अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Thursday, February 25, 2016

परीक्षा जारी है

बदलते सन्दर्भों में गुरु-शिष्य परम्परा, शिक्षा विषयक धारणाओं और मान्यताओं को लेकर फैला संभ्रम, स्कूल-कॉलेजों का वातावरण आदि पर एक समीक्षात्मक दृष्टि डालना प्रस्तुत रचना का मूल उद्देश्य है|


परीक्षा जारी है| छत से लटका पंखा तेज़ी से घूम रहा है| नीचे बैठे छात्र अपनी बुश्शर्ट की बाजू से बीच-बीच में माथे का पसीना पोंछ लेते हैं| पसीना गर्मी की वजह से है या ब्लैक-बोर्ड पर लिखे मुश्किल सवालों की वजह से, यह अलग बहस का मुद्दा है| अधिकतर छात्रों की उँगलियों के बीच जकड़ा कलम अपने पीछे आड़ी-तिरछी बेडौल सी रचनाएँ छोड़ता हुआ कागज़ पर छपी पंक्तियों के बीच दौड़ता चला जा रहा है| कुछ दार्शनिक किस्म के छात्र ऋषि-सुलभ एकाग्रता से खिड़की के बाहर शून्य में निहार रहे हैं| या, यूँ कहिये कि शून्य के साहचर्य का पूर्वाभ्यास कर रहे हैं| कोरी उत्तर-पुस्तिका छोड़ने पर शून्य से अधिक पाने की अभिलाषा करना व्यर्थ है, यह तथ्य तो सर्वविदित ही है| कुछ मंजे हुए करतबी अपने अँगूठे के नाखून पर पैन को बड़ी दक्षता से घुमा रहे हैं| दो-चार वंशज राजा हरिश्चंद्र के भी हैं, जो गरदन का व्यायाम करने के बहाने दाँए-बाएँ बैठे उपकारियों के परिश्रम को सार्थक कर रहे हैं| एक-आध गुरुभक्त हताशा में करेक्शन पैन से टेस्ट-सैटर का सोपाधिक अभिनन्दन-पत्र लिखकर अपनी रचनात्मक प्रतिभा का प्रकाशन करने में व्यस्त हैं|
बीच-बीच में दबी-दबी सी फुसफुसाहट कक्ष को भर देती है| कभी-कभी सिर के रूखे बालों को खुजलाने से पैदा होने वाली खसखसाहट नीरवता के समुद्र में लहर की तरह जनमकर उसी में विलीन हो जाती है| अध्यापक महोदय कुर्सी के हत्थे पर कोहनी टिकाए, हथेली पर ठुड्डी जमाए अलसाई आँखों से सामने की दीवार पर जाले में फँसी मकड़ी को ताक रहे हैं| जैसी रूह, वैसे फ़रिश्ते की उद्भावना साकार हो रही है| परीक्षा जारी है|
कुछ उत्साही छात्र ऊबने भी लगे हैं| कुछ मजेदार नहीं घट रहा है, ना| अध्यापक महोदय अपने सुशिष्यों के रहते चैन की साँस ले लें, यह तो एकलव्य, उपमन्यु और आरुणि के देश में अब किसी अनहोनी से कम नहीं| वैसे भी शिक्षाशास्त्री अपने अनुभवों और तर्कों से अध्ययन को नितांत उबाऊ प्रक्रिया सिद्ध कर चुके हैं| वे अध्ययन-अध्यापन को मनोरंजक बनाने की वकालत करते हैं| लब्बोलुबाब है कि औपचारिक शिक्षण, बन्दर का तमाशा और गाली-गलौच; इन सभी का महत्त्व सामान है बशर्ते कि इनसे मनोरंजन हो रहा हो| लगता है, विषय से भटक रहे हैं, पर कोई बात नहीं हमारे बड़े-बड़े ऋषि–मुनि भी कईं बार भटके हैं| खैर, ऐसी परम्परा तो अपने यहाँ है ही नहीं कि कक्षा केवल पढ़ाई के लिए हो| हम तो चहुँमुखी विकार के हामी हैं| विशेषज्ञता से हमारा क्या नाता? अत: शिक्षणेतर क्रिया-कलाप में अनन्य रूचि-संपन्न एक जिज्ञासु छात्र-शिरोमणि का बायाँ हाथ उसी धीमी गति से ऊपर उठता है जिस गति से अतिमेधावी (अतीन्द्रिय और अतिकाल की तर्ज़ पर) छात्रों की बुद्धि में गणित पैठ बनाता है|
अध्यापक महोदय अपनी तंद्रा में डूबी दृष्टि हाथ उठाने वाले नौनिहाल के चेहरे पर जमा देते हैं| लड़के को भला यह उम्मीद कहाँ कि उसके हाथ उठाने की गुरूजी पर इतनी त्वरित प्रतिक्रिया होगी! वह अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुए दाँये हाथ से लिखने में व्यस्त रहता है| अध्यापक महोदय एकटक लड़के को देखने लगते हैं| उनकी चेतना धीरे-धीरे स्वत:स्फूर्त होने लगती है| वे थोड़ा सा हिलकर अपने शरीरस्थ महारिपु आलस्य छिटका देते हैं और एक लम्बी सी मुखर जम्भाई लेकर विजयघोष करते हैं| फिर, कुछ क्षण प्रतीक्षा करके बोलने को उद्यत होते हैं| इसी बीच उनका विचार पुन: बदलता है| खाली आदमी का विचार सरकार से कम थोड़े ही होता है, बदलता ही रहता है| वे अपनी आँखों को ही जबान बनाने का निश्चय कर लेते हैं| उनकी इच्छाशक्ति इतनी प्रबल है कि कुछ ही पलों में चेहरे पर आँखों की जगह दो प्रश्नवाचक चिह्न टंके हुए नजर आने लगते हैं| कुछ और क्षण बीतते-बीतते वे इतने बड़े हो जाते हैं कि आपस में ही गड्ड-मड्ड होकर एक विशाल रूप धारण कर लेते हैं| उनका सम्पूर्ण व्यक्तित्व एक विराट प्रश्नवाचक चिह्न का छोटा सा अंश प्रतीत होने लगता है| वे कुछ बड़बड़ाते भी हैं लेकिन परीक्षार्थी अभी भी अपने काम में लगा हुआ है| बिल्ली के सरापे छींका नहीं टूटता|
अचानक लड़के का ध्यान अपनी पसलियों में पड़ौसी की चुभन से भंग होता है| उसकी गर्दन ऊपर उठती है| वह कुछ क्षण नाटकीयता के साथ अध्यापक की ओर ताकता है| अपनी कमीज़ के पहले से ही बंद बटन को फिर से बंद करता है| अपना प्रश्न याद आने का अभिनय करता है और ब्लैकबोर्ड की ओर उँगली से इशारा करते हुए पूछता है –
“सर, वह क्या लिखा है?”
“कहाँ” अध्यापक प्रश्न के उत्तर में प्रश्न ही पूछते हैं|
सर, तीसरी लाइन का पहला शब्द|”
अध्यापक महोदय अपने सुलेख की भद्द पिटते देख कर अचकचा जाते हैं| इस समय परलोक के किसी कोने में विराजमान उनके वे सब गुरुजन लज्जावनतवदन हो उठाते हैं जिन्होंने उनका लेख सुधारने की भरपूर कोशिश करते हुए न जाने कितनी बार उन्हें मुर्गा बनाया था, डांटा-फटकारा था और शहतूत की बेंत से शरीर के उस हिस्से को लाल कर दिया था जिसका प्रयोग लोग अक्सर बैठने के लिए किया करते हैं| हाँ, हाथ पकड़कर सही अक्षर बनाना सिखाने की बात शायद उनके ध्यान में ही कभी न आई थी| ऐसी सुपुष्ट गुरुपरंपरा को आगे बढ़ाते हुए अध्यापक महोदय झल्लाकर कहते हैं –
“बिल्कुल साफ़ तो लिखा है| क्या परेशानी है?”
“सर, यहाँ से नहीं दिखाई दे रहा है|” लड़का कम्प्रोमाइज़ करने के स्वर में कहता है|
“तो जगह बदल लो” अध्यापक महोदय अधिकार के साथ सुझाव देते हैं|
सर, कोई दूसरी सीट खाली नहीं है|” लड़के का विवश स्वर उभरता है|
“तब ऐसा करो, मेरे सिर पर बैठ जाओ|” अध्यापक महोदय खीझ के साथ व्यंग्योक्ति करते हैं|
“सर, क्या वहाँ से साफ दिखाई देगा?” लड़का अध्यापक के स्वर और शैली का अनुसरण करते हुए कहता है|
सारी कक्षा हँस पड़ती है| हँसी का प्रभाव सबसे पहले कोने में बैठे उस छात्र पर होता है जो उपर्युक्त वार्तालाप से अप्रभावित बड़े मनोयोग से अपनी जाँघ खुजलाने में लगा हुआ था| उसे लगता है, सब उसी पर हँस रहे हैं| वह विद्युद्गति से अपना हाथ वहाँ से हटाकर मेज पर रखता है| फिर किसी को अपनी ओर ताकता न पाकर मूर्खों की तरह पलकें झपकाने लगता है| उसके चेहरे पर अजीब सी तसल्ली का भाव पसर जाता है| हँसी का दौर थमते-थमते अध्यापक की मुखमुद्रा बदली सी दीखने लगती है| उनका धीरज पंचशील के सिद्धांतों की तरह बेअसर होने लगता है, पर फिर भी वे संयत स्वर में कहते हैं –
“अगर तुम देखना चाहते तो ज़रूर दिखाई दे जाता| बेटे, जब सवाल का जवाब पता नहीं होता तब अक्सर दिखलाई देना बंद हो जाता है| जितना दिमाग इन बेवकूफियों में लगाते हो उतना ही दिमाग अगर सही जगह लगाना सीखो तो आदमी बन जाओ|”
लड़के के मन में आता है कि पूछे तो सही कि गुरूजी किसकी और किन बेवकूफियों की बात कर रहे हैं, पर चुप रहता है|
अपना वाक्य पूर्ण होते होते गुरूजी को महसूस होता है कि उपदेश देने का अवसर बनने लगा है| लड़के के चेहरे पर शर्मिन्दगी का भाव है| कम से कम अध्यापक महोदय को तो ऐसा ही लगता है| सारी जमात अपने हाव-भाव से अध्यापक का समर्थन करती प्रतीत हो रही है| पुन:, कम से कम अध्यापक महोदय को तो ऐसा ही लगता है| मौक़ा छोड़ना नासमझी है| वे कमर सीधी करते हुए लड़के के चेहरे पर करुणापूर्ण दृष्टि डालते हैं और फिर पतलून की ज़िप को अच्छी तरह लॉक करते हुए खड़े हो जाते हैं| दृश्य कुछ ऐसा बन जाता है मानो महाभारत के युद्ध की समाप्ति के अवसर पर शर-शैय्या-शायी भीष्म पितामह मस्तक अवनत किये हुए खड़े धर्मराज युधिष्ठिर पर नीति-विषयक प्रवचन दागने की तैयारी कर रहे हों| तभी अध्यापक महोदय को याद आता है कि परीक्षा चल रही है| वे भाषण को अत्यंत संक्षिप्त रखने का तात्कालिक निर्णय ले डालते हैं| उपदेशामृत की अगाध-सरिता का अजस्र-प्रवाह क्षिप्र-गति से उनके मुख-गह्वर से प्रवाहित होने लगता है –
“बेटे, मौज-मजे का अपना महत्त्व है और पढ़ाई-लिखाई का अपना| तुम्हें आज की परीक्षा के बारे में पता था, फिर भी तुम कल सारा दिन चकरी बने घूमते रहे| माँ-बाप के अरमान तुमसे जुड़े हुए हैं| क्यों अपना समय, माँ-बाप का धन और हमारा श्रम नष्ट करने पर तुले हुए हो? तुम बहुत कुछ कर सकते हो, पर करते नहीं| ऊपर से बहस करते हो कि बोर्ड पर लिखा दिखाई नहीं देता| शर्म आनी चाहिए!”
“सर, क्या करूँ, आँखें गड़ा-गड़ा देखने से भी दिखाई नहीं देता|” लड़का थके स्वर में उत्तर देता है|
अध्यापक महोदय मंथर गति से लड़के के निकट आते हैं और उसकी कमर पर सहानुभूति के साथ थपकी देते हुए कहते हैं –
“बेटे, मेरी आँखों से देख, तुझे सब कुछ दिखाई दे जाएगा|”
कक्षा का वातावरण मार्मिक हो जाता है| लड़का भी समझ जाता है कि अब कुछ होना-जाना नहीं हैं| वह शांत होकर पुन: अपने काम में लग जाता है| राउंड के लिए निकले हैडमास्टर साहब के कानों में अंतिम संवाद पड़ता है - ‘बेटे, मेरी आँखों से देख ...’| वे द्रवित हो जाते हैं| ऐसे समर्पित अध्यापक और फर्माबरदार छात्र को देख-सुनकर उनका हृदय गदगद हो उठाता है|
वातावरण में बहुर देर तक ये शब्द प्रतिध्वनित होते रहते हैं – “बेटे, मेरी आँखों से देख ...”
घंटी बजती है| समय समाप्त होता है| अध्यापक महोदय घूम-घूम कर उत्तर-पुस्तिकाएँ इकट्ठी करने लगते हैं| छात्र शोर मचाते, धौल-धप्पा करते हुए कमरे से बाहर निकलने लगते हैं| अध्यापक महोदय उत्तर-पुस्तिकाएँ गिनते हुए अपनी मेज़ के पास पहुँचाते हैं, जिसपर लाल परमानेंट मार्कर से लिखा हुआ है –
“अपनी आँख मुझे दे दे ठाकुर...”
 

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