अपनी बात

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Friday, October 21, 2016

लगाना मेहंदी का

हमारी और हमारी हिन्दुस्तानी कौम की एक बड़ी गज़ब की आदत है| कहीं भी, कुछ भी चल रहा हो हम छाती ठोक कर यह कहने में कतई संकोच नहीं करते थे कि हमारे देश में तो यह पहले से होता आ रहा है| जहाज बना तो हमने कहा कि पुराने भारत में पुष्पक विमान था| चिकित्सा और सर्जरी की बात चले तो तो हम दुनिया को सुश्रुत और चरक का नाम बताते हैं| राजनैतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में चाणक्य जिंदाबाद हैं| पर्यटन की बात हो तो हमारे सारे ऋषि-मुनि हमारी इज्जत बचाने को मैदान में आ उतरते हैं| कम्प्यूटर की बात चलते ही वैदिक गणित के सिद्धांत सामने चक्कर काटने लगते हैं| इस धरा का बाबा आदम ही निराला है|

ऐसी ही एक कला है – 'टैटू'| जब पहली बार यह शब्द सुना था तो बड़ा हास्यास्पद सा लगा था| पड़ौस के लटूर चंद जी के बेढंगे आवारा पुत्र टीटू का चित्र ज़हन में घूम गया था| वो तो बाद में जाकर पता चला कि सारी दुनिया में टैटू बनवाने का बड़ा भारी चलन है| सुना है कि इस कला की शुरुआत भित्तिचित्रों से हुई थी| समय के साथ जब दीवारें कम पड़ने लगीं तो शरीर पर ही चित्र और इबारतें लिखी जाने लगीं|

हमारी रिसर्च कहती है कि टैटू मेहंदी का ही एक अन्य रूप है| पुराने समय से मेहंदी और आलता हमारे देश में लगाया जाता रहा है| मेहंदी लगाने का फैशन आज भी कम नहीं हुआ है| इस फैशन का प्रभाव हर हिन्दुस्तानी घर में है तो भला हमारी कुटिया भी उससे कैसे बच जाती! वैसे तो श्रीमती जी बारह महीने हमारे नाम को रोया ही करती हैं लेकिन साल में एक दिन ऐसा आता है जब वे हमारे नाम का व्रत रखती हैं| करवाचौथ का व्रत होता बड़ा मुश्किल है| इससे जुड़ी मुश्किलों को हम भली भाँति जानते हैं| इस बात का आभास जो वर्ष भर कराया जाता है| सबसे जबर बात तो यह है कि हम जैसे निकम्मे नाकारा पति को पाने के उपलक्ष में ईश्वर को धन्यवाद देना पड़ता है, इससे अधिक कठिनाई की बात और क्या हो सकती है!

हाँ, बात मेहंदी की चल रही थी| तो, हुआ यह कि आज करवाचौथ की पूर्व-संध्या पर श्रीमती जी ने जिद पकड़ ली कि आज तो मेहंदी लगवानी ही है|

“ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी|”

“एक वजह हो तो बताऊँ, यहाँ तो सैंकड़ों हैं|”

हमने भी ताव में आकर कह दिया, “चलो बताना शुरू करो| देखते हैं तुम्हारी वजहों को भी|”

जवाब में कहने लगीं, “पहली वजह तो यह है कि करवाचौथ के दिन मेहंदी लगाना अच्छा शगुन होता है| करवाचौथ के कार्यक्रम की इसी से शुरुआत हुआ करती हैं|

हमने भी कह दिया, “शुरुआत तो मुहर्रम की भी मेहंदी से ही हुआ करती है| यह तो कोई बढ़िया वजह नहीं लगती|”

क्षणभर की चुप्पी के बाद जो दूसरी वजह बताई गयी वह थी, “मेहंदी एक नाज़ुक सा श्रृंगार होता है|”

इसके उत्तर में हमने भी बता दिया, “सिर और दाढ़ी के बाल रंगने में भी मेहंदी को काम लाया जाता है| सब्जी बेचने वाले मुल्ला जी के चेहरे और खोपड़ी पर जो लाल-लाल रंगत बनी रहा करती है वह मेहंदी से ही होती है| उनके चेहरे पर तो हमें तो श्रृंगार या फैशन कभी नजर नहीं आया| अलबत्ता, हमेशा ऐसा ही लगता है जैसे कहीं से होली खेल कर ‘आलू ले लो, बैंगन ले लो’ की पुकार लगाते चले आ रहे हैं|”

थोड़ा नरम होते हुए और आँखों में प्रीत की रंगत डालते हुए उन्होंने अगली वजह बताई – 
सदियों से मेहंदी का रंग पिया के प्रेम को मापने का पैमाना माना जाता रहा है| मेहंदी का जितना गहरा रंग रचता है, पति उतना ही प्रेम करने वाला होता है| मेहंदी के रंग से पति के प्रेम की गहराई का पता चलता है|”

हमने जवाब दिया, “यह तो मेहंदी न लगवाने का सबसे बड़ा कारण है| बंद हो मुट्ठी तो लाख की, खुल गयी तो फिर ख़ाक की| अच्छा-खासा जीवन चल रहा है क्यों उसमें तूफ़ान पैदा करना चाहती हो?”

आज श्रीमती जी हार मानने के मूड में नहीं थी| वैसे तो कभी रहती भी नहीं लेकिन आज का तो नज़ारा ही कुछ और था| कहने लगीं, “मेहंदी की तासीर ठंडी होती है| इसे लगाने से रक्तचाप नीचे आ जाता है, दिमाग में शान्ति पड़ती हैं और सारी जलन-चुभन शांत हो जाती है| याद नहीं बचपन में जलने से जब फफोले पड़ जाया करते थे, माँ तुरंत उनके ऊपर मेहंदी का लेप कर दिया करती थी| मुँह में छाले पड़ने पर भी मेहंदी का ही प्रयोग किया जाता था|”

इसका उतर देने के लिए यद्यपि हमारे पास बहुत सारी सामग्री थी, तथापि दूरदृष्टि और पक्का अनुशासन दिखाते हुए हमने अपनी भावनाओं पर लगाम लगाई फिर बात को घुमा-फिरा कर कहा, “तासीर के ठंडा होने से क्या होता है? दिमाग की गर्मी तो वह दूर करने से रही| गुस्सा जो हमेशा नाक पर रखा रहता है उसका उपचार ज़रा सी मेहंदी से कहाँ हो सकता है, भला! रही बात रक्तचाप की, तो वह भी उस ऊंचाई पर पहुँच चुका है कि जहाँ से उसका नीचे आना असंभव ही है| दिमाग की शांति पच्चीस साल पहले ही खो चुकी है| अब उसके अवशेष खोजने से भी क्या बनेगा? बचपन में जो मेहंदी आती थी वह शुद्ध होती थी लेकिन अब तो मेहंदी भी कैमिकलों से रची हुई होती है| वह क्या जलन दूर करेगी? जहाँ तक बात मुँह के छालों की है, उनका तो अच्छा न होना ही भला है| मुँह के छालों के साथ साथ दिल के छालों का भी इलाज हुआ करता तो कुछ बात भी होती|”

हमने तरह तरह से समझाया लेकिन बात न मानी जानी थी और न मानी ही गयी| स्कूटर स्टार्ट किया, देवी जी को पीछे बिठाया और पलटन बाजार की तरफ रवाना हो गए, जहाँ मेहंदी लगाने वाले सड़क के किनारे पर छोटे-छोटे स्टूल लगा कर सारे शहर की महिलाओं के हाथों पर मेहंदी रचाने के लिए तैनात थे| थोड़े भाव-ताव के मेहंदी लगाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, जो तकरीबन आधा घंटे तक चली| काम पूरा होने के बाद चंद सलाहों का दौर चला और उसके बाद हमने श्रीमती जी को स्कूटर पर पीछे बिठा कर घर की तरफ कूच किया| चूंकि दोनों हाथ मेहंदी से रचे थे इसलिए अमूमन हमारी कमर पर टिकने वाले उनके हाथ हवा में ही झूलते रहे| स्कूटर का बैलेंस संभालना कठिन हो गया| हम लहराते हुए सड़क पर चले जाते थे| रास्ते पर चलने वाले गाहे-ब-गाहे डपट देते थे जिसमें श्रीमती जी भी अपना सम्पुट लगा देती थीं, “कैसे चला रहे हो, ठीक से चलो, ना|”

खैर, जैसे तैसे घर पहुँचे| घर पहुँच कर पता चला कि घर की चाबी तो है ही नहीं| श्रीमती जी ने उलाहना देते हुए कहा, “तुम्हें पता था कि मेरे हाथ में मेहंदी लगी है तो तुमने चाबी अपने पास क्यों नहीं संभाल ली थी| अब देखो, गिर गयी कहीं|”

गरीब ने रोज़े रखे तो दिन ही बड़े हो गए| किसी तरह ताला तोड़कर घर में दाखिल हुए| शाम हो चुकी थी| समस्या थी कि खाने की व्यवस्था कैसे हो| खाना बनाया गया| यह बताने की कोई जरूरत तो नहीं ही रह गयी है कि खाना किसने बनाया होगा| बनाने की समस्या का समाधान हुआ तो खाने की समस्या सामने थी| हमने खुशी के साथ श्रीमती जी को अपने हाथ से खिलाने का प्रस्ताव किया जिसे हमारे ऊपर कृपा करते हुए उन्होंने मान भी लिया| प्रक्रिया लगभग पंद्रह मिनट चली जिसमें पच्चीस बार हमें इस काम के लिए भी अयोग्य साबित किया गया| ग्रास कभी छोटा हो जाता था, कभी बड़ा| कभी सब्जी कपड़ों पर गिर जाती थी तो कभी कपड़े सब्जी पर| कभी हम मुँह में चम्मच डालना भूल जाते थे तो कभी मुँह में से चम्मच निकालना|

हमने किच-किच से परेशान होकर कह दिया, "कहो तो बछड़े को तेल पिलाने वाली नाल तुम्हारे लिए खरीद लाऊँ या कहीं से कोई ऐसी स्ट्रॉ खरीद कर लाऊँ जो पानी के साथ साथ दाल, चावल, रोटी भी मुँह में पहुँचा दिया करे|"

आखों में आँसू भर कर देवी जी ने कहा, "मैं तो कल तुम्हारे लिए उपवास रखने की तैयारी कर रही हूँ और तुम हो कि ज़रा सा काम करना पड़ गया तो आँय-बाँय बोलने लगे|"

हमें लगा कि अब कल उपवास रखने का इरादा बदलने वाला है| हमारा जीवन, स्वास्थ्य और कल्याण खतरे में पड़ने को ही है| हमने आजिज़ी से कुछ कुछ चापलूसी के साथ कहा, "ऐसी तो कोई बात नहीं है| बस एक सुझाव दिया था, अच्छा नहीं लगा तो हम अपना सुझाव वापस लेते हैं|"

बस अगले कुछ घंटे हम किसी कमेरी सुघड़ गृहणी की तरह घर की साफ़-सफाई, चूल्हे-चौके में ही लगे रहे| बीच-बीच में आधुनिक काल के शिष्टाचार को भी सराहते रहे जिसके चलते अब कोई भी बिना पूर्व सूचना दिए घर में आने की हिमाकत नहीं करता| बच्चे सालों साल से हो रही दुर्घटनाओं के आदी हो चुके है सो, वे भी अब इस तरह की बातों का संज्ञान नहीं लेते| उन्हें यह सब सामान्य लगने लगा है|

आज का दिन तो चलिए किसी तरह लगभग निकल ही गया है, लेकिन कल क्या होगा जब उपवास का प्रभाव श्रीमती जी के स्वाभाव की सारी नरमी सोंख लेगा| बस यही चिंता खाए जा रही है|

हमारा चार दिन की ज़िंदगी में हाल है ऐसा
न जाने लोग कैसे हैं जो सौ सौ साल जीते हैं


चित्र http://www.exoticindiaart.com/ से साभार

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