अपनी बात

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Wednesday, April 27, 2016

फूड-चेन के शिखर-पुरुष

काफी समय से देख  रहा हूँ कि अनशन की प्रथा समाप्त सी होती चली आ रही है|

आजकल स्याही फेंकना चलन में है| धरना देना और धरना देकर थप्पड़ खाना भी काफी प्रचलन में है| रैलियाँ होती रहती है| लीडरों के गले में काकुली को पकड़कर झूला झूलती लक्ष्मी और सरस्वती एक दूसरे को पींगे देती दिखाई देती हैं| पता नहीं क्यों अनशन की परम्परा का लोप सा होता चला जा रहा है| अनशन की मूल भावना यह है कि विरोध करने के लिए अन्न खाना छोड़ दिया जाए|

आजकल क़ानून में पेंच निकालने का ज़माना है| अनशन को लेकर भी दिमागी जोड़-जुगाड़ किये गए| काफी सोच-विचार करने के बाद भाई लोगों ने कहा कि ठीक है, अन्न खाना मना है तो क्या हुआ मुर्गे और बकरे तो उड़ाए ही जा सकते हैं| बस, इस कदर मुर्गे और बकरे उड़ाए गए कि पूरा आसमान ही उनसे भर गया|

आजकल फेसबुक और ट्विटर जैसी नयी दुनियाओं का आसमान भी तरह-तरह के खाद्य पशुओं से भरा हुआ है| इन पशुओं को पैदा करने के लिए अपने दिमाग का और दूसरों की भावनाओं का उपयोग किया जाता है| धूर्तता की परखनली में से छोटे-छोटे भ्रूण निकाले जाते हैं| उनके कान-पूँछ चैक करके सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर चरने के लिए छोड़ छोड़ दिए जाते हैं| वे चारों ओर लहराते रहते हैं, चहल-कदमी करते रहते हैं| किसी को खिझाते हैं, किसी को लुभाते हैं, किसी को धमकाते हैं और किसी को धीरे से छेड़ जाते हैं|

लोगों के घरों में लगातार कचरा जमा होता ही रहता है| अपने कचरे से छुटकारा पाने के लिए घर की सारी झूठन और कचरा उन पशुओं के सामने फेंक देते हैं| पशु उस सब गन्दगी को खाते रहते हैं और धीरे-धीरे मोटे ताजे होकर कटने के लिए तैयार होते जाते हैं|

उधर, पशुओं का मालिक इस बात से प्रसन्न है कि उसके पशु तगड़े हो रहे हैं| असल में चरवाहा पशुओं की मजबूती से प्रसन्न नहीं होता, उसका दिल तो इस बात को देख-देख और सोच-सोचकर बढ़ता जाता है कि जानवरों में मांस ज्यादा निकलेगा और दावत के समय जब उन्हें काटा जाएगा तब भर पेट लजीज पकवान खाने को मिलेंगे|

कुछ समय पहले हमारे परम मित्र चकौड़ी दास की रूचि अपराध-शास्त्र में बहुत बढ़ गयी थी| उन्होंने अपराध के आकार-प्रकार आदि पर खूब रिसर्च की| उनकी विशेषज्ञता अपहरण में अधिक थी| एक बार शास्त्र-चर्चा के दौरान उन्होंने मुझे बताया था कि अपहरण का अपना ही अर्थशास्त्र होता है| छोटे-मोटे अपराधी किसी का अपहरण करने के बाद अपहृत को अगली पार्टी को बेच देते हैं| अपने हिस्से का पैसा लेते हैं और मौज करते हैं| अगली पार्टी उसे और अगली आसामी को बेच डालती है| होते न होते फिरौती की रकम बढ़ती चली जाती है| अंत में माल उस पार्टी के पास पहुँचता है जिसमें फिरौती वसूल करने का बूता होता है|

यही हाल सोशल नेटवर्किंग के आकाश में विहार करते और जनता के दिमाग की जूठन खा-खाकर मांसल बनते जाते पशुओ का भी होता है| वे केवल जूठन खाकर ही नहीं पलते बल्कि उन्हें भी आपस में लड़ाया जाता है| एक दूसरे को मार कर खा जाने को प्रेरित किया जाता है| समय समय पर पशुओं को टटोल टटोल कर देखने के लिए भी आदमी नियुक्त होते हैं| जब सही समय आता है तो सोशल नेटवर्किंग के आकाश में विचरते उन पशुओं को अगली पार्टी के हाथों बेच बेच दिया जाता है|

जिन दिनों हमारे परम मित्र चकौड़ी दास की रूचि अर्थशास्त्र में और विशेष रूप से प्राचीन अर्थशात्र में बढ़ी हुई थी, उन्होंने एक बार बताया था कि पुराने समय में वस्तु बिनिमय की प्रक्रिया हुआ करती थी| इस प्रक्रिया के तहत वस्तुओं और सेवाओं का मूल्य वस्तुओं और सेवाओं के द्वारा ही चुकाया जाता था| विकास हुआ तो यह प्रथा तिरोहित हो गयी| मुद्रा का चलन हुआ तो कीमत मुद्रा में चुकाई जाने लगी| बिकने वाली वस्तुओं की भी बढ़ोतरी हुई| भावनाएँ बिकने लगीं| स्वामिभक्तियाँ बिकने लगीं| सिद्धांत बिकने लगे| आचार-विचार और सोच शो-केस में सज गए| बिकने ही नहीं लगे बल्कि उनकी बोलियाँ लगने लगीं| मुद्रा की हैसियत कम पड़ने लगी तो कीमत पदों और नियुक्तियों के रूप में चुकाई जाने लगी|

सोशल नेटवर्किंग के आकाश में फ्री का राशन खा-खाकर मुटियाते पशुओं की भी बोलियाँ लगने लगीं| अंत में फ़ूड चेन में सबसे ऊपर बैठी पार्टी उनकी कीमत अदा करती है| अंतिम खरीददार जानवर के शरीर के किसी छुपे हुए हिस्से पर धीरे से अपने नाम का ठप्प लगाते है और सही समय पर काटने के लिये उन्हें बाड़े में बाँध देते हैं| समय आने पर उन्हें जिबह किया जाता है| भर-पेट दावत होती है| लोगों का मानसिक कचरा मांस में बदलकर पहले से ही मजबूत शरीर वाले खरीददारों का पोषण करता है|

अब ऐसे में अनशन की प्रथा के फिर से चालू होने की संभावनाएं ज्यादा हैं नहीं| मांसखोर मुँह में पानी भरे घूमते हैं| केवल घूमते ही नहीं बल्कि अपने को आंदोलनकारी के रूप में प्रचारित करते हैं|

आधुनिक आन्दोलनकारी अनशन को बेवकूफाना मानने लगे हैं|

2 comments:

  1. अब ऐसे में अनशन की प्रथा के फिर से चालू होने की संभावनाएं ज्यादा हैं नहीं| मांसखोर मुँह में पानी भरे घूमते हैं|
    इसके साथ ही पानी ही नहीं बीड़ी -सिगरेट और पान गुटका तो चलता रहता है

    आधुनिक आन्दोलनकारी अनशन को बेवकूफाना मानने लगे हैं|

    सटीक प्रस्तुति

    आपको जन्मदिन की बहुत-बहुत हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. धन्यवाद, कविता जी, रचना पर आपकी टिप्पणी के लिए भी और जन्मदिन की शुभकामनाओं के लिए भी. आपका ब्लॉग 'KAVITA RAWAT' फॉलो करता रहता हूँ.

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