अपनी बात

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Tuesday, March 15, 2016

पोस्टर

दीवार पर लगा पोस्टर
ध्यान से देखा
तो आइना सा लगने लगा|
 
ज़िंदगी की हकीकत परत-दर-परत खुलने लगी|
 
जब तक पिक्चर लगी है
तभी तक पोस्टर, पोस्टर है,
उसके बाद गन्दगी
जिसके ऊपर चस्पा हो जाता है
एक और पोस्टर|
 
सैंकड़ों लोग दिखाई देते हैं
सड़क पर चले जाते हुए
दफ्तरी फ़ाइल पर नजरें जमाए हुए –
नीरस आँखों में श्रृंगार खोजते हुए,
वे भी तो पोस्टर ही हैं|
 
यद्यपि चलते हैं, फिरते हैं,
फिर भी चिपके हैं|
 
न जाने कब चित्र उतर जाए
और घूरे पर फेंक दिए जाएँ|
 
बहुत से चित्र बने हैं उन पर –
आँखों से शरारे बरसाता नौजवान,
कमर झुकाए गिड़गिड़ाता बुढ़ापा,
आसमान में उड़ता परिंदा,
...और भी बहुत कुछ,
जो होते हुए भी नहीं है,
या नहीं होते हुए भी है|
 
बिल्कुल स्वप्न की तरह
 जिसे किसी ने दीवार पर चिपका दिया हो|
 
 
 

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