अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Thursday, April 7, 2016

दुआ

सारी दुनिया सोयी थी,
अँधेरे की चादर में लिपटी हुई|
घास की पत्तियों पर उड़ते थे
कुछ बेआवाज, बेफिक्र, आवारा जुगनू
रेडियम की टार्चें लिए हुए|
कभी कभी हवा की सरसराहट से जागकर
पेड़ धीरे से करवट ले लेते थे |
चाँद का पंछी जाकर ठहर गया था
आसमान की कोर पर|

और मैं अकेला बेजुबान, बेरौनक
मुंडेरी पर कोहनियाँ टिकाए
बैठा था किसी टूटते तारे की इंतज़ार में|

माँगना चाहता था दुआएँ
भूख से कुलबुलाती आँतों के लिए,
कमजोर काँपते हाथों के लिए,
सफ़ेद पड़ गए रक्त के प्रवाह के लिए,
बच्चों की गुम हो गयी मुस्कराहट के लिए,
रात कुचली गयी थी जो कली किसी के पैरों तले
उसकी मासूमियत के लिए,
आसमान को ताकती हथेलियों के लिए,
और सबसे अधिक उन आत्माओं के लिए
जिन पर असर ही पड़ना बंद हो गया है अब
उन दृश्यों का
जो कभी तूफ़ान उठा दिया करते थे
कायनात में|

चित्र www.paulsquire.com, waldyrious.deviantart.com से साभार

No comments:

Post a Comment