अपनी बात

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Tuesday, March 1, 2016

बजट आ गया!

बजट को बचपन से आते देख रहे हैं|
 
जब छोटे थे तब समझते थे कि हो न हो कोई सर्कस जैसी चीज होती होगी जिसमें बन्दर-भालू का तमाशा चलता होगा| हाथी फुटबॉल खेलता होगा| चेहरे पर रंग पोतकर गोल टमाटर सरीखी नकली नाक लगाकर कोई जोकर तमाशा दिखाता होगा| लोग उछल-उछलकर वाह वाह करते हुए उत्साह भरी चीत्कार करते होंगे|
 
बजट को हमने सामाजिक परम्परा की तरह आकार लेते देखा है| हमारे पितामह बजट को अखबार में पढ़ा करते थे| जब वे छदामी लाल पहलवान को बादाम और घी महँगा होने की खबर सुनाया करते थे तो पहलवान दार्शनिक की भांति कह दिया करते थे कि चलो कोई बात नहीं अपनी गिजा में दो-चार दाने कम कर लेंगे| हमारे पिता रेडियो पर सुना करते थे| इनकम टैक्स की पटिया पर उनका ख़ास ध्यान रहा करता था| हमने टी वी पर देखना सीखा| जैसे-जैसे बड़े हुए वाशिंग मशीन, टीवी और फ्रिज की बढ़ती कीमतों से परेशान होना सीख गए| आजकल हमारी संतानें बजट को इंटरनेट पर जान लेती हैं| उनका पूरा ध्यान फोन और लैपटॉप से जुडी खबरों पर रहता है|
 
बजट आने के बाद क्या होता है ये तो बात छोड़िये| असली बात तो यह है कि जैसे-जैसे बजट का मौसम पास आता जाता है, तब क्या होता है| अपेक्षाओं के पहाड़ की तलहटी में मन-मृग किलोलें करने लगता है| उसे सारा जंगल हरा-भरा दिखाई देने लगता है| सभी को अपनी-अपनी नाभी में से कस्तूरी की गंध आने लगती है| जंगल महक उठता है|
 
बजट के आने की खबर से ही हिया बढ़ जाता है| आनंद की हिलोरें हृदय के समुद्र में एक के बाद एक आती हैं और मायूसी का कचरा जीवन के तट से धो जाती हैं| हर पल यही लगता है कि जीवन में बदलाव बस आने भर को ही है| बौराया मानस विवर्धन के संकेत पकड़ने में मगन हो जाता है| आशाओं की थरथराती लौ स्थिर होती सी प्रतीत होने लगती है|
 
आशा मानुष को अपने दास की तरह बना देती है| पगलाया सा मन इधर-उधर भागा फिरता है| उछाह उमग-उमग पड़ता है| भविष्य के स्वप्न हजार आँखों में दिप् दिप् करने लगते हैं| उम्मीदों की अठखेलियाँ शुरू हो जाया करती हैं| अंतस् का फागुन रंगों से भर जाता है| सारा संसार उजला-उजला सा लगने लगता है|
 
उजास संसार में ही नहीं नेत्रों में भी भरने लगता है| रात की कालिख फटने लगती है| चारों ओर विस्तृत प्रकृति के साम्राज्य में सुनहरे पुष्प खिलने लगते हैं| खुशबुओं की फुहार छोड़ती सकारात्मकता की बयार चित्त को मतवाला बनाने को आतुर हो जाती है| पग चंचल हो उठते हैं| विवेक कल्पनाओं पर बलिहारी होने लगता है|
 
तुम यह समझ ही नहीं पाते कि बजट न हुआ भानुमती का पिटारा हो गया जिसमें सबके लिए कुछ न कुछ होगा ही| यह बात ख्याल में ही नहीं आती कि अरे, होगा तो उनके लिए होगा जिनके लिए होना चाहिए| अपने लिए कुछ करना चाहते हो तो पहले खुद तो कुछ हो जाओ| चार आने की औकात नहीं और हिस्सा चाहते हो चार हजार करोड़ के बजट में| ये मुँह और मसूर की दाल| अब चलो भी, अपना रास्ता नापो!
 
सदियों से यह रीति चली आयी है कि अगर तुम्हारे पास पहले से ही कुछ है, तो और भी आयेगा और नहीं है, तो ठन-ठन गोपाल| राम भजन करो और मौज में रहो| पत्नी अक्सर कहती हैं कि घर खीर तो बाहर खीर| घर में खीर पैदा करो तो बाहर अपने आप खीर पैदा हो जायेगी| घर में दूध के लिए खूंटे पर चुहिया बाँधते हो और मजा भैसों के तबेले की गंध का लेना चाहते हो? वाह, भई वाह, बलिहारी इस विचार पर|
 
अब कुछ खिंचाव पैदा हुआ न दिल में! तो सुनो, बजट की वैतरणी को पार करने का एक तरीका यह है कि अपनी आवाज को दबा लो| सुना तो होगा ही कि एक चुप सौ को हरावे| अपने होठ सिलाकर बिल्कुल बेखबर हो जाओ| देखते रहो, समझते रहो लेकिन चुप रहो| समझ झरोखे बैठ कर जग का मुजरा लेव| नासमझी पर लानत है लेकिन समझदारी का तकाजा है कि चुप रहो| अपनी इन्द्रियों का दमन करो| अपने आप सुखी हो जाओगे| आयकर की सीमा नहीं बढ़ी तो क्या जान निकल गयी जो हो-हल्ला करना शुरू कर दिया| दो पैसे सर्विस टैक्स बढ़ गया तो क्या आसमान टूट पड़ा या मुसीबत का पहाड़ सर पर आ गिरा? जब आपस में एक दूसरे का गला काटते हो तो दिक्कत नहीं होती और अगले ने जरा सा तकुवा क्या चुभो दिया कि हाय-हाय करने लगे| सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात पर टैक्स बढ़ गया तो बलवा शुरू करने की सोचने लगे जैसे हफ्ते में तीन बार सुनार की दूकान पर चक्कर लगाने की आदत पड़ी हुई हो| नकली रतन भी तो मिलते हैं, खरीद लाओ और चैन की बंसी बजाओ| हफ्ते में दो किलो आलू खरीदते मैय्या मरती है और सोने-चांदी को रो रहे हो|

किसी का रोना है कि तम्बाकू, सिगरेट के दाम बढ़ गए| इसमें बुराई क्या है? सिगरट कम पी जायेगी तो दवाई की जरूरत कम पड़ेगी| दवाओं के दाम बढ़ने के प्रभाव से बच जाओगे| पान खा-खा कर दाँतों पर जो रंगोली सजा राखी है उसे साफ़ करने के लिए मंजन की कम जरूरत पड़ेगी| वहाँ भी पैसे बचे| अनाज, दाल सब्जी, घी, तेल महँगा होने का प्रभाव तो गजब का है| एक परिचित होम्योपैथी के डाक्टर ने एक बार कहा था कि स्वास्थ्य का अचूक उपाय तीन शब्दों में गुँथा हुआ है – भूखा, रूखा और सूखा| उन्होंने इसका पूरा उपाय कर दिया है| स्वस्थ रहोगे साथ ही डायटिंग की जरूरत नहीं पड़ेगी| शरीर हल्का और फुर्तीला बना रहेगा| जिम जाने के जरूरत नहीं होगी| वहाँ के पैसे भी बचे| डीजल-पैट्रोल महँगा हो गया तो क्या? पैदल चलो और स्वास्थ्य बनाओ| ज्यादा जीवित रहोगे तो बजट की लीला को ज्यादा देख पाओगे| अनुभव में हिजाफा होगा| सोचो, मौहल्ले के खंखारते हुए बुड्ढों के बीच बैठकर सारी दुनिया को गरियाने का अवसर मुफ्त में ही मिल जाएगा| संक्षेप में कहूँ, तो थोड़ा सा सकारात्मक होने की जरूरत है, गरीबी की होने पर भी जिन्दगी मजेदार लगने लगेगी|

देखो, हमारा देश गरीबों का देश है| हमारी जोरू को सबकी भाभी कहलाने का गौरव प्राप्त है| सारी दुनिया हमारा लाभ उठाने को व्याकुल है| व्यास जी महाराज ने अठारह पुराणों में दो ही वचन कहे हैं – ‘परोपकाराय पुण्याय’ और तुम इस परोपकार के इस दिव्य अवसर का लाभ उठाने से बचने की सोचते हो| शर्म आनी चाहिए| अपने मान-अपमान की बात मत सोचो| हम तो बेदान्ती महापुरुषों की संताने हैं| मानापमान से ऊपर उठना हमारे जीवन की सार्थकता है| वैसे भी सयाने कह ही गए हैं, “गरीबी तेरे तीन नाम – झूठा, पाजी बेईमान|” आज के जमाने में ये तीन ही तो मौज की काटते हैं| तुम्हें ये तीनों गुण जिन्हें जीवन-शास्त्रियों ने सब से बढ़कर माना है, अनायास ही मुफ्त में मिले जाते हैं और तुम नखरे दिखाते हो| मुफ्त की चीज तो अगर मल में भी पड़ी मिल जाए तो उठा लेनी चाहिए और तुम्हें तो माशाल्लाह जिन्दगी के मॉल में मिल रही है|

अब कहोगे कि जिन्दगी को मॉल क्यों कहा? तो सुनो, मॉल में जाओ तो चारों तरफ जगमगाती लाइटों के पीछे एक से एक जबर सामान लगा दिखाई देता है| अपना नहीं होता लेकिन होता तो है| जनता वहाँ जाती है, खूब आँखें सेकती है और तेरह रुपये में लोकल बस का टिकट खरीद कर घर लौट आती है| दिल-ओ-दिमाग में महंगे और ब्रांडेड सामान की याद अंकित हो जाती है| वस्तुएँ अपने घर में नहीं होतीं, लेकिन अपनी हो जाती हैं| बस यही कहानी जीवन की भी हुआ करती है| इसीलिए जिन्दगी को मॉल कहकर पुकारा है, समझे! तो बात हुई कि मौज लो और रोज लो, न मिले तो जिन्दगी के मॉल में खोज लो|

मौज में रहना है तो उसका एक रामबाण उपाय तो मैं बता सकता हूँ और बाकी उपाय उसी लाइन पर सोचते हुए तुम स्वयं पा सकते हैं| सीधा सिद्धांत है; इच्छाएं, आशाएं और आवश्यकताएँ नियंत्रण में रखो| बिना किसी फल की इच्छा के काम करो| फल की इच्छा बलवती होने लगे तो उसकी दिशा ताकतवर लोगों की तरफ मोड़ दो| दिल में कोई मलाल न रहेगा| किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं होगी| जीवन में रहते ही जीवन-मुक्त हो जाओगे|
 
तुम लोग समझते क्यों नहीं कि ईश्वर ने जीवन-मुक्ति का कितना सरल उपाय तुम्हारे लिए संभाल कर रखा है| कलियुग में जो एक मात्र सदुपाय मानव को मिला है वह यही है| क्या लगता है कि पिछले तीन युगों में मोक्ष, निर्वाण और जीवन-मुक्ति को इतना कठिन क्यों माना जाता था? नहीं समझे! भई, सीधी सी बात है, उन दिनों बजट का प्रावधान नहीं था| बजट का प्रावधान नहीं था इसलिए तपना पड़ता था| तप-तप कर सोना बनना पड़ता था| आज कल तो वह झंझट है ही नहीं| बजट प्रभु की कृपा से सशरीर स्वर्ग का विचरण करने का अच्छा अवसर हाथ लग जाता है|
 
अगर यह विचार दिल को नहीं भाता है, तब ध्यान से यह प्राचीन कथा सुनो| एक समय था जब गुरु विश्वामित्र ने त्रिशंकु को सीधे स्वर्ग भेजने का जुगाड़ कर दिया था| वह पहुँच भी जाता अगर वसिष्ठ महाराज ने भाँजी न मार दी होती| ऐसा झंझट पैदा किया कि अगला न इधर का रहा न उधर का| लटक गया अधर में| माना कि आजकल भी विश्वामित्र और वसिष्ठ अनेक रूप होकर बजट-यज्ञ में बैठते हैं| देवताओं को हवियाँ देते हैं| स्तुतियाँ गाते हैं| अंगरेजी में ढाई-तीन घंटे का मन्त्रजाप करते हैं| सवा सौ करोड़ त्रिशंकुओं को सशरीर स्वर्ग पहुँचाने और पहुँचने से रोकने की साजिश रचते हैं| लेकिन है तो संख्या में तुमसे कम ही| अपनी संख्या का रुआब दिखाओ तो सही| अपने लिए नए स्वर्ग की नींव डालो तो सही| वे सारे ऋषिगण अपना कमंडल हाथ में लेकर दाढ़ी फटकारते हुए तुम्हारे पीछे-पीछे आने लगेंगे|
 
लेकिन यह बात साफ़ है कि ऐसा होगा नहीं| तुम बहुत जल्दी सब भूल जाते हो| अतीत में हुआ कदाचार तुम्हारे दिमाग से निकल भागता है| याद ही नहीं रहता कि तुम सब तो उनके लिए पूर्णाहुति का श्रीफल हो जिन्हें वे एक-एक करके हवनकुंड की पवित्र अग्नि में डालते रहेंगें और फल का भोग करते रहेंगें| यह बात तुम हर बार पांचवा साल आते-आते भूल जाते हो| तुम कुंड तैयार करते हैं और फिर स्वयं को उन्हें सौंप देते हो, समिधा और सामग्री के रूप में, जिन्हें वे स्वाहा-स्वाहा बोलकर अपने देवताओं को बलि के रूप में भेंट करते हैं और याग का अक्षय फल भोगते रहते हैं|
 
भूलना एक महत्वपूर्ण कुशलता है| इस कुशलता को साधने में जीवन व्यतीत हो जाया करता है| मालिक की कृपा से तुम्हें तो यह आदत बचपन से ही पड़ गयी है| जब भूलने की क्रिया सिद्ध हो ही गयी है तो उसका अपने लाभ के लिए उपयोग क्यों नहीं करते? बीते पर मिट्टी डालो और हर दगाबाजी को यह सोच कर सह जाओ कि यह पहली ही है| दूसरों के लिए भूल सकते हो लेकिन अपने लिए नहीं भूल सकते, पाखंडी हिप्पोक्रेट कहीं के|
 
चलो, बहुत हुआ| कागज़ पैन लेकर बैठो और हिसाब लगाओ कि इस साल किस-किस जिन्स में कटौती करनी है| अभावों का उत्सव मनाने की तैयारी करो| मन के दरके हुए दर्पण की तरेर छिपाने के लिए उस पर रंगीन कागज़ चिपकाने की व्यवस्था करो|
 
और कुछ नहीं कर सकते तो जिस-तिस को कोसते हुए अगले साल के आम बजट की राह देखो|
 
तब तक के लिये, राम राम!

चित्र www.economist.com से साभार

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