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Monday, February 15, 2016

रोहित कौशिक का कविता-संग्रह

कहा जाता है कि कविता की उपयोगिता का अंतिम निर्णय समय ही करता है| रोहित कौशिक का नवीनतम काव्य-संग्रह ‘इस खंडित समय में’ वर्तमान समय के यथार्थ का ही दस्तावेज है| उस यथार्थ का जो जनमता तो पीड़ा से है, किन्तु उसका परिपाक आक्रोश में होता है| उस यथार्थ का जो सहनशीलता की उस सीमा तक परीक्षा लेता है, जब दांत भींचकर जोर से गाली देने का मन होने लगता है|
 
रोहित कौशिक नई पीढ़ी के स्थापित रचनाकार हैं| वे जागरूक, भयहीन और शब्दों को अर्थ की नग्नता तक की स्थिति तक छील देने वाले कवि हैं| पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं और समय समय पर प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में छपते रहे हैं|
 
संग्रह में चयनित कविताओं को पढ़ते हुए बार-बार लगा कि कवि चारों ओर व्याप्त हिला देने वाली स्थितियों को ध्यानपूर्वक देखता है| वह केवल देख कर चुप-चाप नहीं रह जाता| वह चीखता है, और तारस्वर में चीखता है| उसकी चीख में स्वर साधने की कोई कोशिश नहीं हुई है| वह चीख के तीखेपन को ऊँचाई पर बैठे हुओं के कानों में चुभने के लिए स्वतन्त्र छोड़ देता है|
 
आँसुओं की बिजली से / चमचमाएंगें भद्रलोक के चेहरे / पर नर्मदा की मिट्टी से सने / चेहरों के सामने / फीकी पड़ जायेगी / भद्रलोक के चेहरों की चमक|
(नर्मदा)
 
प्रगतिवादी विचारधारा के लगभग सभी लक्षण कविता में दिखाई देते हैं| शोषित और कुचले हुए वर्गों के प्रति संवेदना प्रत्येक कविता में पंक्ति-दर-पंक्ति पनपती हुई दिखाई देती है|
 
इसी व्यवस्था के बीच / बगुलों का भोजन बन रही है / केंचुओं की जमात भी | और अब किसान मजबूर है / चुप्पी साधे रहने के लिए|
(चुप है किसान)
 
हिन्दी साहित्य का व्यवस्था विरोधी स्वर आजकल बहुत मुखरता के साथ सुनाई दे रहा है| रोहित की कविता भी इस ‘ट्रेंड’ को अपनाती सी दिखाई देती है| ‘कोर’ नैतिकता और आधुनिक चिंतन के बीच का संघर्ष रोहित की कविता में स्पष्ट दिखाई देता है| दोनों के बीच का तालमेल आज के समय में डगमगाया हुआ है| रोहित की कविता इस बिगड़ते संतुलन को अभिव्यक्त करती है|
 
सूरज अपनी जगह पूर्ण चमकता है / लेकिन उसकी किरणे नहीं भेद पातीं / घने कोहरे को / और नहीं रह जाता कोई अर्थ / सूरज के चमकने का|
(आत्मविश्वास का सूरज)
 
किसान, मजदूर, औरत, प्रेम, प्रकृति, मानवतावाद, समाज में जड़ें जमा कर बैठी विषमता चाहे वह आर्थिक धरातल पर हो या धार्मिक और राजनैतिक धरातल पर, क्रांति की आवश्यकता और उसकी पुकार आदि को कवि ने अपनी अभिव्यंजना का विषय बनाया है| एक उदाहरण द्रष्टव्य है,
 
उन अपनों से / जिनकी आँखों का मर गया है पानी / इस पानी को मरते देख / मर गयी है नर्मदा के पानी की आत्मा भी / ज़िंदा कहाँ रह पाया है / विस्थापितों के अन्दर का पानी / तुम्हारी आवाज / उस मरते पानी की आवाज है / जो आवाज देता है हमारी जिन्दगी को|
(एक पाती मेधा पाटेकर के नाम)
 
रोहित अपनी कविता में गोल-गोल, मीठे और चिकने गुलगुले नहीं बनाते| उनके काव्य की भाषा और शैली में उपजता तीखापन उनकी भावभंगिमा में व्यंग्यात्मकता का समावेश करता है|
 
मजबूरी में दिल्ली में बैठकर / गाँव पर लिखते रहे / छपते छपाते रहे मजबूरी में ही / मजबूरी में लूटते रहे सत्ता का मजा / मजबूरी में ही दिल्ली में रहकर / दिल्ली का फ़ायदा उठाते हुए / दिल्ली को कोसते रहे|
(दिल्ली-दो)
 
कवि का स्वर मूल रूप से जनवादी है| जन की भावना से जुड़ाव को और अधिक मुखरता देने के लिए जन की भाषा के मुहावरे का जाने-अनजाने में बार-बार प्रयोग किया गया है| कवि मूलरूप से भाव और विचार को प्रमुखता देता है इसी के चलते कवि कविता के शैलीगत शास्त्रीय पक्ष की अवहेलना लगातार करता चला है| कवि के लिए सम्प्रेषण का विषय उसके माध्यम से कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण हो गया है| कवि स्वयं एक स्थान पर लिखता है,
 
जब सारे आलोचक इस कागज़ पर / अच्छी और बुरी कविता में / भेद कर रहे होते हैं / ठीक तभी कागज़ से / कल्पनाओं के आकाश में / उड़ जाती है कविता / और कहती है – कविताओं पर इतना दिमाग मत खपाओ / तुम जैसे बौद्धिक और नीरस / लोगों के बस में नहीं है कविता|
(इस कागज़ पर)
 
कवि चुनौती देता सा प्रतीत होता है| वह धर्म के प्रचलित रूप पर प्रश्न खड़ा करता है| समाज के प्रचलित आचार-व्यवहार और जीवन-नीति को कटघरे में खड़ा करता है| परम्परा को बेमानी मानता है| बौद्धिकता के आवरण में छिपाकर स्वीकारात्मकता की परीक्षा करता है| आस्था और विश्वास को वाहियात समझता है| उदाहरण देखें,
 
वे चाहते हैं / कि हम उलझे रहें / अंधविश्वासों के मकड़जाल में / ताकि बिल्कुल भी न जले / हमारे दिमाग की बत्ती|
(इस खंडित समय में)
 
कवि समानता के सिद्धांत की वकालत करता है और अपनी ही मानसिक प्रतिक्रिया के रूप में सामंतवादी प्रवृत्तियों पर चोट करता है|
 
जो लोग तुच्छ समझते हैं जूतों को / उनके लिए बस इतना ही कहना काफी है / कि जब काटते हैं / तो हमारे सम्पूर्ण अस्तित्व को / हिला देते हैं जूते|
(जूते)
 
औरत को उपभोग के लिए तैयार देह मात्र मानने की प्रवृत्ति के विरुद्ध आवाज उठाता है तो उसके स्वर में कड़वाहट उभर आती है| देखें,
 
जब नहीं समझ पाते / कि कितनी गहरे है औरत / तो उभारों के संग / पूरी देह को औंद कर / होते हैं गौरवान्वित / कि फतह कर ली है हमने / एवरेस्ट की चोटी|
(औरत)
 
‘गाँव से गाँव गायब है’ में लोक और सामान्य जन-जीवन की उपस्थिति भी है| न केवल उपस्थिति है बल्कि स्थानीय शब्दों, संज्ञाओं और विशेषणों का प्रयोग भी खुल कर हुआ है| कुछ ऐसे स्थानीय दृश्यों के चित्रण भी हुए हैं जिन्हें समझने के लिए एक पूरी संस्कृति और जीवन शैली को समझना आवश्यक है| ‘पतझड़’ और ‘गंगनहर’ आदि कविताओं में अपनी बात कहने के लिए प्रकृति को रूपक की तरह प्रयोग में लाया गया है| स्पष्ट: प्रकृति-चित्रण से अधिक कवि का मंतव्य प्रकृति को माध्यम के रूप में प्रयोग करना था|
 
मार्क्सवादी स्वर कविता में समय-समय पर उभरता दिखाई देता है| यह बात अक्सर खटकती है कि आज का कवि विचारों के मकड़जाल में फँसकर कृत्रिम भावनात्मक समुद्भरण के चलते आशंका, व्यक्तिवादी कुंठा, मरणधार्मिता और अवसाद आदि को रोमांटिसिज्म का जामा पहनाने की कोशिश करता है| रोहित कौशिक की कविता भी इसका अपवाद नहीं है| यद्यपि बहुधा पीड़ा के उत्स, पीड़ा, और तज्जन्य आक्रोश की अतिरंजित अभिव्यक्ति कविता की सच्चाई को अविश्वसनीय बना देती है तथापि इसे स्थापित दोष के रूप में देखना समीचीन न होगा| संभव है यह कवि का सत्य हो जिससे टिप्पणीकार के सत्य की समरूपता नहीं है| अपने तर्क की पुष्टि के लिए आचार्य रामचंद्र शुक्ल की बात दोहराना चाहता हूँ – “मनुष्य अपने भावों, विचारों को लिए-दिए दूसरों के भावों और विचारों और व्यापारों के साथ कहीं मिलता और कहीं लड़ता हुआ अंत तक चला जाता है और इसी को जीना कहते हैं|”
 
रोहित कौशिक का कवि आँखों में आँखें डालकर सीधे संवाद करता है| उसमें डर नहीं है| वह एक सिरे से सब पर सवाल उठाता चलता है| उसकी कोई बंधी-बंधाई परिपाटी नहीं है| एक ओर व्यक्ति और समाज के स्वत्वरक्षण के लिए सहायकों को पुकारता है तो दूसरी ओर उन्हें भी सावधान रहने की नसीहत सुना देता है| कवि का अपना सौन्दर्यबोध है| सच कहें तो कवि की भावभूमि से अलग हट कर कविता को देखने वाले के मन में उसकी ‘एस्थेटिक सेन्स’ विद्रूपता को जन्म देती है| हमारा स्पष्ट मंतव्य है कि जब भी यह घटना घटती है तो वह कवि की सफलता को ही द्योतित करती है|
 
संकलन को निश्चित रूप से पठनीय एवं संग्रहणीय की श्रेणी में रखा जाना चाहिए|
 

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