत २०७३ की अनंत शुभकामनाओं सहित,

आपका अपना,

अरविन्दनाभ शुक्ल

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