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Sunday, March 20, 2016

बच्चा झूठ बोलता है!



“इम्तहान बहुत अच्छा हुआ,
छियासी प्रतिशत आना पक्का है|”
“नहीं, गाली मैंने नहीं दी थी,
झगड़ा तो उसी ने शुरू किया था|”
“आज मैनें रोटी खाई हैं, जी भर|”
“माँ पिताजी साथ बैठे हैं, टी वी देखते हुए|”

किताबों में लिखी सच-झूठ की परिभाषाओं से
बहुत आगे निकलकर खड़ा हुआ बच्चा
एक के बाद एक सवालों के जवाब देता है|

ठीक है, बच्चा झूठ बोलता है,
पर, सच को अपनी नज़रों से तोलता है|

झूठ की परतों पर परतें जमाता है,
पास बैठे कवि को सिखाता है
कि जब पके फोड़े को गॉज़ से ढकने जैसा अहसास
धुंध बनकर उसके मन पर छा जाता है,
तब झूठ, झूठ न रहकर आशा में बदल जाता है,
और आशा, शाश्वत सत्य में|

मन लगातार अपनी सिकुड़न को छिपाता है,
सपाट और चिकने कथ्य में|

मेहमान के आने से पहले,
गन्दगी भरी अलमारी के आगे टांगी चादर का झूठ,
संतोष और घुटन के बीच माँ
गले अटकी जान सा संभाले रखती है जैसे,
वैसे ही संतुलन को बनाए रखता है बच्चा|

ढलती दुपहरिया में
जा छिपता है सूरज पहाड़ी के पीछे
और तलहटी में छा जाता है अन्धेरा|

सूरज का न होना उतना ही सत्य है
जितना, इस समय, होना सूरज का|

बच्चा जानता है सत्य के इस अबूझे रहस्य को,
इसीलिये – बच्चा झूठ बोलता है|




चित्र www.toperfect.com से साभार

3 comments:

  1. ठीक है, बच्चा झूठ बोलता है,
    पर, सच को अपनी नज़रों से तोलता है..

    बच्चे का झूठ-सच उनकी तरह ही मासूम होता है

    बहुत सुन्दर रचना

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    1. धन्यवाद, कविता जी| पाठकों की एक पंक्ति में दी गयी प्रतिक्रिया भी लेखक के लिए अमूल्य होती है| आभारी हूँ|

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व गौरैया दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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