अपनी बात

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Thursday, March 10, 2016

रात कभी...

कभी...
हुमककर खेलती रही
सितारों के घुँघरुओं को उछाल-उछाल
लालच देता रहा अन्धेरा
चमकीली गेंद का|
 
कभी...
एक कोने से दूसरे कोने तक
भागती रही आसमान के,
थक कर चूर पसीने में लथपथ
भिगोती रही पुलकती घास को|
 
कभी...
धरती की फ़ैली हथेली पर
छू-छूकर पोरवे, गा-गाकर
सिखाती रही गिनती और पहाड़े
आवारा घूमते झींगुरों को|
 
कभी...
बेसुध खानाबदोश शराबी को
काँधे का सहारा दिए, लड़खड़ाती सी
अँधेरे में चेहरा छुपाए
नि:शब्द सामने से गुजर गयी|
 
कभी...
पाँवों से लिपटे सर्पिल रास्तों की
उलझी गुलझटें सुलझाने में मग्न
सुबह का जलता किनारा
खो-खोकर पाती रही, जागती रही|
 
रात कभी...
 
 
चित्र से fineartamerica.com साभार

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