अपनी बात

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Monday, May 30, 2016

पिघलती बर्फ

आज दोस्तों के साथ बैठ ही लिए|
 
धरती का घूमता गोला सर्दियों को हर साल अपनी परिधि में घेर लाता है| सर्दियाँ आती हैं और साथ लाती हैं हर दिल में जागती हुई गरमाहट पाने की उत्कट इच्छा| आँगन के किसी भी कोने में धूप का कतरा उतरता है, तो मन उसके पास जाकर अपनी बाहों में समेट लेने के लिए बेचैन हो उठता है|
 
हर वर्ष की तरह एक बार फिर गरमाहट के खोजी तीन दोस्त घर के छोटे से लॉन में मिले, बैठे| मतलब की बातें शुरू हुईं, फिर धीरे-धीरे बातों के मतलब भी निकलने लगे| परिवार भी आस-पास ही थे| कितनी ही बचपन की बातें सुनी-सुनाई गयीं| यह बात दीगर है कि उन यादों का पुलिंदा पहले भी न जाने कितनी बार खोला जा चुका है, ऐसे ही किसी मौके पर| फिर भी, हर बात नई सी लगी|
 
सब ने मिल कर लकड़ियाँ जमाईं और उसके चारों ओर घेरा बना कर बैठे| रामलीला की बातें हुईं| बुन्दूराम मास्टर जी को याद किया जो मरते दम तक रामलीला के स्वयंभू डायरेक्टर बने रहे| लाला रामचरण का ज़िक्र हुआ जो जिनके नाम से लडके रामलीला के सारे कलाकारों के लिए मात्र एक रुपये का इनाम घोषित करा देते थे| इसके बाद तमतमाए हुए लाला लड़कों को मन भर गालियाया करते थे| हर्रों हलवाई की जलेबियाँ, किसना के समोसे, गोवर्धन की गजक और चुन्नीलाल की चाट-पापड़ी का स्वाद एक बार फिर ज़बान पर छा गया| अब इनमें से कोई नहीं है| शायद इनके लड़कों ने अपने धंधे भी बदल दिए हैं, लेकिन स्वाद आज भी जीवित है, पुरानी यादों में, बचपन की बातों में| बच्चे मुँह बाए सारी कहानियाँ सुनते रहे और अपने परिवेश में उन सभी को पहचानने की कोशिश में लगे रहे| आग जलने लगी थी, चिंगारियाँ छिटकने लगीं थी|
 
लकड़ियों के चटखने की आवाजों में से किस्से फूटने लगे थे| फूफा जी की शादी का वृत्तान्त, हाथी के भड़क कर दुल्हे को ले भागने का हादसा, दुल्हे के पेड़ पर लटकने की कथा, दुल्हन के आँचल से बंघी वर की धोती की लाँग खुलने का प्रकरण, मास्टर जी के हाथों मार खाने का उपाख्यान, हरिया की लड़की और तेलू पंसारी के लड़के की प्रेम कथा, ज़रुरत से ज़्यादा रुई भरने से कड़ी और खड़ी हो गई रिजाई पर उपजा झंझट, भाषा सीखने के लिए गालियों से शुरुआत करने वाले आयरिश की जीवनी, कपड़ों की छीना झपटी और खाने को लेकर मची अफरातफरी का फ़साना, नवदुर्गा पर कन्याओं को जिमाने का कथानक; सर्दी से थरथराती अंधेरी रात में उजाला कर गए| आँच की तपिश भीतर तक गरमाने लगी थी|
 
घर परिवार से लेकर आस-पड़ौस तक के लोग कहानियों में सिमटकर साथ आ बैठे| जिनसे न कोई जान न पहचान, न कोई मिलना न जुलना वे सब अपने से लगने लगे| कितनी ही बार लगा कि कल ही तो मिला था उनसे कहीं नुक्कड़ पर, पान की दूकान पर, चाय के खोखे पर, किसी की शादी में, किसी की गमीं में, नामकरण पर, जनेऊ पर या यूँ ही सफ़र करते हुए रेल के डिब्बे में| कितनी सारी बातचीत हुईं थीं उनसे! एक दूसरे के रिश्तेदार अपने रिश्तेदारों जैसे लगने लगे| कितनी ही बार मन हुआ कि किस्सा सुनाने वाले से कह दूँ कि इसबार जब भी उनसे मिलो तो मेरी राम राम कह देना| किरदार को जानने के लिए नाम-पता जानने की ज़रुरत नहीं होती, आज समझ में आ गया| आग की लपटों में छवियाँ बनने लगी थीं|
 
जिसे हम काम की बात कहते हैं, ऐसी कोई भी बात नहीं हुई| पर फिर भी सब खुश थे| बच्चे चाव से कहानियाँ सुन रहे थे, सवाल कर रहे थे| कोई बीच में बोलता तो “सुनो, सुनो” कह कर चुप करा देते थे| उनके दिल के भीतर दुबकी जान लेने की इच्छा आज आँखों में दिखाई देने लगी थी| चिंगारियाँ उचटने लगी थीं और जहाँ-तहाँ गिरकर छोटे-छोटे अलाव जलाने लगी थीं|
 
सुनते हैं कि आज के बच्चे आत्मकेंद्रित होते जा रहे हैं| वे परिवार को जानना नहीं चाहते| हो सकता है, लेकिन हम उन्हें परिवार से, अपनों से जोड़ने के लिए कहानियाँ भी कहाँ सुनाते हैं! हम उन्हें दूर के रिश्ते के उन दादा जी के बारे में कहाँ बताते हैं, जिन्हें शादियों में मंडप बाँधने का शौक था, जो शहर के हर परिचित अपरिचित के यहाँ शादी का मंडप बाँधने पहुँच जाते थे, जिन्होंने इस काम के लिए अपने चेले तैयार कर लिए थे ताकि उनके बाद भी यह प्रथा चलती रहे| हम उस बल्लू के बारे में कहाँ बताते हैं, जो किसी भी घर में मौत की खबर सुनते ही अपने आप बिना बुलाये अर्थी बाँधने पहुँच जाता था और जिसे मंज़ूर न था कि एक गाँठ भी गलत लग जाए| हम कहाँ बताते हैं कि गाँव में कोई भी पर्व-त्यौहार होने पर आँगन और सड़क को सजाने के लिए रंगीन कागज़ की झंडियाँ बनायी जाती थीं| गाँव में उत्सव किसी के यहाँ भी हो अनाज का पिसान सबके यहाँ होता था| दही हर घर में जमाया जाता था| शाक-भाजी आढ़त से नहीं लाई जाती थी बल्कि घर-घर से उसका संग्रह किया जाता था| मिठाइयों की तश्तरियाँ हुआ करती थीं और उन तश्तरियों को खाने की प्रतियोगिताएँ चलती थीं| सुख्खू कुबड़ा सौ रसगुल्ले खा जाता था| वो चहलपहल, धूमधाम, रसिकता, रंग, आमोद-प्रमोद! हम कहाँ बताते हैं उन्हें यह सब? उस पर तुर्रा यह कि शिकायत भी करते हैं कि आज के बच्चे इकलखोर होते जा रहे हैं|
 
हम परेशान रहते हैं कि बच्चे टीवी से चिपके रहते है| परेशान तो रहते है, लेकिन यह नहीं बताते कि टीवी का आना हमारे बचपन में एक सामाजिक घटना थी| रविवार की शाम जब दूरदर्शन पर पिक्चर आती थी तो सारा मौहल्ला टीवी के सामने इकट्ठा हो जाता था| दरियाँ बिछाईं जाती थीं, चाय बनती थी, गाना आने पर बच्चे नृत्य करने के लिए खड़े हो जाया करते थे, टीवी को रंगीन बनाने के लिए उसके सामने रंगीन स्क्रीन लगाई जाती थी और पूरा मौहल्ला एकाग्रचित्त होकर एक परिवार बनकर आनंद लेता था| मूंगफली के छिलके तोड़ने की आवाज़ लगातार आती रहती थी| बूढ़े काका वैजयंती माला को स्क्रीन पर देखकर भावविभोर हो जाया करते थे| किसी ने बताया कि नेहरू जी वैजयंती माला के बड़े प्रशंसक थे| सुनकर काका, जो स्वयं नेहरू जी के अनन्य भक्त थे, नेहरू जी के प्रति शंकित हो जाते थे| उनके चेहरे पर अनायास ही ईर्ष्या का भाव जाग उठता था| दोनों एक ही भावभूमि पर स्थापित हो जाया करते थे| कृषि-दर्शन का कार्यक्रम पूरे चाव के साथ देखा जाता था| पूरा समाज मासूमियत की डोर से बंधा था|
 
जो काम हज़ारों-लाखों वैज्ञानिक नहीं कर नहीं कर सकते, यादें आपस में मिल-मिला कर एक यंत्र बनाती हैं, जिसे टाइम-मशीन या समय-यंत्र कहते हैं| आज उस समय-यंत्र की सबने सवारी की और घूम आये दशकों पीछे की दुनिया में जब बिनाका गीत माला बजा करती थी, हॉकी के टैस्ट मैच होते थे जिनका आँखों देखा हाल सुना जाता था, शास्त्री जी रेडियो पर देश में अन्न की कमी की बात करते थे तो उनकी एक पुकार पर लाखों लोग सप्ताह में एक दिन उपवास करना आरम्भ कर देते थे, प्रेशर कुकर को स्वाद का हत्यारा कहा जाता था, गैस पर खाना पकाने में गृहणियाँ डरती थीं, आधा हिन्दुस्तान रात में लालटेन और तेल की ढिबरियाँ जलाता था, भाप के इंजन से चलने वाली रेलगाड़ियों की सवारी की जाती थी और कभी-कभार अखबार में कम्प्यूटर नामक खोज के बारे में छपता था जिसके बारे में सुना जाता था कि वह इंसान की इच्छा से भी तेज़ दौड़ जाता है| आग के नीचे रेत में कुछ शकरकंदियाँ दबा दी थीं| उनके भुनने की गंध फैलने लगी थी|
 
किसी ने मज़ाक में पूछा कि पेंसिल और कैसेट का क्या सम्बन्ध है| लगभग सभी बड़ों को ध्यान था कि कैसेट लपेटने के लिए उसमें पेंसिल घुमाई जाती थी| याद आया कि कैसेट ख़राब होने पर कूड़े के ढेर पर फेंक दी जाती थी और शरारती बच्चे उसे खोल कर फीता कुत्ते की पूँछ में बाँध देते थे| हवा में लहराता हुआ फीता गली के एक सिरे से दूसरे सिरे तक पहुँच जाता था| अब बच्चे स्कूल जाते हैं| ट्यूशन जाते हैं| होमवर्क करते हैं| बचे हुए समय में विडियो गेम खेलते हैं या बड़े शहरों की सोसाइटियों में बने पार्कों में झूला झूलते हैं| अब हम उन्हें गली में खेलने ही नहीं देते|
 
एक दोस्त की पत्नी ने बड़ी हसरत से याद दिलाया जब गली की औरतें दोपहरियों में काम निपटाकर साथ बैठती थीं| पापड़ बेलती थीं, कचरियाँ तोड़ती थीं, जवे उतारती थीं, फंदे गिनते हुए सलाइयाँ चलाती थीं और पास में खेलते किसी के भी बच्चे को भी बुलाकर नाप का अंदाजा लेती थीं, छोटी छोटी लड़कियों को क्रोशिया चलाना सिखाती थीं, फ्रेम में कपड़ा कस कर फूलों और बेलबूटों की कढ़ाई करती थीं या झुण्ड में बैठी सबसे बूढ़ी औरत से जानकारी लेती थीं कि बीस किलो आम के अचार में कितनी कलौंजी और कितना तेल डालना चाहिए| आग के चारों तरफ वे ही बूढ़ी, जवान जानकार औरतें बैठी दिखाई देने लगीं जिनके संचित ज्ञान का हस्तांतरण पीढ़ी दर पीढ़ी मौहल्ले के किसी घर के दालान में ऐसे ही होता आया है| जो पहले कलाएँ थी, अब झंझट हो गए हैं| अब तो सब बाज़ार में मिल जाता है| सच है, सारा सामान बाज़ार में मिल जाता है लेकिन भावनाएँ अभी भी किसी दूकान पर नहीं मिलतीं|
 
भागती-दौड़ती ज़िंदगी में रिश्ते-नाते जमते से जा रहे हैं| मिलना नहीं होता किसी से भी| सिर्फ मिलने के लिए घंटों सफ़र करके लोग किसी दोस्त-रिश्तेदार के घर नहीं जाते| बतकहियाँ नहीं होती| कहकहे नहीं होते| किस्सों की बेरोकटोक धाराएँ नहीं बहतीं| बेलाग बातें नहीं होती| धौल-धप्पा नहीं होता| फ़िज़ूल की गप्पें नहीं होतीं| कुछ ठंडे से दो-चार लफ्ज़ इधर से और कुछ जमे से दो-चार फ़िक़रे उधर से और बात ख़त्म| फिर काम की बात पर आ जाते हैं| कितनी काम की होती हैं, इसका किसी को कोई अंदाजा नहीं| माना जाता है, काम की बातें होती हैं| हर दिल डरा सा रहता है कि कहीं किसी को कोई बात बुरी न लग जाए| फ़िक्र रहती है कि अगर किसी ने कोई तीखी बात कह दी तो उसका जवाब क्या होगा| हम बातों को मज़ाक में उड़ाना भूल रहे हैं|
 
आज माहौल कुछ बदला सा लगा| घंटों तक लकड़ियाँ दहकती रहीं, अग्नि की जीभ लपलपाती रही, परछाइयाँ अँधेरे में नाचती रहीं और फिर धीरे धीरे आग ठंडी पड़ने लगी| लकड़ियाँ कोयले में और कोयला राख में बदलने लगा| धीरे धीरे सब उठे, चलने का उपक्रम हुआ, विदा ली गयी, नमस्कार-प्रणाम-बाय-गुडनाइट का दौर चला और सब अपने अपने घर की ओर रुखसत हुए| सर्दी बहुत थी, कोहरा और ठिठुरन भी, लेकिन आज कोई काँप नहीं रहा था| सब अच्छी तरह तपे हुए थे| खासतौर पर बच्चों के गाल तो मारे गर्मी के बिल्कुल सुर्ख हो गए थे|
 

जीवन के छोटे छोटे क्षण किस तरह कहानियाँ बनाते हैं और किस तरह उन कहानियों में पूरा इतिहास और तत्कालीन जीवन-दर्शन निबद्ध हो जाता है, बस यही प्रस्तुत रचना का मूल भाव है| ‘आग की गरमाहट’ के रूपक से यही बात कहने की कोशिश की है|

 चित्र paintwithme.ca, www.marycoss.com से साभार

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