अपनी बात

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Sunday, January 31, 2016

लौट रही है ज़िंदगी!

(लम्बे समय के बाद स्कूल खुलने पर बच्चों के लौटने की घटना का एक अधूरा चित्र)

 









कुछ ठहरती, कुछ सिमटती, कुछ शरमाई और कुछ अटपटाई सी लौट रही है ज़िंदगी|

सर्दियों की दो महीने लम्बी छुट्टियाँ समाप्त हो रही हैं| स्कूल के कोने-कोने में पसरा सन्नाटा टूटने लगा है| ‘मेन गेट’ पर चहल-कदमी बढ़ गयी है| वर्दियों में सजे-धजे लड़के दिखाई देने लगे हैं, अपना सूटकेस उठाए हुए और माँ-बाप से विदा लेते हुए| आँखों में आँसू आते तो हैं लेकिन टपकते नहीं, बस धीरे से आस्तीन से पोंछ लिए जाते हैं|

माली लोग सर्दियों भर क्यारियाँ बनाते रहे थे, बीज बोते रहे थे, निराई-गुड़ाई करते रहे थे, खर-पतवार निकालते रहे| कई बार तो फूलों का इंतज़ार करते करते ऊब भी जाते होंगे| आखिर समय आ ही गया| फूल अपनी पूरी चमक के साथ नीले आकाश के नीचे खिले हुए हैं| रंगत बिखरी पड़ रही है| हजार हाथ भी अराजकता के साथ विस्तारित रंगत को समेटने के लिए कम पड़ रहे हैं| श्रम सार्थक हो रहा है|

रास्तों पर बिछी बजरी बूटों की ठोकर खा-खाकर फिर से सक्रिय और जीवंत होने लगी है| बजरी, जिस पर छात्रों की असंख्य पीढ़ियों ने चलना सीखा, संतुलन की कला सीखते हुए जीवन के विषम तल पर पाँव जमाने का अभ्यास किया और जिसने बालकों के पैरों की छुअन से अपने नुकीले किनारों को गोल कर लिया; पुन: कड़कड़ की हँसी हँसने लगी है|

ताज़ा पेंट की गयी कुर्सियों और मेजों की गंध कक्षाओं के खुल जाने से बाहर फैलने लगी है| यह गंध आत्मा की गंध होती है, चेतना की गंध होती है, परिष्कार की गंध होती है| कक्षाएँ अपने दरवाजे खुलने पर ही सार्थक, अभिव्यंजक, निदर्शक और विचारोत्तेजक होती हैं| प्रवेशमार्ग और निर्गम के बंद हो जाने पर वे चुपचाप एक ऐसे विषैली वायु से भरे प्रकोष्ठ के रूप में बदल जाती हैं जहाँ केवल हत्याएँ हुआ करती हैं - विचारों की, भावनाओं की, आदर्शों की, स्वतंत्रता की, लगाव की और सबसे बढ़कर अधिकारों की|

मुख्य-भवन के ऊपर टंगी घंटी फिर से टनटनाने लगी हैं| टन-टन होते ही फिर से कदम तेजी के साथ उठाने लगे हैं| छोटे लड़के तो दौड़ ही पड़ते हैं, बेतहाशा| बड़े लड़के दौड़ते तो नहीं किन्तु गति उनकी चाल की भी बढ़ जाती है| अगर ऐसा लगता है कि सारी कोशिश के बावजूद भी देरी हो ही जायेगी तब दिमाग भी तेजी से दौड़ने लगता है, यह तय करने में कि अध्यापक को देर हो जाने के लिए क्या बहाना बनाना है| सर्जनशीलता, मौलिकता और कल्पनात्मकता का जन्म ऐसे ही तो हुआ करता है|

किताबों के भीतर दुबक कर बैठी रंगीन दुनिया अंगड़ाई लेकर उठ गयी है और मुड़े हुए पन्नों से बनी दरार में से बाहर झांकने लगी है| किताबें अकेलेपन में किसी काम की नहीं होतीं| अड़ियल हाथों में थाम लिए जाने पर बिल्कुल बेकार हो जाती हैं| वे खुला दिल और खुला दिमाग देती तो हैं, लेकिन तभी जब उन्हें कोई बच्चा या बच्चे जैसा बड़ा अपने हाथों में थामता है| किताबें अपना अर्थ पाने लगी हैं|

यहाँ-वहाँ छोटे –छोटे झुण्ड बनने लगे हैं और कहकहों की आवाजें दूर तक सनाई देने लगी हैं किस्सों की बारातें सजधज कर सड़कों पर निकल आयीं हैं| कुछ शिकायत के स्वर भी सुनाई दे रहे हैं, “फोन क्यों नहीं किया”, “मेल का उत्तर क्यों नहीं दिया”, “तुमने नोट्स भेजे ही नहीं” या फिर “घर जाते ही दोस्तों को भूल गए”| बतकहियाँ और गलबहियाँ चल रही हैं| मुस्कराहटें बिखर रही हैं| सर्दियों के म्लानमुख सूरज की चमक आज कुछ बढ़ी हुई सी दिखाई दे रही है|

एक करीने से तराशे हुए और बिखरे बालों वाला छोटा सा लड़का अपनी चमकीली आँखों के साथ छात्रावास की छत पर कुछ खोजता सा दिखाई दे रहा है| दो महीने पहले जब छुट्टियाँ शुरू होने ही वाली थीं, वह लड़का स्कूल के भोजनालय से ब्रेड के चंद टुकड़े अपने स्वेटर में छिपाकर निकलता हुआ पकड़ा गया था| उसे कुछ दंड भी मिला था| उसने वही प्रयास शाम को फिर किया और सफल भी हुआ| जाने से पहले वे टुकड़े छत पर डाल गया था| अब देखने आया है कि चिड़ियों ने उन्हें चुग लिया है कि नहीं|

घर छोड़कर आना बहुत कठिन होता है| यार-दोस्त, मौज-मस्ती, सुख-सुविधाएँ और सोने-जागने की स्वतंत्रता; याद तो आती हैं लेकिन इतनी नहीं कि स्कूल के दोस्तों का साथ छोड़ दिया जाए| साझे की शरारतें, सम्मिलित तो कभी-कभी अकारण मिली सजाएँ, पुरस्कार पाने की खुशी तो कभी डाह, घर की याद आने पर नम हो उठी आँखों को देखकर एक-दूसरे को दिलासा देते हुए हाथ का मसृण स्पर्श, दीवार को छूते हुए दूर तक एक दूसरे के पीछे दौड़ना; इन सब की बहुत कमी अनुभव होती थी|

जीवन के बिछड़े हुए सिरे आज फिर से जुड़ गए हैं|

 

9 comments:

  1. Thank you Sir for taking me through the eyes and life of my two sons Rachit and Arjun at Doon.How soon their years flew!!!

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    1. Mrs. Khaitan...? Thank you for reading and appreciating the article. Hope you liked it

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  2. हमेशा की तरह सर आपने रूपक का इस्तेमाल बहुत अच्छे से किया है व आख़री से दुसरे अनुछेद में निरंतरता भी बहुत सुन्दर है। पढ़ कर व सुन कर बहुत अच्छा लगा।

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    1. धन्यवाद, प्रणव! अक्सर देखा जाता है कि बहुत सी चीज़ें हमारे दिल के बहुत करीब होती हैं, लेकिन हम यह बात जान ही नहीं पाते| बस, उसी निकटता की अभिव्यक्ति है यह लेख| मुझे संतोष है कि तुम्हें अच्छा लगा|

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  3. Beautifully penned Sir! Touched the bottom of my heart!

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    1. Thank you, Amaan. I am glad that you liked the article. Believe me, life feels so essenceless without boys in school. Life comes back with them.

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  4. 2 महीने की छुट्टियां 3 साल कहा बन गए पता ही नही चला॥ एक बार फिर जिन्दगी को गले लगाना है॥

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    1. धन्यवाद शुभम| जो महसूस किया, बिलकुल वैसा ही लिख दिया बिना कुछ जोड़े या बिना कुछ घटाए| उम्मीद है कि लेख अच्छा लगा होगा|

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