अपनी बात

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Friday, December 9, 2016

मौहल्ले में क्रान्ति

श्राद्धों का मौसम चल रहा था|
कुत्ते दावतें उड़ाने में व्यस्त थे| पंडित जी अपना झोला लिए किसी घर की ओर बढ़ते दिखाई दिए नहीं कि श्वानवृन्द ऊर्ध्वकर्ण होकर उनके पीछे-पीछे चल पड़ता| इधर पंडित जी सांकल खड़खड़ा कर दरवाजा खुलने का इंतज़ार करते और उधर पूँछ-संचालन का कार्य अबाध गति से प्रारम्भ हो जाता| पंडित जी दरवाजा खोलने वाले जजमान के लिए हाथ उठाकर आशीर्वचनावली का गान करते और पीछे से कूँ कूँ का स्वर उनकी संगत देता| अन्दर से मन्त्र पढ़ने की आवाजें आती तो बाहर रसीले व्यंजनों के स्मरणमात्र से चलायमान जिह्वाओं के लपलपाने की ध्वनि| इसके बाद खानपान का कार्यक्रम प्रारम्भ होता| गलियों में घूमते हुए कुत्तों का दल चबूतरे पर रखे भोज्य-पदार्थों की ओर लपक पड़ता| आपस में खूब कहासुनी होती| छीना-झपटी के दौर चलते| दन्त-नखक्षतों का आदान-प्रदान होता| भागदौड़ होती| लड़ाई-झगड़े होते| विविध स्वरों में एक-दूसरे पर दोषारोपण होता| देखने वाले उस दिव्य दृश्य का भरपूर आनंद लेते और हँस-हँसकर उनकी चित्र-विचित्र भाव-भंगिमाओं का सांगोपांग बखान करते|
कुत्तों में कुछ नेतानुमा कुत्ते भी थे| वे लड़ते-झगड़ते थे| छीना-झपटी करते थे| काटते-खसोटते थे| खाना देने वाले के सामने दो पैरों पर खड़े होकर पूँछ भी हिलाते थे और साथ ही अपने साथियों पर यह भी जताते थे कि उन्हें वह सब पसंद नहीं|
एक दिन की बात, खाना देने वाले ने खाना दिया| कुछ को मिला कुछ को नहीं मिला| जिन्हें मिला उन्होंने थोड़ा और पाने के लिए और जिन्हें नहीं मिला उन्होंने सिर्फ पाने के लिए पेट दिखाकर और उछलकूद कर देने वाले की चिरौरी करना प्रारम्भ किया| अन्नदाता शायद बुरे मूड में था| उस दिन उसे वह सब अच्छा नहीं लगा| यह आवश्यक तो नहीं कि जो अच्छा हो वह अच्छा ही लगे| वैसे आवश्यक तो यह भी नहीं कि जो अच्छा हो वह ही अच्छा गले| कारण कुछ भी रहा हो, पर हुआ यह कि उसने एक कुत्ते के पेट पर जमाकर पादप्रहार किया| दो-चार उच्च गुणवत्ता की गालियाँ दीं| उन्हें उनके जातिनाम से संबोधित किया| और भविष्य में आस-पास न दिखाई देने की ताकीद भी कर दी|
चोटिल कुत्ते ने अपने नेताओं से शिकायत की| शिकायत हुई तो नेताओं के लिए भी कुछ न कुछ करना अनिवार्य हो गया| उन्होंने सिर जोड़कर आपातकालीन सभा की| स्वाभाविक बात थी कि एजेंडा ‘कुत्तों के आत्मसम्मान की रक्षा’ ही था| विचार-विमर्श हुआ| उस दौरान चमत्कारिक रूप से न कोई झगड़ा हुआ और न ही किसी बात पर किसी ने असहमति व्यक्त की| जन्म-जन्म के शत्रु कुत्ते एक दूसरे को अत्यंत सम्मानजनक संबोधनों से पुकार रहे थे| भाई-चारा अपने चरम पर था| कुत्तावाद नेताओं की रगों में खून बनकर बहने लगा था|
काफी लम्बे विचार-विमर्श के बाद एक छुटभैये नेता ने सुझाव दिया –
“हमें अपना प्रतिनिधिमंडल गृहस्वामी के पास भेजना चाहिए और उसे सूचित करना चाहिए कि उसकी यह हरकत हम कुत्तों पर नागवार गुज़री है| भले ही हम कुत्ते हों पर खून हमारा भी लाल ही हैं| भले ही शक्ल न मिलती हो पर उसके और हमारे कुछ गुण तो अवश्य ही मिलते हैं| सच्ची बात तो यह है कि आदमी हमारा गुरु है| हमने पूँछ हिलाना उससे सीखा, पूँछ दबाना उससे सीखा, दांत दिखाना उससे सीखा, खीसे निपोरना उससे सीखा और अगर अतिशयोक्ति न समझें तो हमने अधिकांश कुत्तापन ही उससे सीखा है|”
“भाइयों, नेता जी ने जो कहा है अपनी ओर से सोच-समझ कर ही कहा होगा, पर मेरा मत कुछ और है| मेरी बात सुनने में कठोर अवश्य लगेगी लेकिन सच्चाई यही है कि अब कुतागिरी पर उतर आने का समय आ चुका है| अगली बार जब घर का मालिक खाना देने आता है तब रोटी पकड़ने के स्थान पर उसका हाथ ही धर-दबोचा जाए|” – युवा-श्वानसंघ के गतयौवन महामंत्री ने राय दी|
दलित कुक्कुर-प्रकोष्ठ का कार्यकारी सचिव जो युवा-श्वान-संघ के महामंत्री-पद पर कई महीनों से नज़रें जमाए था, बोला –
“हमें इतना ऊपर उठने की क्या आवश्यकता है? सबसे आसान तो यह है कि उसका पाँव ही पकड़ लिया जाए| चार दांत गड़ा दिए जाएँ| बदला भी पूरा हो जाएगा और उस आततायी को सबक भी मिल जाएगा|”
एक मंझोले नेता ने कहा –
“बात तो पते की है लेकिन इससे होने वाले लाभ के साथ-साथ हानि पर भी विचार कर लिया जाना चाहिए| हमने उस आदमी की बदौलत बहुत दावतें उड़ाईं हैं| अगर हमने उसे हानि पहुँचाने की कोशिश की तो ध्यान रहे, भविष्य में एक-एक टुकड़े के लिए मोहताज हो जायेंगें| कुछ ऐसी जुगत सोचो जिसमें हर्र लगे न फिटकरी और रंग चोखा ही चोखा|”
एक बुजुर्ग नेता बहुत देर से चुपचाप बैठा था| उसके गले में एक पट्टा पड़ा हुआ था जिसे वह व्यवस्था से विद्रोह का चिह्न कहा करता था| वैसे कुछ शरारती कुत्ते उसे भूतपूर्व पालतू कुत्ता भी कहा करते थे जिसे उसकी नाफरमानियों की वजह से उसके मालिक ने बाहर का रास्ता दिखा दिया था| वह बुजुर्ग नेता अचानक ऊँचे स्वर में बोला –
“हमारे सामने चार प्रश्न हैं – किससे बदला लेना है, क्यों बदला लेना है, कैसे बदला लेना है और सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि किसका बदला लेना है? जब तक इन चार प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता तब तक हम कुछ भी करने की स्थिति में नहीं हैं| इन चार में से दो के जवाब तो मेरे पास हैं| हमें आदमी से बदला लेना है| बदला इसलिए लेना है क्योंकि आदमी ने हमारे एक भाई के पेट पर लात मारी है| कैसे बदला लेना, इस विषय पर विचार चल ही रहा है| अब सवाल यह है कि हमें किसका बदला लेना है?”
“अपने भाई का बदला लेना है|” – युवा नेता तपाक् से बोला|
“बौड़मपने की बात क्यों कर रहे हो जी? अपनी इस समझ की वजह से ही तो आज तक घास काट रहे हो| व्यक्तिगत झगड़े को सामुदायिक रंग देने का क्या अर्थ है? बदला मुझे या तुम्हें लेने की जरूरत क्या है? क्या लात तुम्हें पड़ी है? नहीं न! तो फिर? मैं तुमसे बड़ा कुत्ता हूँ इसीलिये कहता हूँ कि दूसरों के फटे में टांग अड़ाने की कोशिश मत करो| क्रांतिकारियों की तरह सोचने में अपना समय ज़ाया न करो| नेता हो, नेताओं की तरह सोचो, नेताओं की तरह|” – बुजुर्ग नेता ने उत्तर दिया|
सभा में थोड़ी देर चुप्पी छाई रही| सभी छोटे-बड़े, मंझोले-छुटभैय्ये, नए-पुराने, कुत्तावादी-रोटीवादी नेता इस बात को आत्मसात करने में जुट गए| जो अभी तक दूसरे के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार को लेकर चिंतित थे, अचानक सच्चे योगियों की तरह बाह्य से अंत: की ओर उन्मुख हो गए| कुछ काल की नितांत चिंतनपूर्ण चुप्पी के बाद एक श्वान-शिरोमणि ने प्रस्ताव रखा कि अनुभव और वरिष्ठता की कद्र करते हुए अंतिम निर्णय करने का अधिकार बुजुर्ग कुत्ते को ही सौंप दिया जाए| सभी ने इस प्रस्ताव का स्वागत किया तथा सहमति में अपनी पूँछें लहराईं| यद्यपि कुछ पूँछें ज्यादा ऊँची नहीं उठी थी तथापि अंतिम निर्णय का अधिकार बुजुर्गवार को दे दिया गया|
बुजुर्ग नेता ने रात के समय आमसभा बुलाई| मौहल्ले के कोने-कोने से तरह तरह के कुत्ते सभा में शिरकत करने के लिए आने लगे| रामल्ला हलवाई की भट्ठी के पीछे कुत्तों का जमावड़ा हो जाने के बाद बुजुर्ग नेता अपने चेले-चपाटों के साथ आ पधारे| चेलों ने किंकिया-किंकिया कर कुक्कुर जाति की प्रतिष्ठा में नारे लगवाए| सम्मान प्रदर्शित करने के लिए नेताजी के पट्टे को बार-बार चाटा| नेताजी की प्रशस्ति में कूकरी-गान का आयोजन हुआ| इसके बाद पूरे तामझाम के साथ नेताजी भट्ठी पर चढ़ गए| उन्होंने एक बार पुन: जाति का जयघोष किया फिर गला खँखार कर बोले –
“भाइयों और भगिनियों, आज के ऐतिहासिक अवसर पर इतने श्वान-सम्मर्द को देखकर मेरा ह्रदय गद्गद् हो गया है| अब मैं दावे के साथ कह सकता हूँ कि हमारी जाति की सम्मान-रक्षा कठिन नहीं है| जैसा कि आप सभी जानते ही हैं कि एक मनुष्य ने हमारे स्वत्व को ललकारा है| हमारी खुद्दारी को गाली दी है| यह एक मनुष्य और एक कुत्ते के बीच जन्मा कोई साधारण विवाद नहीं है| यह तो टकराव है बुर्जुआ प्रवृत्ति और सदियों से दबाई-कुचली जा रही आम जनता की आवाज का| समय आन पहुँचा है कि जब हमें अपनी थूथनी को ऊँचा उठाकर अपने वंशजों के साथ हुए अपमानजनक व्यवहार का प्रतिकार करना होगा| हे युगकर्णधार, कुक्कुर-समाज! अगर तू आज इस विष को पी गया तो तेरी आने वाली नस्लें गुलामी के अभिशाप को हर पल भोगेंगी| साथियों, अगर आज आप लोग चुप्पी साध गए तो कभी भी बोल न पाओगे| मेरा विश्वास मानो, आने वाले समय की अदालत में आप लोग हाथ बांधे अपराधियों की तरह कटघरे में खड़े किये जाओगे|”
चारों ओर से हुंकारें भरने की आवाजें आने लगीं| सदियों से टांगों के बीच में घुसी हुई पूँछें अचानक ऊपर उठकर बड़े वेग से लहराने लगीं| कोई-कोई वीर तो मारे जोश के अपने पिछले पंजों से जमीन खुरचने लगा| नाक सिकुड़ कर ऊपर की ओर चढ़ गईं और दांतों के किनारे सड़क के खम्भे पर लगी जलती-बुझती ट्यूब की रोशनी में चमचमाने लगे| लगा कि क्रान्ति मौहल्ले की सीमा तक आ पहुँची है|
बुजुर्ग नेता ने एक बार चारों ओर नजरें घुमाकर सामने सामने बैठे कुत्तों पर अपनी बात के असर को परखा और फिर संतोष के साथ आगे कहना प्रारम्भ किया-
“हमारे सामने एक ही रास्ता है और वह है असहयोग का| पितृपक्ष चल रहा है| कल भी कोई न कोई दुष्ट मनुष्य खाना देने आयेगा| आजा-आजा, ले-ले, तो-तो की ध्वनि के साथ हमें पुकारेगा| हमें अपने मन पर काबू रखना होगा| मन कहीं भटक न जाए इसलिए किसी ऐसी जगह जा छिपाना होगा जहाँ से न तो वह हमें दिखाई दे और न ही हमें उसकी आवाज सुनाई दे| एक न एक दिन मजबूरी का मारा मनुष्य अवश्य जी हमारे पास आयेगा और हमसे खाने के लिए मिन्नतें करेगा| उस समय हमारा पलड़ा भारी होगा और हम अपनी शर्तों पर उसे नचाएंगे| बोलो, है मंजूर?”
चारों ओर से आवाजे आने लगीं –
“मंजूर है, मंजूर है| आपकी बात बिलकुल सही है| ऐसा ही होगा|”
इसके बाद सभा समाप्त हुई| नेताजी की जयजयकार हुई| कुत्ते छोटे छोटे दलों में अपनी भावी विजय पर चर्चा करते हुए प्रस्थान कर गए| सड़क के खम्भे पर लगी ट्यूब और भी तेजी के साथ जलने-बुझने लगी|
अगला दिन आया| कुत्ते मनुष्यों के घरों के आसपास ही घूमते रहे| वे मनुष्य के सामने ही उसकी रोटी छोड़कर जाना चाहते थे| वे अपने असहयोग को यथाशक्ति अभिव्यक्त करना चाहते थे| जैसा कि नेताजी समझाया था, उनके लिए यह अस्मिता का प्रश्न था| मान-सम्मान का प्रश्न था| कुत्तों के दिमाग में यह बात घर करा दी गयी थी कि उनका भविष्य दाँव पर है| अतीत की कालिख से निकलकर वर्त्तमान की रोशनी में आने जो अवसर उन्हें नेताजी की अनुकम्पा से मिला था उसे किसी भी कीमत पर वे खोना नहीं चाहते थे|
कुत्तों की दृष्टि द्वारों पर टिकी थी| धीरे-धीरे परीक्षा की घड़ी आन पहुँची| एक दरवाजा खुला| हाथ में भोज्य-पदार्थ लिए मनुष्य बाहर निकला| उसने कुत्तों को पुकारा| तय योजना के अनुसार कुत्ते मुँह फेरकर वहाँ से चलते बने| मनुष्य ठगा सा यह दृश्य देख रहा था| उसकी समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करे|
तभी उसने एक बूढ़े कुत्ते को अपनी ओर आते देखा| उसके गले में पट्टा पड़ा हुआ था| उसकी पूँछ बड़ी तेजी के साथ हिल रही थी| उसकी आँखों में खुशामद की चमक भरी थी| कुत्ते ने आते ही जमीन पर लेटकर अपना पेट दिखाया| कूँ कूँ की आत्मसमर्पणात्मक ध्वनि की| आदमी ने खाना उसके सामने फेंक दिया| कुत्ते ने क्षणभर में भोज समाप्त किया| कुछ बचे हुए टुकड़े उठाकर अपने चेलों-चमचों के लिए एक ओर छिपाकर रखे और योजना के उत्तरार्द्ध का पालन करते हुए किसी गुप्त स्थान पर छिपने के लिए चला गया|
यह एक ही दिन हुआ हो, ऐसा नहीं है| यह घटना रोज-रोज दोहराई जाने लगी| आज भी दोहराई जा रही है| बुजुर्ग नेताजी का स्वास्थ्य उत्तरोत्तर उत्तमता की ओर बढ़ता जा रहा है| असहयोग भी जारी है| सब योजना के अनुसार ठीक-ठाक ही चल रहा है|
बस मौहल्ले के कुत्ते थोड़े असमंजस में हैं कि क्रान्ति मौहल्ले की सीमा को पार करके भीतर क्यों नहीं आ रही है|

चित्र http://www.davidbellugi.com से साभार

Sunday, December 4, 2016

बूढ़े पेड़ की चिड़ियाँ और गिलहरियाँ

र के सामने एक कटहल का पेड़ है; भरा-भरा, घना-घना, चमकदार पत्तों वाला| पेड़ के डालियों पर कुछ मिट्टी के बर्तन टंगे हुए हैं जिनमें पानी और कुछ दाना मुसलसल पड़ा रहता है| सुबह के समय तोते आते हैं, टें-टें करते हुए दाना चुगते हैं| उनके बाद गौरैय्या, कौए और जंगली फाख्ता आसपास मंडराते रहते हैं|| शाम के समय तो नज़ारा और भी कमाल का हो उठता है| गिलहरियाँ चिक् चिक् करती हुई भागदौड़ करती रहती हैं| यूँ तो लगभग सभी परिंदों से उनकी ठनी रहती है, पर तोतों के साथ उनकी अदावत का तो कोई ठौर-ठिकाना ही नहीं| गिलहरी अकेली हो तो तोते उसे पास फटकने नहीं देते और तोता अकेला हो तो गिलहरियाँ उसे दाने पर चोंच मारने नहीं देती| दिन भर खूब रौनक बनी रहती है|

जब भी इस पेड़ पर होती हुई हलचल को देखता हूँ तो बचपन फिर से ज़िंदा हो जाता है; भागदौड़, किलकारियाँ, हँसी-ठिठोली, बेसिर-पैर की लम्बी लम्बी बातों का अथक सिलसिला| गज़ब के दिन थे| सुबह तो उतनी प्रिय नहीं होती थी लेकिन पता नहीं क्यों, पर उस जमाने में शामें बहुत शानदार हुआ करती थीं| ऐसा भी नहीं था कि शाम किसी एक ही ख़ास तरीके से गुजारी जाती हो| कोई तयशुदा नियम नहीं था| सब मन-मर्जी पर आधारित था| कभी किसी दोस्त के घर के बाहर चबूतरे पर बैठ कर दुनिया जहान की बाते छौंका करते तो कभी ‘चौड़ी गली’ के चक्कर लगा आया करते थे| जब बचपन अपने आखरी चरण में पहुँचाने लगा तब बातचीत का विषय कई बार प्रेम-प्रसंग हुआ करते थे| इसमें कोई छिपाने वाली बात है नहीं कि मैं उस उम्र की बात कर रहा हूँ जब प्रेम अक्सर इकतरफा ही हुआ करता था| प्रेम की मर्यादा का भी कोई ख़ास ख्याल नहीं होता था| प्रेम की अलग-अलग गलियों में न जाने कितने चक्कर लग जाया करते थे| आस-पास ही नहीं दूर-दूर तक बसने वाली परियों सरीखी सूरतों के बारे में अधिक जानकारी रखने वाले साथी, दोस्तों के समाज में विशेष सम्मान के साथ देखे जाते थे| कभी-कभी तो उनके प्रति सम्मान से ज्यादा ईर्ष्या का भाव मन में जड़ें जमा लेता था| गली-मौहल्ले की साथिनें जिनके साथ छोटेपन में इक्कल-दुग्गल खेला करते थे, उम्र के इस पड़ाव पर पहुँचते पहुँचते दूरी सी बनाए रखने लगती थीं| छोटे-छोटे झुण्ड बनाए गली में से बेपरवाह निकल जाया करती थीं| उनकी दबी-दबी हँसी दूर जाते जाते उत्फुल्ल खिलखिलाहट में बदल जाया करती थी| किसी छोटे मोटे काम के बहाने कहीं उनके घर जाने का अवसर मिल जाता तो दिन बन जाया करता था|

अच्छा, एक कमाल की बात यह थी कि अपने से ज्यादा दूसरों के प्रेम की जानकारी रखना महत् कार्य माना जाता था| मौहल्ले के ‘बल्लू’ चचा का तीसरी गली में रहने वाले ‘चंदू’ मुनीम के घर काफी आना-जाना रहा करता था| यह आना-जाना मुनीम जी के दूकान पर जाने के बाद ही संपन्न हुआ करता था| लड़कों को जल्दी ही इस बात की भनक लग गयी| बल्लू चचा आसपास से निकलते तो मौहल्ले के नालायक लड़के जिनमें खाकसार का नाम भी शुमार होता था, एक दूसरे को ललकार कर एक ही साँस में ‘चंदू के चाचा ने, चंदू की चाची को, चांदनी रात में, चांदी की चम्मच से, चटनी चटाई’ का जाप करने के लिए कहा करते थे| ‘बल्लू’ चचा भी कभी-कभी रुककर, मुस्कराकर लड़कों के इस खेल में शामिल हो जाया करते थे| लड़के एक दूसरे को कोहनी मारते और उनकी उपस्थिति से आनंदित होते|

‘चंदू’ मुनीम की घरवाली जो ‘मुनीमनी’ के नाम से जानी जाती थीं, जब चलती थीं तो उनके दोनों हाथ कोहनी के आगे से दायें-बाएँ हवा में फैल जाया करते थे| ऐसा लगता था जैसे वे हवाई जहाज बनकर हवा में उड़ने की तैयारी कर रहीं हों| लड़के आपसी बात-चीत में उन्हें ‘हवाई-जहाज’ ही कहा करते थे| ‘गिन्नू’ ने एक बार ‘बल्लू’ चचा से बहुत मासूमियत से पूछ लिया, “चचा, सुना है आजकल हवाई जहाज उड़ाना सीख रहे हो?”

‘बल्लू’ चचा ने उससे भी ज्यादा मासूमियत के साथ जवाब दिया, “हाँ बेटा, सीख तो रहा हूँ, इसके बाद हैलिकॉप्टर उड़ाना सीखूँगा|”

यह संवाद सुनकर आसपास बैठे सभी लोगो के पेट में हँसते-हँसते बल पड़ गए| ‘गिन्नू’ तो बस शरमाकर रहा गया| अच्छा, हैलिकॉप्टर वाला मामला ये था कि ‘गिन्नू’ की दादी का स्वर बहुत ही भयानक था| जब बोलती तो ऐसा लगता मानों कोई हैलिकॉप्टर उड़ने की तैयारी कर रहा हो| उन्हें आपसी हँसी मज़ाक में हैलिकॉप्टर कहकर ही पुकारा जाता था|

उस जमाने में स्कूलों में नैतिक शिक्षा भी पढ़ाई जाती थी लेकिन उसका अलिखित नियम यही था कि पुस्तकों का महत्त्व केवल परीक्षाओं तक सीमित होना चाहिए| लिहाजा, कक्षा से बाहर कोई उसकी ज्यादा परवाह करता नहीं था| गजेन्द्र प्रताप जैन उर्फ़ ‘गज्जू’ वकील लड़कों के लिए किसी खलनायक से कम नहीं थे| उसकी वजह यह थी कि जब भी गली के लड़के बीच सड़क पर विकेट बना कर क्रिकेट खेलते तो जाने अनजाने में गेंद उनके घर चली जाया करती थी| बात यह थी कि गज्जू वकील की एक हमारी हमउम्र पोती थी; दूध सी गोरी, छुईमुई सी नाज़ुक| रोज़ सुबह स्कर्ट पहन कर ‘होली एंजिल्स कान्वेंट स्कूल’ में पढ़ने के लिए जाया करती थी| किसी ने उसे न तो कभी भी किसी बात ही करते देखा था और न ही वह किसी की ओर देख कर कभी मुस्कराया ही करती थी| जी. आई. सी., ग्रेन चैम्बर और एस. डी. इंटर कालेज में पढ़ने वाले हममें से कुछ उसे ‘सय्याद की कैद में फँसी बुलबुल’ की तरह देखा करते थे तो कुछ न जाने क्यों उसके अंग्रेजी स्कूल में पढ़ने के लिए जाने से बेचैनी महसूस करते थे| इसके पीछे ‘हिंदीवाद’ या ‘राष्ट्रवाद’ की भावना तो कतई नहीं थी, इतना तो विश्वास के साथ कहा जा सकता था|

जहाँ तक गेंद का बकील साहब के घर में जाने वाला मामला था, कुछ लोग अनाड़ियों की तरह उलटा सीधा बल्ला घुमाते हुए गेंद को उनके दालान में पहुँचा देते थे और कुछ मंजे हुए निशानची इस बहाने उनकी पोती के दर्शन पाने के उद्देश्य से जानबूझ कर कौशल दिखाया करते थे| कई बार उनके घर के शीशे भी इस चक्कर में शहीद हो जाया करते थे| वकील साहब खलनायक के रूप में इसलिए देखे जाते थे क्योंकि उनमें सहनशीलता कतई नहीं थी| धीरज भी नहीं था| दो पैसे के शीशे टूटने पर नित्य ही हमारे पिताओं से हमारी शिकायत करते जिसके चलते हर दूसरे दिन किसी न किसी घर से बेंत फटकारने की आवाजें आया करती थीं| अब आवाजों का क्या है, वे जितनी शिद्दत के साथ पैदा होती थीं उतनी ही शिद्दत के साथ वातावरण में विलीन भी हो जाया करती थीं| कोई भी समय ऐसा नहीं आया कि जब किसी ने भी अपने घर में बाबा, पिता, ताऊ या चाचा के हाथों होने वाली अपनी कुटाई को स्वीकार किया हो| यद्यपि कुटाई की घटना को सार्वजनिक रूप से माना तो नहीं जाता था तथापि बदले की सामूहिक भावना दिनों-दिन बलवती होती जाती थी|

आखिरकार दीवाली पर अवसर मिल ही गया| वकील साहब धन-तेरस के दिन हलके नीले रंग का नया स्कूटर लाये| उसे मंदिर ले गए| पंडित जी को दक्षिणा देकर उसपर स्वास्तिक का निशान बनवाया| उस समय तो हमने इस बात पर बिलकुल विचार नहीं किया कि जैन होने के बावजूद भी उन्होंने सनातन धर्म मंदिर के पुजारी से स्कूटर के सुख, शान्ति और सुरक्षा के लिए उसके हैंडिल पर कलावा क्यों बंधवाया था| अलबत्ता अब जरूर इस बात को सोच कर थोड़ा अजीब लगता है|

हुआ यह कि दीपावली के दिन लड़कों को वकील साहब का स्कूटर बाहर खड़ा मिल गया जिसे देख कर एक साथी के दिमाग में बहुत ही मौलिक विचार ने जन्म लिया| पप्पू की छत पर सबको इकट्ठा किया गया| थोड़े बहुत विचार विमर्श के बाद ‘काण्ड’ करने पर आम सहमति हो गयी| सबने एक-एक रुपया जमा किया| रुपया देना सभी के लिए आवश्यक था ताकि घटना में सभी की भागीदारी रहे और बात खुलने की संभावना को नकारा जा सके| जमा किये गए पैसों से मुर्गाछाप एटम-बम लाया गया| एक सिगरेट और माचिस भी खरीदी गयी| बम के पलीते को सिगरेट में जोड़कर सिगरेट सुलगाई गयी| मुन्नू ने सिगरेट की आग को तेज करने करने के लिए उसमें दो चार गहरे-गहरे कश भी लगा लिए| मन्नू का सिगरेट पीने का यह पहला मौक़ा था जिसका परिणाम यह हुआ कि वह खाँसते खाँसते बेदम सा हो गया| कुछ लोग थोड़े घबराए लेकिन पप्पू ने अपने हाथ से उसके मुँह को दबाकर ज्यों ही “साला, टीबी का मरीज” कहकर उसकी भर्त्सना की, उसकी खाँसी अपने आप ही रुक गयी| दो साथियों ने बम को प्लांट करने का जिम्मा लिया और ले जाकर स्कूटर के ‘स्पीडोमीटर’ के ऊपर स्थापित कर दिया| सभी साथी तितर-बितर हो गए और अलग-अलग ठिकानों पर छिप कर दम साधे हुए धमाके की प्रतीक्षा करने लगे| दिलों के धड़कने की आवाज़ अपने पास में खड़े साथी को भी साफ़ साफ़ सुनाई दे रही थी| मौसम में हल्की ठंडक के बावजूद कनपटियों पर पसीना चुहचुहाने लगा था| कुछ ही समय के बाद ‘धड़ाम’ की आवाज के साथ स्कूटर के ‘स्पीडोमीटर’ के परखच्चे उड़ गए| ध्यान देने पर उसमें से लाल-नीले तार बाहर लटकते हुए दिखाई दिए| मन में कुछ वैसी भावना जागी जैसी राजगुरु, भगत सिंह और सुखदेव के मन में असेम्बली में बम विस्फोट के बाद जागी होगी| पर्चे फेंकने और नारे लगाते हुए अपनी गिरफ्तारी देने का न तो नैतिक साहस था और न ही उसकी कोई आवश्यकता ही प्रतीत हुई|

इस घटना को अंजाम देने के बाद सभी साथी एक-एक करके वहाँ से खिसक लिए और पहले से तय की हुई जगह यानि स्टेशन पर फिर से मिले| सभी काँप रहे थे; कुछ उत्साह से तो कुछ डर से और कुछ उत्तेजना से तो कुछ योजना की सटीकता और सफलता से जनमी प्रसन्नता से| बहुत देर तक इस घटना को तरह तरह से कई बार बखाना गया| एक दूसरे को कसमें देकर इस भेद को भेद ही बनाए रखने के लिए कहा गया लेकिन होनी को तो कुछ और मंजूर था| न जाने कैसे हमारे घर वापस पहुँचने से पहले ही हमारे अल्पजीवी राज का पर्दाफाश हो चुका था| उस दिन तो सभी के घर में धुंआधार आतिशबाजी हुई| खूब बम और पटाखे फूटे|

अगले दिन जब हम सब मिले तो किसी ने भी अपने शरीर पर पड़े ‘नील’ छुपाने की कोशिश नहीं की| वे हमारे प्रतिशोध के बदले में मिले हुए पदक जो थे|

कटहल का बूढ़ा पेड़ अपने भूरे मजबूत तने से टिका यूँ तो अक्सर ऊँघता सा रहता है, लेकिन परिंदों के पंखों की फड़फड़ाहट और गिलहरियों की उछलकूद से बीच-बीच में नींद से जाग भी जाता है और फिर देर तक हवा की ताजगी को अपने पत्तों की सिहरन में महसूस करता रहता है|




चित्र lesliepaints.wordpress.com से साभार

Sunday, October 30, 2016

दीपावली की मंगल-कामनाएँ

प्रिय पाठकों,

समय का चक्का घूम कर फिर वहीं आ पहुंचा है, जहाँ एक साल पहले था। बहुत कुछ बदला है और बहुत कुछ बदलाव की तरफ बढ़ा भी है। उठा-पटक जारी है जो काफी हद तक अच्छा लक्षण है। समय ठिठक कर रुक जाए तो साँस थमने लगती है। इतिहास ने हमें एक ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा कर दिया है जहां हम न केवल अपने लिए बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए भी सही निर्णय ले सकते हैं। हमारे हाथ आने वाली नस्लों के सामने क्षमा याचना में जुड़े होंगे या आशीर्वाद में उठे होंगे, यह हमें तय करना है। 

सुन रहे हैं कि आजकल स्वतन्त्र चिंतन फैशन में है। अगर ऐसा है तो फिर फतवों की बाढ़ सी क्यों आयी हुई है? जिस सोच को दिमाग के काले अंधियारे कोनों में  जकड कर रखा गया है, उसे बाहर निकाला जा सके तो ही सच्ची दीपावली है।

वर्जनाओं और मर्यादाओं के उच्छृंखल विरोध को जरा सा टोक कर और जरा सा रोक कर भावना और तर्क के मिलेजुले सतरंगी प्रकाश में जीवन को देखा जाए तो ही यह प्रकाश का पर्व सार्थक हो सकता है।

रामराज्य, जो कभी आदर्श था आज झगड़े का कारण बन गया है। राजनीति जो कभी लोककल्याण की वाहक थी, स्वार्थकेंद्रित हो चुकी है। राजदंड जो रक्षा के लिए था, शोषण में लिप्त हो गया है। मार्ग जो लक्ष्य पर ले जाते थे, भूल-भुलैय्या में फंसा रहे हैं। ठीक है, बहुत कुछ गलत हो रहा है लेकिन प्रश्न यह है कि क्या हम सही हैं। अपने सुधार की और हमारा ध्यान जाए तो ही यह उल्लास का पर्व, सत्य की असत्य पर विजय का पर्व जीवन में आनंद भर सकेगा। 

दीपावली संवत २०७३ की अनंत शुभकामनाओं सहित,

आपका अपना,

अरविन्दनाभ शुक्ल

Friday, October 21, 2016

लगाना मेहंदी का

हमारी और हमारी हिन्दुस्तानी कौम की एक बड़ी गज़ब की आदत है| कहीं भी, कुछ भी चल रहा हो हम छाती ठोक कर यह कहने में कतई संकोच नहीं करते थे कि हमारे देश में तो यह पहले से होता आ रहा है| जहाज बना तो हमने कहा कि पुराने भारत में पुष्पक विमान था| चिकित्सा और सर्जरी की बात चले तो तो हम दुनिया को सुश्रुत और चरक का नाम बताते हैं| राजनैतिक व्यवस्था के सन्दर्भ में चाणक्य जिंदाबाद हैं| पर्यटन की बात हो तो हमारे सारे ऋषि-मुनि हमारी इज्जत बचाने को मैदान में आ उतरते हैं| कम्प्यूटर की बात चलते ही वैदिक गणित के सिद्धांत सामने चक्कर काटने लगते हैं| इस धरा का बाबा आदम ही निराला है|

ऐसी ही एक कला है – 'टैटू'| जब पहली बार यह शब्द सुना था तो बड़ा हास्यास्पद सा लगा था| पड़ौस के लटूर चंद जी के बेढंगे आवारा पुत्र टीटू का चित्र ज़हन में घूम गया था| वो तो बाद में जाकर पता चला कि सारी दुनिया में टैटू बनवाने का बड़ा भारी चलन है| सुना है कि इस कला की शुरुआत भित्तिचित्रों से हुई थी| समय के साथ जब दीवारें कम पड़ने लगीं तो शरीर पर ही चित्र और इबारतें लिखी जाने लगीं|

हमारी रिसर्च कहती है कि टैटू मेहंदी का ही एक अन्य रूप है| पुराने समय से मेहंदी और आलता हमारे देश में लगाया जाता रहा है| मेहंदी लगाने का फैशन आज भी कम नहीं हुआ है| इस फैशन का प्रभाव हर हिन्दुस्तानी घर में है तो भला हमारी कुटिया भी उससे कैसे बच जाती! वैसे तो श्रीमती जी बारह महीने हमारे नाम को रोया ही करती हैं लेकिन साल में एक दिन ऐसा आता है जब वे हमारे नाम का व्रत रखती हैं| करवाचौथ का व्रत होता बड़ा मुश्किल है| इससे जुड़ी मुश्किलों को हम भली भाँति जानते हैं| इस बात का आभास जो वर्ष भर कराया जाता है| सबसे जबर बात तो यह है कि हम जैसे निकम्मे नाकारा पति को पाने के उपलक्ष में ईश्वर को धन्यवाद देना पड़ता है, इससे अधिक कठिनाई की बात और क्या हो सकती है!

हाँ, बात मेहंदी की चल रही थी| तो, हुआ यह कि आज करवाचौथ की पूर्व-संध्या पर श्रीमती जी ने जिद पकड़ ली कि आज तो मेहंदी लगवानी ही है|

“ऐसी क्या जरूरत आन पड़ी|”

“एक वजह हो तो बताऊँ, यहाँ तो सैंकड़ों हैं|”

हमने भी ताव में आकर कह दिया, “चलो बताना शुरू करो| देखते हैं तुम्हारी वजहों को भी|”

जवाब में कहने लगीं, “पहली वजह तो यह है कि करवाचौथ के दिन मेहंदी लगाना अच्छा शगुन होता है| करवाचौथ के कार्यक्रम की इसी से शुरुआत हुआ करती हैं|

हमने भी कह दिया, “शुरुआत तो मुहर्रम की भी मेहंदी से ही हुआ करती है| यह तो कोई बढ़िया वजह नहीं लगती|”

क्षणभर की चुप्पी के बाद जो दूसरी वजह बताई गयी वह थी, “मेहंदी एक नाज़ुक सा श्रृंगार होता है|”

इसके उत्तर में हमने भी बता दिया, “सिर और दाढ़ी के बाल रंगने में भी मेहंदी को काम लाया जाता है| सब्जी बेचने वाले मुल्ला जी के चेहरे और खोपड़ी पर जो लाल-लाल रंगत बनी रहा करती है वह मेहंदी से ही होती है| उनके चेहरे पर तो हमें तो श्रृंगार या फैशन कभी नजर नहीं आया| अलबत्ता, हमेशा ऐसा ही लगता है जैसे कहीं से होली खेल कर ‘आलू ले लो, बैंगन ले लो’ की पुकार लगाते चले आ रहे हैं|”

थोड़ा नरम होते हुए और आँखों में प्रीत की रंगत डालते हुए उन्होंने अगली वजह बताई – 
सदियों से मेहंदी का रंग पिया के प्रेम को मापने का पैमाना माना जाता रहा है| मेहंदी का जितना गहरा रंग रचता है, पति उतना ही प्रेम करने वाला होता है| मेहंदी के रंग से पति के प्रेम की गहराई का पता चलता है|”

हमने जवाब दिया, “यह तो मेहंदी न लगवाने का सबसे बड़ा कारण है| बंद हो मुट्ठी तो लाख की, खुल गयी तो फिर ख़ाक की| अच्छा-खासा जीवन चल रहा है क्यों उसमें तूफ़ान पैदा करना चाहती हो?”

आज श्रीमती जी हार मानने के मूड में नहीं थी| वैसे तो कभी रहती भी नहीं लेकिन आज का तो नज़ारा ही कुछ और था| कहने लगीं, “मेहंदी की तासीर ठंडी होती है| इसे लगाने से रक्तचाप नीचे आ जाता है, दिमाग में शान्ति पड़ती हैं और सारी जलन-चुभन शांत हो जाती है| याद नहीं बचपन में जलने से जब फफोले पड़ जाया करते थे, माँ तुरंत उनके ऊपर मेहंदी का लेप कर दिया करती थी| मुँह में छाले पड़ने पर भी मेहंदी का ही प्रयोग किया जाता था|”

इसका उतर देने के लिए यद्यपि हमारे पास बहुत सारी सामग्री थी, तथापि दूरदृष्टि और पक्का अनुशासन दिखाते हुए हमने अपनी भावनाओं पर लगाम लगाई फिर बात को घुमा-फिरा कर कहा, “तासीर के ठंडा होने से क्या होता है? दिमाग की गर्मी तो वह दूर करने से रही| गुस्सा जो हमेशा नाक पर रखा रहता है उसका उपचार ज़रा सी मेहंदी से कहाँ हो सकता है, भला! रही बात रक्तचाप की, तो वह भी उस ऊंचाई पर पहुँच चुका है कि जहाँ से उसका नीचे आना असंभव ही है| दिमाग की शांति पच्चीस साल पहले ही खो चुकी है| अब उसके अवशेष खोजने से भी क्या बनेगा? बचपन में जो मेहंदी आती थी वह शुद्ध होती थी लेकिन अब तो मेहंदी भी कैमिकलों से रची हुई होती है| वह क्या जलन दूर करेगी? जहाँ तक बात मुँह के छालों की है, उनका तो अच्छा न होना ही भला है| मुँह के छालों के साथ साथ दिल के छालों का भी इलाज हुआ करता तो कुछ बात भी होती|”

हमने तरह तरह से समझाया लेकिन बात न मानी जानी थी और न मानी ही गयी| स्कूटर स्टार्ट किया, देवी जी को पीछे बिठाया और पलटन बाजार की तरफ रवाना हो गए, जहाँ मेहंदी लगाने वाले सड़क के किनारे पर छोटे-छोटे स्टूल लगा कर सारे शहर की महिलाओं के हाथों पर मेहंदी रचाने के लिए तैनात थे| थोड़े भाव-ताव के मेहंदी लगाने की प्रक्रिया प्रारम्भ हुई, जो तकरीबन आधा घंटे तक चली| काम पूरा होने के बाद चंद सलाहों का दौर चला और उसके बाद हमने श्रीमती जी को स्कूटर पर पीछे बिठा कर घर की तरफ कूच किया| चूंकि दोनों हाथ मेहंदी से रचे थे इसलिए अमूमन हमारी कमर पर टिकने वाले उनके हाथ हवा में ही झूलते रहे| स्कूटर का बैलेंस संभालना कठिन हो गया| हम लहराते हुए सड़क पर चले जाते थे| रास्ते पर चलने वाले गाहे-ब-गाहे डपट देते थे जिसमें श्रीमती जी भी अपना सम्पुट लगा देती थीं, “कैसे चला रहे हो, ठीक से चलो, ना|”

खैर, जैसे तैसे घर पहुँचे| घर पहुँच कर पता चला कि घर की चाबी तो है ही नहीं| श्रीमती जी ने उलाहना देते हुए कहा, “तुम्हें पता था कि मेरे हाथ में मेहंदी लगी है तो तुमने चाबी अपने पास क्यों नहीं संभाल ली थी| अब देखो, गिर गयी कहीं|”

गरीब ने रोज़े रखे तो दिन ही बड़े हो गए| किसी तरह ताला तोड़कर घर में दाखिल हुए| शाम हो चुकी थी| समस्या थी कि खाने की व्यवस्था कैसे हो| खाना बनाया गया| यह बताने की कोई जरूरत तो नहीं ही रह गयी है कि खाना किसने बनाया होगा| बनाने की समस्या का समाधान हुआ तो खाने की समस्या सामने थी| हमने खुशी के साथ श्रीमती जी को अपने हाथ से खिलाने का प्रस्ताव किया जिसे हमारे ऊपर कृपा करते हुए उन्होंने मान भी लिया| प्रक्रिया लगभग पंद्रह मिनट चली जिसमें पच्चीस बार हमें इस काम के लिए भी अयोग्य साबित किया गया| ग्रास कभी छोटा हो जाता था, कभी बड़ा| कभी सब्जी कपड़ों पर गिर जाती थी तो कभी कपड़े सब्जी पर| कभी हम मुँह में चम्मच डालना भूल जाते थे तो कभी मुँह में से चम्मच निकालना|

हमने किच-किच से परेशान होकर कह दिया, "कहो तो बछड़े को तेल पिलाने वाली नाल तुम्हारे लिए खरीद लाऊँ या कहीं से कोई ऐसी स्ट्रॉ खरीद कर लाऊँ जो पानी के साथ साथ दाल, चावल, रोटी भी मुँह में पहुँचा दिया करे|"

आखों में आँसू भर कर देवी जी ने कहा, "मैं तो कल तुम्हारे लिए उपवास रखने की तैयारी कर रही हूँ और तुम हो कि ज़रा सा काम करना पड़ गया तो आँय-बाँय बोलने लगे|"

हमें लगा कि अब कल उपवास रखने का इरादा बदलने वाला है| हमारा जीवन, स्वास्थ्य और कल्याण खतरे में पड़ने को ही है| हमने आजिज़ी से कुछ कुछ चापलूसी के साथ कहा, "ऐसी तो कोई बात नहीं है| बस एक सुझाव दिया था, अच्छा नहीं लगा तो हम अपना सुझाव वापस लेते हैं|"

बस अगले कुछ घंटे हम किसी कमेरी सुघड़ गृहणी की तरह घर की साफ़-सफाई, चूल्हे-चौके में ही लगे रहे| बीच-बीच में आधुनिक काल के शिष्टाचार को भी सराहते रहे जिसके चलते अब कोई भी बिना पूर्व सूचना दिए घर में आने की हिमाकत नहीं करता| बच्चे सालों साल से हो रही दुर्घटनाओं के आदी हो चुके है सो, वे भी अब इस तरह की बातों का संज्ञान नहीं लेते| उन्हें यह सब सामान्य लगने लगा है|

आज का दिन तो चलिए किसी तरह लगभग निकल ही गया है, लेकिन कल क्या होगा जब उपवास का प्रभाव श्रीमती जी के स्वाभाव की सारी नरमी सोंख लेगा| बस यही चिंता खाए जा रही है|

हमारा चार दिन की ज़िंदगी में हाल है ऐसा
न जाने लोग कैसे हैं जो सौ सौ साल जीते हैं


चित्र http://www.exoticindiaart.com/ से साभार

Sunday, October 16, 2016

गरचे मतलब कुछ न हो

ऐसा लगने लगा है कि वर्तमान समय में बोलना सबसे बड़ी कला हो गयी है| कुछ भी बोलना और बोलते रहना बेशर्मी की सीमा से निकलकर जीवन की ज़रूरी कुशलता बन गया है। मन, बुद्धि और विवेक की सारी ताकत खिंच कर ज़बान पर जम चुकी है| हाथ पाँव हिलें न हिलें, ज़बान का हिलना समय की मांग हो चुकी है। जबान का हिलना ही नहीं बल्कि जबान का कतरनी की तरह चलना और चलते रहना सामाजिक आदत बन गया है। हालात यहाँ तक पहुँच गए हैं कि श्रोता सुनना बंद कर देते हैं, लेकिन वक्ता बोलना बंद नहीं करते| सड़कों पर, दूकानों में, घर में, दफ्तरों-अदालतों में, टीवी पर सभी जगह यही हाल है|

पिछले दिनों डेंगू और चिकनगुनिया का कहर छाया हुआ था| लोग बुखार और दर्द से परेशान डाक्टरों के यहाँ लाइन लगाए बैठे रहते थे| कष्ट अपनी जगह था लेकिन भाषण-प्रेमियों की भी बन आयी थी| फेसबुक, व्हाट्सएप सरीखे मंचों पर चढ़कर मित्रों ने सलाहों और हिदायतों का इतना बड़ा अम्बार लगा दिया था कि बीमारों की आधी जान तो उसके नीचे दब कर ही निकल जाती थी| रही सही कसर फोन पूरी कर देता था| सच तो यह है कि ज्ञान झाड़ने में हमारा कोई जवाब नहीं है| मुँह खुलता है तो खुला का खुला रह जाता है। देश का आम बजट आता है तो हर चौथी फेल उसकी समीक्षा में लग जाता है| अपने बच्चे संभलते नहीं, दूसरों को इस विषय पर राय दी जाती है कि बच्चों का पालन-पोषण कैसे किया जाना चाहिए| मैंने तो अड़तीस किलो के सिगरेट सरीखी टांगों वाले एक सींकिया पहलवान को ‘शरीर रक्षा के उपाय’ पर भाषण झाड़ते भी देखा है| अपने घर में पत्नी की झाड़ पड़ती है तो आवाज नहीं निकलती और बाहर सेना को सलाह देते हैं कि पाकिस्तान को नेस्त-ओ-नाबूद कर दो| फाटकेबाज़ नैतिकता का पाठ पढ़ाते हैं, मौहल्ले के पतंगबाज सरकार को विलायती जहाज खरीदने का मशवरा देते हैं, लोग-बाग बोतल में मनी प्लांट की बेल लगाकर कृषि वैज्ञानिक होने का दावा करते हैं; कहाँ तक कहते रहें बस यह समझ लीजिये - “मानहुँ पर्वत कन्दरा, मुख सब गये समाइ|”

काफी लम्बे समय से इस विषय पर चुप-चाप मनन करता चला आ रहा था कि आखिर इतना अधिक बोला क्यों जाता है| मनन तो लगातार चलता रहा था पर उत्तर ही नहीं मिल पा रहा था| इसका ज़िक्र अपने परम मित्र चकौड़ी दास जी से किया तो उन्होंने एक कमाल की बात कही –
“बोलना ऐसी कला है जिसका प्रयोग बात कहने के लिए किया जाता है, लेकिन उससे भी कहीं अधिक उसका प्रयोग बात को न कहने के लिए भी किया जाता है|”

मैंने अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा –
“चलिए, यह बात तो सही है, लेकिन समय के साथ भाषा में एक तरह का जो नंगापन आता जा रहा है; वह बड़ा खतरनाक लक्षण है| किसी भी बात को सलीके से क्यों नहीं कहा जा सकता? यह क्यों जरूरी है कि दूसरे को चोट पहुँचाने के लिए ही शब्द मुँह से निकाले जाएँ|”

मेरी बात सुनकर जोर से हँसे और बोले –
“अरे भाई, सांड को अगर कच्छा-बनियान, सूट-बूट पहनाकर उसके सामने खड़े हो जाओगे, तब भी वह सींग तो मारेगा ही|”

मैने उनकी बात से अपना ही मतलब निकालते हुए कहा –
“इसका मतलब यह है कि भाषा अपनी जगह है और भावना अपनी जगह| भावना को भाषा का मोहताज नहीं माना जाना चाहिए|”

पता नहीं क्यों यह सुन कर थोड़ा चिढ से गए| शायद कोई पुराना ज़ख्म था जिसे मैंने कुरेद दिया था| कहने लगे –
“आप भावना और भाषा की बात करते हैं, उससे पहले यह समझ लीजिए कि भाषा का जन्म होता किस उद्देश्य से है| उससे भी पहले यह समझ लीजिये कि जानवरों की कोई भाषा नहीं होती और मनुष्यों के पास भाषा के अलावा कुछ नहीं होता| जानवर अपना जीवन जीते हैं लेकिन मनुष्य अपने जीवन से ज्यादा दूसरे का जीवन जीते हैं| जितना अधिक विकसित मनुष्य-समाज होता है उतना ही अधिक विकसित उसका भाषा-बोध होता है| इसकी वजह भी सीधी सी है| जैसे-जैसे मनुष्य का विकास होता है उसमें शिकायत, चुगली, परनिंदा, आत्मप्रशंसा और श्रेष्ठता की भावना जैसे गुणों का विकास होता जाता है| इन्हीं भावनाओं की अभिव्यक्ति के लिए भाषाओं का प्रयोग किया जाता है| यही भाषा के जन्म का अंतिम उद्देश्य है|”

थोड़ा ठहर कर उन्होंने एक गहरी सांस ली और फिर बात को आगे बढ़ाया –
“देखो, भाषा और भाव का सम्बन्ध डाक्टर और कंपाउंडर जैसा होता है| डॉक्टर जो दवाई लिख देता है कंपाउंडर भी वही दवाई देता है| अगर कुछ भी इधर-उधर हुआ तो समझो कि मुसीबत को बुलावा मिल गया| फिर तुम कैसे कह सकते हो कि भावना को भाषा का मोहताज...”

अच्छा, उनकी बात अभी ख़त्म नहीं हुई थी| मैंने टोक कर कह दिया –
“भाषा तो विशुद्ध अभिव्यक्ति का साधन है| भाषा ही तो वह साधन है जिसके द्वारा हम दूसरों से जुड़ते हैं|”

एक दम सिरे से उखड़ कर बोले –
“इस कठहुज्जत से कोई बात नहीं बनेगी| भाषा का प्रयोग अपनी पीड़ा को दूसरों तक पहुंचाने में ज्यादा हुआ करता है| सड़क पर चलते हुए आपके पाँव पर किसी की गाड़ी का पहिया चढ़ जाये तब देखिये किस तरह भाषा मूर्तिमती होकर आपके मुख से निकलती है| किसी की बात आपको चुभ जाए तब देखिये भाषा किस तरह खंजर बन कर कलेजे में उतरने को तत्पर हो जाया करती है|”

आज वे पूरी रौ में थे| कंधे पर आजिज़ी के साथ हाथ रख कर उन्होंने समझाते हुए कहा –
“भाषा के प्रभाव को विस्तार से समझना हो तो एक बार दिल्ली घूम आइये| इन दिनों दिल्ली की सड़कों पर हरयाणवी खूब धड़ल्ले से बोली जाती है| चाहे डी टी सी की बसों के ड्राइवर-कंडक्टर हों या फिर गुड़गांव में अपनी जमीनें सोने के भाव बेचकर नव-धनाढ्य हरयाणवियों का वर्ग हो| आज दिल्ली में हरयाणवी धाकड़पने की भाषा है, अधिकार की भाषा है, किसी को कुछ न समझने की मनोवृत्ति की भाषा है| कानटूटे पहलवान ऊँची कार में से उतरते हैं और अक्खड़पने के साथ सामने अपनी छोटी सी कार रोककर खड़े हुए सफ़ेद कॉलर वाले साहब की माँ-बहन एक कर देते हैं| तंत्र के तो केवल पञ्च-मकार प्रसिद्ध है, भाषा के मकार तो ‘अ’ से शुरू होकर ‘ज्ञ’ तक जाते हैं, मेरे भोले!”

मैंने कहा - “इससे तो यह साबित होता है कि भाषा बौद्धिकता का प्रतिरूप है|”

तमक कर बोले –
“घंटा है बौद्धिकता का प्रतिरूप! भाषा आज का ‘स्टेटस सिम्बल’ है| फिलहाल दिल्ली की बात चल रही है तो यह भी समझ लीजिए कि बिहारी भाई दिल्ली पहुँचते हैं तो कैसे अपनी भाषा को बदलने के लिए पूरा जोर लगा देते हैं| अपनी भाषा ही नहीं बोलने की लहजा बदलने की कोशिश में चेहरे की रेखाओं में गहरापन आ जाता है, माथे की नसें उभर आती हैं और पाँव ऐसे काँपते हैं जैसे दिल्ली की जमीन में आठ डिग्री से भी अधिक ताकत का भूचाल आ गया हो| मैंने ऐसी स्थिति में कईं बार आँखों में शर्मिन्दगी और बेबसी का भाव भी जागते देखा है|”

मेरे भीतर का बौद्धिक जिज्ञासु अभी भी करवटें बदल रहा था| मैंने फिर उसकी बात को स्वर दिया –
“भाषा व्यक्तियों, संस्कृतियों और सभ्यताओं के बीच पुल का काम करती है|”

सुनकर धीरे से मुस्कराए फिर कमर पर धौल जमाया और अपनी बात को आगे बढाते हुए बोले –
“तुम भी यार पूरे घोंघा-बसंत हो| यह कोरा झूठ है| भाषा अलगाव का महामंत्र है| हमारे गाँव में एक बार बंटवारा हुआ था| जमीन-जायदाद, रुपये-पैसे, बरतन, कपड़े, आभूषण, हल-बैल, मवेशी भाइयों के बीच बांटे गए थे| बंटवारा तो हुआ था लेकिन सारा गाँव उसे रोकने की कोशिश कर रहा था| कोशिश तो कर रहा था लेकिन कोशिश की सफलता भी चाह रहा हो ऐसा कभी भी नहीं लगता था| सफ़ेद दाढ़ी वाले और ऊँची धोती वाले बुजुर्ग पग्गड़ बाँध-बाँध कर अनहोनी को टालने की कोशिश में दिखाई देने की कोशिश करते हुए दरवाजे पर जम गए| लगातार ऊँचे स्वर में बोल रहे थे| तकरार की तेजी में कमी आती तो मजे में खुद-ब-खुद कमी आने लगती थी| जहां मामला सुलझाता सा दिखाई देता तो फिर कोई ऐसी पेंचीदा बात कह देते कि महायुद्ध एक अल्पविराम के बाद पुन: प्रारंभ हो जाता| खूब तू-तू मैं-मैं हुई लेकिन होनी तो होकर रहनी थी| हुई भी| गोलियां चलीं, तलवारें लहराईं, लट्ठम-लट्ठा हुई लेकिन बंटवारा भी होकर रहा| पता नहीं वहाँ इतनी आसानी से अलगाव कैसे हो गया! शायद एका कभी था ही नहीं| घुट-घुट कर बातें करने वाले भाइयों और उनके परिवारों के बीच आज भी बोलचाल बंद है|”

बात भाषाओं के अर्थशास्त्र, मनोविज्ञान और दर्शन की गलियों में चक्कर काट कर समाजशास्त्र पर आकर दम लेने के लिए रुक गयी थी| रुकी तो बड़ा सुकून महसूस हुआ| इच्छा हुई कि काश, ऐसा हो जाए कि रुकी हुई बात बस रुक कर ही रह जाए| कुछ भी सुनना न पड़े| वैसी भी सुना जाना किसी भी क़ानून के हिसाब से जरूरी नहीं है|

हमारे परम मित्र चकौड़ी दास जी का बोलना अभी भी चल रहा है| चल रहा है तो चलता रहे| उनका तो बस यही हाल है -
ख़त लिखेंगे गरचे मतलब कुछ  हो
हम तो आशिक़ हैं तुम्हारे नाम के

Tuesday, October 11, 2016

बज रही घंटी

समस्या गंभीर थी| गंभीर! सो भी कोई ऐसी वैसी गंभीर नहीं; खतरनाक वाली गंभीर|

फिजाओं में हवा की जगह खुरदुरी रेत बह रही थी जिसमें न ज़िंदगी थी, न ताजगी| बस चारों तरफ एक अजीब सी खसखसाहट घुली-मिली थी| अन्धेरा इतना कि हाथ को हाथ नहीं सूझता था| कोई रास्ता नहीं दिखाई दे रहा था| जंगल के सारे जानवर किसे अनहोनी की आशंका से त्रस्त थे|

जानवर भी केवल जानवर न थे| एक से बढ़ कर एक बाकमाल थे, तरह तरह के चरित्र और तरह तरह के स्वभाव वाले| उनमें बहुत सारे आलोचक थे, कुछ-एक विचारक थे और दो-एक कार्यकर्ता भी थे|

समस्या थी तो उसके कुछ कारण भी थे| कारण थे, तो कारण पैदा करने वाले भी थे| सब कुछ था तो माना जा रहा था कि कोई उपाय भी होगा| जब उपाय के होने की उम्मीद थी तो उसे खोजने वाले भी होने ही थे| कोई कुछ भी अपने आप तो होता नहीं हैं| होता तब है जब उसे ज़िम्मेदारी दी जाती है| यूँ भी, वे जानवर सभ्यता के उस शिखर पर पहुँच चुके थे जहाँ अपने आप कुछ भी नहीं होता| वही होता है जो किया जाता है| तो इस सिद्धांत के तहत उपाय खोजने की ज़िम्मेदारी विचारकों को दी गयी थी|

विचारक भी कैसे? एक से बढ़कर एक! सारा डेटा दिमाग में और दिमाग? भगवान जाने कहाँ| उन्होंने बहुत सारे उपाय सोचे लेकिन उपाय सोचते सोचते समस्या को भूल गए| विचार पारे जैसे होते हैं| ज़रा सा छू भर लिया जाए तो अलग अलग दिशाओं में भागते हैं| एक बार इकट्ठा कर दिया जाए तो पता नहीं कौन सा हिस्सा किस दिशा में गया था| सब पूर्ववत हो जाता है| उथल-पुथल पूरी रहती है लेकिन नतीजा सिफर! कहने का मतलब यह है कि जहाँ से चले थे, लौट कर वहीं आ पहुंचे| इस घटना ने एक बार फिर साबित किया कि जिन्दगी एक पहिया है जो घूम-घाम कर वहीं आ रुकता है जहां से चलना शुरू करता है| जन्म, बचपन, जवानी बुढापा मृत्यु और फिर से जन्म का चक्कर चलता ही रहता है|

किसी ने याद दिलाया कि भई, समस्या को तो देख लो एक बार!

उपाय खोजने की जिम्मेदारी विचारकों की थी| उन्हें जो एकमात्र उपाय दिखाई दे रहा था वह था कि स्थिति को यथावत् रहने दिया जाए| उनका मानना था कि जब समस्या को मान लिया जाता है तब उसके समाधान की खोज में सिर खपाना लाजमी हो जाता है| वे उन लोगों को हिकारत की निगाह से देख रहे थे जिनकी समझ में पता नहीं यह छोटी सी बात क्यों नहीं आ रही थी| क्या किया जाए? दो-चार सिरफिरे सब जगह होते हैं जिनका ‘आ बैल मुझे मार’ के सिद्धांत में अटल विश्वास होता है| उन्हीं की वजह से समस्याओं का बोझ सभी को अपने काँधे पर ढोना पड़ता है| यह श्रम जैसे वाहियात विचार को जन्म देता है| वैसे वे काम करने को इतना बुरा भी नहीं मानते थे और ख़ास तौर पर उस स्थिति में तो वे काम की पूजा करते थे जब काम किसी और के द्वारा किया जा रहा हो|

तो, विचारकों का स्पष्ट मत था कि काफी सोच-विचार के बाद यह यह मान लिया जाना चाहिए कि कोई समस्या है ही नहीं| यह कोई नई बात है भी नहीं, अतीत में ऐसा कई बार हो चुका है| यूँ भी चिंता-परेशानियों को चेहरा देना नकारात्मक दृष्टिकोण है| जीवन का आनंद तो सकारात्मकता में छिपा हुआ है| नकारात्मकता कष्टों का द्वार है| वैसे भी आलोचक लोग घात लगाए बैठे रहते हैं| आलोचना से बचने का तो यह जांचा-परखा तरीका है कि कुछ न कहो और कुछ भी करने से तो पूरा ही परहेज रखो|

समाज में कुछ कार्यकर्ता भी थे जिनके पुरखे भी मूलरूप से कार्यकर्ता ही रहे थे| उनकी बात न कोई मानता था और न ही उनसे राय ली जाती थी| ये वे लोग थे जिनका सम्मान या तो एक मई को किया जाता था या फिर विश्वकर्मा दिवस को उनकी पूजा करके किनारे कर दिया जाता था| बाकी दिन उनका काम केवल हुक्म बजा लाने का ही था| कार्यकर्तागण यूँ भी विचारकों के इस दावे से परेशान रहते हैं कि वे सब कुछ जानते हैं| ‘जानने’ का परिपाक ‘न जानने’ में हो जाए तो मामला कहीं अधिक चुभने वाला हो ही जाता है| उन्होंने भी आपस में विचार-विमर्श किया और राय बनाई कि विचारकों को अवश्य ही समस्या को समझकर उसका समाधान खोजना चाहिए तथा उसे अमल में भी लाना चाहिए| इससे और कुछ नहीं भी होगा तो कम से कम कुछ करने को तो मिलेगा| हो सकता है कि बाल – बच्चों के दो-चार वक्त के खाने का ही इंतजाम हो जाए|

कुछ हठधर्मी आलोचक भी थे जो अपने बात पर अड़े हुए थे कि समस्या को अवश्य ही समस्या के रूप में देखा जाना चाहिए| राय उनकी भी यही थी कि न केवल परिस्थिति को समस्यागत माना जाए बल्कि उपस्थित समस्या का समाधान पाने का प्रयत्न भी किया जाए| जैसे ही समाधान सामने आये, उसे प्रयोग में लाने में क्षणांश की भी देरी नहीं करनी चाहिए| इसके बाद बुद्धि की निकषा पर समाधान रूपी धातु को परिणाम के आधार पर परखा भी जाना चाहिए| हद्द होती है! जीव भी कभी कभी कितना डिमांडिंग हो जाता है| साफ़ तौर पर उन्हें डर था कि अगर वे ऐसी मान नहीं करेंगे तो आलोचक के रूप में उनकी उपयोगिता पर सवालिया निशान लगने लगेंगे| विचारकों के बारे में उनकी जमी-जमाई राय यही थी कि गाय का दूध निकालने के सौ तरीके जानते हैं लेकिन गाय को नहीं पहचान पाते|

तात्पर्य यह है कि मूल समस्या तो थी ही लेकिन उसके साथ जुडी हुई कई आनुषांगिक समस्याएँ भी थीं|

मामला एक नज़र में जितना सीधा-सादा लगता था उतना था नहीं| समुद्र में तैरती हिम-शिला तो देखी ही होगी| बस, यह समझ लिया जाए कि वह समस्या नहीं थी, एक हिम-शिला ही थी| जितनी सतह पर दिखाई देती थी उसकी नौ गुना सतह के नीचे पसरी थी|

मामले पर तरह तरह से और जगह जगह पर विचार किया गया| एकाध बार प्रकाश की किरण कौंधी तो सही पर चिरस्थाई न रह सकी| किसी मनचले ने सलाह दी कि मामला वनराज के पास ले जाना चाहिए| कार्यकर्ताओं ने सोचा कि चलो कुछ समाधान मिलेगा, अपने कौशल को परखने का अवसर प्राप्त होगा| विचारकों ने भी विचार किया कि हाँ, यही सही रहेगा| राजा की मदद करने में जो मज़ा है वह इन टटपूंजियों को रास्ता दिखाने में कहाँ! शायद कुछ इनाम-विनाम का भी जुगाड़ बैठ जाए| आलोचकों को भी यह सलाह पसंद आयी| न सही समाधान, उसकी प्रक्रिया पर ही कलम चलाएंगे| अरसा हो गया कोई हॉट टॉपिक मिले हुए| आलोचक की तो ज़बान बिकती है| कौन जाने ज़बान पर लगी लगाम थोड़ी कमजोर पड़ जाए और बुराइयां देने, कीचड़ उछालने, व्यवस्था को गलियाने और व्यवस्थापकों को लतियाने का कोई संविधान-सम्मत मौक़ा हाथ पड़ जाए|

सो, सब मिलकर राजा की गुफा के द्वार पर पहुँचे और फ़रियाद की घंटी बजाने लगे|

इस घटना को घटे आज सैकड़ों साल हो गए है| घंटी अभी भी लगातार बज रही है लेकिन उसकी आवाज़ न जाने क्यों भीतर नहीं जा पा रही है| अन्दर से कुछ गाजे-बाजे की सी आवाज तो कभी-कभी आती है, लेकिन फ़रियाद को सुनने के लिए कोई नहीं आता|

चित्र http://fineartamerica.com/ से साभार