अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Sunday, October 16, 2016

गरचे मतलब कुछ न हो

ऐसा लगने लगा है कि वर्तमान समय में बोलना सबसे बड़ी कला हो गयी है| कुछ भी बोलना और बोलते रहना बेशर्मी की सीमा से निकलकर जीवन की ज़रूरी कुशलता बन गया है। मन, बुद्धि और विवेक की सारी ताकत खिंच कर ज़बान पर जम चुकी है| हाथ पाँव हिलें न हिलें, ज़बान का हिलना समय की मांग हो चुकी है। जबान का हिलना ही नहीं बल्कि जबान का कतरनी की तरह चलना और चलते रहना सामाजिक आदत बन गया है। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि श्रोता सुनना बंद कर देते हैं, लेकिन वक्ता बोलना बंद नहीं करते| सड़कों पर, दूकानों में, घर में, दफ्तरों-अदालतों में, टीवी पर सभी जगह यही हाल है|

पिछले दिनों डेंगू और चिकनगुनिया का कहर छाया हुआ था| लोग बुखार और दर्द से परेशान डाक्टरों के यहाँ लाइन लगाए बैठे रहते थे| कष्ट अपनी जगह था लेकिन भाषण-प्रेमियों की भी बन आयी थी| फेसबुक, व्हाट्सएप सरीखे मंचों पर चढ़कर मित्रों ने सलाहों और हिदायतों का इतना बड़ा अम्बार लगा दिया था कि बीमारों की आधी जान तो उसके नीचे दब कर ही निकल जाती थी| रही सही कसर फोन पूरी कर देता था| सच तो यह है कि ज्ञान झाड़ने में हमारा कोई जवाब नहीं है| मुँह खुलता है तो खुला का खुला रह जाता है। देश का आम बजट आता है तो हर चौथी फेल उसकी समीक्षा में लग जाता है| अपने बच्चे संभलते नहीं, दूसरों को इस विषय पर राय दी जाती है कि बच्चों का पालन-पोषण कैसे किया जाना चाहिए| मैंने तो अड़तीस किलो के सिगरेट सरीखी टांगों वाले एक सींकिया पहलवान को ‘शरीर रक्षा के उपाय’ पर भाषण झाड़ते भी देखा है| अपने घर में पत्नी की झाड़ पड़ती है तो आवाज नहीं निकलती और बाहर सेना को सलाह देते हैं कि पाकिस्तान को नेस्त-ओ-नाबूद कर दो| फाटकेबाज़ नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, मौहल्ले के पतंगबाज सरकार को विलायती जहाज खरीदने का मशवरा देते हैं, लोग-बाग बोतल में मनी प्लांट की बेल लगाकर कृषि वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं; कहाँ तक कहते रहें बस यह समझ लीजिये - “मानहुँ पर्वत कन्दरा, मुख सब गये समाइ|”

काफी लम्बे समय से इस विषय पर चुप-चाप मनन करता चला आ रहा था कि आखिर इतना अधिक बोला क्यों जाता है| मनन तो लगातार चलता रहा था पर उत्तर ही नहीं मिल पा रहा था| इसका ज़िक्र अपने परम मित्र चकौड़ी दास जी से किया तो उन्होंने एक कमाल की बात कही –
“बोलना ऐसी कला है जिसका प्रयोग बात कहने के लिए किया जाता है, लेकिन उससे भी कहीं अधिक उसका प्रयोग बात को न कहने के लिए भी किया जाता है|”

मैंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा –
“चलिए, यह बात तो सही है, लेकिन समय के साथ भाषा में एक तरह का जो नंगापन आता जा रहा है; वह बड़ा खतरनाक लक्षण है| किसी भी बात को सलीके से क्यों नहीं कहा जा सकता? यह क्यों जरूरी है कि दूसरे को चोट पहुँचाने के लिए ही शब्द मुँह से निकाले जाएँ|”

मेरी बात सुनकर जोर से हँसे और बोले –
“अरे भाई, सांड को अगर कच्छा-बनियान, सूट-बूट पहनाकर उसके सामने खड़े हो जाओगे, तब भी वह सींग तो मारेगा ही|”

मैने उनकी बात से अपना ही मतलब निकालते हुए कहा –
“इसका मतलब यह है कि भाषा अपनी जगह है और भावना अपनी जगह| भावना को भाषा का मोहताज नहीं माना जाना चाहिए|”

पता नहीं क्यों यह सुन कर थोड़ा चिढ से गए| शायद कोई पुराना ज़ख्म था जिसे मैंने कुरेद दिया था| कहने लगे –
“आप भावना और भाषा की बात करते हैं, उससे पहले यह समझ लीजिए कि भाषा का जन्म होता किस उद्देश्य से है| उससे भी पहले यह समझ लीजिये कि जानवरों की कोई भाषा नहीं होती और मनुष्यों के पास भाषा के अलावा कुछ नहीं होता| जानवर अपना जीवन जीते हैं लेकिन मनुष्य अपने जीवन से ज्यादा दूसरे का जीवन जीते हैं| जितना अधिक विकसित मनुष्य-समाज होता है उतना ही अधिक विकसित उसका भाषा-बोध होता है| इसकी वजह भी सीधी सी है| जैसे-जैसे मनुष्य का विकास होता है उसमें शिकायत, चुगली, परनिंदा, आत्मप्रशंसा और श्रेष्ठता की भावना जैसे गुणों का विकास होता जाता है| इन्हीं भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए भाषाओं का प्रयोग किया जाता है| यही भाषा के जन्म का अंतिम उद्देश्य है|”

थोड़ा ठहर कर उन्होंने एक गहरी सांस ली और फिर बात को आगे बढ़ाया –
“देखो, भाषा और भाव का सम्बन्ध डाक्टर और कंपाउंडर जैसा होता है| डॉक्टर जो दवाई लिख देता है कंपाउंडर भी वही दवाई देता है| अगर कुछ भी इधर-उधर हुआ तो समझो कि मुसीबत को बुलावा मिल गया| फिर तुम कैसे कह सकते हो कि भावना को भाषा का मोहताज...”

अच्छा, उनकी बात अभी ख़त्म नहीं हुई थी| मैंने टोक कर कह दिया –
“भाषा तो विशुद्ध अभिव्यक्ति का साधन है| भाषा ही तो वह साधन है जिसके द्वारा हम दूसरों से जुड़ते हैं|”

एक दम सिरे से उखड़ कर बोले –
“इस कठहुज्जत से कोई बात नहीं बनेगी| भाषा का प्रयोग अपनी पीड़ा को दूसरों तक पहुंचाने में ज्यादा हुआ करता है| सड़क पर चलते हुए आपके पाँव पर किसी की गाड़ी का पहिया चढ़ जाये तब देखिये किस तरह भाषा मूर्तिमती होकर आपके मुख से निकलती है| किसी की बात आपको चुभ जाए तब देखिये भाषा किस तरह खंजर बन कर कलेजे में उतरने को तत्पर हो जाया करती है|”

आज वे पूरी रौ में थे| कंधे पर आजिज़ी के साथ हाथ रख कर उन्होंने समझाते हुए कहा –
“भाषा के प्रभाव को विस्तार से समझना हो तो एक बार दिल्ली घूम आइये| इन दिनों दिल्ली की सड़कों पर हरयाणवी खूब धड़ल्ले से बोली जाती है| चाहे डी टी सी की बसों के ड्राइवर-कंडक्टर हों या फिर गुड़गांव में अपनी जमीनें सोने के भाव बेचकर नव-धनाढ्य हरयाणवियों का वर्ग हो| आज दिल्ली में हरयाणवी धाकड़पने की भाषा है, अधिकार की भाषा है, किसी को कुछ न समझने की मनोवृत्ति की भाषा है| कानटूटे पहलवान ऊँची कार में से उतरते हैं और अक्खड़पने के साथ सामने अपनी छोटी सी कार रोककर खड़े हुए सफ़ेद कॉलर वाले साहब की माँ-बहन एक कर देते हैं| तंत्र के तो केवल पञ्च-मकार प्रसिद्ध है, भाषा के मकार तो ‘अ’ से शुरू होकर ‘ज्ञ’ तक जाते हैं, मेरे भोले!”

मैंने कहा - “इससे तो यह साबित होता है कि भाषा बौद्धिकता का प्रतिरूप है|”

तमक कर बोले –
“घंटा है बौद्धिकता का प्रतिरूप! भाषा आज का ‘स्टेटस सिम्बल’ है| फिलहाल दिल्ली की बात चल रही है तो यह भी समझ लीजिए कि बिहारी भाई दिल्ली पहुँचते हैं तो कैसे अपनी भाषा को बदलने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं| अपनी भाषा ही नहीं बोलने की लहजा बदलने की कोशिश में चेहरे की रेखाओं में गहरापन आ जाता है, माथे की नसें उभर आती हैं और पाँव ऐसे काँपते हैं जैसे दिल्ली की जमीन में आठ डिग्री से भी अधिक ताकत का भूचाल आ गया हो| मैंने ऐसी स्थिति में कईं बार आँखों में शर्मिन्दगी और बेबसी का भाव भी जागते देखा है|”

मेरे भीतर का बौद्धिक जिज्ञासु अभी भी करवटें बदल रहा था| मैंने फिर उसकी बात को स्वर दिया –
“भाषा व्यक्तियों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच पुल का काम करती है|”

सुनकर धीरे से मुस्कराए फिर कमर पर धौल जमाया और अपनी बात को आगे बढाते हुए बोले –
“तुम भी यार पूरे घोंघा-बसंत हो| यह कोरा झूठ है| भाषा अलगाव का महामंत्र है| हमारे गाँव में एक बार बंटवारा हुआ था| जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे, बरतन, कपड़े, आभूषण, हल-बैल, मवेशी भाइयों के बीच बांटे गए थे| बंटवारा तो हुआ था लेकिन सारा गाँव उसे रोकने की कोशिश कर रहा था| कोशिश तो कर रहा था लेकिन कोशिश की सफलता भी चाह रहा हो ऐसा कभी भी नहीं लगता था| सफ़ेद दाढ़ी वाले और ऊँची धोती वाले बुजुर्ग पग्गड़ बाँध-बाँध कर अनहोनी को टालने की कोशिश में दिखाई देने की कोशिश करते हुए दरवाजे पर जम गए| लगातार ऊँचे स्वर में बोल रहे थे| तकरार की तेजी में कमी आती तो मजे में खुद-ब-खुद कमी आने लगती थी| जहां मामला सुलझाता सा दिखाई देता तो फिर कोई ऐसी पेंचीदा बात कह देते कि महायुद्ध एक अल्पविराम के बाद पुन: प्रारंभ हो जाता| खूब तू-तू मैं-मैं हुई लेकिन होनी तो होकर रहनी थी| हुई भी| गोलियां चलीं, तलवारें लहराईं, लट्ठम-लट्ठा हुई लेकिन बंटवारा भी होकर रहा| पता नहीं वहाँ इतनी आसानी से अलगाव कैसे हो गया! शायद एका कभी था ही नहीं| घुट-घुट कर बातें करने वाले भाइयों और उनके परिवारों के बीच आज भी बोलचाल बंद है|”

बात भाषाओं के अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और दर्शन की गलियों में चक्कर काट कर समाजशास्त्र पर आकर दम लेने के लिए रुक गयी थी| रुकी तो बड़ा सुकून महसूस हुआ| इच्छा हुई कि काश, ऐसा हो जाए कि रुकी हुई बात बस रुक कर ही रह जाए| कुछ भी सुनना न पड़े| वैसी भी सुना जाना किसी भी क़ानून के हिसाब से जरूरी नहीं है|

हमारे परम मित्र चकौड़ी दास जी का बोलना अभी भी चल रहा है| चल रहा है तो चलता रहे| उनका तो बस यही हाल है -
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ  हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

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