अपनी बात

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Sunday, March 20, 2016

बच्चा झूठ बोलता है!



“इम्तहान बहुत अच्छा हुआ,
छियासी प्रतिशत आना पक्का है|”
“नहीं, गाली मैंने नहीं दी थी,
झगड़ा तो उसी ने शुरू किया था|”
“आज मैनें रोटी खाई हैं, जी भर|”
“माँ पिताजी साथ बैठे हैं, टी वी देखते हुए|”

किताबों में लिखी सच-झूठ की परिभाषाओं से
बहुत आगे निकलकर खड़ा हुआ बच्चा
एक के बाद एक सवालों के जवाब देता है|

ठीक है, बच्चा झूठ बोलता है,
पर, सच को अपनी नज़रों से तोलता है|

झूठ की परतों पर परतें जमाता है,
पास बैठे कवि को सिखाता है
कि जब पके फोड़े को गॉज़ से ढकने जैसा अहसास
धुंध बनकर उसके मन पर छा जाता है,
तब झूठ, झूठ न रहकर आशा में बदल जाता है,
और आशा, शाश्वत सत्य में|

मन लगातार अपनी सिकुड़न को छिपाता है,
सपाट और चिकने कथ्य में|

मेहमान के आने से पहले,
गन्दगी भरी अलमारी के आगे टांगी चादर का झूठ,
संतोष और घुटन के बीच माँ
गले अटकी जान सा संभाले रखती है जैसे,
वैसे ही संतुलन को बनाए रखता है बच्चा|

ढलती दुपहरिया में
जा छिपता है सूरज पहाड़ी के पीछे
और तलहटी में छा जाता है अन्धेरा|

सूरज का न होना उतना ही सत्य है
जितना, इस समय, होना सूरज का|

बच्चा जानता है सत्य के इस अबूझे रहस्य को,
इसीलिये – बच्चा झूठ बोलता है|




चित्र www.toperfect.com से साभार

Tuesday, March 15, 2016

पोस्टर

दीवार पर लगा पोस्टर
ध्यान से देखा
तो आइना सा लगने लगा|
 
ज़िंदगी की हकीकत परत-दर-परत खुलने लगी|
 
जब तक पिक्चर लगी है
तभी तक पोस्टर, पोस्टर है,
उसके बाद गन्दगी
जिसके ऊपर चस्पा हो जाता है
एक और पोस्टर|
 
सैंकड़ों लोग दिखाई देते हैं
सड़क पर चले जाते हुए
दफ्तरी फ़ाइल पर नजरें जमाए हुए –
नीरस आँखों में श्रृंगार खोजते हुए,
वे भी तो पोस्टर ही हैं|
 
यद्यपि चलते हैं, फिरते हैं,
फिर भी चिपके हैं|
 
न जाने कब चित्र उतर जाए
और घूरे पर फेंक दिए जाएँ|
 
बहुत से चित्र बने हैं उन पर –
आँखों से शरारे बरसाता नौजवान,
कमर झुकाए गिड़गिड़ाता बुढ़ापा,
आसमान में उड़ता परिंदा,
...और भी बहुत कुछ,
जो होते हुए भी नहीं है,
या नहीं होते हुए भी है|
 
बिल्कुल स्वप्न की तरह
 जिसे किसी ने दीवार पर चिपका दिया हो|
 
 
 

Monday, March 14, 2016

सिसकियाँ

धमाके की आवाज़...
साथ ही कुछ तड़तड़ाहट... तड़ाक् तड़...
शायद कुछ टूटा है...
मंदिर? ...मस्जिद? ...गुरद्वारा?
नहीं... एक पहचान, एक संस्कृति, ज़िंदगी की पहचान।
फिर धमाका.... धमाके
साथ ही कुछ चीत्कार... कराहें
शिशु का क्रंदन...
शायद कोई मर रहा है... 
हिन्दू? मुसलमान? सिख?
नही... सदियों की क्रमागत उन्नति की पहचान
अट्टहास...
साथ ही रणनाद, हुंकार और तालियों की आवाज़ें...
शायद कोई हँस भी रहा है...
शत्रु? पड़ौसी? ...?
नहीं...
हमारा इतिहास... भविष्य...
हमारे वर्तमान पर
क्रूरता की हँसी...
उस हँसी के पीछे
कभी कभी सिसकियाँ
सिसकते मूल्य... जर्जर आस्थाएँ
साल-दर-साल
लाल किले पर फहराए जाते झंडे
...निरर्थक झंडे
कभी-कभी उभर आते हैं
सिसकियाँ बनकर
 
 
चित्र www.huffingtonpost.com www.gettyimages.de से सभार

Thursday, March 10, 2016

रात कभी...

कभी...
हुमककर खेलती रही
सितारों के घुँघरुओं को उछाल-उछाल
लालच देता रहा अन्धेरा
चमकीली गेंद का|
 
कभी...
एक कोने से दूसरे कोने तक
भागती रही आसमान के,
थक कर चूर पसीने में लथपथ
भिगोती रही पुलकती घास को|
 
कभी...
धरती की फ़ैली हथेली पर
छू-छूकर पोरवे, गा-गाकर
सिखाती रही गिनती और पहाड़े
आवारा घूमते झींगुरों को|
 
कभी...
बेसुध खानाबदोश शराबी को
काँधे का सहारा दिए, लड़खड़ाती सी
अँधेरे में चेहरा छुपाए
नि:शब्द सामने से गुजर गयी|
 
कभी...
पाँवों से लिपटे सर्पिल रास्तों की
उलझी गुलझटें सुलझाने में मग्न
सुबह का जलता किनारा
खो-खोकर पाती रही, जागती रही|
 
रात कभी...
 
 
चित्र से fineartamerica.com साभार

Saturday, March 5, 2016

सीधे का मुँह कुत्ता चाटे

आज कोई किस्सा या व्यंग्य नहीं, एक नेक आदमी की जीवन-गाथा सुनाता हूँ जिसे अपनी दयालुता के परिणाम स्वरूप ‘दमनकारी’, ‘असहिष्णु’, ‘निरंकुश’, ‘शोषक’ और ‘अत्याचारी’ आदि उपाधियों से नवाजा गया|
 
हमारे एक मित्र हैं, चकौड़ी दास| नाम फटीचर सा लगता है लेकिन बताते हैं कि उनका खानदान काफी ऊँचा था| मौहल्ले में अच्छा-खासा रुतबा था| देहरी पर दिन में भी दीपक जलता था| सोच-विचार, चिंतन-मनन चला करता था| गए वक्तों में उस खानदान के कब्ज़े में अच्छी-खासी जमीनें थीं, पर जमाने की बद-नजर ऐसी लगी कि सब जाता रहा| कुछ इसलिए चला गया कि संभाल नहीं सके और कुछ इस लिए निकल गया क्योंकि बेगैरत अड़ौसी-पड़ौसियों ने दबा लिया था| तिजोरियों में छेद हो गए और हीरे-मोती, सोने-चाँदी समेत सब माल-मत्ता उन छेदों से रिसकर दांये-बाएँ हो गया| किस्मत का फेर, पोतड़ों के रईस दर-दर के भिखारी हो गए|
 
अब तो चकौड़ी दास जी की उम्र काफी हो गयी है| तजुर्बों की गठरी कमर पर लादे घूमते हैं| ज़िंदगी भर तरह-तरह के काम किये; बंधुआ मजूरी से लेकर व्यापारी की मुनीमी तक| कभी पीठ पर मालिक के कोड़े खाकर चिलचिलाती धूप में पानी-पानी पुकारते हुए मुँह के बल जमीन पर आ गिरे तो कभी पुलिसिया लाठी-डंडों की मार खाकर गोलियों से भूने जाने से बाल-बाल बचे| यूँ तो पढ़े-लिखे समझदार थे, लेकिन जीवन के आदर्श और मूल्यों के चक्कर में सारी समझ गवाँ बैठे और जाहिलों की सी जिन्दगी भी बिताई| रुपये-धेले का भी कोई ठिकाना न रहा सो दाने-दाने को मुँहताज हो गए| हालत यहाँ तक गिर गयी कि यदि दो पैसे मिल गए तो अधपेट रोटी खाई, परिवार को भी कुछ खिला दिया और अगर दु:खों का मारा कोई मेहमान आ गया तो दो निवाले उसके मुँह में डाल दिए| कुछ नहीं मिला तो कोरा पानी पी कर सो लिए|
 
चौदह बरस में घूरे के भी दिन फिरते हैं, उनके भी फिरे| समय सुधरा, चार पैसे हाथ में आये तो छोटा सा छप्पर छा लिया| एक कोने में कच्चा चूल्हा बना लिया| सुबह-शाम धुएँ की गंध वातावरण में फैलने लगी| बालक-बच्चे पाठ याद करते दिखाई देने लगे| खुद भी चार किताबें खरीद लाये और फिर से पढ़ने-लिखने का शौक फरमाने लगे| पैरों में जूता और तन पर कपड़ा जमने लगा| स्थिति कुछ और सुधरी तो एक चरखा खरीद लाये और उस पर सूत कात-कात कर कुछ अतिरिक्त कमाने लगे|
 
यह उन दिनों की बात है, जब जीवन में भारी उथल-पुथल चल रही थी| साँझ ढले, आस-पास की दुनिया से बेखबर अपनी ही धुन में पाँव घसीटते हुए घर की तरफ लौट रहे थे| सड़क के बीचो-बीच पड़े हुए एक पिल्ले पर नजर पड़ी| इतना कमजोर कि चलना-फिरना तो दूर रिरिया भी नहीं पा रहा था| चेष्टा से भूखा और जमाने भर का दुत्कारा हुआ लग रहा था| उसकी हालत देख कर हृदय द्रवित हो गया| पिल्ले के पास पहुँचे और तेज रफ़्तार से आते वाहनों से बचाने के लिए उसे उठाकर सड़क के किनारे रख दिया| कुछ क्षण उसे देखते रहे फिर अपनी राह लगे| चलने को चल तो दिए लेकिन मन नहीं माना| उसकी सुरक्षा को लेकर मन में चिंता जाग उठी| एक बार फिर ठिठके और अगले ही क्षण उसकी ओर लौट पड़े| करुणा के साथ उसके हडैल ढाँचे पर हाथ फेरा तो वह भी कुछ चेतन हुआ| पहले कुंकुआया फिर आश्वस्त होकर उनका हाथ चाटने लगा| अब पिल्ले को सड़क पर मरने के लिए छोड़ देना संभव न था| उन्होंने उस मरगिल्ले जानवर को हाथों में लिया, कुछ क्षण इधर उधर देखा और फिर उसे उठाए-उठाए घर की राह लगे|
 
थोड़ा आगे बढ़े ही थे कि छोटे-छोटे कुछ और पिल्ले कियाँ-कियाँ करते उनके पीछे लग लिए| जब तक घर के दरवाजे तक पहुँचे पिल्लों की गिनती काफी बढ़ चुकी थी| अब क्या किया जाए? परेशानी यह थी कि न तो इतने पिल्लों को पालने की जगह थी और न ही बूता| दरवाजे पर खड़े शरणागत को भगाया नहीं जा सकता| जीवन के मूल्य इसकी अनुमति नहीं देते| स्थिति विकट हो गयी थी लेकिन आत्म-बलिदान के द्वारा उसे सँभाला जा सकता था| सोचने लगे कि यहाँ तो अपना ही पेट भरने का ठौर नहीं है लेकिन चलो, देखी जाएगी| जो मिलेगा उसे नन्हें श्वान-शावकों के साथ बाँट लेंगें|
 
आदमी का घर होता है तो ज़ाहिर सी बात है कि उसका पड़ौस भी होता है| पड़ौस होता है तो पड़ौसियों वाले गुण भी होते हैं| अपने घर में क्या चल रहा है, इससे अधिक यह जानने की इच्छा होती है कि बराबर के घर में क्या चल रहा है| दूसरे के घर में टांग अड़ाना प्रत्येक प्रतिवेशी का परम कर्त्तव्य होता है| चकौड़ी दास के पड़ौसी कहीं चाँद से तो आये नहीं थे| रहने वाले इसी धरती के थे, सो एक-एक कर यह पता लगाने के लिए आने लगे कि पिल्लों की फ़ौज पैदा कहाँ से हो गयी| और पिल्ले भी कैसे; लाल, पीले, भूरे, सफ़ेद, काले, चितकबरे और दूसरे-दूसरे मिलवा रंगों के पिद्दी से दिखने वाले जानवर जो अपनी दुम पिछली टांगों के बीच दबाये विस्मित और स्तब्ध से खड़े थे; एक-दूसरे से सटे हुए, एक-दूसरे को धकियाते हुए, एक-दूसरे की गर्दनों पर अपनी थूथन टिकाये हुए ओर खीसें निपोरते हुए| उनकी आँखों में याचना और स्वर में रक्षा की गुहार थी| इस समय सिर्फ रोटी की फ़िक्र थी| इसे अतिरिक वे और कुछ भी न चाहते थे|
 
पड़ौसी अभी भी एक तरफ खड़े तमाशा देख रहे थे| दरवाजों के पीछे, दीवार के कोनों में, आलों में, चहबच्चों में और अन्य संभावित-असंभावित प्रदेशों में छोटे-छोटे झुण्ड बने हुए थे| पिल्लों की काँय-काँय कुछ कम हुई तो एक-एक कर चकौड़ी दास के पास आने लगे| आते थे, पूछते थे कि इतने सारे पिल्ले कहाँ से ले आये? क्यों ले आये? इनके साथ क्या करने का विचार है? जवाब में चकौड़ी दास विस्तार में पिल्लों को पाने की घटना सुनाते थे| पड़ौसी आश्चर्य प्रकट करते और फिर चलते-चलते कुछ-एक सलाह थमा जाते थे| कोई कहता कि कहीं से ईंट और पुआल लाकर इनके लिए छोटे-छोटे घर बना दो| कोई समझाता कि इन्हें टाट से ढक कर रखो जिससे ठण्ड से बचाव हो सके| कोई बताता कि इन्हें प्रशिक्षण देकर समझदार बनाओ| कोई सम्मति देता कि इन्हें नहला-धुलाकर स्वच्छ बनाओ| कोई इंजेक्शन लगवा कर उनका स्वास्थ्य सुनिश्चित करने की तजवीज सुझाता तो कोई प्यार से दुलारने परामर्श देता| छोटे से घर में सलाहों की संभाल करना मुश्किल हो गया| होते-होते स्थिति यहाँ तक पहुँच गयी कि चकौड़ी दास हतबुद्धि होकर दुविधा में पड़ गए कि पिल्लों को संभालें या सलाहों को| वैसे चकौड़ी दास भी उन पिल्लों के लिए सब करना चाहते थे लेकिन उनके पास साधन कहाँ थे! यहाँ अपनी ही रोटी के लाले पड़े हुए थे, ऊपर से इन नन्हें बेजुबान जानवरों की जिम्मेदारी भी आन पड़ी|
 
चकौड़ी दास दयालु आदमी ठहरे| घर के भीतर गए और जो भी खाने योग्य सामग्री थी, उठा लाये| छोटे-छोटे टुकड़े करके भूखे प्राणियों के सामने डाल दिया| सबने बड़े प्रेम से खाया| कोई लड़ाई-झगड़ा नहीं, कोई छीना-झपटी नहीं और कोई वैमनस्य नहीं| एक-एक दो-दो टुकड़े अपनी थूथन में दबाए और किसी कोने में बैठ कर चबाने लगे| पेट भरा, थोड़ी तसल्ली मिली तो जगह के लिए खोज-बीन शुरू हुई| जगह मिली तो चकौड़ी दास के घर में अपना-अपना क्षेत्र चिह्नित करने के उद्योग में लग गए|
 
चकौड़ी दास ने किसी तरह मासूम दिखाई देने वाले जीवों के रहने का इन्तिजाम किया| इन्तिजाम बहुत अच्छा न था, लेकिन उन परिस्थितियों में उससे अच्छा हो भी न सकता था| पिल्लों के लिए दूध-बोटी की व्यवस्था नहीं हो पाई लेकिन चकौड़ी दास ने अपने हिस्से की रोटी से जैसे-तैसे उनके खाने की व्यवस्था की| उनका निश्चित राशन आरक्षित कर दिया| इसके अलावा कोई और प्रबंध उनके लिए न हो सका| पड़ौसियों ने इसे उत्पीड़न की पराकाष्ठा के रूप में प्रचारित किया|
 
पड़ौसी दुःख प्रकट करने लगे| कभी-कभी चकौड़ी दास पर कठोरता बरतने का आरोप लगाकर कोसते भी सुनाई देने लगे| धीरे-धीरे दूरदृष्टि-सम्पन्न पड़ौसियों ने अपने घर से लाकर रोटी के बासी टुकड़े चकौड़ी दास के पिल्लों के सामने डालने शुरू कर दिए| पिल्ले बढ़ने लगे| बालपन की लीलाएँ होने लगीं - उछलकूद करते, अपनी पूंछ पकड़ने की कोशिश में गोल गोल घूमते, एक दूसरे के पीछे भागते, कुर्सी-मेजों के पाँवें चबा जाते, नाश्ता जानकर चप्पल-जूतों का चर्वण कर जाते, दोनों पंजे जोड़कर उनपर अपना सिर टिकाकर गहन चिंतन में लीन हो जाते| समय बीता तो क्रमश: गुर्राना सीखने लगे| दांत दिखाकर नापसंदगी जताने लगे| अब चकौड़ी दास का घर उनके लिए छोटा पड़ने लगा था| कहने का मतलब यह है कि वक्त की चाल के साथ कदम मिला कर सरपट दौड़ते हुए चकौड़ी दास के पिल्ले, कुत्तों में बदलने लगे|
 
क्षुद्र जानवरों पर अत्याचार की खबर फ़ैली तो नगर के पशुप्रेमी भी गाहे-बगाहे छोटे-छोटे झुण्ड बनाकर छुट्टी के दिन आते, समझाते-बुझाते, नारेबाजी करते, धमकियाँ देते फिर भोजन का समय होने पर अपने घर लौट जाते| पशुओं की रक्षा के लिए चिल्लाने का अधिकार तो उनके पास था, लेकिन जिम्मेदारी हमारे मित्र चकौड़ी दास की ही तय थी|
 
कुत्ता मूलरूप से बड़ा वफादार जानवर होता है| वफादारी किसकी हो इस विषय पर कुत्तों में अक्सर मतभेद रहता है| कुछ मानते हैं कि मालिक की, कुछ का सोचना है रक्षक की, कुछ के विचार में सामने निवाला फेंकने वाले की तो कुछ के मत में जो पसंद आ जाए उसकी| यहाँ भी यही हुआ| कुत्ते भरमाने लगे कि वफादारी किसकी की जाए| उनका रखवाला, भोजनदाता, मालिक आदि सभी अलग अलग हैं| मामला पेंचीदा हो गया था| वे चकौड़ी दास के घर में रहते थे, उनकी रूखी-सूखी खाते थे लेकिन कभी-कभी पड़ौसियों के माल पर भी हाथ साफ़ कर लेते थे| आते-जाते लोग उनकी पीठ पर हाथ फेर जाते जिससे सड़क चलतों के साथ भी उनका स्नेह सम्बन्ध तैयार होने लगा था| एक दिन चकौड़ी दास की पतलून चबा डाली| उनका अधिकार क्षेत्र बढ़ता ही जा रहा था| एक अन्य अवसर पर चकौड़ी दास की मेहनत से कमाई गयी रोटी छोड़कर पड़ौसियों के डाले बिस्कुटों पर झपट पड़े| चकौड़ी दास को बुरा तो लगा लेकिन पशुओं की पशुता का नमूना समझकर शांत रह गए| सारी गड़बड़ी के बावजूद भी यह माना जाता था कि जब चुनाव का अंतिम समय आयेगा तब वे चकौड़ी दास के हक़ में भौकेंगे| लेकिन यहाँ तो मामला बलकुल ही उलट गया| उन्होंने गाहे-बगाहे चकौड़ी दास पर ही गुर्राना शुरू कर दिया| उन्हें शांत कराने की कोशिश की तो किसी ने कह दिया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाया जा रहा है|
 
कुत्ते पड़ौसियों के हो गए थे| दिनभर झोंपड़ी में आराम फरमाते और रात होते ही आसपास के घरों की रखवाली करने निकल जाते| एक दिन चकौड़ी दास अजीब ही परिस्थिति में पड़ गए| शाम के समय वे थके-हारे काम से लौटे तो कुतों ने उनके ऊपर भौंकना शुरू कर दिया| उनके लिए घर में प्रवेश करना कठिन हो गया| वे अपने ही घर में अनाहूत प्रवेष्टा के रूप में प्रचारित हो गए| कुत्ते चकौड़ी दास को घर का मालिक समझने से इनकार करने लगे| इसमें भी कोई दिक्कत नहीं थी| परेशानी की बात यह थी कि अब कुत्ते घर को अपना समझने लगे थे और चकौड़ी दास को पराया|
 

ऐसा भी नहीं था कि कुत्ते आपस में शांति से रहते हों| आपस में भी खूब किच-किच होती है| एक दूसरे पर झपटते हैं और आपस में ही लहू-लुहान होकर रह जाते हैं| चकौड़ी दास उनके बीच समझौता करने की कोशिश करते हैं तो सब मिलकर उन्हीं पर हमला बोल देते हैं| चकौड़ी दास कुत्तों को अनुशासित करने के लिए उन्हें डांट-फटकार देते हैं| यह खबर आम हो गयी है जिसकी वजह से उन्हें आजकल असहिष्णु कहा जाने लगा है|
 
आजकल चकौड़ी दास परेशान हैं| अपनी झोंपड़ी छोड़ नहीं सकते| घर कुत्तों को सौंपा नहीं जा सकता, अपने बाल-बच्चों की भी फ़िक्र है| कुत्तों को घर से निकाल नहीं सकते| पशु-रक्षकों का दबाव लगातार बना रहता है| अपना सम्मान दाँव पर लगा है| पड़ौसियों की ओर से कोई उम्मीद नहीं है| कुत्तों को जहर देकर मार भी नहीं सकते| कानून और सुव्यवस्था की जिम्मेदारी भी चकौड़ी दास को ही निबाहनी है|
 
अब उन्हें कौन समझाये कि जब अपना ही सिक्का खोटा हो तो परखने वाले का दोष नहीं होता|

 
 

Tuesday, March 1, 2016

बजट आ गया!

बजट को बचपन से आते देख रहे हैं|
 
जब छोटे थे तब समझते थे कि हो न हो कोई सर्कस जैसी चीज होती होगी जिसमें बन्दर-भालू का तमाशा चलता होगा| हाथी फुटबॉल खेलता होगा| चेहरे पर रंग पोतकर गोल टमाटर सरीखी नकली नाक लगाकर कोई जोकर तमाशा दिखाता होगा| लोग उछल-उछलकर वाह वाह करते हुए उत्साह भरी चीत्कार करते होंगे|
 
बजट को हमने सामाजिक परम्परा की तरह आकार लेते देखा है| हमारे पितामह बजट को अखबार में पढ़ा करते थे| जब वे छदामी लाल पहलवान को बादाम और घी महँगा होने की खबर सुनाया करते थे तो पहलवान दार्शनिक की भांति कह दिया करते थे कि चलो कोई बात नहीं अपनी गिजा में दो-चार दाने कम कर लेंगे| हमारे पिता रेडियो पर सुना करते थे| इनकम टैक्स की पटिया पर उनका ख़ास ध्यान रहा करता था| हमने टी वी पर देखना सीखा| जैसे-जैसे बड़े हुए वाशिंग मशीन, टीवी और फ्रिज की बढ़ती कीमतों से परेशान होना सीख गए| आजकल हमारी संतानें बजट को इंटरनेट पर जान लेती हैं| उनका पूरा ध्यान फोन और लैपटॉप से जुडी खबरों पर रहता है|
 
बजट आने के बाद क्या होता है ये तो बात छोड़िये| असली बात तो यह है कि जैसे-जैसे बजट का मौसम पास आता जाता है, तब क्या होता है| अपेक्षाओं के पहाड़ की तलहटी में मन-मृग किलोलें करने लगता है| उसे सारा जंगल हरा-भरा दिखाई देने लगता है| सभी को अपनी-अपनी नाभी में से कस्तूरी की गंध आने लगती है| जंगल महक उठता है|
 
बजट के आने की खबर से ही हिया बढ़ जाता है| आनंद की हिलोरें हृदय के समुद्र में एक के बाद एक आती हैं और मायूसी का कचरा जीवन के तट से धो जाती हैं| हर पल यही लगता है कि जीवन में बदलाव बस आने भर को ही है| बौराया मानस विवर्धन के संकेत पकड़ने में मगन हो जाता है| आशाओं की थरथराती लौ स्थिर होती सी प्रतीत होने लगती है|
 
आशा मानुष को अपने दास की तरह बना देती है| पगलाया सा मन इधर-उधर भागा फिरता है| उछाह उमग-उमग पड़ता है| भविष्य के स्वप्न हजार आँखों में दिप् दिप् करने लगते हैं| उम्मीदों की अठखेलियाँ शुरू हो जाया करती हैं| अंतस् का फागुन रंगों से भर जाता है| सारा संसार उजला-उजला सा लगने लगता है|
 
उजास संसार में ही नहीं नेत्रों में भी भरने लगता है| रात की कालिख फटने लगती है| चारों ओर विस्तृत प्रकृति के साम्राज्य में सुनहरे पुष्प खिलने लगते हैं| खुशबुओं की फुहार छोड़ती सकारात्मकता की बयार चित्त को मतवाला बनाने को आतुर हो जाती है| पग चंचल हो उठते हैं| विवेक कल्पनाओं पर बलिहारी होने लगता है|
 
तुम यह समझ ही नहीं पाते कि बजट न हुआ भानुमती का पिटारा हो गया जिसमें सबके लिए कुछ न कुछ होगा ही| यह बात ख्याल में ही नहीं आती कि अरे, होगा तो उनके लिए होगा जिनके लिए होना चाहिए| अपने लिए कुछ करना चाहते हो तो पहले खुद तो कुछ हो जाओ| चार आने की औकात नहीं और हिस्सा चाहते हो चार हजार करोड़ के बजट में| ये मुँह और मसूर की दाल| अब चलो भी, अपना रास्ता नापो!
 
सदियों से यह रीति चली आयी है कि अगर तुम्हारे पास पहले से ही कुछ है, तो और भी आयेगा और नहीं है, तो ठन-ठन गोपाल| राम भजन करो और मौज में रहो| पत्नी अक्सर कहती हैं कि घर खीर तो बाहर खीर| घर में खीर पैदा करो तो बाहर अपने आप खीर पैदा हो जायेगी| घर में दूध के लिए खूंटे पर चुहिया बाँधते हो और मजा भैसों के तबेले की गंध का लेना चाहते हो? वाह, भई वाह, बलिहारी इस विचार पर|
 
अब कुछ खिंचाव पैदा हुआ न दिल में! तो सुनो, बजट की वैतरणी को पार करने का एक तरीका यह है कि अपनी आवाज को दबा लो| सुना तो होगा ही कि एक चुप सौ को हरावे| अपने होठ सिलाकर बिल्कुल बेखबर हो जाओ| देखते रहो, समझते रहो लेकिन चुप रहो| समझ झरोखे बैठ कर जग का मुजरा लेव| नासमझी पर लानत है लेकिन समझदारी का तकाजा है कि चुप रहो| अपनी इन्द्रियों का दमन करो| अपने आप सुखी हो जाओगे| आयकर की सीमा नहीं बढ़ी तो क्या जान निकल गयी जो हो-हल्ला करना शुरू कर दिया| दो पैसे सर्विस टैक्स बढ़ गया तो क्या आसमान टूट पड़ा या मुसीबत का पहाड़ सर पर आ गिरा? जब आपस में एक दूसरे का गला काटते हो तो दिक्कत नहीं होती और अगले ने जरा सा तकुवा क्या चुभो दिया कि हाय-हाय करने लगे| सोने, चांदी, हीरे, जवाहरात पर टैक्स बढ़ गया तो बलवा शुरू करने की सोचने लगे जैसे हफ्ते में तीन बार सुनार की दूकान पर चक्कर लगाने की आदत पड़ी हुई हो| नकली रतन भी तो मिलते हैं, खरीद लाओ और चैन की बंसी बजाओ| हफ्ते में दो किलो आलू खरीदते मैय्या मरती है और सोने-चांदी को रो रहे हो|

किसी का रोना है कि तम्बाकू, सिगरेट के दाम बढ़ गए| इसमें बुराई क्या है? सिगरट कम पी जायेगी तो दवाई की जरूरत कम पड़ेगी| दवाओं के दाम बढ़ने के प्रभाव से बच जाओगे| पान खा-खा कर दाँतों पर जो रंगोली सजा राखी है उसे साफ़ करने के लिए मंजन की कम जरूरत पड़ेगी| वहाँ भी पैसे बचे| अनाज, दाल सब्जी, घी, तेल महँगा होने का प्रभाव तो गजब का है| एक परिचित होम्योपैथी के डाक्टर ने एक बार कहा था कि स्वास्थ्य का अचूक उपाय तीन शब्दों में गुँथा हुआ है – भूखा, रूखा और सूखा| उन्होंने इसका पूरा उपाय कर दिया है| स्वस्थ रहोगे साथ ही डायटिंग की जरूरत नहीं पड़ेगी| शरीर हल्का और फुर्तीला बना रहेगा| जिम जाने के जरूरत नहीं होगी| वहाँ के पैसे भी बचे| डीजल-पैट्रोल महँगा हो गया तो क्या? पैदल चलो और स्वास्थ्य बनाओ| ज्यादा जीवित रहोगे तो बजट की लीला को ज्यादा देख पाओगे| अनुभव में हिजाफा होगा| सोचो, मौहल्ले के खंखारते हुए बुड्ढों के बीच बैठकर सारी दुनिया को गरियाने का अवसर मुफ्त में ही मिल जाएगा| संक्षेप में कहूँ, तो थोड़ा सा सकारात्मक होने की जरूरत है, गरीबी की होने पर भी जिन्दगी मजेदार लगने लगेगी|

देखो, हमारा देश गरीबों का देश है| हमारी जोरू को सबकी भाभी कहलाने का गौरव प्राप्त है| सारी दुनिया हमारा लाभ उठाने को व्याकुल है| व्यास जी महाराज ने अठारह पुराणों में दो ही वचन कहे हैं – ‘परोपकाराय पुण्याय’ और तुम इस परोपकार के इस दिव्य अवसर का लाभ उठाने से बचने की सोचते हो| शर्म आनी चाहिए| अपने मान-अपमान की बात मत सोचो| हम तो बेदान्ती महापुरुषों की संताने हैं| मानापमान से ऊपर उठना हमारे जीवन की सार्थकता है| वैसे भी सयाने कह ही गए हैं, “गरीबी तेरे तीन नाम – झूठा, पाजी बेईमान|” आज के जमाने में ये तीन ही तो मौज की काटते हैं| तुम्हें ये तीनों गुण जिन्हें जीवन-शास्त्रियों ने सब से बढ़कर माना है, अनायास ही मुफ्त में मिले जाते हैं और तुम नखरे दिखाते हो| मुफ्त की चीज तो अगर मल में भी पड़ी मिल जाए तो उठा लेनी चाहिए और तुम्हें तो माशाल्लाह जिन्दगी के मॉल में मिल रही है|

अब कहोगे कि जिन्दगी को मॉल क्यों कहा? तो सुनो, मॉल में जाओ तो चारों तरफ जगमगाती लाइटों के पीछे एक से एक जबर सामान लगा दिखाई देता है| अपना नहीं होता लेकिन होता तो है| जनता वहाँ जाती है, खूब आँखें सेकती है और तेरह रुपये में लोकल बस का टिकट खरीद कर घर लौट आती है| दिल-ओ-दिमाग में महंगे और ब्रांडेड सामान की याद अंकित हो जाती है| वस्तुएँ अपने घर में नहीं होतीं, लेकिन अपनी हो जाती हैं| बस यही कहानी जीवन की भी हुआ करती है| इसीलिए जिन्दगी को मॉल कहकर पुकारा है, समझे! तो बात हुई कि मौज लो और रोज लो, न मिले तो जिन्दगी के मॉल में खोज लो|

मौज में रहना है तो उसका एक रामबाण उपाय तो मैं बता सकता हूँ और बाकी उपाय उसी लाइन पर सोचते हुए तुम स्वयं पा सकते हैं| सीधा सिद्धांत है; इच्छाएं, आशाएं और आवश्यकताएँ नियंत्रण में रखो| बिना किसी फल की इच्छा के काम करो| फल की इच्छा बलवती होने लगे तो उसकी दिशा ताकतवर लोगों की तरफ मोड़ दो| दिल में कोई मलाल न रहेगा| किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं होगी| जीवन में रहते ही जीवन-मुक्त हो जाओगे|
 
तुम लोग समझते क्यों नहीं कि ईश्वर ने जीवन-मुक्ति का कितना सरल उपाय तुम्हारे लिए संभाल कर रखा है| कलियुग में जो एक मात्र सदुपाय मानव को मिला है वह यही है| क्या लगता है कि पिछले तीन युगों में मोक्ष, निर्वाण और जीवन-मुक्ति को इतना कठिन क्यों माना जाता था? नहीं समझे! भई, सीधी सी बात है, उन दिनों बजट का प्रावधान नहीं था| बजट का प्रावधान नहीं था इसलिए तपना पड़ता था| तप-तप कर सोना बनना पड़ता था| आज कल तो वह झंझट है ही नहीं| बजट प्रभु की कृपा से सशरीर स्वर्ग का विचरण करने का अच्छा अवसर हाथ लग जाता है|
 
अगर यह विचार दिल को नहीं भाता है, तब ध्यान से यह प्राचीन कथा सुनो| एक समय था जब गुरु विश्वामित्र ने त्रिशंकु को सीधे स्वर्ग भेजने का जुगाड़ कर दिया था| वह पहुँच भी जाता अगर वसिष्ठ महाराज ने भाँजी न मार दी होती| ऐसा झंझट पैदा किया कि अगला न इधर का रहा न उधर का| लटक गया अधर में| माना कि आजकल भी विश्वामित्र और वसिष्ठ अनेक रूप होकर बजट-यज्ञ में बैठते हैं| देवताओं को हवियाँ देते हैं| स्तुतियाँ गाते हैं| अंगरेजी में ढाई-तीन घंटे का मन्त्रजाप करते हैं| सवा सौ करोड़ त्रिशंकुओं को सशरीर स्वर्ग पहुँचाने और पहुँचने से रोकने की साजिश रचते हैं| लेकिन है तो संख्या में तुमसे कम ही| अपनी संख्या का रुआब दिखाओ तो सही| अपने लिए नए स्वर्ग की नींव डालो तो सही| वे सारे ऋषिगण अपना कमंडल हाथ में लेकर दाढ़ी फटकारते हुए तुम्हारे पीछे-पीछे आने लगेंगे|
 
लेकिन यह बात साफ़ है कि ऐसा होगा नहीं| तुम बहुत जल्दी सब भूल जाते हो| अतीत में हुआ कदाचार तुम्हारे दिमाग से निकल भागता है| याद ही नहीं रहता कि तुम सब तो उनके लिए पूर्णाहुति का श्रीफल हो जिन्हें वे एक-एक करके हवनकुंड की पवित्र अग्नि में डालते रहेंगें और फल का भोग करते रहेंगें| यह बात तुम हर बार पांचवा साल आते-आते भूल जाते हो| तुम कुंड तैयार करते हैं और फिर स्वयं को उन्हें सौंप देते हो, समिधा और सामग्री के रूप में, जिन्हें वे स्वाहा-स्वाहा बोलकर अपने देवताओं को बलि के रूप में भेंट करते हैं और याग का अक्षय फल भोगते रहते हैं|
 
भूलना एक महत्वपूर्ण कुशलता है| इस कुशलता को साधने में जीवन व्यतीत हो जाया करता है| मालिक की कृपा से तुम्हें तो यह आदत बचपन से ही पड़ गयी है| जब भूलने की क्रिया सिद्ध हो ही गयी है तो उसका अपने लाभ के लिए उपयोग क्यों नहीं करते? बीते पर मिट्टी डालो और हर दगाबाजी को यह सोच कर सह जाओ कि यह पहली ही है| दूसरों के लिए भूल सकते हो लेकिन अपने लिए नहीं भूल सकते, पाखंडी हिप्पोक्रेट कहीं के|
 
चलो, बहुत हुआ| कागज़ पैन लेकर बैठो और हिसाब लगाओ कि इस साल किस-किस जिन्स में कटौती करनी है| अभावों का उत्सव मनाने की तैयारी करो| मन के दरके हुए दर्पण की तरेर छिपाने के लिए उस पर रंगीन कागज़ चिपकाने की व्यवस्था करो|
 
और कुछ नहीं कर सकते तो जिस-तिस को कोसते हुए अगले साल के आम बजट की राह देखो|
 
तब तक के लिये, राम राम!

चित्र www.economist.com से साभार