अपनी बात

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Wednesday, May 4, 2016

दिल्ली की बिल्ली और घरेलू चूहे

कहीं दिल्ली की बिल्ली में तो इसका सूत्र नहीं लुका हुआ है!

सुना है, दिल्ली की बिल्ली बाघ से अधिक खतरनाक, लोमड़ी से बढ़कर चालाक, तेंदुए से कहीं ज़्यादा शातिर और भेड़िये से ऊपर क्रूर होती है| बस, उसमें हाथी सा बल नहीं होता, गैंडे की तरह सींग झुकाकर सामने की ओर से हमला नहीं करती और कुत्ते सी वफादार नहीं होती|

असल में, हुआ यह है कि पिछले कुछ दिनों से घर में चूहे दिखाई देने बंद हो गए हैं| किताबें, दरवाज़े, दरियाँ और गत्ते के डिब्बे कुतरे नहीं जा रहे हैं| भूतल पर धमाचौकड़ी नहीं, कमरे के कोनों में उछलकूद नहीं, चिक् चिक् की आवाज़ नहीं| आनाज के दाने नहीं बिखरते| बिल खोदने की खसखसाती ध्वनि नहीं सुनाई देती| पलंग के नीचे से छोटे-छोटे गुलाबी बच्चे नहीं झाँकते| घर में सूनापन है|

मुद्दा बहुत भावनात्मक बन गया है|

बदलाव की कोई स्पष्ट या प्रच्छन्न वजह भी सामने नहीं आ रही है| कटोरदान में रोटियाँ हस्बेमामूल रखी जाती हैं| मूँगफली के छिलकों के साथ दाने अब भी ज़मीन पर गिरते हैं| घर के अँधेरे कोनों में सीलन बनी हुई है| फर्श भी पक्का नहीं हुआ है| चूहेदान तो सालों से दुछत्ती पर पड़ा हुआ है|

कुछ साल गये, चूहेदान को बड़ी आशाओं के साथ लुहार से बनवाया था| बात तब की है जब घर में चूहे दिखाई देने शुरू ही हुए थे| एक-दो दफा चूहे उसमें फँसे भी| थैले में डालकर घर के बाहर छोड़ आये लेकिन देखते-देखते वे घर की मोरी में दाखिल हुए और वापस अपने स्थान पर पहुँच गए| सुना है चूहों की स्मृति बहुत तेज़ होती है| क्रमश: वे चतुर भी होते चले गए| उन्होंने फंदे में फँसे बिना ही रोटी का टुकड़ा निकालना सीख लिया| तब से चूहेदान घर के टूटे-फूटे सामान के साथ दुछत्ती पर पड़ा है|

किसी ने बताया था, रोटी पर ज़हर लगा कर रख दो| इधर दाँत लगा, उधर काम तमाम| रोटी और ज़हर, दो बेमेल चीज़े हैं, यही सोचकर प्रस्ताव को अस्वीकार कर दिया| कितना ही छोटा प्राणी हो, ज़िंदा रहने का हक़ तो उसे भी है| हमारे पास न रहे, वहाँ रहे जहाँ उसकी पूछ हो|

एक सलाह मिली थी, गहरे बर्तन में थोड़ा तेल डाल कर रख दो| तेल के लालच में चूहा बर्तन में कूद कर फँस जाएगा| यह उपाय भी काम न आया| उस दिन तो हद हो गयी, चूहा बर्तन के किनारे बैठा था, अपनी पूँछ तेल में डुबोता और उस पर लगा तेल चाट लेता| मूषक-वृन्द के हट्टा कट्टा होते जाने का यही राज था|

बहुत उपाय किये पर चूहों से छुटकारा न मिला| घर में रखने के लिए ऊँट के दाँये खुर का नाखून कहीं से जुगाड़कर लाए, मटका फोड़कर उस पर चूहे भगाने का चमत्कारी मन्त्र काजल से लिखकर आवास के चारों कोनों में रखा, पुदीने के फूल गोशे-गोशे में फैलाए; लेकिन अफसोस! कोई लाभ न हुआ| दो-चार दफा हाथ में झाड़ू और कपड़ा लेकर चूहों को पकड़ने के लिए उनके पीछे भागे, लेकिन उनकी चपलता से हार गए|

किस्साकोताह यह, अंतत: हमने आत्मसमर्पण कर दिया और फिर धीरे-धीरे चूहों की उपस्थिति की आदत पड़ गयी| अब उनके बिना वीरान सा लगता है|

चूहों के गायब होने का रहस्य गहराता जा रहा था| पर्दा उठाने के लिए ‘गूगल गुरु’ की शरण में जाने का विचार किया|

आधुनिक युग में ‘गूगल गुरु’ की प्रतिष्ठा ‘गुरूणाम् गुरु:’ की है| बड़े-बड़े शोध-निर्देशक, लेखक-कवि, चिन्तक-विचारक, समीक्षक, धर्मपुरुष, समाजसुधारक और मौलिकता के पैरोकार; इन्हीं के श्रीचरणों में बैठकर सिद्धि प्राप्त करते देखे गए हैं| ये गुरु चमत्कारी और अन्तर्यामी भी है| मन की बात अभिव्यक्त करने से पहले ही संभावित उत्तरों की सूची सामने रख देते हैं| सुनते हैं कि ये त्रिकालदर्शी भी हैं| इनसे कुछ छिपा नहीं है| कभी-कभी मौज में आ जाते हैं तो कूट-भाषा में बात करने लगते हैं| सवालों के जवाब चाइनीज़-कोरियन जैसी लगने वाली भाषाओं में देने लगते हैं| प्रश्नकर्ता से उम्मीद करते हैं कि वह उनकी भाषाई उलटबाँसियों को भेदने में समर्थ होगा| उनका ज्ञान योगी की कुटिया सा है, जिसपर सबका समान रूप से अधिकार होता है| गुरु-दक्षिणा का भी कोई झंझट नहीं|

अब ‘गूगल गुरु’ तो गुरु ठहरे, पक्के वेदांती| उनके पास आदमी और जानवर में क्या भेद| सबको एक ही तराजू पर तौलते हैं| सवाल को देखते हैं, सवाल पूछने वाले की नीयत या ज़रूरत को नहीं| हमने तो चूहों के गायब होने की बात की थी और उन्होंने न जाने क्या समझ लिया| सो, उन्होंने हमारे प्रश्न के ऐसे-ऐसे जवाब दिए कि दिमाग चकरा गया| उन्होंने कुछ संभावनाएँ झट से बता डालीं| उन्होंने शंका व्यक्त की, चूहों ने अब हमारे घर को अपना मान लिया है| वे इस षड्यंत्र में लगे हैं कि घर के मूल निवासियों को बाहर का रास्ता कैसे दिखाया जाये| इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए वे अपनी संख्या बढ़ाने के उपक्रम में लगे हुए हैं| उन्होंने आगे कहा कि वे चूहे गुरिल्ला युद्ध की तैयारी कर रहे हैं| कोई समय जा रहा है, जब हमारी केबल की तारें, फोन कनेक्शन और चार्जर को काट दिया जाएगा| किताबों की लुगदी बना कर सारे घर में फैलाई जाएगी| छत पर रखी पानी की टंकी में छेद करके पूरे घर को बहा दिया जाएगा| रिजाई-गद्दे काट-कूट कर कूड़े के ढेर में बदल दिए जायेंगे| मकान की नींव तक खोद दी जायेगी| उन्होंने अनुमान व्यक्त किया के वे चूहे जैविक युद्ध की तैयारी कर रहे हैं| अबकी बार जब लौटेंगे तो प्लेग सरीखी बीमारियों के कीटाणुओं से लैस आत्मघाती दस्तों के रूप में लौटेंगे|

गुरु ने इस बात की ओर संकेत किया कि हो सकता है वे किसी बड़े आन्दोलन की तैयारी में लगे हों| ज़ाहिर है, नमक बनाने के लिए दांडी मार्च तो करेंगे नहीं| कहीं पर्चे-पोस्टर छपवा रहे होंगे, भाड़े के लेखकों से भाषण तैयार करा रहे होंगे, इवेंट मैनेजमेंट के खिलाड़ियों से नई बिसातें बिछवा रहे होंगे| इनमें सबसे खतरनाक बात यह थी कि हो सकता है कि वे घर के असंतुष्ट प्राणियों से साँठ-गाँठ करके किसी बड़ी क्रान्ति की आमद की तैयारी कर रहे हों|

गुरु के कहने का मतलब यह था कि हमारी रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा, संचार, सुरक्षा, सम्मान, तालमेल, सहकार और अस्तित्व; सब खतरे में हैं|

माथे पर पसीने की बूँदें चुहचुहाने लगी| धड़कने भी बढ़ सी गयी| दुनिया गोल की जगह तख्ते जैसी सपाट दिखाई देने लगी| महसूस हुआ कि किनारे तक जा पहुँचे हैं, ज़रा भी आगे बढ़े तो अनंत, अपरिमेय, अंधी गहराइयों में लुढ़क जायेंगे| मैं जान गया कि गुरु का ज्ञान किसी और ही स्रोत से निसृत होने लगा है| सूचनाओं की बाढ़ का खतरा देखकर निकासी को तुरंत रोकना पड़ा|

चूहों को क्रान्ति की आवश्यकता क्यों पड़ी होगी, इसकी वजह गुरुदेव नहीं बता सके| क्रान्ति की वजहें मात्र सूचनाओं और बौद्धिकता के आधार पर नहीं खोजी जा सकतीं| उन्हें समझने के लिए भावनात्मक कुशलता भी चाहिए, जो संयोग से गुरु में न थी| उनके पास दूर की कौड़ी खोजने वाला तेज दिमाग तो था, लेकिन धड़कनों का संगीत पैदा करने वाला दिल न था|

ओह! दिल की बात हुई तो दिल्ली की बिल्ली का ख्याल आया| मौहल्ले के एक हजरत लालकिला देखने गए थे| वहाँ एक मासूम सा लगने देने वाला बिल्ली का भूखा-प्यासा बच्चा भटकता दिखाई दिया| उन्हें दया आयी और अपने साथ उठा लाये| बच्चा तो था, लेकिन था तो बिल्ली का ही| सबसे पहले उन सज्जन के घर में पलने वाले चूहे निपटाए| फिर आस-पास के घरों के चक्कर लगाने शुरू कर दिए| खुराक मिली तो तगड़ा हो गया| अब तो एक ही झपट्टे में बड़े-बड़े हेकड़ीबाज हठी चूहों का काम तमाम कर देता है और मुँह में लटकाए शान से किसी कोने की ओर बढ़ जाता है|

इधर कुछ दिनों से हमारे घर में भी उसकी आमदरफ्त बढ़ गयी है|

अगर दिल्ली की बिल्ली में ही घटना का सूत्र छुपा है तो निश्चय ही घर के अधिकांश चूहे मारे जा चुके हैं और बचे-खुचे कहीं गहरे बिलों में छुपे बैठे हैं|

डर यही है, कहीं वे नन्हें से चूहे, बिल्ली के बच्चे बन कर न लौटें या फिर पूरे बिलाव ही!


‘आमूल-परिवर्तनवादी वैचारिक कट्टरवाद या तो अन्य विचारों को खा जाता है या फिर उन्हें और भी अधिक अनम्य एवं पूर्ण प्रति-कट्टरवाद में बदल देता है| यह कहीं और नहीं, लगातार हमारे अपने दिमाग में होता रहता है’ - बस यही प्रस्तुत रचना का मूल भाव है| 

2 comments:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विलुप्त होते दौर में - ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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