अपनी बात

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Saturday, April 2, 2016

जूते का बूता

जूते के ऊपर बहुत कहा और उससे भी अधिक सुना जाता है। कहने वाले तो जूते को आदमी का बूता भी बताते हैं। कहने वाले तो कहते ही रहते हैं, वे तो यहाँ तक कहते हैं कि आज के दौर में अगर अपनी पहचान बनानी है तो जूते की चोट मारने में सिद्धहस्त हो जाइए और अपने विवेक से तय कीजिये कि जूता चमड़े का हो या चाँदी का। विवेक का कितना सुन्दर उपयोग बताया है विद्वानों ने। जब वह जूते की ताकत के साथ एकाकार हो जाता है, गजब ही ढा देता है|
जूतों के जो कईं सारे उपयोग देखे जाते हैं, उनमें से एक है आग को मसल कर दबा देने का| चिंगारियों को बहुत बार जूतों के नीचे कुचले जाते हुए देखा है| आग का भ्रूण ही नष्ट कर दिया जाए तो आग जलेगी ही कहाँ? वैसे कईं बार ऐसा भी हुआ है कि चिंगारियाँ जूतों के नीचे दब कर भी बुझी नहीं| सुलगती रहीं| हवा के साथ उड़कर आये सूखे पत्ते एक जगह जमा होकर बड़े से ढेर में बदलते रहे और फिर एक दिन चिंगारी और सूखे पत्ते एक ही समय, एक ही जगह इकट्ठे हो गए| जब ऐसा घटा, तब चिंगारी ने दावानल बन कर जूते को पहनने वाले सहित जलाकर राख कर दिया| पर, ऐसा बहुत कम होता है| जिंदगियाँ बीत जाती हैं ऐसा होने के इंतज़ार में| यही बात जूते के अहंभाव को निरंतर बड़ा बनाती रहती है| कभी-कभी तो लगता है कि पूरा असमान ही जूते के अहंकार को संभालने के लिए छोटा पड़ रहा है|
जूते का राजनैतिक महत्त्व भी होता है| महत्त्व की क्या कहें! असल में जूता राजनैतिक हथियार हो गया है| मुहूर्त्त देख कर जूते उछाले जाते हैं, उछलवाये जाते हैं| जूते की खासियत यह है कि उसका एक मालिक भी होता है, जो यह तय करता है कि उसे किसकी तरफ उछलना है। सुनते हैं कि एक राजनैतिक व्यक्ति का जन्मदिन मनाया जा रहा था| बस किसी बात को लेकर जूतम-पैजार हो गयी| जनता तो तमाशे की शौक़ीन होती ही है| दोनों ही तरफ उभारने वाले दर्शक भी जमा हो गए| बस फिर क्या था, जिस का मौक़ा लगा उसने दूसरे को दौड़ा-दौड़ा कर पीटा| सुनने में आता है कि एक सभा में किसी श्रोता ने वक्ता की तरफ जूता फेंक दिया| क्या पुलिस, क्या कार्यकर्ता, क्या नेता, क्या आम जनता; सभी हाथ में जूता लेकर इधर से उधर भागते दिखाई दिए| जूतम-पैजार की अपनी कहानियाँ हैं| वैसे, कमाल की बात है, जो जूता पैर के लिए था अब हाथ में आकर कई गुना शक्तिशाली हो गया है|
एक महापुरुष ने तो अपना चुनाव-चिह्न ही जूता रखा था। उनका मानना था कि जूता न केवल दुष्टों से बचाता है अपितु दुष्टों पर प्रहार के काम भी आ जाया करता है। देखिये, कितनी गजब की चीज़ है जूता; ठोकर से बचाता भी है और ठोकर लगाता भी है। अगर इस मामले को उधेड़ दें, सारी सिवन उखाड़ दें तो देखेंगें कि सारी सोच प्रहार और बचाव पर आकर टिकी हुई है।
जूते का धार्मिक महत्त्व भी किसी से कम नहीं है| मंदिर के बाहर से प्रसाद की तरह और मस्जिद के बाहर से दुआओं की तरह जूते उड़ा दिए जाते हैं| इसी से सीख लेकर शायद गिरजे में जूतों के साथ जाने की मुमानियत ख़त्म कर दी गयी है| शादी के दौरान जूते चुराने की रस्म तो प्रसिद्ध ही है| हमारे यहाँ इस रास्म का कार्यान्वयन होते हुए भी एक बात जूते चल गए थे| किसी दुल्हे की साली दुल्हे के साथियों की मुस्तैदी की वजह से जूते नहीं चुरा पायी तो उसने जूतों में रसगुल्लों का बाखर ही डाल दिया| जूते इज्जत का प्रतीक थे और इज्जत से इस प्रकार खेला जाना अनुचित माना गया| वरपक्ष को बात नागवार गुज़री तो बात बढ़ गयी और इस कदर बढ़ी कि उसका अंत दुल्हे समेत पूरी बारात की पिटाई में हुआ| जो लोग दुल्हन लेने आये थे पूरे शरीर पर जूतों के निशान लेकर लौटे, कोर्ट कचहरी हुई सो अलग|
जूते का महत्त्व नियम और क़ानून की स्थापना में भी कम नहीं है| दूसरे, चौथे दिन महिला कॉलेजों के सामने खड़े मजनुओं की पिटाई करती हुई वीरांगनाएँ इस बात को सिद्ध करती हैं| आज-कल तो प्रचलन कम हो गया है, लेकिन गुज़रे ज़माने में लड़कों को बाप के जूते की सलामी मिलना आम बात हुआ करती थी| बिगड़े को सुधारने का और बिना बिगड़े को बिगड़ने से बचाने का यह आजमाया हुआ तरीका था, जिसका ज्ञान पीढी-दर-पीढी आगे बढ़ाया जाता रहा था|
जूता आर्थिक दबंगई का भी कारण, कारक और प्रतीक होता है| मिल मालिक मजदूरों पर चलाते हैं| जूतों की धमक अच्छे अच्छों के दिल दहलाकर रख देती है| जूतों के नीचे से सरकारें चलाई जाती हैं| जूते हिला और कभी जूते दिखाकर तबादले और नियुक्तियाँ कराई जाती हैं| आर्थिक संस्थाएँ जूतों की नोक पर फुटबॉल की तरह उछाली और एक दूसरे को पास की जाती हैं| इतिहासकार बताते हैं कि आर्थिक प्रगति के बाद यूरोप में तो जूता हैसियत और रुआब का प्रतीक बन गया था| उनके जूतों तले न जाने कितनों के सम्मान और कितनों के अरमान कुचले गए, इसका हिसाब लगाना कठिन है| आज भी न जाने कितनों के द्वारा उनके जूते चूम-चूम कर चमकाए जाते हैं|
जूते के आविष्कार की कहानी कोई नई तो नहीं है पर है बड़ी अनूठी| कहते हैं, चीन में एक राजा था| बड़ा राजा था सो, शान भी बड़ी थी| ऐश-ओ-आराम की ज़िंदगी थी लेकिन, ज़िंदगी चाहे कितने भी आराम की हो उसमें एक-आध दिक्कत रह ही जाती है| उसकी जिन्दगी में भी थी| बात ये हुई कि उसके दिल में भारी परेशानी रहने लगी| हुआ यह, वह अपने घोड़े पर बैठ कर राज्य का हाल-चाल लेने निकला तो उसने किसानों को नंगे पैर झुलसती जमीन पर काम करते देखा| कुछ और आगे चला तो मजदूरों को पथरीली जमीन पर नंगे पैर मजदूरी करते देखा| थोड़ा और आगे चला तो कुछ राहगीरों को नंगे पैर कंटीले जंगल पार करते देखा| उसका मन तकलीफ से भर उठा| उसकी तकलीफ यह नहीं थी कि लोग नंगे पैर घूमते हुए कष्ट भरा जीवन बिताते हैं बल्कि उसकी तकलीफ यह थी कि कहीं किसी दिन उसे भी नंगे पैर ऐसे ही काँटों और पत्थरों से भरे रास्ते पर चलना पड़ गया तो क्या होगा!
जाहिर सी बात है, जिस समय के बारे में बात हो रही है, उस समय तक जूते का आविष्कार नहीं हुआ था| क्या राजा, क्या रंक सभी लोग नंगे पैर ही घूमा करते थे| बस मामूली सा फर्क इस बात को लेकर था कि राजा महल के नरम, गुदगुदे कीमती कालीनों पर घूमता था जिन्हें या तो ईरान की तरफ से आने वाले व्यापारियों से कर के रूप में वसूला गया था या फिर अपने ही देश के कारीगरों से जबरन बनवाया गया था| कभी-कभी वह शाही बाग़ की मखमली घास पर भी घूमता था, यह दीगर बात है कि उसे वहाँ घूमते समय उन चिरे हुए लहुलुहान तलवों की याद नहीं आती थी जो किसी समय पथरीली और कँटीली जमीन को साफ़ और समतल करने की कोशिश करते हुए लाल-लाल छापे पीछे छोड़ते उस जमीन पर घूमे थे| खैर, नरम मुलायम समतल सतह पर चलते हुए भी राजा के नाज़ुक शाही तलवों को बड़ी तकलीफ होती थी| इसमे कोई अचंभित होने वाली बात नहीं है| पैर शाही थे तो ज़ाहिर है कि तकलीफ भी शाही ही थी| मोटी चमड़ी और मोटी बुद्धि वाले आम लोगों की तकलीफ का मुकाबला राजा के कुलीन क्लेश से कहाँ!
जहाँ तक आम लोगों का सवाल है, पहली बात तो उनकी गिनती करना ही राजकीयता का उल्लंघन होता है| दूसरी बात यह है कि सामान्य लोगों की तकलीफ ऐतिहासिक रूप से तकलीफ की श्रेणी में नहीं आया करती है| मामूली पैरों के तलुवों को यह अच्छी तरह समझा दिया जाता है कि कष्ट उनका अपना देव-प्रदत्त हिस्सा होता है| यह जबरदस्त धारणा उनके मन में शाही सोच अता फरमाया करती है| एक अन्य बात और है, जब भी शाही पैरों को तकलीफ होती है तो किसी न किसी तरह वह तकलीफ आम पैरों में स्थानांतरित कर दी जाती है| होता यह था कि इस तकलीफ को आगे बढ़ाने में भी शाही पैरों को काफी तकलीफ होती है| कहने का मतलब यह है कि आम पैरों की तकलीफ तो चलिए, कोई ख़ास बात नहीं लेकिन हाँ, शाही तकलीफ जमाने की तकलीफ हुआ करती हैं, यह भी प्रागैतिहासिक काल से होता आ रहा है| हो भी रहा है| तो, इसलिए तय हुआ कि शाही तकलीफ को दूर करने का शाही उपाय निकालने युक्ति की जाए|
मामला अभिजात तंत्र से जुड़ा था, इसलिए कोई छोटी-मोटी तिकड़म भिड़ाकर मामले को रफा-दफा करने की कोशिश नहीं की जा सकती थी| कुछ बड़ा होना जरूरी था। अंत में  वही हुआ जो आज भी बेधड़क हो रहा है| समितियाँ बनीं| उपसमितियाँ बनीं| उनके अध्यक्ष, उपाध्यक्ष, परमाध्यक्ष, अपराध्यक्ष बने| सचिव, अपर-सचिव, पूर्ण-सचिव, अपूर्ण-सचिव, उपसचिव, उपेतर-सचिव, सहायक-सचिव, ऑन-रिकॉर्ड सचिव, नॉन-रिकॉर्ड सचिव, रिकॉर्डिंग-सचिव आदि की नियुक्तियाँ हुईं| सदस्य, मानद-सदस्य, पदेन सदस्य, आजीवन-सदस्य, अंशकालिक-सदस्य, पूर्ण-कालिक सदस्य, पूर्ण-सदस्य, नाम-मात्र के सदस्य आदि बने| सभाएँ हुईं| सभाओं के लिए बजट पारित हुए जिनका पूरा उपयोग किया गया| कईं बार बजट से अधिक खर्चा भी हुआ लेकिन राजा ने उसकी चिंता नहीं की| वित्त-मंत्री को अगले साल जनता पर उप-कर लगाने का आदेश दे दिया| बड़े लोग बड़ी समस्याओं को भी चुटकियों में हल कर देते हैं| धन्यवाद प्रस्ताव पारित हुए| हफ़्तों तक विचार-विमर्श चलता रहा| सिर जोड़कर बड़े-बड़े सिरों वाले लोग हफ़्तों तक बुत बने बैठे रहे| संभावित उपायों की सूचियाँ बनाई गयीं| उनकी परीक्षा के लिए अन्य समितियाँ बनीं जिनमें आवश्यकतानुसार नई नियुक्तियाँ हुईं| अंत में एक जुगत राजा को अच्छी लगी| बस, बात खत्म! उसने अपनी राजकीय मुहर उस तजवीज पर लगा दी|
हुक्म हुआ कि सारे मुल्क की ज़मीन चमड़े से ढक दी जाए| हर वो जगह चमड़े से मढी जानी चाहिए जहाँ शाही पैर रखे जाते हैं| राजा के खानदान वालों ने इस हुक्म में सुधार करते हुए जोड़ा कि राजा के परिवार के आने जाने के रास्ते और मंजिलें भी चमड़े से मढी होनी चाहियें| मंत्रियों ने अपनी तरफ से हुक्म में सुधार कर दिया कि जहाँ मंत्री-परिषद् और उनके परिवार के सदस्य आते-जाते हैं, उन स्थानों को भी चमड़े से मढ़ा जाना चाहिए| बाकी ताकतवर लोगों ने भी अपनी सुविधा के लिए जमीन के अलग-अलग हिस्सों को चमड़े से मढ़े जाने का फरमान निकलवा दिया| काम की शुरुआत हुई तो चमड़े की ज़रुरत पड़ी| जैसे-जैसे मढी जाने वाली जमीन का क्षेत्रफल बढ़ा वैसे वैसे चमड़े की जरूरत भी बढ़ती गयी| चमड़ा पाने के लिए एक के बाद एक जानवर काटे जाने लगे, पर फिर भी चमड़ा कम ही पड़ता था| राज्य के सारे जानवर चाहे वे दो पैर वाले हों या चार पैर वाले, उनकी खाल राज्य के काम आ गयी लेकिन फिर भी काम पूरा न हुआ| नरम-मुलायम आदमियों की संख्या भी ठीक-ठाक थी लेकिन उनका चमड़ा इस काम आ नहीं सकता था, सो काम अधूरा रह गया|
वजीर ने शाही हुज़ूर में पेश होकर खबर दी कि कोशिश सफल नहीं हो पाई है| राजा नाराज़ होकर उसकी खाल खिंचवा देता उससे पहले ही उसने राजा को सलाह दी कि अच्छा हो कि वह अपने पैर पर ही चमड़ा मढ़वा ले| राजा को बात पसंद आयी और इस तरह जूते का आविष्कार हुआ|
हमें तो ऐसा लगता है कि जूता पहिये से भी ज्यादा महत्त्वपूर्ण आविष्कार है| इतने बड़े आविष्कार को कुछ लोग छोटा करने की कोशिश करते हुए भी देखे जाते हैं| हमारे मित्र चकौड़ी दास को ही ले लें| वे थोड़े सनकी प्राणी हैं और हर जगह कमियाँ देखना उनका स्वभाव हो गया है| एक दिन कहने लगे-
 
"सही कहूँ तो जूता बेरोजगारी का प्रतीक है| जितना अधिक घिसा हुआ उसका तला होता है, यह समस्या उतनी ही गंभीर होकर सामने आती है| जूता शोषण का प्रतीक है| उसका तला जितना मोटा और भारी होता है, शोषण की समस्या उतने ही खतरनाक रूप से बढ़ती जाती है| जूता असमानता का प्रतीक होता है| दरवाजे के बाहर जितनी अधिक संख्या में जूते उतरे हुए दिखाई देते हैं, वर्गों के बीच का अंतर उतना ही अधिक होता है| जूता व्यक्तिगत स्वतंत्रता की अवहेलना का प्रतीक होता है| पंचायत की सभा के बाद जूते फटकारने की आवाज गिनती में जितनी अधिक और स्वर में जितनी ऊँची होती है, व्यक्तिगत स्वातंत्र्य की दशा उतनी ही अधिक शोचनीय होती है|"
 
एक दिन अपनी ही रौ में बोले -
 
"मॉल की चमकती हुई दूकान में चकाचौंध रोशनी के पीछे साफ़ सुथरे शीशे से टिकाकर सलीके से रखे चम-चमाते जूते को ध्यान से देखिये, लहू की बूँदे टपकती हुई दिखाई दे जायेंगीं|"
 
चकौड़ी दास जैसे लोग शिकायतें करते हुए पैदा होते हैं और शिकायतों के कफ़न में लिपटकर ही इस दुनिया से रुखसत हो जाते हैं| उनकी बेबुनियाद बातों पर विश्वास करने की कोई वजह नहीं दिखाई देती|
 
 
 

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