अपनी बात

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Sunday, December 27, 2015

क़त्ल के सामान

लगता है कि अपन अब बुढ़ाने लगे हैं|
 
कुछ दिन हुए, पान खाने की तलब लिए नेगी जी की दुकान तक पहुँचे ही थे कि एक पुराने परिचित भी उधर ही आ निकले| दुआ-सलाम के बाद पूछने लगे, “भई, बाल-बच्चे क्या कर रहे हैं|”
 
हमने उन्हें अपने साहबज़ादे और साहबज़ादी की पढाई-लिखाई के बारे में तफसील से बताना शुरू किया| बात पूरी भी न हुई थी कि वे कुछ ऊबे से दिखाई देने लगे| बड़ी सी जमुहाई लेकर बोले, “बच्चों के भविष्य का क्या बंदोबस्त किया है|”
 
हम कुछ चकराए, फिर कहा, “बंदोबस्त क्या करना है, पढ़ाना-लिखाना हमारी ज़िम्मेदारी है, बाकी तो उन्हें ही सोचना है|”
 
वे बोले, “क्या अहमकों की सी बात कर रहे हैं, जनाब| बंदोबस्त का मतलब हैं, पैसा, धन, संपत्ति का क्या इंतज़ाम किया है?”
 
हमने जवाब में कह दिया, “पूत सपूत तो क्यूं धन संचय, पूत कपूत तो क्यूं धन संचय|”
 
वे हज़रत हमारी उम्मीद के खिलाफ पूरे उत्साह से कहने लगे, “मियाँ, ये तो कोई बात नहीं हुई| अपनी सोच के फंदे में बच्चों को क्यों फँसाते हैं? घरेलू पौधों की जड़ें जंगली पेड़ों जैसी नहीं हुआ करतीं| कुछ और न हो तो बीमा ही करवा डालिए| कल अगर आँखें मुंद गयीं तो लड़के सर धुन-धुन कर यह शिकायत तो करते नहीं घूमेंगें कि बुढ़ऊ की छोड़ी किताबों और लोटा थाली का क्या करें!”
 
बात कुछ जमी तो सही लेकिन इतनी जल्दी इस बारे में निर्णय लेने की ताब न थी| सो, उन्हें टालने की गरज से यूँ ही कह दिया कि इस बारे में ज़रूर सोचेंगे| थोड़ी देर यहाँ वहाँ की बातचीत के बाद उन्होंने चलने का इरादा जताया और चलते चलते अपना विजिटिंग कार्ड हमारी हथेली में सरकाकर बोले कि कभी ज़रुरत पड़े तो याद कीजिएगा| कार्ड पर सरसरी सी नज़र डालकर हमने इस बात का वादा किया और घर की राह ली|
 
वास्तविकता तो यह है कि कार्ड पर लिखा नाम तो हमारी आँखों ने जैसे पढ़ा ही नहीं था, लेकिन उसके नीचे लिखी ‘बीमा एजेंट’ की उपाधि हमारे ज़हन से उतर न सकी| इसी मामले में सोचते विचारते घर पहुंचे| और, सोचना-विचारना भी ऐसा कि घंटों तक चलता रहा| चेहरा जो कि पान चबाने के बाद अक्सर होली हुआ करता था, मुहर्रम हो गया| आँखों के सामने अन्धेरा सा छाने लगा| अभी तक का किया कराया मिट्टी जान पड़ने लगा| जीवन की सार्थकता कम से कमतर महसूस होने लगी| घर पहुँचकर, मुँह ढाँपकर बिस्तर पर जा पड़े|
 
श्रीमती जी ने जब हमारा ये हाल देखा तो उन्हें बड़ा सदमा लगा| हमारी सेहत की फ़िक्र करते हुए माजरा पूछने लगीं| हमने समझाया कि सब ठीक है, कोई परेशानी नहीं है| वे मानी ही नहीं| कहने लगीं, “क्या बात है! आज न कोई लड़ाई, न झगड़ा, न कोई ताना, न कटाक्ष; दुश्मनों की तबीयत ज़रूर नासाज़ हैं| वरना तुम! तुम तो जब तक पचास जली कटी न कह लो चैन से बैठते ही नहीं| तुम्हारी आदत में आये इस फर्क की कोई न कोई तो वजह है|”
 
फिर मुस्कराकर कहने लगीं, “किसी ने तुम्हारी शक्ल को लेकर तो कोई सच्ची बात नहीं कह दी|”
 
तबीयत तो बहुत फड़फड़ाई पर तरह देकर रह गए| हमारी चुप्पी को ताड़कर थोड़ी संजीदगी दिखाते हुए हमारे माथे पर हाथ रखकर बोलीं, “आज तो तनख्वाह मिलने का दिन भी नहीं है, जो इतने बेचैन दिखाई दे रहे हो|”
 
हम फिर भी चुप रहे| तब उन्हें लगा कि मामला उतना भी सीधा नहीं है जितना वे समझ रही हैं| फिर, कुछ परेशान हो कर उन्होंने हमें अपनी सौगंघ देकर उदासी का कारण बताने को कहा| बातों में गज़ब की सच्चाई और आँखों में असली मुहब्बत देखकर हमने गर्दन ऊपर उठाई और आँखों को दीवार पर टाँक दिया| फिर दीवार के पार देखते हुए बीमा एजेंट के साथ हुई सारी बात तफसील से सुना दी|
 
एक हिन्दुस्तानी, वो भी औरत, सलाह देने से चूक जाए, वो भी अपने शौहर को; देश और कौम के अभी इतने बुरे दिन तो नहीं आये हैं| पहले तो नज़रों ही नज़रों में मुस्कराकर हमारे चुगदपने की तस्दीक की, फिर कहने लगीं कि उस बीमा वाले को बुलाकर बुलाकर उससे बात क्यों नहीं कर लेते| जिसने दर्द दिया है वही दवा भी देगा| सिफारिश पर तुरंत अमल हुआ| फोन लगाया गया| अपने चरित्र के विपरीत फोन एक ही बार में लग भी गया| एजेंट महोदय ने तुरंत पहचान लिया| अगले दिन शाम को आने का वादा किया और ठीक समय पर आ भी पहुँचे|
 
बड़ी अदा के साथ एजेंट महोदय भीतर तशरीफ लाये और सोफे पर जम गए| सिन लगभग पैंतालीस का, दुहरा पर बेहद फुर्तीला बदन, आँखों पर काला चश्मा, खूब खींच कर काढ़े गए बालों में तेल की बू, बदन पर सलेटी रंग का सफारी सूत, जूते यद्यपि पुराने और झुर्रीदार पर पालिश किये हुए, बांये हाथ में ब्रीफकेस और दांये हाथ में स्कूटर की चाबी, पानमसाले से रंगे दांत, भर्राई हुई आवाज़, ताकती हुई नज़र, करीने से तराशी गयीं मूँछें, होठों पर झेंपी सी हँसी – बस यूँ कहिए कि क़त्ल के सब सामान तैयार थे| एजेंट साहब अपनी पूरी फॉर्म में थे| घुटनों पर रख कर ब्रीफकेस खोला| उसमें से एक छोटा सा लैटर पैड निकाला| पैन निकाला| पैन निकाल कर पास में पड़े अखबार पर उसकी चाल को परखा| कुछ और भी अदद ब्रीकेस में से निकले थे मसलन एक फॉर्म, एक डायरी, एक पीली सी किताब और एक नज़र का चश्मा| चश्मा नाक पर टिका, किताब मेज पर, डायरी हाथ में और फॉर्म में बराबर में सोफे पर| उन्होंने ब्रीफकेस बंद किया, उसके ऊपर ही कोने में कागजात, किताब, डायरी आदि रखे| लैटर पैड बीचोबीच रखा गया| पैन उँगलियों के बीच घूमने लगा|
 
इसके बाद शुरू हुआ सवाल–जवाब का सिलसिला| हमारी तनख्वाह पूछी गयी| हमारे घरखर्च का हिसाब लगाया गया| सालाना इनकम टैक्स का ब्योरा लिया गया| हमारी और हमारी श्रीमती जी की उम्र पूछी गयी| हमारी उम्र सुनकर उनके चेहरे पर दया का भाव और हमारी श्रीमती जी की उम्र सुनकर प्रशंसा का भाव स्पष्ट दिखाई दिया| उस मारक अभिव्यक्ति ने हमारी देवी जी के मन में उस महापुरुष की योग्यता का सिक्का जमा दिया| हमारे बच्चों की उम्र मय दर्जे के पूछी गयी| इसके बाद उन्होंने बीमें की अलग अलग योजनाओं के बारे में विस्तार से बताना शुरू किया| इस घटना के दौरान उन्होंने कागज़ पर बहुत सारे गोले और चारखाने बनाए| उन गोलों और चारखानों के अन्दर-बाहर बहुत सी संख्याएँ लिखीं| इस बीच कईं बार पीली किताब को भी खोला| किताब में लिखी शर्तों और बीमा कराने की हालत में मिलने वाली रकम को कभी तो खुद देखा और कभी हमें दिखाया| हर योजना के साथ नई संख्या और नई शर्तें होती थी|
 
हिसाब-किताब में तो यूँ ही हम हमेशा कमजोर रहे हैं, चाहे वो पैसों का हो चाहे ज़िंदगी का| रही बात शर्तों की तो उनकी सच्चाई हमारी घिसी हुई चप्पलों में देखी जा सकती है| जब भी अपनी शर्तों पर जीने की कोशिश की तो सब दूसरे ही रहे| जब दूसरों की शर्तों पर जीना तय किया तो हम, हम न रहे| तजुर्बे ऐसे रहे हैं कि हम शर्तों से दूर ही भागने लगे हैं|
 
चलिए, उन्होंने हर योजना को सबसे बढ़िया बताया ही था| हमें लगने लगा कि चाहे जो हो हमारा सौदा बढ़िया रहेगा| वे लगातार योजनाओं के फायदे गिनाते रहे और हम सुनते रहे, अवाक्|
 
जो इल्म उन्होंने उस शाम हमें दिया था उसका सार यही था कि जीवन क्षणभंगुर है| हमारे परिवार को हमारे रहने की अपेक्षा हमारे न रहने की सूरत में ज़्यादा फ़ायदा हो सकता है| हर पल हमारे सर पर मंडराते मौत के खतरे की तरफ हमारा ध्यान खींचा और बताया कि जन्नत की हूरें किन-किन तरकीबों से हमें अपनी आगोश में लेने के लिए बेताब हैं| मौत ही क्यों उसके हिस्सों से होने वाले फायदों का भी उन्होंने प्रेम और सहानुभूति के साथ खाका खींचा| उन्होंने बताया कि दायाँ हाथ टूटने पर, बायाँ हाथ टूटने पर, पैर टूटने पर और चारों अंग टूटने पर कितना लाभ होगा| और तो और अगर ईश्वर अधिक ही कृपालु हों जाएँ तो कभी-कभी बीमित आदमी की मौत विदेश में भी हो जाया करती है| ऐसे में परिवार के एक व्यक्ति को उसे वापस लाने के लिए विदेश यात्रा का खर्च मिलने का भी प्रावधान है| हमने डरते डरते इलाज खर्च की बात चलाई तो उन्होंने दो टूक शब्दों में उसके लिए मना कर दिया| उन्होंने बताया कि इस स्कीम तहत कंपनी की ज़िम्मेदारी मरने पर हैं, ज़िंदा रहने पर नहीं| अलबत्ता, इलाज खर्च के लिए दूसरी स्कीमें भी हैं लेकिन बीमारी सूची में दी हुई होनी चाहिए| हमें इस बात का अफसोस हुआ कि ऊपरवाले ने मनुष्य को अपनी बीमारी चुनने का अधिकार क्यों नहीं दिया है| उनकी तमाम बातों को सुनकर हमारा दिल कितनी बार बैठा और कितनी बार उठा इसका अंदाजा लगाना बस उन्हीं के बूते की बात है जिन्होंने अतीत में बीमा एजेंटों के प्रवचनों को आत्मसात कर रखा हो|
 
बीमा एजेंट साथ हुई इस मीटिंग ने हमें सीख दी कि दूकानदार अच्छा हो तो मौत भी बेच सकता है| उसके करिश्माई भाषण ने हमें जीवन में मृत्यु के महत्त्व से परिचित कराया| एक क्षण के लिए तो यहाँ तक भी लगा कि ज्ञान पाने की जो लालसा गौतम बुद्ध के मन में वृद्ध, बीमार, अपाहिज और मुर्दा शरीरों को देखकर जागी थी, वही ज्ञान-पिपासा उनमें पहले ही जाग जाती अगर वे किसी बीमा एजेंट से मिल लिए होते| उनके प्रश्नों का समाधान हो गया होता| साथ ही वे किसी बीमा कंपनी में ‘विज्ञापन का चेहरा’ बन कर नोट भी छाप रहे होते|
 
अब जो हो, हमने उनकी सलाह से बीमा करा लिया है| कोई उधार देने वाला मिल जाए तो किश्त भी जमा करा ही देते हैं| इसका फ़ायदा कब होगा, ईश्वर ही जाने| मीर की बात अक्सर दिमाग में घूमती रहती हैं –
 
सब्ज़ होती ही नहीं ये सरज़मीं
तुख्म-ए-ख्वाहिश दिल में तू बोता है क्या

 
 

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