अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Wednesday, January 20, 2016

परमेन्द्र सिंह का कविता-संग्रह

१२ जनवरी का दिन अचानक महत्त्वपूर्ण बन गया। विश्व पुस्तक मेले में घूमते हुए श्री परमेन्द्र सिंह से भेंट हो गयी। उनके साथ कईं तरह के सम्बन्ध हैं - वे हमारे शहर मुज़फ्फर नगर के बाशिंदे हैं, बहुत खूबसूरत और अपने से लगने वाले व्यक्ति हैं, यात्राओं के शौक़ीन हैं, फोटोग्राफी के जानकार हैं और सबसे बढ़कर साहित्यिक व्यक्ति हैं। उन्होंने बहुत संकोच के साथ अपने प्रथम काव्य संग्रह 'कोई भी अंत अंतिम नहीं' के विमोचन की सूचना दी। हाल १२ में 'शिल्पायन' के स्टॉल संख्या ८३ पर लगभग २ बजे संख्या में थोड़े लेकिन कद में बड़े, लेखकों, कवियों और साहित्य प्रेमियों की उपस्थिति में बहुत अनौपचारिक ढंग से अपनत्व भरे माहौल में पुस्तक का विमोचन हुआ।

९६ पृष्ठों की पुस्तक में ६३ कविताओं को चुना गया है। पुस्तक का कलेवर आकर्षक बन पड़ा है। आवरण पर प्रयुक्त रंग और चित्र पुस्तक का प्रथम परिचय, और काफी हद तक बिलकुल सच्चा परिचय दे देते हैं। संग्रह में संकलित कम-ओ-बेश सभी कविताओं में एक ख़ास तरह की उदासी और ज़ोर लगाकर अपनी और खींचने वाली अस्पष्टता लगातार बनी रहती है। एक उदाहरण देखें,

अधिकांश लोग
लगभग संतुष्ट हैं
शेष अधिकाँश से
लगभग अधिक हैं ।  (लगभग जीवन ) 

परमेन्द्र अपनी धुन में अपने ही रास्ते पर चलने वाले कवि हैं इसलिए कईं बार उनकी कतिपय रचनाओं में काव्य-शिल्प के प्रचलित मानदंडों का उल्लंघन होता सा लगता है किन्तु, कविता की तो राह होती ही नई है। देखें,

गाँव के मैदान जिसे
उनमें लगने वाले मेलों के नाम से अब भी जाना जाता है
बाकी दिनों में अब वहां सिर्फ सन्नाटा टहलता है
जहाँ लोगों का कुछ खोया नहीं बचपन के सिवा
(कृपया उस चिड़िया का सन्दर्भ ग्रहण करें जो दाना चुगते ही
गायब/हो कर दी जाती है) (गाँव - दि विलेज : एक रफ ड्राफ्ट)

कविता का सौंदर्य केवल शब्दों में ही गुम्फित नहीं होता, केवल भाव-विचारों से ही नहीं खिलता, केवल अलंकार ही उसे पारिभाषित नहीं करते बल्कि कवि की नीयत भी उसे शरीर देती है। एक ईमानदार अभिव्यक्ति देखें,

पगडंडियाँ  बनाता है प्रेम
पगडंडियाँ जो जाती हैं
नदी तक
नदी
जिसमें पगडंडियाँ  नहीं होती । (पगडंडियाँ  बनाता प्रेम )

कवि का स्वर अनेक स्थलों पर जनवाद की उद्घोषणा करता है, लेकिन कवि का जनवाद आक्रामक नहीं हैं, वह तो परिस्थिति का बयान भर है। एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि कवि अपनी तरह सोचने को मजबूर कर रहा हो। कवि तो स्वयं ही परिस्थितियों को समझने में व्यस्त है। कवि जानता है कि किसी भी परिवर्तन के लिए यह समझना बेहद महत्त्वपूर्ण है कि वर्त्तमान स्थिति में आखिर दिक्कत क्या है! एक जगह कवि कहता है,

सूखता है हलक
गला छीलती है साँस
मगर गा रहे है हम स्वागत गीत
लहूलुहान हाथों से
राजपथ सजा रहे हैं
बजा रहे हैं समय का नगाड़ा
चकमक के उजाले में
घुल रही है हमारे उछाह की गमक
यहीं कहीं धूल खा रहा होगा
हमारे आँसुओं से भीगा रूमाल। (हम )

प्राय: रचनाएँ बहुत छोटी-छोटी हैं लेकिन इतना तय है कि उनका कथ्य कतई छोटा नहीं है। परमेन्द्र संवेदना को बेचते नहीं है इसीलिए उसका शो-केस भी नहीं सजाते। वे अपनी छुअन को एक बीज की तरह अपने पाठक के सामने रखते हैं। पाठक का काम है उसे हवा-पानी देना है और अगर पाठक ऐसा कर पाता है तभी दृष्टि को विस्मित कर देने वाला अर्थ सामने प्रकट होता है। द्रष्टव्य है,

चलती है हवा
हिलते हैं पेड़
गिरते हैं सूखे पेड़
बहती है हवा
झूमते हैं पेड़
कि झरते हैं पीले पत्ते (जीवन)

कवि विरोधाभास का सहारा लेकर भी अपनी बात कहता है। लेकिन इतना ज़रूर है कि यह विरोधाभास किसी बाजीगर की बाजीगरी नहीं है। यह कबीर की उलटबांसियों सा जानदार है। विरोधाभास का प्रयोग चमत्कार पैदा करने के लिए नहीं हुआ है बल्कि इसलिए हुआ है कि कभी कभी उलटे को सीधा देखने के लिए उलटा ही होना पड़ता है।  देखें,

उसने कल रात -
जिजीविषा पर कविता लिखी
सुबह -
वह मृत पाया गया
बंद कमरे में
रस्सी से लटका हुआ। (जिजीविषा)

परमेन्द्र की कविता-संसार को रचने की अपनी ही शैली है। वे धीरे-धीरे ज़मीन तैयार करते हैं फिर बिना किसी त्वरा के तैयार भावभूमि पर विचार का बीज-वपन करते हैं। वे कविता के भाष्यकार नहीं हैं, वे तो उसके सूत्रकार हैं। आधुनिक मुहावरे में कहें तो उनकी प्राय: सभी कविताओं की आत्मा उस 'पंचलाइन' में होती है जो कविता के आरम्भ, मध्य या अंत कहीं भी आ सकती है। अक्सर इसका अनुमान होने लगता है कि पंचलाइन अब आने वाली है। कविता की  आनुमानिकता उबाऊ नहीं बनाती अपितु वैसा ही मानसिक तोष देती हैं जैसा बीज बोने पर हुआ करता है कि अब अंकुर निकलेगा। या भोर का तारा दिखाई देने पर कि अब सूरज निकलेगा। देखें,

मैंने कहा -
अब बस!
तब से
मेरे पास
न लोक है, न उसकी धुन
बस
मैं हूँ - अपनी धुन में। (अपनी धुन में )

आज के समय में जब शब्दों का प्रयोग वैमनस्य फैलाने में, आक्रोश एवं पीड़ा की अतिरंजनापूर्ण अभिव्यक्ति में, हठ-धर्मिता के प्रकाशन में और कुढ़न का आभासी (वर्च्युअल ) रूप प्रस्तुत करने में करने में हो रहा है; परमेन्द्र की सहज एवं सरल अभिव्यक्तियाँ अर्थ को उसकी पूरी उदात्तता के साथ प्रस्तुत करने में सफल होती हैं।  देखिए,

मैं टूटी फूटी सड़क पर
गंधाते कचरे से बचते हुए
नाक रूमाल से ढांप
सुरक्षित हिस्से से होकर
गुजर जाता हूँ
अपनी धुन में गुनगुनाता - सोचता
और खुद को
आधुनिक होने की मुबारकबाद देता हूँ। (समकालीन )

कहना न होगा, 'कोई भी अंत अंतिम नहीं' पठनीय, संग्रहणीय और मननीय काव्य-रचना है। कवि की सोच, उसका चिंतन, उसका मनन, उसके डर, उसकी खीझ और उसका अनमनापन पाठकों को गहरे तक छू जाता है। यह रचना भाषा या भाव का कोई नया मुहावरा तो नहीं घड़ती, लेकिन जो है और जैसा है उसे बिना तल्खी के और बिना तकल्लुफ के सामने रख देती है।

साधुवाद!

2 comments:

  1. आपके स्नेह और उदारता का आभार... आपकी प्रतिक्रिया मुझे भविष्य में दिशा देगी... धन्यवाद...

    ReplyDelete
    Replies
    1. परमेन्द्र जी, आप नैसर्गिक कवि हैं| किसी दिशा-निर्देश की आपको आवश्यकता नहीं है| जो मन में आता है, बेलाग कहिए| अभिव्यक्तियाँ अपने आप उत्तमोत्तम होती जायेंगी| कविताएँ पढ़कर अच्छा लगा| आपका ही,

      Delete