अपनी बात

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Tuesday, October 11, 2016

बज रही घंटी

समस्या गंभीर थी| गंभीर! सो भी कोई ऐसी वैसी गंभीर नहीं; खतरनाक वाली गंभीर|

फिजाओं में हवा की जगह खुरदुरी रेत बह रही थी जिसमें न ज़िंदगी थी, न ताजगी| बस चारों तरफ एक अजीब सी खसखसाहट घुली-मिली थी| अन्धेरा इतना कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था| कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था| जंगल के सारे जानवर किसे अनहोनी की आशंका से त्रस्त थे|

जानवर भी केवल जानवर न थे| एक से बढ़ कर एक बाकमाल थे, तरह तरह के चरित्र और तरह तरह के स्वभाव वाले| उनमें बहुत सारे आलोचक थे, कुछ-एक विचारक थे और दो-एक कार्यकर्ता भी थे|

समस्या थी तो उसके कुछ कारण भी थे| कारण थे, तो कारण पैदा करने वाले भी थे| सब कुछ था तो माना जा रहा था कि कोई उपाय भी होगा| जब उपाय के होने की उम्मीद थी तो उसे खोजने वाले भी होने ही थे| कोई कुछ भी अपने आप तो होता नहीं हैं| होता तब है जब उसे ज़िम्मेदारी दी जाती है| यूँ भी, वे जानवर सभ्यता के उस शिखर पर पहुँच चुके थे जहाँ अपने आप कुछ भी नहीं होता| वही होता है जो किया जाता है| तो इस सिद्धांत के तहत उपाय खोजने की ज़िम्मेदारी विचारकों को दी गयी थी|

विचारक भी कैसे? एक से बढ़कर एक! सारा डेटा दिमाग में और दिमाग? भगवान जाने कहाँ| उन्होंने बहुत सारे उपाय सोचे लेकिन उपाय सोचते सोचते समस्या को भूल गए| विचार पारे जैसे होते हैं| ज़रा सा छू भर लिया जाए तो अलग अलग दिशाओं में भागते हैं| एक बार इकट्ठा कर दिया जाए तो पता नहीं कौन सा हिस्सा किस दिशा में गया था| सब पूर्ववत हो जाता है| उथल-पुथल पूरी रहती है लेकिन नतीजा सिफर! कहने का मतलब यह है कि जहाँ से चले थे, लौट कर वहीं आ पहुंचे| इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि जिन्दगी एक पहिया है जो घूम-घाम कर वहीं आ रुकता है जहां से चलना शुरू करता है| जन्म, बचपन, जवानी बुढापा मृत्यु और फिर से जन्म का चक्कर चलता ही रहता है|

किसी ने याद दिलाया कि भई, समस्या को तो देख लो एक बार!

उपाय खोजने की जिम्मेदारी विचारकों की थी| उन्हें जो एकमात्र उपाय दिखाई दे रहा था वह था कि स्थिति को यथावत् रहने दिया जाए| उनका मानना था कि जब समस्या को मान लिया जाता है तब उसके समाधान की खोज में सिर खपाना लाजमी हो जाता है| वे उन लोगों को हिकारत की निगाह से देख रहे थे जिनकी समझ में पता नहीं यह छोटी सी बात क्यों नहीं आ रही थी| क्या किया जाए? दो-चार सिरफिरे सब जगह होते हैं जिनका ‘आ बैल मुझे मार’ के सिद्धांत में अटल विश्वास होता है| उन्हीं की वजह से समस्याओं का बोझ सभी को अपने काँधे पर ढोना पड़ता है| यह श्रम जैसे वाहियात विचार को जन्म देता है| वैसे वे काम करने को इतना बुरा भी नहीं मानते थे और ख़ास तौर पर उस स्थिति में तो वे काम की पूजा करते थे जब काम किसी और के द्वारा किया जा रहा हो|

तो, विचारकों का स्पष्ट मत था कि काफी सोच-विचार के बाद यह यह मान लिया जाना चाहिए कि कोई समस्या है ही नहीं| यह कोई नई बात है भी नहीं, अतीत में ऐसा कई बार हो चुका है| यूँ भी चिंता-परेशानियों को चेहरा देना नकारात्मक दृष्टिकोण है| जीवन का आनंद तो सकारात्मकता में छिपा हुआ है| नकारात्मकता कष्टों का द्वार है| वैसे भी आलोचक लोग घात लगाए बैठे रहते हैं| आलोचना से बचने का तो यह जांचा-परखा तरीका है कि कुछ न कहो और कुछ भी करने से तो पूरा ही परहेज रखो|

समाज में कुछ कार्यकर्ता भी थे जिनके पुरखे भी मूलरूप से कार्यकर्ता ही रहे थे| उनकी बात न कोई मानता था और न ही उनसे राय ली जाती थी| ये वे लोग थे जिनका सम्मान या तो एक मई को किया जाता था या फिर विश्वकर्मा दिवस को उनकी पूजा करके किनारे कर दिया जाता था| बाकी दिन उनका काम केवल हुक्म बजा लाने का ही था| कार्यकर्तागण यूँ भी विचारकों के इस दावे से परेशान रहते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं| ‘जानने’ का परिपाक ‘न जानने’ में हो जाए तो मामला कहीं अधिक चुभने वाला हो ही जाता है| उन्होंने भी आपस में विचार-विमर्श किया और राय बनाई कि विचारकों को अवश्य ही समस्या को समझकर उसका समाधान खोजना चाहिए तथा उसे अमल में भी लाना चाहिए| इससे और कुछ नहीं भी होगा तो कम से कम कुछ करने को तो मिलेगा| हो सकता है कि बाल – बच्चों के दो-चार वक्त के खाने का ही इंतजाम हो जाए|

कुछ हठधर्मी आलोचक भी थे जो अपने बात पर अड़े हुए थे कि समस्या को अवश्य ही समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए| राय उनकी भी यही थी कि न केवल परिस्थिति को समस्यागत माना जाए बल्कि उपस्थित समस्या का समाधान पाने का प्रयत्न भी किया जाए| जैसे ही समाधान सामने आये, उसे प्रयोग में लाने में क्षणांश की भी देरी नहीं करनी चाहिए| इसके बाद बुद्धि की निकषा पर समाधान रूपी धातु को परिणाम के आधार पर परखा भी जाना चाहिए| हद्द होती है! जीव भी कभी कभी कितना डिमांडिंग हो जाता है| साफ़ तौर पर उन्हें डर था कि अगर वे ऐसी मान नहीं करेंगे तो आलोचक के रूप में उनकी उपयोगिता पर सवालिया निशान लगने लगेंगे| विचारकों के बारे में उनकी जमी-जमाई राय यही थी कि गाय का दूध निकालने के सौ तरीके जानते हैं लेकिन गाय को नहीं पहचान पाते|

तात्पर्य यह है कि मूल समस्या तो थी ही लेकिन उसके साथ जुडी हुई कई आनुषांगिक समस्याएँ भी थीं|

मामला एक नज़र में जितना सीधा-सादा लगता था उतना था नहीं| समुद्र में तैरती हिम-शिला तो देखी ही होगी| बस, यह समझ लिया जाए कि वह समस्या नहीं थी, एक हिम-शिला ही थी| जितनी सतह पर दिखाई देती थी उसकी नौ गुना सतह के नीचे पसरी थी|

मामले पर तरह तरह से और जगह जगह पर विचार किया गया| एकाध बार प्रकाश की किरण कौंधी तो सही पर चिरस्थाई न रह सकी| किसी मनचले ने सलाह दी कि मामला वनराज के पास ले जाना चाहिए| कार्यकर्ताओं ने सोचा कि चलो कुछ समाधान मिलेगा, अपने कौशल को परखने का अवसर प्राप्त होगा| विचारकों ने भी विचार किया कि हाँ, यही सही रहेगा| राजा की मदद करने में जो मज़ा है वह इन टटपूंजियों को रास्ता दिखाने में कहाँ! शायद कुछ इनाम-विनाम का भी जुगाड़ बैठ जाए| आलोचकों को भी यह सलाह पसंद आयी| न सही समाधान, उसकी प्रक्रिया पर ही कलम चलाएंगे| अरसा हो गया कोई हॉट टॉपिक मिले हुए| आलोचक की तो ज़बान बिकती है| कौन जाने ज़बान पर लगी लगाम थोड़ी कमजोर पड़ जाए और बुराइयां देने, कीचड़ उछालने, व्यवस्था को गलियाने और व्यवस्थापकों को लतियाने का कोई संविधान-सम्मत मौक़ा हाथ पड़ जाए|

सो, सब मिलकर राजा की गुफा के द्वार पर पहुँचे और फ़रियाद की घंटी बजाने लगे|

इस घटना को घटे आज सैकड़ों साल हो गए है| घंटी अभी भी लगातार बज रही है लेकिन उसकी आवाज़ न जाने क्यों भीतर नहीं जा पा रही है| अन्दर से कुछ गाजे-बाजे की सी आवाज तो कभी-कभी आती है, लेकिन फ़रियाद को सुनने के लिए कोई नहीं आता|

चित्र http://fineartamerica.com/ से साभार

2 comments:

  1. धन्यवाद, दुबे जी|इस विचार का उत्स हमारी रोज़मर्रा की ज़िंदगी में ही है जहां अक्सर ही अनिश्चय की परिस्थिति से दो-चार होना पड़ता है|

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