अपनी बात

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Wednesday, January 27, 2016

बहुसंख्यक - अल्पसंख्यक : नयी परिभाषाएँ


मैं और मेरे जैसे और भी, स्वयं को उसी देश में जो हमारे लिए बना था, वैचारिक रूप से दलित महसूस करने लगे हैं|

आजकल कुछ भी कहने में डर लगने लगा है| ख़ासकर किसी का विरोध करना तो ‘आ बैल मुझे मार’ मुहावरे का जीवंत प्रयोग हो जाता है| सड़क पर निकलो तो लोग मुस्कुरा कर कहते हैं कि ये ही वे हजरत हैं जिन्होंने अपने पैरों पर आप कुल्हाड़ी दे मारी है|

अब सवाल है कि ऐसा होता क्यों हैं? उनकी नापसंदगी की बात कह दी तो हंगामा क्यों हो जाता है? पता नहीं क्यों लोग जनेऊ देखते हैं, चोटी देखते हैं, जालीदार टोपी देखते हैं, गले में लटका क्रॉस देखते हैं, पांच ककार देखते हैं, पोशाक देखते हैं, भाषा देखते हैं, बोली देखते हैं, जाति देखते हैं, उम्र देखते हैं और यह देखते हैं कि नर हैं या मादा; इससे आगे उनका ध्यान ही नहीं जाता? कुछ भी कहें तो प्रतिक्रियाएँ आती हैं – ‘तुम्हारे अन्दर का ब्राह्मणवादी बोल रहा है’, ‘दलित-विरोधी बोल रहा है’, ‘स्त्री-विरोधी बोल रहा है’, ‘पुरुष-वर्चस्ववादी बोल रहा है’, ‘भगवावादी बोल रहा है’, ‘पाकिस्तानी बोल रहा है’, ‘व्यवस्था-दूषक बोल रहा है’... और भी न जाने क्या क्या...|

कभी-कभी लगता है कि बहुसंख्यक हमें साधारण मनुष्य की तरह देखने की कोशिश ही नहीं करते| हो यह रहा है कि अपनी दृष्टि को विशेष दिखाने के प्रयास में वे लोग कुछ ऐसा देखने लगे हैं जो किसी को नहीं दिखता, कुछ ऐसा दिखाने की कोशिश करते हैं जो कोई नहीं दिखाता, कुछ ऐसा बताने लगते हैं जो उन्हें तालियाँ और दूसरों को गालियाँ दिलवाए| इसी चक्कर में वे अपनी आँखों में एक्स-रे मशीन लगाए घूमते रहते हैं| फिर कहते हैं कि देखो हड्डियाँ हैं| हड्डियाँ हैं, और वह भी नंगी हैं| सनसनी-वाद आज का प्रचलित वाद है| अपने यहाँ परेशानी यह बनी रहती है कि कहीं सनसनी के चक्कर में हमारे शब्दों को ही नंगा न कर दिया जाय, इसलिए बस चुप ही रहते हैं|

चाहे कितने भी भोलेपन से बात कही हो, पर लोग यही कहते हैं कि बेवकूफ बन कर पंजीरी खा रहा है| अपनी बात कही नहीं कि ‘असहिष्णु’ का तमगा टाँक दिया जाता है। राष्ट्रवाद की वकालत करते ही ‘संकीर्ण मानसिकता’ का आरोप लगा दिया जाता है। आत्म-सम्मान की बात की जाए तो 'बुर्जुआ' कहलाने लगते हैं। कोई समझाए इन दोस्तों को कि किसी ख़ास राजनैतिक विचारधारा से आपका विरोध है तो इसका मतलब यह हो गया कि हर व्यक्ति जो आप जैसी बात नहीं कह रहा, बुरा हो गया। अपनी बात न कह पाने का दर्द सभी को होता है। जब से राजनैतिकों ने दलित-राजनीति को अपना लक्ष्य बना दिया हैं, मुँह से बात निकलती नहीं कि आधुनिक चिंतक चीखने लगते हैं। वह दर्द क्या ज़रूरी है कि हर उस व्यक्ति को दिया जाए जिसके विचार आप से नहीं मिलते। अपनी बात कहने में भय महसूस होने लगा है कि चारों और से गालियों के पत्थर पड़ने लगेंगे। मैंने भी सोच लिया है कि भई, बस अब चुप ही रहा करेंगें|

लो जी, ये नया फैशन  है... एक और प्रवृत्ति सोशल मीडिया में देख रहा हूँ, वह है लोगों को एकदम से खारिज कर देने की। रोहित की आत्महत्या बहुत बड़े सवाल छोड़ जाती है| बहुत सारे खुलासे भी कर जाती है| पहला तो यह कि प्रगतिशीलता के झंडे का डंडा बने हुए मानवता के पैरोकार, असल में मानवता के पैरोकार हैं भी या नहीं और या फिर सिर्फ अपनी आवाज के प्रेमी हैं| समस्या को भावनात्मक रूप से देखने लगते हैं| खुद देखें तो भी कोई समस्या नहीं, लेकिन होता यह है कि दूसरों को भी भावनात्मकता की आड़ में छलने लगते हैं| इस देश का आम नागरिक बहुत भावुक है| अपने को चतुर समझता है लेकिन असल में होता बहुत भोला है| चतुर तो वे होते हैं जो उसे दुनिया को सही नज़र से देखने ही नहीं देते| सही नज़र का मतलब हैं – अपनी नज़र से| वे सुहाने लगने वाले चश्में आँखों पर चढ़ा देते हैं और छोड़ देते हैं चोट खा-खा कर फुदकने के लिए और स्वयं दूर खड़े होकर तमाशा देखते हैं| आने-जाने वाले कौड़ी दो कौड़ी सामने डाल देते हैं तो वे पहुँच जाते हैं उठाने के लिए| फुदकने वाला इसी बात से खुश कि उसके सामने कुछ खैरात डाली गयी थी और इस खुशी के आलम में वह यह देखना भी भूल जाता है कि जो उसके सामने फेंका गया था वह असल में गया किस की जेब में| कभी कह देता हूँ कि दूसरों के नाम पर आप क्यों खा रहे हैं तो चीखने लगते हैं, चिल्लाने लगते हैं यही वजह है कि मैंने कुछ कहना ही बंद कर दिया है|

वे कोई भी बात कहते हैं तो यह सोचकर ही कहते हैं कि वे सही हैं, उनका दृष्टिकोण ही सही और सभी के लिए प्रयोज्य है| इस समय मैं जातिवाद के सन्दर्भ में बात कर रहा हूँ। जो हज़ारों साल तक हुआ वह आज के समय के लिए अनुपयुक्त व्यवस्था के अंतर्गत हुआ| आज की परिस्थिति में वह सर्वथा अनुचित है। प्रत्येक मनुष्य को जीने का और सम्मान के साथ जीने का हक़ है| यह तय है कि कुछ लोग किसी न किसी कारण से नहीं चाहते होंगे कि व्यवस्था में बदलाव हो, लेकिन इसका अर्थ यह तो नहीं कि सभी सवर्णों को गालियाँ दी जाएँ| सभी को मानवता का क्रूर हत्यारा कहकर पुकारा जाए| लांछनों से बचना है, लांछन लगाने की प्रवृत्ति से बचना है; इसीलिये चुप रहता हूँ|

एक मित्र ने बताया कि यह गाली-गलौज इसलिए होती है, क्योंकि सदियों तक समर्थ-जन असमर्थ-जन को दबाते-कुचलते रहे हैं| तथ्य बिल्कुल पक्का है| इसमें कोई संदेह नहीं है कि ऐसा हुआ है| लेकिन यह भी तो कोई नियम नहीं है कि समाज में किसी न किसी को पिसना ही पड़े| एक बात बताऊँ, सैंकड़ों-हज़ारों लोगों के साथ हुई बातचीत के आधार पर कह रहा हूँ कि वे लोग जिन्हें कुचला हुआ या दलित या ऐसा ही कुछ और कहा जाता है, किसी के प्रति दुराग्रह नहीं रखते| वे केवल अपने उत्थान की बात करते हैं| लेकिन उनके स्वयंभू वकील उनके उत्थान से अधिक दूसरों की लानत-मलामत में रूचि दिखाते हैं| ध्यान से इस पूरे व्यवहार पर दृष्टि डालिए तो स्पष्ट हो जाएगा, ज़्यादातर ऐसे लोगों को अपमानित किया जाता है जो स्वयं कुचले हुए हैं और विरोध नहीं कर सकते| ऐसे ही वर्ग का व्यक्ति होने के नाते सारे अपमान सहता हूँ और अवाक् रह जाता हूँ|

मैं समाज में विभिन्न मंचों पर दूसरों के विचारों को प्रकट ही न करने देने कि प्रवृत्ति को काफी समय से पनपते हुए देख रहा हूँ| मैंने लिख दिया कि समाज में समलैंगिक-यौन-संबंधों को मान्यता नहीं मिलनी चाहिए क्योंकि यह अप्राकृतिक है, तो लोगों ने गला फाड़ कर चिल्लाना शुरू कर दिया कि नहीं ऐसा करने से तो मानवता की स्वतंत्रता का ह्रास हो जाएगा| यहाँ तक भी ठीक था, लोगों के अपने विचार हो सकते हैं और होने भी चाहियें| परेशानी तब हुई जब मेरा 'इनबॉक्स' गालियों और अपशब्दों से भर गया| ठीक है, आपको मेरी बात सही नहीं लगती तो मुझे इसमें कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मुझे भी तो आपकी बात सही नहीं लगती फिर इसमें क्या दिक्कत हो जाती है| मैं भी मानता हूँ कि भेदभाव को दंडनीय अपराध घोषित किया जाए, खाली पड़े हुए पदों को भरा जाये, आरक्षण की स्थति का पुनर्मूल्यांकन किया जाये तथा सुनिश्चित किया जाये कि आरक्षण उन्हीं लोगों को मिल रहा जिन्हें उसकी आवश्यकता है, पुनर्जागरण हो तथा जनता को जागरूक किया जाये... आदि| लेकिन आप क्यों चाहते हैं कि हर विषय पर मेरे विचार आप जैसे हों, आप ही की बात को मैं रट्टू तोते की तरह दोहराता रहूँ? आपको मेरी बात सुनना गवारा नहीं हैं और मैं आपकी बात दोहरा नहीं सकता इसीलिये ज़बान बंद ही रखता हूँ|

बस अब अंतिम बात, मुझे लगता है कि किन्हीं कारणों के चलते, जिनमें असुरक्षा, दूसरों को दबाने की आकांशा, वैचारिक आतंकवाद से लेकर स्वार्थों की पूर्ति तक कुछ भी हो सकता है; बहुत से लोग स्वयं को न्यायोचित ठहराने वाले अतएव आक्रामक, नुकीले और बहुकंटक हो गए हैं| मैं किसी राजनैतिक दल का समर्थक या प्रशंसक नहीं हूँ, किसी भी विशेष आर्थिक वर्ग का प्रतिनिधि का नहीं हूँ, किसी भी सामाजिक वर्ग का नहीं हूँ, किसी भी चिंतन-धारा का उत्पाद या उप-उत्पाद नहीं हूँ; मैं तो उस देश–समाज का सामान्य नागरिक हूँ जिसे संविधान के निर्माताओं ने तैयार किया था| विडम्बना देखिए कि आज मैं ही अल्पसंख्यक हो गया हूँ|
 
मैं सौगंध-पूर्वक कहता हूँ कि मैं अपने ही देश में स्वयं को वैचारिक रूप से दलित महसूस करने लगा हूँ।
 

2 comments:

  1. Sir..... bas Aapse main bol raha hoon .. aisa lagta hai.... lakin main itna accha nahi bol pata....

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    1. धन्यवाद, मृगांक! उम्मीद है कि बात पसंद आयी|

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