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Sunday, February 7, 2016

मनु स्वामी का कविता-संग्रह

बादलों के सुराख से निकलती धूप की लकीर सी कोमल और प्राणमयी है, मनु स्वामी की कविता| वह झर-झराकर धारासार नहीं बहती बल्कि, वह तो किसी विशाल पर्वत के पथरीले कोने से रूह को सुकून देने वाले बूँद-बूँद टपकते मीठे पानी के परनाले जैसी है|

मनु स्वामी जनपद मुज़फ्फर नगर के खूब पढ़े जाने वाले वरिष्ठ (यद्यपि वे स्वयं के लिए इस विशेषण का प्रयोग करने के हिमायती नहीं हैं, तथापि मैं तो टिप्पणीकार के अधिकार से इसका प्रयोग कर ही सकता हूँ|) कवि हैं| ‘दीवार में पीपल’, ‘शब्द-संवाद’, ‘बहती है कविता’, ‘बक्से में धूप’, और ‘आकाश की देह पर’ के क्रम में प्रकाशित नवीनतम संग्रह ‘सफ़र में हूँ’ देखने को मिला| संग्रह में अट्ठाईस कविताओं को शामिल किया गया है| एक विलक्षणता जो पहली ही दृष्टि में सामने आती है, वह यह है कि सभी कविताएँ एक ही भाव-तंतु से आपस में जुड़ी हुई हैं| अगर उन्हें थोड़ा आगे-पीछे करके एक क्रम में व्यवस्थित कर दिया जाए तो वे अनायास ही एक बड़ी कविता में बदल जायेंगी|

कविता की सरलता और प्रभावशीलता का सुन्दर समन्वय संग्रह में प्रकाशित प्राय: सभी रचनाओं में स्पष्ट दिखाई देता है| अगर कोई कविता के कड़कपन का हामी है या कविता में उसकी बेरहमी और धृष्टता को खोजता हैं, तब यह संग्रह उसके लिए नहीं है| कवि वायव्य विचारों और आकाशीय कल्पना से परहेज करता दिखाई देता है| दोमुँही और पाखंडपूर्ण दार्शनिकता उसे प्रभावित नहीं करती| वह अपने आस-पास के परिवेश को और उस परिवेश में निर्बद्ध छोटी-छोटी वस्तुओं को देखता-परखता है| कवि को अक्टूबर, ९५ के आखरी दिनों में खरीदे ‘स्कूटर’ में भी कविता दिखाई देती है और दुनिया के हाल-चाल का पुलिंदा लेकर घर-घर पहुँचते ‘अखबार’ में भी| तिनके से कमतर होने पर भी फौलाद सा हौसला रखती ‘चींटियाँ, भी कवि के कवित्व की उत्प्रेरक हैं और सड़क के किनारे मिट्टी की दीवारों पर आशियाना बना लेने वाले ‘बागड़िये’ भी| उसकी दृष्टि की सूक्ष्मता गज़ब की है| वह कभी भी सतह को बेरहमी से तोड़ता नहीं, बल्कि स्वयं पूरी ईमानदारी से सतह का हिस्सा बनकर भीतर की तहों में दाखिल हो जाता है, चारों ओर भरपूर दृष्टि डालता है और लिखता है,

गुंजाइश / कहाँ रही / घरौंदों की?
गलियारे सा / बीघों में फैला / तट|
रास्ता / भूल गए हैं / चौपाये|
(काली नदी)

कवि घर में या घर के बाहर भी अस्फुट स्वरों में बातचीत करते, चहलकदमी करते या कभी-कभी थक कर बैठ गए लोगों को चुपचाप देखता है, उनकी शरीर-भाषा समझाने का प्रयत्न करता है, उनके स्वर को पहचानने का प्रयास करता है और फिर धीरे से उनका चित्र खींच लेता है| कविता के कैनवास पर उनके रंग उभारता है, वजूद के मूलभूत चिह्नों को कभी छोटे, तो कभी बड़े परिमाण में विस्तारित करता है| जिन्हें पहले भी कईं बार देखा गया होता है, वे भी इत्तफ़ाक से नए से लगने लगते हैं| चरित्र एक-एक कर प्रतीकों के रूप में खिलने लगते हैं| कमाल की बात यह है कि माध्यम से संपृक्त होते हुए भी कवि मूल-तत्व से असम्पृक्त ही रहता है और प्राय: ‘जजमेंटल’ नहीं होता| वह उन्हें अच्छा या बुरा साबित नहीं करता, बस उनकी ओर ध्यान आवर्जित कराता है| जय-रामजी कर एक झटके में फूहड़ बड़ेपन की खुमारी उतार देने वाली ‘कामवाली’, गून्दे को सहलाकर पात्र घड़ता दलमीरा ‘प्रजापति’, उजास से भरी आँखों वाली पक्की ‘सहेली’ खजानी, चुटकी भर खुशी ढूँढते पिता ‘रघु’, शीत से कराह रही सवारियों को देखकर खिल उठता ‘चायवाला’ और कबीराना अंदाज़ से जीवन बिताने वाला ‘बावरा’ जैसे पात्र यथार्थ से भी बढ़कर सत्य प्रतीत होने लगते हैं| उनके माध्यम से कवि ने अधुनातन दुष्प्रवृत्तियों की खूब खबर ली है| एक निदर्शन देखें,

पैर की / हड्डी टूटी / तो बेटे के पास / जाना पड़ा / स्टेशन से ही / किराए के घर में / पहुँचा दिए गए / रघु |
(रघु)

मनु स्वामी स्मृतियों के कवि हैं| उनकी कविता में यादें एक के बाद छोटी-बड़ी, फीकी-रंगीन, यांत्रिक-भावभीनी, कटी-फटी तो कुछ साबुत नई-नकोर कटी पतंगों की तरह लहरातीं, हिचकोले खातीं और कईं बार अपनी बेढब गति से गोते खातीं सी आगे निकल जाती हैं| उन्हें थामना कठिन लगता है| कवि स्वयं उन्हें पूरी तरह पकड़ने का उद्यम करता प्रतीत भी नहीं होता वह तो केवल अलग अलग कोणों पर उनकी कुछ झलक लेता है| एक उदाहरण द्रष्टव्य है,

कंक्रीट उगा / तो कड़ियों के साथ / विदा हो गई / चिड़िया|
(चिड़िया)

एक और देखें,

नया देश / घर-परिवेश / जान की / सलामती / तो मिली / बड़ों की / ठंडक भरे / घर में / निम्बोलियों की / महक के साथ / मंजी पर ली / मीठी नींदें / फिर कहाँ ले पाए?
(बँटवारा)

कवि प्रकृति के विविध आयामों को भी अपनी कविता में समेटता चला है| प्राविधि वही प्रतीकात्मकता की ही रही रही है जिसका मैं ऊपर उल्लेख कर आया हूँ| प्रकृति का वर्णन मात्र करने के लिए प्रकृति को नहीं छुआ गया है| कवि ने बिम्ब प्रस्तुत किये हैं, उपमान प्रस्तुत किये हैं; लेकिन उनकी अपनी व्याख्या भी की है| बिना गुडाई-निराई के अपना अस्तित्व बना लेती ‘दूब’, दिग-दिगन्तर तक फैल कर आमंत्रण देती मादक गंध वाली ‘प्रकृति’, बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गैरजरूरी उत्पाद सी रजाई में घुस आती ‘सर्दी’, देह-मन को चम्पा-चमेली-गुलाब बनाने को आतुर ‘वसंत’, माँ सा मन होने के कारण विनाश करने से थमी ‘काली नदी’ जैसे प्रकृति के अनेक आयाम दिखाई देते हैं| एक उदाहरण देखें,

आवारगी में / मशगूल होता है / जब सूरज / तो वह / ठुनकती / ना-नुकुर का / अभिनय करती / क्रीडारत / हो जाती है / मन में / आ बसे / प्रवासी के / पहलू में / आकर|
(प्रकृति)

लेखक अपने समय से जुड़ा है| उसका दर्द वह अपना बना लेता है और लिखता है,

ईराक / और सीरिया की देह / जब रौंद रहा था / अन्धेरा / प्रशंसकों द्वारा / लगाया जा रहा था / हिसाब / कितना बाकी है / रौंदा जाना|
(उजाला)

लेखक ने स्वाभाविक रूप से जहाँ-तहाँ रूपक और उपमा का प्रयोग किया ही| भाषा में कस्बाई गंध लगातार बनी रहती है| देशज शब्दों का विशेष रूप से ‘अन्नदाता’ में समीचीन प्रयोग हुआ है| यदाकदा कवि कविता सुनाने के स्थान पर कविता समझाता सा प्रतीत होने लगता है| संभवत:, यह कवि के कविता के प्रति अनन्य राग का परिणाम है| लेकिन, पाठक के दृष्टिकोण से कहूँ तो उसके लिए अर्थ संकुचित होकर रह जाता है| कविता पढ़ते हुए वाक्यों का सूक्ष्मातिसूक्षतम होता जाता विच्छेद भी कभी-कभी धारा बनने नहीं देता, इसलिए मैं तो शब्द या वाक्यांश के स्थान पर पूरे वाक्य ही पढ़ता चला जाता हूँ|

चूँकि बात ख़त्म भी करनी है, मनु स्वामी का काव्य-संग्रह ‘सफ़र में हूँ’ काव्य-रसिकों के लिए सुन्दर उपहार है| वे धारणा से अधिक भावना और संवेदना की बात करते हैं, तर्क की बात करते हैं लेकिन विश्वास को भी खारिज नहीं करते, किसी बड़े-बुजुर्ग के तजुर्बे सुनने जैसा अपनेपन का अहसास कविताओं को पढ़ते हुए लगातार होता रहता है| यह पुस्तक निश्चित रूप से किसी भी कविता-प्रेमी के संग्रह को समृद्ध करेगी|

और, अब अंत में मेरी सबसे प्रिय कविता –
 
अहसास की
कलम से
लिखा था
मन का पोस्टकार्ड|
मिला?
या बदल गया है
तुम्हारा पता?  
(तुम्हारा पता)

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