अपनी बात

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Saturday, March 5, 2016

सीधे का मुँह कुत्ता चाटे

आज कोई किस्सा या व्यंग्य नहीं, एक नेक आदमी की जीवन-गाथा सुनाता हूँ जिसे अपनी दयालुता के परिणाम स्वरूप ‘दमनकारी’, ‘असहिष्णु’, ‘निरंकुश’, ‘शोषक’ और ‘अत्याचारी’ आदि उपाधियों से नवाजा गया|
 
हमारे एक मित्र हैं, चकौड़ी दास| नाम फटीचर सा लगता है लेकिन बताते हैं कि उनका खानदान काफी ऊँचा था| मौहल्ले में अच्छा-खासा रुतबा था| देहरी पर दिन में भी दीपक जलता था| सोच-विचार, चिंतन-मनन चला करता था| गए वक्तों में उस खानदान के कब्ज़े में अच्छी-खासी जमीनें थीं, पर जमाने की बद-नजर ऐसी लगी कि सब जाता रहा| कुछ इसलिए चला गया कि संभाल नहीं सके और कुछ इस लिए निकल गया क्योंकि बेगैरत अड़ौसी-पड़ौसियों ने दबा लिया था| तिजोरियों में छेद हो गए और हीरे-मोती, सोने-चाँदी समेत सब माल-मत्ता उन छेदों से रिसकर दांये-बाएँ हो गया| किस्मत का फेर, पोतड़ों के रईस दर-दर के भिखारी हो गए|
 
अब तो चकौड़ी दास जी की उम्र काफी हो गयी है| तजुर्बों की गठरी कमर पर लादे घूमते हैं| ज़िंदगी भर तरह-तरह के काम किये; बंधुआ मजूरी से लेकर व्यापारी की मुनीमी तक| कभी पीठ पर मालिक के कोड़े खाकर चिलचिलाती धूप में पानी-पानी पुकारते हुए मुँह के बल जमीन पर आ गिरे तो कभी पुलिसिया लाठी-डंडों की मार खाकर गोलियों से भूने जाने से बाल-बाल बचे| यूँ तो पढ़े-लिखे समझदार थे, लेकिन जीवन के आदर्श और मूल्यों के चक्कर में सारी समझ गवाँ बैठे और जाहिलों की सी जिन्दगी भी बिताई| रुपये-धेले का भी कोई ठिकाना न रहा सो दाने-दाने को मुँहताज हो गए| हालत यहाँ तक गिर गयी कि यदि दो पैसे मिल गए तो अधपेट रोटी खाई, परिवार को भी कुछ खिला दिया और अगर दु:खों का मारा कोई मेहमान आ गया तो दो निवाले उसके मुँह में डाल दिए| कुछ नहीं मिला तो कोरा पानी पी कर सो लिए|
 
चौदह बरस में घूरे के भी दिन फिरते हैं, उनके भी फिरे| समय सुधरा, चार पैसे हाथ में आये तो छोटा सा छप्पर छा लिया| एक कोने में कच्चा चूल्हा बना लिया| सुबह-शाम धुएँ की गंध वातावरण में फैलने लगी| बालक-बच्चे पाठ याद करते दिखाई देने लगे| खुद भी चार किताबें खरीद लाये और फिर से पढ़ने-लिखने का शौक फरमाने लगे| पैरों में जूता और तन पर कपड़ा जमने लगा| स्थिति कुछ और सुधरी तो एक चरखा खरीद लाये और उस पर सूत कात-कात कर कुछ अतिरिक्त कमाने लगे|
 
यह उन दिनों की बात है, जब जीवन में भारी उथल-पुथल चल रही थी| साँझ ढले, आस-पास की दुनिया से बेखबर अपनी ही धुन में पाँव घसीटते हुए घर की तरफ लौट रहे थे| सड़क के बीचो-बीच पड़े हुए एक पिल्ले पर नजर पड़ी| इतना कमजोर कि चलना-फिरना तो दूर रिरिया भी नहीं पा रहा था| चेष्टा से भूखा और जमाने भर का दुत्कारा हुआ लग रहा था| उसकी हालत देख कर हृदय द्रवित हो गया| पिल्ले के पास पहुँचे और तेज रफ़्तार से आते वाहनों से बचाने के लिए उसे उठाकर सड़क के किनारे रख दिया| कुछ क्षण उसे देखते रहे फिर अपनी राह लगे| चलने को चल तो दिए लेकिन मन नहीं माना| उसकी सुरक्षा को लेकर मन में चिंता जाग उठी| एक बार फिर ठिठके और अगले ही क्षण उसकी ओर लौट पड़े| करुणा के साथ उसके हडैल ढाँचे पर हाथ फेरा तो वह भी कुछ चेतन हुआ| पहले कुंकुआया फिर आश्वस्त होकर उनका हाथ चाटने लगा| अब पिल्ले को सड़क पर मरने के लिए छोड़ देना संभव न था| उन्होंने उस मरगिल्ले जानवर को हाथों में लिया, कुछ क्षण इधर उधर देखा और फिर उसे उठाए-उठाए घर की राह लगे|
 
थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि छोटे-छोटे कुछ और पिल्ले कियाँ-कियाँ करते उनके पीछे लग लिए| जब तक घर के दरवाजे तक पहुँचे पिल्लों की गिनती काफी बढ़ चुकी थी| अब क्या किया जाए? परेशानी यह थी कि न तो इतने पिल्लों को पालने की जगह थी और न ही बूता| दरवाजे पर खड़े शरणागत को भगाया नहीं जा सकता| जीवन के मूल्य इसकी अनुमति नहीं देते| स्थिति विकट हो गयी थी लेकिन आत्म-बलिदान के द्वारा उसे सँभाला जा सकता था| सोचने लगे कि यहाँ तो अपना ही पेट भरने का ठौर नहीं है लेकिन चलो, देखी जाएगी| जो मिलेगा उसे नन्हें श्वान-शावकों के साथ बाँट लेंगें|
 
आदमी का घर होता है तो ज़ाहिर सी बात है कि उसका पड़ौस भी होता है| पड़ौस होता है तो पड़ौसियों वाले गुण भी होते हैं| अपने घर में क्या चल रहा है, इससे अधिक यह जानने की इच्छा होती है कि बराबर के घर में क्या चल रहा है| दूसरे के घर में टांग अड़ाना प्रत्येक प्रतिवेशी का परम कर्त्तव्य होता है| चकौड़ी दास के पड़ौसी कहीं चाँद से तो आये नहीं थे| रहने वाले इसी धरती के थे, सो एक-एक कर यह पता लगाने के लिए आने लगे कि पिल्लों की फ़ौज पैदा कहाँ से हो गयी| और पिल्ले भी कैसे; लाल, पीले, भूरे, सफ़ेद, काले, चितकबरे और दूसरे-दूसरे मिलवा रंगों के पिद्दी से दिखने वाले जानवर जो अपनी दुम पिछली टांगों के बीच दबाये विस्मित और स्तब्ध से खड़े थे; एक-दूसरे से सटे हुए, एक-दूसरे को धकियाते हुए, एक-दूसरे की गर्दनों पर अपनी थूथन टिकाये हुए ओर खीसें निपोरते हुए| उनकी आँखों में याचना और स्वर में रक्षा की गुहार थी| इस समय सिर्फ रोटी की फ़िक्र थी| इसे अतिरिक वे और कुछ भी न चाहते थे|
 
पड़ौसी अभी भी एक तरफ खड़े तमाशा देख रहे थे| दरवाजों के पीछे, दीवार के कोनों में, आलों में, चहबच्चों में और अन्य संभावित-असंभावित प्रदेशों में छोटे-छोटे झुण्ड बने हुए थे| पिल्लों की काँय-काँय कुछ कम हुई तो एक-एक कर चकौड़ी दास के पास आने लगे| आते थे, पूछते थे कि इतने सारे पिल्ले कहाँ से ले आये? क्यों ले आये? इनके साथ क्या करने का विचार है? जवाब में चकौड़ी दास विस्तार में पिल्लों को पाने की घटना सुनाते थे| पड़ौसी आश्चर्य प्रकट करते और फिर चलते-चलते कुछ-एक सलाह थमा जाते थे| कोई कहता कि कहीं से ईंट और पुआल लाकर इनके लिए छोटे-छोटे घर बना दो| कोई समझाता कि इन्हें टाट से ढक कर रखो जिससे ठण्ड से बचाव हो सके| कोई बताता कि इन्हें प्रशिक्षण देकर समझदार बनाओ| कोई सम्मति देता कि इन्हें नहला-धुलाकर स्वच्छ बनाओ| कोई इंजेक्शन लगवा कर उनका स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की तजवीज सुझाता तो कोई प्यार से दुलारने परामर्श देता| छोटे से घर में सलाहों की संभाल करना मुश्किल हो गया| होते-होते स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी कि चकौड़ी दास हतबुद्धि होकर दुविधा में पड़ गए कि पिल्लों को संभालें या सलाहों को| वैसे चकौड़ी दास भी उन पिल्लों के लिए सब करना चाहते थे लेकिन उनके पास साधन कहाँ थे! यहाँ अपनी ही रोटी के लाले पड़े हुए थे, ऊपर से इन नन्हें बेजुबान जानवरों की जिम्मेदारी भी आन पड़ी|
 
चकौड़ी दास दयालु आदमी ठहरे| घर के भीतर गए और जो भी खाने योग्य सामग्री थी, उठा लाये| छोटे-छोटे टुकड़े करके भूखे प्राणियों के सामने डाल दिया| सबने बड़े प्रेम से खाया| कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, कोई छीना-झपटी नहीं और कोई वैमनस्य नहीं| एक-एक दो-दो टुकड़े अपनी थूथन में दबाए और किसी कोने में बैठ कर चबाने लगे| पेट भरा, थोड़ी तसल्ली मिली तो जगह के लिए खोज-बीन शुरू हुई| जगह मिली तो चकौड़ी दास के घर में अपना-अपना क्षेत्र चिह्नित करने के उद्योग में लग गए|
 
चकौड़ी दास ने किसी तरह मासूम दिखाई देने वाले जीवों के रहने का इन्तिजाम किया| इन्तिजाम बहुत अच्छा न था, लेकिन उन परिस्थितियों में उससे अच्छा हो भी न सकता था| पिल्लों के लिए दूध-बोटी की व्यवस्था नहीं हो पाई लेकिन चकौड़ी दास ने अपने हिस्से की रोटी से जैसे-तैसे उनके खाने की व्यवस्था की| उनका निश्चित राशन आरक्षित कर दिया| इसके अलावा कोई और प्रबंध उनके लिए न हो सका| पड़ौसियों ने इसे उत्पीड़न की पराकाष्ठा के रूप में प्रचारित किया|
 
पड़ौसी दुःख प्रकट करने लगे| कभी-कभी चकौड़ी दास पर कठोरता बरतने का आरोप लगाकर कोसते भी सुनाई देने लगे| धीरे-धीरे दूरदृष्टि-सम्पन्न पड़ौसियों ने अपने घर से लाकर रोटी के बासी टुकड़े चकौड़ी दास के पिल्लों के सामने डालने शुरू कर दिए| पिल्ले बढ़ने लगे| बालपन की लीलाएँ होने लगीं - उछलकूद करते, अपनी पूंछ पकड़ने की कोशिश में गोल गोल घूमते, एक दूसरे के पीछे भागते, कुर्सी-मेजों के पाँवें चबा जाते, नाश्ता जानकर चप्पल-जूतों का चर्वण कर जाते, दोनों पंजे जोड़कर उनपर अपना सिर टिकाकर गहन चिंतन में लीन हो जाते| समय बीता तो क्रमश: गुर्राना सीखने लगे| दांत दिखाकर नापसंदगी जताने लगे| अब चकौड़ी दास का घर उनके लिए छोटा पड़ने लगा था| कहने का मतलब यह है कि वक्त की चाल के साथ कदम मिला कर सरपट दौड़ते हुए चकौड़ी दास के पिल्ले, कुत्तों में बदलने लगे|
 
क्षुद्र जानवरों पर अत्याचार की खबर फ़ैली तो नगर के पशुप्रेमी भी गाहे-बगाहे छोटे-छोटे झुण्ड बनाकर छुट्टी के दिन आते, समझाते-बुझाते, नारेबाजी करते, धमकियाँ देते फिर भोजन का समय होने पर अपने घर लौट जाते| पशुओं की रक्षा के लिए चिल्लाने का अधिकार तो उनके पास था, लेकिन जिम्मेदारी हमारे मित्र चकौड़ी दास की ही तय थी|
 
कुत्ता मूलरूप से बड़ा वफादार जानवर होता है| वफादारी किसकी हो इस विषय पर कुत्तों में अक्सर मतभेद रहता है| कुछ मानते हैं कि मालिक की, कुछ का सोचना है रक्षक की, कुछ के विचार में सामने निवाला फेंकने वाले की तो कुछ के मत में जो पसंद आ जाए उसकी| यहाँ भी यही हुआ| कुत्ते भरमाने लगे कि वफादारी किसकी की जाए| उनका रखवाला, भोजनदाता, मालिक आदि सभी अलग अलग हैं| मामला पेंचीदा हो गया था| वे चकौड़ी दास के घर में रहते थे, उनकी रूखी-सूखी खाते थे लेकिन कभी-कभी पड़ौसियों के माल पर भी हाथ साफ़ कर लेते थे| आते-जाते लोग उनकी पीठ पर हाथ फेर जाते जिससे सड़क चलतों के साथ भी उनका स्नेह सम्बन्ध तैयार होने लगा था| एक दिन चकौड़ी दास की पतलून चबा डाली| उनका अधिकार क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा था| एक अन्य अवसर पर चकौड़ी दास की मेहनत से कमाई गयी रोटी छोड़कर पड़ौसियों के डाले बिस्कुटों पर झपट पड़े| चकौड़ी दास को बुरा तो लगा लेकिन पशुओं की पशुता का नमूना समझकर शांत रह गए| सारी गड़बड़ी के बावजूद भी यह माना जाता था कि जब चुनाव का अंतिम समय आयेगा तब वे चकौड़ी दास के हक़ में भौकेंगे| लेकिन यहाँ तो मामला बलकुल ही उलट गया| उन्होंने गाहे-बगाहे चकौड़ी दास पर ही गुर्राना शुरू कर दिया| उन्हें शांत कराने की कोशिश की तो किसी ने कह दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है|
 
कुत्ते पड़ौसियों के हो गए थे| दिनभर झोंपड़ी में आराम फरमाते और रात होते ही आसपास के घरों की रखवाली करने निकल जाते| एक दिन चकौड़ी दास अजीब ही परिस्थिति में पड़ गए| शाम के समय वे थके-हारे काम से लौटे तो कुतों ने उनके ऊपर भौंकना शुरू कर दिया| उनके लिए घर में प्रवेश करना कठिन हो गया| वे अपने ही घर में अनाहूत प्रवेष्टा के रूप में प्रचारित हो गए| कुत्ते चकौड़ी दास को घर का मालिक समझने से इनकार करने लगे| इसमें भी कोई दिक्कत नहीं थी| परेशानी की बात यह थी कि अब कुत्ते घर को अपना समझने लगे थे और चकौड़ी दास को पराया|
 

ऐसा भी नहीं था कि कुत्ते आपस में शांति से रहते हों| आपस में भी खूब किच-किच होती है| एक दूसरे पर झपटते हैं और आपस में ही लहू-लुहान होकर रह जाते हैं| चकौड़ी दास उनके बीच समझौता करने की कोशिश करते हैं तो सब मिलकर उन्हीं पर हमला बोल देते हैं| चकौड़ी दास कुत्तों को अनुशासित करने के लिए उन्हें डांट-फटकार देते हैं| यह खबर आम हो गयी है जिसकी वजह से उन्हें आजकल असहिष्णु कहा जाने लगा है|
 
आजकल चकौड़ी दास परेशान हैं| अपनी झोंपड़ी छोड़ नहीं सकते| घर कुत्तों को सौंपा नहीं जा सकता, अपने बाल-बच्चों की भी फ़िक्र है| कुत्तों को घर से निकाल नहीं सकते| पशु-रक्षकों का दबाव लगातार बना रहता है| अपना सम्मान दाँव पर लगा है| पड़ौसियों की ओर से कोई उम्मीद नहीं है| कुत्तों को जहर देकर मार भी नहीं सकते| कानून और सुव्यवस्था की जिम्मेदारी भी चकौड़ी दास को ही निबाहनी है|
 
अब उन्हें कौन समझाये कि जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता|

 
 

1 comment:

  1. कुछ मित्रों ने पूछा कि मेरे विचारा में कौन किसका प्रतीक है...?
    मेरे ख्याल में चकौड़ी दास भारत का, पिल्ले अलग अलग विचारधाराओं के और पड़ौसी उन संस्थाओं के प्रतीक हैं जो मानस को बरगलाने का काम करते हैं|
    ...ऐसा मुझे लगता है पर अंतिम निर्णय आप का ही है|

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