अपनी बात

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Thursday, February 4, 2016

बेकरारी रंग दिखाएगी

एल.टी.ए. का मतलब है ‘लीव ट्रेवलिंग अलाउंस’, यानि वो पैसा जो छुट्टियों में घूमने-घामने के लिए मिला करता है| ‘लीव’ अर्थात् छुट्टियाँ जिसका मतलब है भयंकर गर्मियाँ या हाड़ कँपाने वाली सर्दी| इन दोनों में से कुछ नहीं तो निर्विवाद रूप से भयंकर भीड़| एल.टी.ए. का मिलना ऐसा होता है जैसे, पड़ौसी की लाटरी का लग जाना| वहाँ खुशियों का माहौल और यहाँ कलेजे पर साँप लोट रहे होते हैं| उधर पटाखे फूट रहे होते हैं और इधर उनका धुँआ हलक में फँस रहा होता है|
 
सवाल है कि सैर-सपाटे में ऐसा क्या है कि किसी का दिल हलकान हो जाए| सरकार चाहती है कि लोग बाहर निकलें और ज़िंदगी को अच्छी तरह समझें| सोचने-समझने की योग्यता का विस्तार हो| यूरोपीय और अमरीकी लोगों के दुनिया में सबसे बढ़ा-चढ़ा होने का कारण ही यह है कि वे खूब पर्यटन करते हैं, भ्रमण करते हैं| हमारे लोग अज्ञान के अन्धकार से बाहर इसीलिए नहीं निकल पा रहे हैं, क्योंकि घूमने से डरते हैं| माना कि अपने यहाँ रेल के डिब्बों में बम फट जाते हैं, जहाज हाईजैक हो जाते हैं, नशीले पदार्थ खिला कर यात्रियों को लूट लिया जाता है, ट्रेनें समय पर नहीं चलतीं, सड़क दुर्घटनाएँ बेलगाम हैं, अपहरण-फिरौती का चक्कर रहता है, बंद घरों में चोरियाँ हो जाती हैं; लेकिन ये इतने बड़े कारण तो नहीं हैं कि यात्राओं से परहेज किया जाए| सफ़र करते हैं तो दूसरों के कष्ट दिखाई देते हैं जिससे अपनी ज़िंदगी पर अभिमान होने लगता है| ज्ञान बढ़ता है| पता चलता है कि अमुक राज्य के निवासी अमुक राज्य के निवासियों से कितनी घृणा करते हैं| कहाँ पर एक पूजास्थल को तोड़कर दूसरे धर्मावलम्बियों ने अपने प्रार्थना-स्थल बना लिए हैं| फायदों की कमी थोड़े ही है, केवल एक बार जीवन का मोह मन से निकालना होता है|
 
चकौड़ी दास सरकारी नौकर हैं| पक्के भारतीय होने के नाते घर से बाहर निकलने में डरते हैं| सरकार इस बात को नहीं जानती जिसके चलते तीन साल में एक बार उनकी जान को झंझट आ पड़ता है| आज वही दिन आ पहुँचा है| खबर आ गयी है| छुट्टियों का यात्रा-भत्ता मिलने की खबर आ गयी है| सारा परिवार खुशियाँ मना रहा है| योजनाएँ बन रही हैं, बिगड़ रही हैं, अस्वीकृत हो रही हैं, नए सिरे से विचार किया जा रहा है, पुराने सिरों को फिर से पकड़ा जा रहा है, जगहों के नाम सुझाए जा रहे हैं, रामेश्वरम से लेकर गोवा-पांडिचेरी तक चर्चा का केंद्र बने हुए हुए हैं; लेकिन चकौड़ी दास हलक सूखा जा रहा है| फिर वही रेलवे आरक्षण के लिए लगी लाइनों की धक्का-मुक्की, होटलों की रिसेप्शनिस्ट की बला की नकली मुस्कान, रेस्टोरेंटों में टिप टटोलते वेटर, कुली की पुकार, ऑटो-टैक्सी वालों से झाँय-झाँय, साड़ियों की खरीद का आग्रह, हस्तकारी का नकली स्थानीय सामान खरीदने की मजबूरी, अटैचियों में सामान की ठूंस-ठांस, फोटो खिंचवाने के लिए देर तक पोज़ बनाए रखने की मजबूरी; अच्छे दिन के नाम पर खतरनाक क्षणों के आगमन की आहट पास आती दिखाई दे रही है|
 
वाद-विवाद चल रहा है| चलना ही चाहिए| यह परम्परा तो देश में पुरातन काल से चली आ रही है| मानव इतिहास के सबसे बड़े वाद-विवाद, जिन्हें कुछ लोग महिमामंडित करते हुए शास्त्रार्थ भी कह देते हैं, हमारे देश में ही हुए थे| इस परम्परा का दुखद पक्ष आज घर में उपस्थित है| प्रत्येक प्राणी अपने को शंकराचार्य, गार्गी और याज्ञवल्क्य समझे बैठा है| पड़ौसियों के उदाहरण दिए जा रहे हैं, देशाटन के सिद्धांत को पुन: व्याख्यायित किया जा रहा है, आपस में विमति बन रही है| एक-आध आशा की किरण बीच-बीच में झलक जाती है जब सारे विचारक वक्ता थक कर दो साँस लेने के लिए ठहर जाते हैं| जितनी देर में यह लगता है कि सहमति बनने वाली है, उतनी ही देर में बहस नए सिरे से शुरू हो जाती है|
 
इसी बीच चोम्स्की की आत्मा चकौड़ी दास के पास आयी और कान में फुसफुसा कर पूछने लगी कि क्या इस हंगामें से छुटकारा चाहते हो, लगातार जोर पकड़ रहे विवाद को नियंत्रित करना चाहते हो, विवाद में फँसे लोगों को निष्क्रिय करके अपने कहे में रखना चाहते हो? विदेशी सलाह मिल रही थी, वह भी बिल्कुल मुफ्त| तुरंत ‘हाँ’ कह दिया| आत्मा ने समझाया कि मौजूदा हालात में सर्वोत्तम उपाय यही है कि बहस के विस्तार को कम से कम कर दिया जाए| उसने सलाह दी कि तुरंत सीमाओं का निर्धारण करो और फिर बहस-मुबाहिसे के दरिया को निर्बाध गति से पानी छलछलाते हुए बहने दो| चकौड़ी दास समय-समय पर अपने दफ्तर में महत्त्वपूर्ण मीटिंग अटैंड करते रहते हैं| झट से बात समझ गए और फट से बजट, मौसम, दूरी और समय से सम्बंधित सीमाओं की सूचनाएँ दे दीं| बहस जारी रही और इस कदर जारी रही कि संसद में बैठे लोग भी गालियाँ देना छोड़ खड़े होकर तालियाँ बजाने लगे|
 
अब मुद्दा था कि किस तरह के स्थान पर चला जाए! ऐतिहासिक स्थलों की यात्रा करते हुए गाइड-जन विचित्र और विलक्षण तथ्यों से परिचित कराते हैं लेकिन उनमें से कुछ भी याद नहीं रह जाता| इमारतों की सुन्दरता भी अधिकतर लोगों को समझ नहीं आती| कुल जमा कोनों में लिखी गालियाँ और दो नामों के बीच बना दिल को बेधता हुआ तीर ही याद रह जाया करता है| ये सब तो शहर के सभी सार्वजनिक लघुशंकागृहों में ही दिखाई दे जाता है| इसके लिए इतिहास की परतों में केंचुए की तरह घुसने की बात चकौड़ी दास को बेतुकी ही लगती है| वैसे भी एक किला देख लिया तो समझो सारे देख लिए| एक जैसे ही तो होते हैं|
 
आजकल सुना है गोवा बड़ा हॉट डेस्टिनेशन बना हुआ है| मन तो चकौड़ी दास का भी बहुत है वहाँ जाने का, लेकिन गोवा के समुद्र-तट पर विहार करती यौवनश्री से संपन्न गोरी सुंदरियों के झुण्ड के बीच पत्नी और बच्चों के साथ अधनंगी अवस्था में अपनी उपस्थिति की कल्पना से परेशान होकर वहाँ जाने का विचार भी त्याग दिया|
 
पहाड़ों पर जाने में दम सूखता है| आधा बजट घोड़े-खच्चर वाले ठिकाने लगा देते हैं और बाकी बचा हुआ होटल वाले| और, वैसे भी फेफड़ों को धुएँदार हवा में साँस लेने की आदत पड़ी हुई है, वहाँ की साफ़ और ताज़ी हवा पता नहीं पचेगी या नहीं| चकौड़ी दास को देशी घी खाने से कोष्ठबद्धता की समस्या हो जाती है| इसी तर्ज़ पर अगर वहाँ फुफ्फुसबद्धता हो गई तो लेने के देने पड़ जायेंगे| यह विचार भी हवा हुआ|
 
चकौड़ी दास दरवाजे के पल्ले का सहारा लेकर खड़े हुए और सबके सामने साफ़ कह दिया कि विचार तीर्थ यात्रा पर जाने का है| सस्ता खाना, सस्ती धर्मशाला, सौ-डेढ़ सौ रुपये तीर्थ-पुरोहित के और सौ-पचास रुपये का प्रसाद; कुल मिलाकर यात्रा के अलावा इतना ही खर्चा है| सबके लिए प्रसाद के अलावा कुछ और उपहार लाने का झमेला भी नहीं होता| आज चकौड़ी दास को इस बात का अफसोस हुआ कि उनके तीर्थ स्थान विदेश में क्यों न हुए, नहीं तो सरकारी इमदाद से सस्ती दरों पर विदेश यात्रा भी हो जाती|
 
एक सप्ताह तक बहसें चलती रहीं| दिन रात चलती रहीं| जनता ने गंतव्य तय कर लिया था| तीर्थयात्रा की खबर फ़ैलने लगी| अड़ौसी-पड़ौसी, नाते-रिश्तेदार चढ़ावे के पैसे देने के लिए आने लगे| उपदेश, परामर्श और मंत्रणाओं के दौर चलने लगे| इलाके का यात्रा संबंधी सम्मिलित ज्ञान बरसने लगा| होटलों के नाम, परिचितों के पते, यात्रा की सावधानियाँ सूचीबद्ध होने लगीं| मठरियाँ तलने की महक सारे मोहल्ले में फ़ैलने लगी| कपड़े खोजने के लिए पलंगों के बक्से खंगाले जाने लगे| फरमायशों का निराकरण और निस्तारण होने लगा|
 
यात्रा का बंदोबस्त करने की ज़िम्मेदारी चकौड़ी दास पर थी| ट्रेवलिंग एजेंट के पास पहुंचे तो उसने उन्हें अपना मेन्यू थमा दिया| यात्रा, धार्मिक यात्रा, धार्मिक स्थान पर हनीमून, होटल सहित, होटल रहित, सस्ता, महँगा, शानदार, जानदार जैसे अनेक नामों वाले पैकेजों का उल्लेख था| बुद्धि चकरा गयी| उन्होंने शर्माते हुए एल.टी.ए. पॅकेज के बारे में पूछा| टाई बांधे हुए चुस्त-चौकस एजेंट ने उन्हें ऊपर से नीचे तक ध्यान से देखा| होठों ही होठों में बुदबुदाया, “मुझे पहले ही समझ लेना चाहिए था|” कार्ड में सबसे नीचे ‘मुफ्तखोरी पैकेज’ को काट कर ‘रियायती पैकेज’  लिखा हुआ था| उसी पर पैन की नोक चुभाते हुए इशारे से पूछा कि क्या इसी की आवश्यकता है| चलिए यह इंतज़ाम भी हुआ|
 
यात्रा की तैयारी आपने उस चरण में आ पहुँची थी जिसे महिलाओं की शब्दावली में ‘शॉपिंग’ और पुरुषों की भाषा में यातना, फिजूलखर्ची या झक मारना कहा जाता है| चकौड़ी दास सरकारी नौकर होने पर भी स्वभाव से शर्मीले और मन से सिद्धांतवादी आदमी थे इसलिए ट्रांसफर के दौरान रुपयों का जुगाड़ नहीं बैठा सके, सो नियुक्ति किसी किसी हरी-भरी जगह नहीं हो पायी थी| उनके इस अवगुण के कारण यार दोस्त पीठ पीछे बौड़म कहा करते थे| बंधी-बंधाई तनख्वाह का ही सहारा था नतीजतन पैसा खर्चने के नाम पर थोड़ा घबराते थे|
 
बाज़ार के नाम भर से चकौड़ी दास का शरीर थरथराने लगता है| पत्नी के साथ बाज़ार जाने के नाम से तो उनकी आत्मा हिचकोले खाने लगती है, लगता है कि नैय्या अब डूबी और तब डूबी| उनकी पत्नी शान्ति ‘शॉपिंग’ के क्षेत्र में किसी क्रान्ति से कम नहीं हैं| हाल यह है कि अगर उन्हें रूमाल खरीदना हो तो रिजाई देखने से अपने अभियान की शुरुआत करती हैं| फिर धीरे-धीरे कम्बल, चादर, तकिये के गिलाफ और तौलिये आदि के भाव तथा ट्रेंड जान लेने के बाद मुद्दे पर आती हैं| कोई विशेष अवसर होने पर ‘टी सैट’ से भी प्रारम्भ हो सकता है|
 
शान्ति देवी का मानना है कि खरीददारी देख-परख कर करनी चाहिए| इस सिद्धांत का पालन करते हुए समान छापे की सामान वस्तुओं को कम से कम चार दूकानों पर देखती हैं| कभी-कभी तो ‘टाटा’ का नमक ही वे तीन दुकानों पर देख आती हैं| सामान बदलने में उनका कोई सानी नहीं है| जब तक दो-चार बार बदली न हो जाए उन्हें लगता ही नहीं कि कि पैसे वसूल हो गए हैं| उनका दूकान में घुसना किसी सूनामी के आने से कम विध्वंसक नहीं होता| सेल्समैनों को चकरघिन्नी की तरह घुमाती हैं| शेल्फ में अगर एक भी वस्तु रखी रह जाए तो उसकी चर्चा हफ़्तों तक बाज़ार में हुआ करती है| शहर के दूकानदार अपनी दूकान पर उनके आगमन से बचने के लिए अपने पूरे परिवार को गंडे-ताबीज़ बंधवाए रहा करते हैं|
 
मोल-भाव में शान्ति देवी को आत्मिक आनंद की अनुभूति होती है| ताने, उलाहने, कसमें, वादे उनके मुँह से अनवरत झरा करते हैं| स्थिति यहाँ तक आन पहुँची है कि बच्चों के स्कूल और डाक्टरों की दूकान पर भी वे उन्मुक्त भाव से फीस कम करने का आग्रह कर लेती हैं| चकौड़ी दास स्वयं सीधे-सादे आदमी हैं| दो टूक बातें करते हैं और ज्यादा कुतर पाँच करना न तो उन्हें आता है और न ही उन्हें भाता है| स्वाभाविक ही है कि ऐसी पत्नी के साथ खरीददारी करने के नाम पर उनके दम खुश्क होने लगते हैं| अब जो होना है सो तो होना ही है| उनके लिए मन समझाने के अलावा और कोई रास्ता भी तो नहीं बचा|
 
लोग कहते हैं कि यात्राएँ चिंता, तनाव से मुक्ति दिलाती हैं| जीवन में नयापन भरती हैं| नवीन ऊर्जा का संचार करती हैं और स्फूर्ति पैदा करती हैं| चकौड़ी दास तो यात्रा शुरू होने से पहले ही थक चुके हैं, तनाव से भर चुके हैं, नयापन खो चुके हैं, ऊर्जाशून्य हो चुके हैं| बेचैन हैं कि किसी तरह यह तैयारी का झगड़ा ख़त्म हो और वे पत्ता तोड़ भागें|
 
घर से भागने की बेकरारी क्या-क्या रंग दिखाएगी, यह तो समय ही बताएगा|


चित्र jotarofootsteps.blogspot.com और www.shutterstock.com से साभार

 

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