अपनी बात

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Monday, March 14, 2016

सिसकियाँ

धमाके की आवाज़...
साथ ही कुछ तड़तड़ाहट... तड़ाक् तड़...
शायद कुछ टूटा है...
मंदिर? ...मस्जिद? ...गुरद्वारा?
नहीं... एक पहचान, एक संस्कृति, ज़िंदगी की पहचान।
फिर धमाका.... धमाके
साथ ही कुछ चीत्कार... कराहें
शिशु का क्रंदन...
शायद कोई मर रहा है... 
हिन्दू? मुसलमान? सिख?
नही... सदियों की क्रमागत उन्नति की पहचान
अट्टहास...
साथ ही रणनाद, हुंकार और तालियों की आवाज़ें...
शायद कोई हँस भी रहा है...
शत्रु? पड़ौसी? ...?
नहीं...
हमारा इतिहास... भविष्य...
हमारे वर्तमान पर
क्रूरता की हँसी...
उस हँसी के पीछे
कभी कभी सिसकियाँ
सिसकते मूल्य... जर्जर आस्थाएँ
साल-दर-साल
लाल किले पर फहराए जाते झंडे
...निरर्थक झंडे
कभी-कभी उभर आते हैं
सिसकियाँ बनकर
 
 
चित्र www.huffingtonpost.com www.gettyimages.de से सभार

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