अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Wednesday, April 20, 2016

हैण्डरिटन लवलैटर्स

बच्चों के कमरे की दीवार पर चिपके हुए कागज़ के ऊपर हाथ से अंग्रेजी में एक उद्धरण लिखा हुआ है|

आजकल के बच्चे हिन्दी को पिछड़ा और हिन्दी पढ़ने वालों को और भी अधिक पिछड़ा मानते हैं| उन्हें लगता है, सारी अच्छी बातें अंगरेजी में ही लिखी जा सकती हैं| अंगरेजी में लिखी बातों का प्रभाव भी ज्यादा पड़ता है| मैं बच्चों के इस विचार से सौ टके सहमत हूँ| बच्चों के मन में परमात्मा का वास होता है| अगर वे ऐसा मानते हैं तो भई, ठीक ही होगा|

देखा नहीं, बर्गर बेचने वाला जब फर्राटेदार अंगरेजी में ऑर्डर लेता है और ग्राहक के दिए नोटों को करीने से बक्से में सजा देता है, आत्मा तृप्त हो जाती है| पिज्जा बेचने वाला ग्राहक की टूटी-फूटी अंगरेजी पर द्रवित नहीं होता| उसका अपमान न हो जाए इसलिए भाषा की पटरी नहीं बदलता| वह धाराप्रवाह अंगरेजी में बात करता है जिसके परिणाम-स्वरूप ग्राहक का आत्मविश्वास आसमान छूने लगता है| टेलीकॉम कंपनी की आपरेटर मधुर स्वर में फोन करती है और फिसलती हुई अंगरेजी जबान में ‘बिल’ की जानकारी देती है| अंत में सधी हुई आवाज में स्थानीय भाषा में किसी अन्य सेवा के लिए पूछती है| हमारा विश्वास दृढ हो जाता है कि अंगरेजी कमाऊ-पूतों की भाषा है और अन्य देसी भाषाएँ सेवादारों की|

अग्रेजी के महत्त्व को इसी बात से समझा जा सकता है कि हमारे मौहल्ले का तेलू पंसारी जिसके बाप-दादों ने भी कभी न तो अंग्रेजी का मुँह देखा होगा और न ही अंग्रेजों का, आजकल ‘साबुन की बट्टी’ को ‘सोप-केक’ बताता है और हिसाब में कोई गलती हो जाने पर नाक में उंगली घुमाते हुए जोर से कहता है – ‘सिट’ और उसके बाद देसी तरीके से दांतों में जीभ दबा लेता है|

पुरानी बात है, हमारे बचपन के साथी बब्बन के दूर के रिश्ते के मामा एक बार कहीं विदेश गए थे| भगवान जाने किस देश में गए लेकिन बब्बन का कहना था कि उन्होंने इंगलैंड की यात्रा की थी| यूँ तो उस जमाने में विदेश का मतलब इंगलैंड ही था वैसे ही जैसे सभी गोरे अंग्रेज और चपटी नाक और बंद आँखों वाले चीनी कहलाते थे| खैर, बब्बन ने बहुत चकित होते हुए बताया था कि मामा के अनुसार इंगलैंड बड़े कमाल का देश है| वहाँ के रिक्शे-ठेले वाले भी अंग्रेजी बोलते हैं| सच कहूँ, इस सूचना ने एक बार को तो हमारा आत्मविश्वास जैसे हिला ही दिया था| अपने देश की शिक्षा प्रणाली से नफ़रत सी हो गयी थी| अपने मास्टरों के प्रति खुंदक बढ़ गयी थी| ख़ास तौर पर अंगरेजी के मास्टर का तो मुँह नोच लेने का मन होने लगा था जो और कुछ तो छोड़िये चार ढंग की गालियाँ भी अंग्रेजी में न सिखा सका था| ये वो ही मास्टर था जिसके अनुसार ‘साइंस’ पढ़ने वाले लड़के ‘जहीन’ होते थे, ‘कॉमर्स’ पढ़ने वाले ‘मेहनती’ और ‘आर्ट साइड’ वाले ‘लफंगे, निकम्मे और नाकारा’| ये तो भला हो नयी शब्दावली बनाने वाले विद्वानों का जो ‘आर्ट साइड’ को ‘मानव-विज्ञान’ या ‘मानविकी’ कहने लगे और इतिहास, भूगोल, नागरिक-शास्त्र पढ़ने वालों को जाहिली के कलंक से मुक्त किया|

अंग्रेजी का प्रभाव देखना है तो रेलवे के रिजर्वेशन की लाइन में ‘एक्सक्यूज़ मी’ कहकर देखिये, तुरंत आगे बढ़ने का मौक़ा मिलता है| कोई सभ्यता का व्यवहार कर रहा हो तो देहाती जबान से एकदम निकलता है, “ज्यादा अंग्रेज न बन, जमीन पर आ जा|” इसका अर्थ यही है कि सभ्यता का ठेका अंग्रेजीदां साहेबान ने ही ले रखा है|

हमारे पड़ौसी सरदार जी का पुत्र रूस में काम करने चला गया था| वहाँ उसने काम के साथ-साथ एक रूसी औरत से शादी भी कर ली| गोरी बीवी तो मिली ही और साथ में दो गोरी बेटियाँ भी रुंगे में मिल गईं| कुछ साल विदेश में रहकर सरदार जी के लख्तेजिगर वापस लौटे| बस स्टैंड पर आगवानी के लिए आधा शहर हाजिर था| चिकने सफाचट प्रवासी को बस से उतरते देखा तो सब चौंक गए| उन देसी साहब ने दाढी और केश को तिलांजलि दे दी थी| उनके पीछे-पीछे उतरे तीन दमकते हुए चेहरे| शहर में हल्ला पड़ गया| एक रिक्शे पर साहब अपनी पत्नी के साथ स्थापित हुए, दूसरे पर गोरी-गोरी दूध सी काया वाली दो बच्चियाँ| पीछे के दो रिक्शों पर सामान लादा गया| उससे पीछे के तीन रिक्शों पर स्वागत के लिए पहुँचे हुए डेढ़ दर्जन बंधु-बांधव विराजमान हुए| रिक्शों की क़तर के पीछे असंख्य साइकिलें और पैदल चलने वाले लोग थे| छोटे-छोटे बच्चे पूरे उत्साह से दौड़-दौड़ कर रिक्शे वालों को रास्ता दिखाते थे| बात रिक्शे वालों से करते थे, लेकिन उनकी नजर गोरी सवारियों पर ही रहती थी| बीच-बीच में यस, ओके, थैंक-यू की अंगरेजी भी सुनाई देती थी| कोई-कोई बच्चा तो ए से लेकर ज़ेड तक पूरी अंग्रेजी की वर्णमाला सुना देता था| विडम्बना यह थी कि उन बेचारों को कोई यह बताने वाला नहीं था कि तीनों विशिष्ट अतिथियों में से अंग्रेजी किसी को भी नहीं आती थी| आगे चलकर घर  में क्या हुआ यह लम्बी कहानी है, लेकिन इतना जरूर समझ में आ गया था कि अंग्रेजी का विशिष्टता के साथ निकटता का नाता होता है|

आजकल मॉल संस्कृति सिर चढ़कर बोल रही है| चमचमाते मॉल में मातृभाषा में बोलकर इज्जत का कचरा कराने से बचने के लिए क्या बच्चे और क्या बूढ़े, सभी अंग्रेजी सिखाने वाले संस्थानों की ओर रुख कर रहे हैं| व्यक्तित्व को संवारने के लिए अंग्रेजी सीखना अपरिहार्य है, आचार-विचार-व्यहार की चिंता गयी भाड़-चूल्हे में| हमारे बचपन में जो काम दस रुपये की ‘रेपिडेक्स इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स’ की पोथी से हो जाता था उसमें हजारों खर्च किये जा रहे हैं, आखिर कुछ तो होगा इस भाषा में|

अंग्रेजी प्रगतिवाद का प्रतीक है| अंग्रेजी बौद्धिकतावाद का चिह्न है| वैश्विकता की चमक-दमक उसी चेहरे पर दिखाई देती है जिसकी जिह्वा से सार्वजनिक-विमर्श के लगातार जुगाली किये जाते हुए जुमले अनवरत बहते हैं| आज के चिन्तक-विचारक वे ही हैं जो जमी-जमाई तथा समय द्वारा परीक्षित एवं समर्थित मान्यताओं-परम्पराओं की लानत-मलामत करने को फैशन मानते हैं| आज के मानवतावाद की वकालत का जिम्मा उन्हीं के हवाले है जो व्यक्तिवादी-चिंतन को सामाजिक सरोकारों से ऊपर या जरूरत के अनुसार नीचे मानने की सुविधा का भोग करते है और अपने मुँह से बेरोक-टोक कुछ नारेनुमा शब्द झाड़ते रहते हैं| यह सब अंग्रेजी में ही होता है; कभी सोच में तो कभी भाषा में| इसके अलावा बाकी सब फिरका-परस्ती और गवाँरपन के अंतर्गत आता है|

अंग्रेजी कुलीनों की भाषा है| कुलीन हमेशा संख्या में कम ही हुआ करते हैं| वैसे इसका अर्थ यह भी नहीं है कि जो संख्या में कम होते हैं वे हमेशा कुलीन ही होते हैं| तो, कहने का मतलब सिर्फ इतना है कि अल्पसंख्यकता जो है वह ‘आभिजात्य’ या ‘कुलीनता’ का विशेष तत्व होती हैं| संख्या के आधार पर ताकत का अनुमान लगाने की गलती मत कीजियेगा क्योंकि उनकी ताकत बाकी सब से कहीं अधिक बढकर हुआ करती हैं| तभी तो पाँच प्रतिशत अंग्रेजीदां उच्च-कुल-जन्माओं का छोटा सा लश्कर एक अरब से ज़्यादा को चला रहा है| मुझे तो परेशानी इस बात को लेकर है कि अरे यार, पैजामा, चाय, योगा, गुरु जैसे दूसरे दर्जे के शब्द अंग्रेजी के शब्दकोश में क्यों शामिल कर लिए गए| प्योरिटी भी कोई चीज होती है!

मैं दिल से अंग्रेज, अंग्रेजी और अंग्रेजियत का प्रशंसक हूँ| अंग्रेजी की नफासत मुझे प्रभावित करती है| देखिये, अंग्रेजी ऐसी है जैसे साफ़ सुथरे कागज़ पर शानदार तरीके से टाइप किया हुआ लेख जिसमे मन-भावन कृत्रिमता साकार होती है| दूसरी तरफ, देसी भाषाएँ ऐसी, जैसे कागज़ पर हाथ से सजा-सजाकर उकेरने की कोशिश करते हुए भदेसपन के साथ लिखा हुआ कोई लेख| बताइये, कहाँ मशीन का शानदार उत्पाद और कहाँ हाथ का अरुचिकर काम! कोई समानता हो सकती है क्या?

तो यह तय हुआ कि महान विचार  अंग्रेजी में ही व्यक्त किये जा सकते हैं| इसीलिए बच्चों के कमरे की दीवार पर चिपके हुए कागज़ पर लिखा उद्धरण अंगरेजी में था –

‘हैण्डरिटन लवलैटर्स विल नेवर गो आउट ऑफ़ स्टाइल’ यानी ‘हस्तलिखित प्रेमपत्र कभी प्रचलन से बाहर नहीं होंगे|’

2 comments:

  1. बहुत ही सराहनीय लेख - उदय प्रकाश की कविता याद आ गई- https://samatavadi.wordpress.com/2007/01/12/uday-prakash-hindi-poem/

    ReplyDelete
  2. इस लेख को पढ़कर एक बात ध्यान आ गयी । एक भारतीय बच्चा पहली बार विदेश से स्वदेश लौटा। उसके दादाजी ने पूछा - बेटा कैसा देश है जहां गए थे? बच्चे ने बड़े उत्साह के साथ उत्तर दिया - दादाजी, वह ऐसी जगह है जहां हर कोई English बोलता है। :) :)

    ReplyDelete