अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Monday, February 8, 2016

अलविदा निदा!


अलविदा निदा!
 
बहुत याद आओगे, मुक्तदा हसन फाज़ली!
 
कौन जानता था कि जब तुम मंदिर के बाहर खड़े हुए सूरदास के पद सुन कर गोपियों की विरह पीड़ा पर आँसू बहा रहे थे, उसी समय तुमने करोड़ों लोगों के दिलों में अपनी जगह बनाने की शुरुआत कर दी थी!
 
दुनिया लड़ रही है, झगड़ रही हैं और बच्चों को रुला रही है ऐसे में मस्जिद का रास्ता छोड़ कर उन्हें हँसाने वाला अज़ीम शायर अब दूसरा कहाँ से आयेगा, निदा!
 
तुमको रुखसत तो कर दिया लेकिन सच में यह पता न था कि घर छोड़कर जाने वाला सारा घर अपने साथ ही ले जाएगा| तुम बहुत याद आओगे, तुमसे ज़्यादा तुम्हारी मुस्कान याद आयेगी और तुम्हारी मुस्कान से भी ज़्यादा तुम्हारी बात याद आयेगी -
 
दीवार-ओ-दर से उतर के परछाइयाँ बोलती हैं
कोई नहीं बोलता जब तनहाइयाँ बोलती हैं

अब कौन उजड़ी हुई बस्तियों में आबादियों की बात सुनेगा? कौन निगाहों में इंतज़ार रखने की खूबसूरत सलाह देगा? कौन हिम्मत देगा कि चुप-चाप सुनना बंद करो और एक बार हिम्मत करो गलत के लिए नहीं कहने की? तुम्हारा बात कहने का तरीका, तुम्हारी लोच, फकीरों जैसी जिन्दगी और सादगी अब कहाँ मिलेगी? तुम चले गए तो ऐसा लगा कि एक खालिस हिन्दुस्तानी चला गया! इंसान की इंसानियत के गीत गाने वाली सुरीली आवाज़ चली गयी| बहुत बड़ी सोच चली गयी जो यकीनन बाज़ार में बिकने के लिए बड़ी नहीं बनी थी|
 
गए तो गए पर क्या खूब कह गए -
 
किसी घर के किसी बुझते हुए चूल्हे में ढूँढ उसको
जो चोटी और दाढ़ी में रहे वो दीनदारी क्या
 
इश्क का मसीहा चला गया| तुम सा महबूब शायर चला गया|
 
जुर्रत का अर्थ समझते-समझाते वो दिलेर चला गया जिसने कहा –
 
दिल में ना हो ज़ुर्रत तो मोहब्बत नहीं मिलती
ख़ैरात में इतनी बड़ी दौलत नहीं मिलती
कुछ लोग यूँ ही शहर में हमसे भी ख़फा हैं
हर एक से अपनी भी तबीयत नहीं मिलती

ज़्यादा कुछ कहा नहीं जा रहा| दिल ग़मज़दा है, आँखें नम है, हाथ कांप रहे हैं और समझ बेबस है|
 
अलविदा निदा!
 

चित्र http://www.bbc.com से साभार|

5 comments:

  1. Dear Sir,
    It was dis-heartening to hear about a loss to the nation. A poet's death is always morned by all and your tribute to Fazli explains it all.
    In memory of Nida Fazli-
    अपना ग़म ले के कहीं और ना जाया जाए
    घर में बिखरी हुई चीज़ों को सजाया जाए
    जिन चिरागों को हवाओं का कोई खौफ नहीं
    उन चिरागों को हवाओं से बचाया जाए
    बाग़ में जाने के आदाब हुआ करते हैं
    किसी तितली को न फूलों से उड़ाया जाए
    खुदखुशी करने कि हिम्मत नहीं होती सब में
    और कुछ दिन यूँ ही औरों को सताया जाए
    घर से मस्जिद है बहुत दूर चलो यूँ कर लो
    किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए

    Rest in Peace!

    ReplyDelete
    Replies
    1. Thank you, Ritzy. It was a sheer privilege for our generation to see the work of a poet like Nida Sahab.

      Delete
  2. प्रिय शायर के जाने से बहुत दुःख हुआ ,हमारे दिलों में उनका स्थान चिर स्थायी है | ईश्वर उनकी आत्मा को शांति दें - उनकी कुछ पंक्तियाँ -
    किसी को मुकम्मल जहाँ नहीं मिलता
    कहीं ज़मीन तो कहीं आसमान नहीं मिलता

    जिसे भी देखिये वो अपने आप में गुम है
    ज़ुबाँ मिली है मगर हमज़ुबाँ नहीं मिलता
    कभी ...


    तेरे जहाँ में ऐसा नहीं कि प्यार न हो
    जहाँ उम्मीद हो इसकी वहाँ नहीं मिलता
    कभी ...
    तुमको रुखसत तो कर दिया लेकिन सच में यह पता न था कि घर छोड़कर जाने वाला सारा घर अपने साथ ही ले जाएगा| तुम बहुत याद आओगे, तुमसे ज़्यादा तुम्हारी मुस्कान याद आयेगी और तुम्हारी मुस्कान से भी ज़्यादा तुम्हारी बात याद आयेगी -

    ReplyDelete
    Replies
    1. मिश्र जी, मैं जानता हूँ कि निदा फ़ाज़ली और मुनव्वर राणा आपके प्रिय शायरों में से हैं| निदा साहब के जाने के आपके दुःख को मैं समझ सकता हूँ|

      Delete
  3. अत्यंत हृदयस्पर्शी प्रविष्टि!!
    उनका जाना विश्व साहित्य की ही क्षति नही अपितु भारत की आत्मा के एक हिस्से के विदा होना है. मेरी शब्दांजलि यहाँ देखें:
    http://www.securespeak.org/%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%A6-%E0%A4%B9%E0%A5%8B-%E0%A4%9C%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%BE-%E0%A4%8F%E0%A4%95-%E0%A4%B0%E0%A5%8B%E0%A4%B6%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%A8-%E0%A4%95%E0%A4%BE/

    ReplyDelete