अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Saturday, January 9, 2016

नवजात बालक का रुदन

ब्लॉगबाजी करते हुए चार महीने हो गए हैं| इतने ही दिन हुए हैं दूसरों के ब्लॉग पढ़ना शुरू किये हुए| दूसरों के ब्लॉग इस लिए पढ़ने शुरू किये कि भई, ज़रा देखें तो सही किसके चिट्ठे में क्या बंद है| अपने प्रेमपत्र पढ़ने से कहीं अधिक आनंद दूसरों के पढ़ने में आता है| फिर, इसमें एक स्वार्थ भी जुड़ा था कि तनिक इस बात की भी जानकारी हो जाये कि अपने लेखन को कैसे अधिक से अधिक लोगों के पास तक पहुँचाया जाता है| इस क्षेत्र के दो-चार पुरोधाओं को बड़ी विनम्रता के साथ चिट्ठी भी लिखी लेकिन किसी ने जवाब ही नहीं दिया| मैं जानता हूँ कि इस कला के भीष्मपितामहों के बीच अपनी हैसियत ‘नैपी’ में बंधे बच्चे से ज़्यादा नहीं है| अगर हो भी, तो वे उसे बच्चे से ज्यादा दिखने नहीं देते| वे जो करते हैं ठीक ही करते होंगे, लेकिन मैं तो अपने जन्म के बाद की कियाँ-कियाँ लगातार सुनाता ही रहता हूँ|
 
सद्य:जात बालक के रोने की आवाज़ शायद दुनिया की सबसे ख़ूबसूरत आवाज़ है| यह आवाज़ पहचान देती है| ज़िंदा होने का पहला अहसास देती है| भविष्य की कल्पनाओं के पंखों का पहला रोंआ होती है, यह आवाज़| लम्बी प्रतीक्षा की समाप्ति की घोषणा है| इस रुदन में सूरज के पारदर्शी प्रकाश में घुले-मिले सात रंगों सरीखी सारी भावनाएँ गुंथी रहती हैं| यह आवाज़ पवित्रता और कोमलता का अप्रतिम अहसास होती है| बस आजकल ऐसी ही आवाज़ के साथ पुकारता हूँ| अभी इसमें मिलावट नहीं हुई है|
 

एक पाठक ने लिखा कि अच्छा हुआ आपने ब्लॉग शुरू किया| कुछ नयी तरह का पढ़ने को मिल जाता है| लेकिन सही बात तो यह है कि यहाँ नया है ही क्या? सब पुराना ही है बस बाज दफा उसे नए रूप में पेश कर दिया जाता है| कोई विचार, भावना, अस्तित्व, पदार्थ ऐसा नया नहीं हैं जिस पर कभी लिखा ना गया हो| बात समझ की है| आशय यही है कि जब लेखक नए सन्दर्भ जोड़ने में सफल हो जाता है उसे ही नया लेखन कहने लगते हैं| मुझे संतुष्टि है अगर मैं घटनाओं, भावनाओं, विचारों को नई रोशनी में देख या दिखा पाता हूँ| यूँ भी, जो लिखा जाता है वह किसी घटे हुए की पुनरुक्ति मात्र होता है|
 
ज्यादा बड़े मुद्दों पर न तो दिमाग चलाता हूँ और न ही कलम| जो सामने दीखता है और जैसा दीखता है उसी को कह देता हूँ| कुछ लोग पसंद करते हैं, फेसबुक के पेज पर लाइक भी करते हैं और कभी-कभी चिट्ठे पर टिप्पणी भी लिख देते हैं| शुरू शुरू में हर लाइक पर दिल बल्लियों उछला करता था| कोई टिप्पणी लिख दे तो घंटों तक उसका नशा रहता था| पूरी तैयारी के साथ जवाब लिखा करता था| फेसबुक के पेज पर लाइक मिले तो सोचता था कि पढ़कर लाइक किया है या बिना पढ़े ही यांत्रिक रूप से यह काम किया गया है| धीरे-धीरे सब आदत में आ गया|
 
एक समय था जब खुशखत या सुलेख का अभ्यास किया जाता था| तख्तियाँ घोटी जाती थीं| कलम तराशी जाती थीं| फाउंटेन पैन गरम पानी में धोकर साफ़ किये जाते थे| चेलपार्क की नीली स्याही खरीदी जाती थी और उसे भी अधिक ध्यानावार्जक बनाने के लिए उसमें थोड़ी सी लाल स्याही मिला दी जाती थी| मुझे याद है पैन के निब को साफ़ करते हुए कितनी सावधानी से काम लिया जाता था| बाज़ार से सादे या लाइनदार कागज़ के दस्ते लाकर उनपर खूब लिखते थे| स्याहीसोख्ता हमेशा पास रखा रहता था| अब इनमें से किसी की भी ज़रुरत नहीं पड़ती| बस थोड़ी सी सच्चाई की आवश्यकता रहती है, जिसे पाना, मेरी बात का विश्वास कीजिये, कभी कभी तो बहुत ही कठिन हो जाता है|
 
बहुत बड़ा अंतर जो पिछले कुछ महीनों में आया है वह यह है कि अब अपने लिखे को कितनों ने पढ़ा इससे अधिक महत्त्वपूर्ण यह हो गया है कि जो लिखा वह कितनी ईमानदारी से लिखा है| इसके बाद दूसरी बात जो अब मुझे प्रभावित करती है वह यह है कि जो लिखा है कितने दृढ विश्वास से लिखा है| दृढ विश्वास या कन्विक्शन लेखन की आत्मा है, यह बात समझ में आने लगी है|
 
एक और काम आजकल होने लगा है| पहले जो घटना मात्र हुआ करती थी उसमें से अब कहानियाँ निकलने लगी हैं| कहानियों के सिरों में से विचार निकलने लगे हैं| विचारों की अंगुलियाँ पकड़े घूमती समस्याएँ दिखाई देने लगी हैं| समस्याओं के आसपास भिनकती अस्पष्टता और अनिर्णय की मक्खियाँ दिखाई देने लगी हैं| दुविधा से गुस्सा और गुस्से से असंतोष जनमने लगा है| खीझ की स्थिति लगातार बनी रहने लगी है| जब लिखने बैठता हूँ तो वही कागज़ पर उतरता जाता है जो दिखाई देता है| विद्रूप को सजाकर प्रस्तुत करने की कोशिश का मन ही नहीं होता| इसी लिए जो जैसा है, वैसा ही उकेर देने की कोशिश रहती है|
 
एक ब्लॉगलेखन के दिग्गज ने सलाह दी कि लेखन में बिकने वाला मसाला भी मिलाओ| राय दी है तो भले के लिए ही दी होगी, इसमें कोई शक नहीं है| मासाला मिलाना आसान है, लेकिन ऐसा करने में परेशानी यह है कि मसाला ही मसाला रह जाता है, मूल स्वाद गुम जाता है| मैं चाट की दूकान नहीं चलाता| कड़वाहट को कड़वाहट के रूप में बाँटता हूँ, बेचता भी नहीं केवल बाँटता हूँ| अगर बेचूँगा तो मुझे मजबूरन वह तैयार करना पड़ेगा जिसे चटोरे पसंद करते हैं| मेरा उद्देश्य केवल जुड़ना है, उन लोगों से जिन्हें सच की ज़रुरत है|
 
दुनिया को देखकर ही दुनिया की कमियों और अच्छाइयों को देखा जा सकता है| सयाने कहते है कि आदर्श स्थिति कभी नहीं बनती, लेकिन आदर्श स्थिति बनाने के लिए कोशिश तो हो सकती है| मेरे लिए तो यह कोशिश भी किसी आदर्श स्थति से कम नहीं है| सार्थक लेखन दूध का हिसाब लिखना नहीं होता| वह घरखर्च की बही भरना भी नहीं है| अखबार के लिए खबरें लिखना नहीं है| सप्ताह में कितने हिट मिले इसका गणित नहीं है| लाला का रोज़नामचा नहीं है| वह तो कुछ और ही है, जिसकी जड़ें दूधिया से की गयी बात-चीत में हो सकती हैं और पैसे कमाने की तिकड़मों में हो सकती हैं| बस, यहीं से मैं अपनी आदर्श स्थिति पाने का सुराग उठाता हूँ|
 
विवाद में पड़ने से डरता नहीं लेकिन ‘वाद’ के चक्कर में फँसता नहीं| वाद का लेखन केवल एक विचार को पुष्ट करने के लिए होता है| मेरा मानना है कि किसी वाद के पचड़े में फंसने का अर्थ है अपनी चिन्तन-धारा को अवरुद्ध कर देना| किसी एक जगह अटक कर अपना तम्बू वहीं गाड़ देना| आगे क्षितिज पर क्या फैला है इससे कोई सरोकार नहीं रह जाना| मेरी स्थिति को दुविधाग्रस्तता के प्रति आकर्षण ही माना जाए, कशमकश की स्थिति को जीने लगना ही माना जाए, तो भी कोई चिंता नहीं है| कम से कम साँस तो चल रही हैं, धड़कने घटती-बढ़ती तो हैं, सोच कुलाबें तो भर रही है|
 
एक पाठक ने पत्र लिखकर पूछा कि आप अधिकांश समय उत्तम-पुरुष में ही क्यों लिखते हैं| मैंने भी ध्यान दिया कि हाँ, बात तो सही है| अधिकतर लेख उत्तम-पुरुषात्मक शैली में ही लिखे गए हैं| पूरी तरह तो नहीं पता लेकिन इसका कारण कदाचित् अपने कहे हुए की पूरी ज़िम्मेदारी लेना रहता होगा| अपने बात का आरोप किसी दूसरे पर करना चाहे वह काल्पनिक पात्र ही क्यों न हो, मुझे कठिन लगता है| इसके अलावा जिन अंतर्विरोधों में हमारा आज का जीवन चल रहा है, उनकी अभिव्यक्ति के लिए ‘मैं’ से उपयुक्त पात्र का गढ़ना कठिन ही लगता है| मेरे ‘मैं’ के भावात्मक उद्वेलन के अनुभवों को मेरे ‘मैं’ के अतिरिक्त और कौन शब्दों में ढाल सकता है? प्राय: ऐसा भी होता है कि दूसरों के अनुभव अपने से लगाने लगते हैं| साहित्यिक भाषा में इसे साधारणीकरण और मनोवैज्ञानिक भाषा में ‘समानुभूति’ या ‘एम्पेथी’ कह देते हैं| ऐसी स्थिति में भी मेरा ‘मैं’ बात को पूरी ईमानदारी से कहने की कोशिश करता है| एक बात कहूँ, सुना है पुराने समय में रोम में एक राजकुमार था| वह अपनी छवि पर इस कदर मोहित हो गया कि अपने ही ध्यान में घंटों बैठा रहता था| उसकी आत्म-आसक्ति इस सीमा तक बढ़ गयी कि वह स्वयं से ही विवाह करने को बावला हो गया| यह तय मानिए कि ‘मैं’ नामक पात्र को गढ़ने के पीछे आत्मा-मोह की भावना कतई नहीं है|
 
मेरी एक पाठिका ने कहा कि मेरा लेखन कई बार बहुत रूखा हो जाता है| उसने ‘सिनिकल’ शब्द का प्रयोग किया था| उसे ऐसा लगा है तो इसमें उसका सच होगा| मेरे लिए तो यही बहुत है कि उसने अपने सच को कहा तो सही| रूखापन क्या सुन्दर नहीं होता| मैंने रेगिस्तान से लेकर ऊँचे ऊँचे पहाड़ों की ख़ाक छानी है, जहाँ रूखेपन की कठोरता अपने चरम पर होती है| पर, क्या यह उस विन्यास को देखने के अनेक में से एक दृष्टिकोण नहीं है? अगर यही एकमात्र सच होता तो इन कठोरतम स्थलों पर भी जीवन क्यों पनपता? कैमरा उठाए लोग क्यों दिखाई देते? रूखेपन और खुरदुरेपन का अपना सौन्दर्य होता है|
 
अंतिम बात, ऐसा नहीं है कि सब बुरा ही है, दूषित ही है| या, मीनमेख निकालना मेरी आदत में आ गया है| सूरज के नीचे और ऊपर की हर वस्तु मूलरूप से सुन्दर ही है| उसके ऊपर विस्तीर्ण आवरण को हटाने भर की देरी रहती है, सत्य और शिव की आभा से प्रकाशमान दिव्य सौन्दर्य सामने आ जाता है|
 
यही मेरा सच है| यही मेरे लेखन का सच है|

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