अपनी बात

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Wednesday, April 13, 2016

जो देश में चल रहा है

विधि की विडम्बना देखिये, सरकार बनाने का मौक़ा हाथ में था और हमारे पाँव काँप रहे थे| न केवल शासकीय बल्कि वित्तीय अधिकार भी हमारे पास आ रहे थे और हम थे कि पार्टी से निलंबित विधायक से चेहरे पर मुर्दनी सजाये बैठे थे|

क्या कहें, बस अक्ल पर ही पत्थर पड़ गए थे| अच्छी खासी जिन्दगी चल रही थी| आराम-तलबी पूरे उरूज पर थी| कोई चिंता ना फिक्र, पर तकदीर ही ऐंठने लगे तो कोई क्या करे|

 हुआ...? क्या नहीं हुआ...! होशियारी भारी पड़ गयी| जीवन का सफ़र मज़े से सही रास्ते पर चला जा रहा था लेकिन दिमाग का कीड़ा जागा और बस! आ बैल मुझे मार| चलिए, पहेलियाँ बुझाना बंद, सीधे मुद्दे पर आते हैं| बात यह है कि पिछले कई दशकों से या यूँ कहें कि विवाह के बाद से ही हमने अपनी पत्नी को गृहस्वामिनी की दर्जा है रखा है| ये लीजिए, अब स्त्री-अधिकारवादी लोग उखड़ने लगे| ठीक है, तो ऐसा कहते हैं कि विवाह के बाद से ही हमारी पत्नी ने गृहस्वामिनी होने का दायित्व हम पर और हमारे सभी सगोत्रियों पर कृपा करते हुए स्वीकार कर लिया था|

पूरे महीने हम अपने दफ्तर में जी चुरा कर काम किया करते थे और एक तारीख को तनख्वाह मिलते ही सारी कमाई अपनी पत्नी के चरणों में अर्पित कर देते थे| हमारे कर्त्तव्य की इतिश्री यहीं हो जाती थी| इसके बाद घर-गृहस्थी की चिंता से मुक्त होकर सारे महीने चैन की बंसी बजाते थे| घर चलाने के अलावा हमारी सारी फिजूलखर्ची भी हमारी श्रीमती जी के मत्थे थी| हम उनसे जेबखर्च लेते थे, मनमुताबिक खर्च करते थे और पैसे ख़त्म होते ही फिर उनसे पैसों की मांग करने लगते थे| ऐश थी| इज्जत और रुआब अर्श पर था|

श्रीमती जी का एक पुराना सेवक है, अशोक| वैसे तो उसे सेवक कहना ही अल्पोक्ति है, वस्तुत: वह तो उनका पूरा भक्त ही है| सही कहें तो भक्त भी क्या, चमचा कहना ज्यादा समीचीन रहेगा| नाम का तो अशोक है, लेकिन हमारे लिए तो शोक की गठरी है| देवी जी की सरपरस्ती में उसके मुँह में पाँच गज की जबान आ गयी है| उनके कहने पर सारा दिन एक पाँव पर खड़ा रह सकता है और अगर हम कोई छोटा-मोटा काम भी बता दें तो झट से कह देता है, “आंटी से कहला दीजिये|” अपनी सेवा-भक्ति और चापलूसी के बल पर उसने कामचोरी का अधिकार प्राप्त कर लिया है| कामचोरी ही नहीं मुँहजोरी का हक़ भी उसने सहज ही कमा लिया है|

उस खाना-खराब की आए दिन होने वाली गुस्ताखियों पर हमारे इत्ते-पित्ते सुलग जाते हैं, लेकिन हमारी भी अपनी मजबूरियां हैं, जिनके चलते चुप रह जाते हैं| मजबूरी यही है कि सभी हिन्दुस्तानी पतियों की तरह हम भी पत्नी के दबाव में ही रहते हैं| वैसे तो दबाव में रहना आम हिन्दुस्तानी की नियति है| मकान-मालिक से लेकर नुक्कड़ पर खड़े वर्दीधारी तक सभी का दबाव सहन करना पड़ता है| क्या नेता और क्या उनके उनके गुंडे, सभी दबाव बनाए रखते हैं| एक दिन तो हद्द ही हो गयी| इतवार का दिन था| आलस्य में बिस्तर पर पड़े हुए टीवी देख रहे थे| थोड़ा ऐय्याशी करने का दिल हुआ तो हमने उस ढीठ से ज़रा यूँ ही बाजार जाकर नेगी जी की दूकान से पान-तमाखू लाने के लिए कह दिया| उसने अपना रटा रटाया संवाद “आंटी से कहला दीजिये” सुनाया तो गाव-तकिये के सहारे पसरे-पसरे हमने उसे काम से हटाने की धमकी दे डाली| कहीं और तो धमकाने का मौक़ा रहता नहीं, सोचा यहीं हाथ आजमा लिया जाए| धमकी  का असर भी हुआ| इधर हम जीत की खुशी मना रहे थे और उधर उसने चुपचाप अपनी साइकिल उठाई, बाजार गया और हमारे ऐब का सामान ले आया| ले तो आया पर लाकर हमारे हवाले नहीं किया बल्कि अपनी आंटी के हाथ में धर दिया| खुले पैसे वापस करते हुए उस बेगैरत अहसान फरामोश ने हमारी धमकी भी बा-तफसील सुना दी|

हमें तो इस घटना का तब जाकर पता चला जब हमारे सामने पड़ने पर हमने उससे पूछा कि भई, माल कहाँ है| उसने बेझिझक सारा वाकया सुना दिया| उसकी बात पूरी होते न होते हमारे माथे पर पसीना चुहचुहा आया| तीर कमान से निकल चुका था| देवी जी वैसे ही हमारी पान-तमाखू की आदत से बिदकी रहती हैं, ऊपर से हमारी धमकी वाली हिमाकत, संसार का अंत समीप ही दिखाई देने लगा| इज्जत और गुरूर का जनाज़ा निकालने के पूरे इंतजाम हो गए थे| उससे बात करने से कोई लाभ न था| भवितव्य होना तय था, सो जो होना था होकर रहना था| हमारे बचाव का कोई रास्ता न दिखाई देता था| अढ़ाई हाथ की ककड़ी, नौ हाथ का बीज| क्या करने चले थे और क्या हो गया| हमारा हाल वही था कि अंधा बगुला कीचड़ खाय| लेकिन शायद तकदीर बुलंद थी| विधाता को कुछ और ही मंजूर था| अगले कुछ दिनों तक इस बात का जिक्र ही घर में नहीं हुआ| न ही दरवाजे धड़ाम से बंद करने की आवाजें आईं| कोई तानेबाजी या छींटाकशी भी नहीं हुई| सुबह की चाय से लेकर रात के दूध तक सब हस्बेमामूल हमारे सामने पेश होता रहा| छोटी बिटिया ने भी, जो हमारी जिन्दगी में मौसम की भविष्यवाणी करने वाली वेबसाइट की तरह है, हवा के दबाव में होने वाले किसी बदलाव की तरफ इशारा नहीं किया| दुविधा जरूर थी कि हिमाकत को संज्ञान में क्यों नहीं लिया गया| धीरे-धीरे हमने मान लिया कि हमारे अधिकार की ध्वजा फहरा गयी है| फतहयाब हुए तो कमीजें छोटी पड़ने लगीं| छाती छप्पन इंच की जो हो गयी थी|

फिर एक दिन वह हुआ जिसके होने की उम्मीद समाप्त हो चुकी थी| महीने की एक तारीख हमने ए टी एम् से वेतन निकाला और श्रीमती जी की ओर घरखर्च के लिए बढ़ाया तो उन्होंने बहुत आजिजी के साथ कहा, “इसकी कोई जरूरत नहीं है| यह काम आप ही संभालिये|”

“क्यों, क्या हुआ?”

“कुछ नहीं, यह काम गृहस्वामी का है, गृहस्वामी ही संभालें|”

“ऐसा क्या हो गया?”

“नहीं, कुछ नहीं, घर के सारे निर्णय लेना आप ही को पसंद है इसलिए कह रहे हैं कि यह जिम्मेदारी अब आप ही संभालिये|”

अब बात कुछ समझ में आने लगी थी फिर भी अनजान बनकर कहा, “अरे भई, क्यों मज़ाक करती हो? यह तुम्हारा घर है, इसका राजपाट तुम्हीं संभालो| हमारा क्या, हम तो रमता जोगी हैं| सामने दो टुकड़े डाल देती हो तो तुम्हारे दरवाजे पर पड़े रहते हैं|”

“नहीं, बिलकुल नहीं, यह घर आपका है| यहाँ का राज्यभार भी आपका है| नौकर रखना और निकालना भी आपका का ही शगल है| रही बात हमारी, किसी दिन हमसे भी जाने के लिए कह दिया तो हमें भी जाना ही पड़ेगा|”

इससे पहले कि हम कुछ कहने का साहस जुटा पाते, उन्होंने आगे कहा, “आप तो ठहरे चतुर सुजान, आपको हिसाब-किताब संभालने में कोई दिक्कत होनी तो नहीं चाहिए| अब चाहे जिसे रखिये और चाहे जिसे निकालिए|”

उनके स्वर में तल्खी आ चुकी थी| समझौता-वार्ता की संभावनाएं भी धूमिल पड़ चुकी थीं| यह सबसे बड़ी दिक्कत थी| आज का ज़माना समझौते का ही तो है| जीवन की सारी संभावनाएं समझौते में छुपी होती हैं| जन्म होता है तो डाक्टर के साथ, स्कूल जाते हैं तो अध्यापकों के साथ, परिवार-रिश्तेदारों के साथ, दोस्तों के साथ समझौता-वार्ता चलती ही रहती है| नेता, व्यापारी, मजदूर, रिक्शेवाले, वकील, जज, पुलिस और अन्य सरकारी-गैरसरकारी महकमे समझौते की जद में आ जाते हैं| यहाँ तक कि एजेंटों के माध्यम से ईश्वर के साथ भी समझौता चला करता है| और सब से अधिक समझौता अपनी अंतरात्मा के साथ चलता है| असल में ‘नेगोसिएशन’ हमारे विचारों और सिद्धांतों को हमारे सुविधा के लिए सरल कर देते हैं| चलिए, यह विशद विषय इस पर फिर किसी समय विस्तार से चर्चा होगी|

हमने आज तक मजे की काटी थी| इस समय मजे की परम्परा विच्छिन्न होती दिखाई दे रही थी| घर के बजट और खर्च का हिसाब-किताब रखने की आदत ख़त्म हो चुकी थी| आने वाले समय की कठिनाइयों पर नजर डाली तो हाथों के तोते उड़ गए| कैसे होगा, यह चिंता खाए जा रही थी| मर्दानगी का लौह-स्तम्भ शीशे का टुकड़ा बनकर तरेरों से भर गया था|

इसी बीच हमारे परम मित्र चकौड़ी दास ने घर का दरवाजा खुला देखा तो बिना घंटी बजाये भीतर दाखिल हो गए| आते ही जोर से चाय की फरमाइश की और फिर हमारी ओर देखकर सस्नेह बोले, “ये तुम चौराहे पर जुतियाए गए शराबी की सी शक्ल बनाए क्यों बैठे हो? कुछ बुरी गुज़री है क्या?”

हमने दबे स्वर में सारी घटना कह सुनाई| उन्होंने गहरी साँसें ली, एक-दो संवाद फिर से सुनाने के लिए कहा और मशविरा दिया, “समय की नजाकत समझो| कुछ मत कहो| चुपचाप घर चलाने की जिम्मेदारी अपने हाथ में ले लो| बस ध्यान रखने वाली बात यही है कि चुप रहना है| देश के प्रधानमंत्री तक बरसों चुप रहकर सरकार चला ले जाते हैं| तुम्हारा तो बीस हजार रुपये महीने के बजट वाला ज़रा सा घर ही है|”

इसके बाद चाय की इंतज़ार किये बिना ही निकल गए| हमारी तो फँसी थी, लेकिन वे अपनी नहीं फँसाना चाहते थे|

हमने भी मन ही मन सोचा कि चढ़ जा बेटा सूली पर भली करेंगें राम| जो होगा, देखा जाएगा|

इस प्रकार, आजकल घर का खर्चा हमारे हाथ में है| लेकिन बात समझ में नहीं आ रही कि इन दिनों अचानक इतने सारे मेहमान क्यों आने लगे हैं? पत्नी पाँच हजार रुपये महीने की किटी में क्यों शामिल हो गयी हैं? जो राशन महीने भर चलता था वह क्यों दस दिन में ही ख़त्म होने लगा है? बच्चे हर हफ्ते-दस दिन के बाद बाहर चलकर खाने और पिक्चर देखने की फरमाइश क्यों करने लगे हैं? स्कूटर की सर्विस इसी महीने कराना जरूरी क्यों हो गया है? घर के परदे और सोफों के कवर बदलने की मांग क्यों उठने लगी है? ... फेहरिस्त लम्बी है और उससे भी अधिक लम्बी क्यों होती जा रही है?

सही कहूँ, तो हार मानने को भी तैयार हूँ लेकिन हार मानने का कोई तरीका भी समझ में नहीं आ रहा है| चकौड़ी दास जी मय पत्नी बच्चों के अपने साले की शादी में ससुराल गए हुए हैं| उनसे भी किसी मदद की उम्मीद नहीं है|

फिलहाल के लिए, जवाब में मैंने भी घर में पूरा ‘प्रोफेशनल’ रवैया अख्तियार कर रखा है| कोई कुछ भी कहे मैं व्यक्तिगत नहीं मानता| हर समस्या का इलाज हो, यह भी जरूरी नहीं मानता| सबकी बात सुनी जाये इसका ध्यान रखता हूँ, लेकिन सबकी बात पूरी की जाये इसे अपने दायित्व या धर्म की सीमा के बाहर मानता हूँ|

आशा यही है जब देश में ऐसे ही चल रहा है तो घर में क्यों नहीं चल सकता|
चित्र www.srijangatha.com से साभार

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