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Thursday, February 11, 2016

किशन सरोज: भावनाओं का कवि

आज डा. प्रदीप जैन के फेसबुक टाइमलाइन पर सुकवि किशन सरोज के गीत का उल्लेख देखा| गीत का उल्लेख क्या देखा... ऐसा लगा जैसे करीब बीस बाईस बरस पुराना समय ही देख लिया हो|

कितने ही चेहरे, कितनी घटनाएँ और शहर के कितने ही कोने आस-पास बिखरे से महसूस होने लगे|

वर्ष तो याद नहीं लेकिन सर्दियों की शुरुआत थी, इतना ज़रूर ध्यान है| किशन सरोज मुजफ्फर नगर आये थे| नई मंडी में किसी लाला के घर पर उनके एकल काव्य पाठ का आयोजन हुआ था| शहर के एक कविता प्रेमी स्वर्गीय विवेक मित्तल के साथ मैं भी गया था| करीब तीन घंटे के निरंतर काव्य-श्रवण के बाद भाव और कला की नई समझ लिए हुए लौटा| उस दिन किशन जी कविता के साथ-साथ कविता की रचना-प्रक्रिया पर भी टिप्पणी करते रहे थे|

वैसे तो बहुत सारे कवियों को सुनने का अवसर मिला, लेकिन किशन सरोज की बात ही निराली लगी| कवि और कविता को एकाकार होते देखना हो तो किशन सरोज को काव्य-पाठ करते हुए देखिये| कोहरे की चादर में चन्दन वन को डूबते हुए अगर देखना और महसूस करना है, तो यह गीत उन्हीं के स्वर में सुनिए| नागफनी होने की पीड़ा को घनीभूत होते देखना है, तो किशन सरोज के स्वर में इस गीत को फूल सा पत्ती-पत्ती होकर बिखरते देखिये| जब स्वर का हिरन बाण से आहत होकर भागता है, तब उसे देख कर दिल की कैफियत और सी ही हो जाती है|

भावात्मकता, रागात्मकता, चित्रात्मकता और अनुभूतियों की सघनता के कवि किशन सरोज की कविता का आनंद लीजिये| उनकी पुत्री तनिमा जौहरी को इंटरनेट पर उनके गीत अपलोड करने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद|

कुछ लिंक नीचे दे दिए गए हैं-
धागों बिंधे गुलाब
फिर लगा प्यासे हिरन ...
नागफनी आँचल में ...
चन्दन वन डूब गया ...
बस्तियों बस्तियों एवं अन्य गीत ...

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