अपनी बात

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Thursday, December 31, 2015

नये साल की शुभकामनाएँ


आ रहा है, नया साल भी ससुर आ ही रहा है!
नया-नया करते ज़बान घिसने लगी है| हज़ारों रुपये डाक में फूँक दिए| कागज़, कलम, स्याही बरबाद किया, सो अलग| अब तो इन्टरनेट पर भी खर्च होता है| क्या नया हो गया, कोई बताए तो सही!
आज भी मासूम से दिखने वाले भेड़िये भेड़ों पर झपटते हैं| झाड़ियों तले सूखे पत्तों पर फुदक-फुदक कर दाना चुगती चिड़ियाँ बिलौटों का शिकार होती हैं| खरगोश मारकर उनके सफ़ेद फ़र की टोपियाँ पहनी जाती हैं| रंगे सियार सड़कों पर बेरोकटोक घूमते हैं और मनमर्जी के तमाशे करते हैं| शेरों की खालें दीवारों पर टांगी जाती हैं| परिंदे शाम को लौटकर आते हैं तो वे पेड़ ही नहीं पाते जिन पर उनका घोंसला बना था| गिलहरियों की कमर पर लदी उल्लास की पोटली खुल कर बिखर गई है|
पूर्णिमा की रातों को छोटा करके अमावस्या के हवाले कर दिया गया है| ताल-सरोवरों की तलियों पर गहरी दरारें दिखाई देती हैं| रेगिस्तान फैलाते जा रहे हैं| सूरज पर बना काला धब्बा बड़ा होता जा रहा है| घास पर  पाला पड़ता है और वह हरी से भूरी हो जाती है|
ऐसी आवाजें, जो अपनी आवाज़ से मेल नहीं खातीं दबा दी जाती हैं| हँसते मुस्कराते कार्टून भी प्रतिहिंसा जगाते हैं| रोटी के बदले बंदूकें खरीदी जाती हैं| अपनी नस्ल को ऊँचा साबित करने के लिए डी.एन.ए. टैस्ट होते हैं| सारी दुनिया जानती है कि सच क्या है पर फिर भी सालों तक मुकदमे चलते हैं और लोग बरी हो जाते हैं| सड़क के किनारे सोया गरीब मज़दूर जीने का हक़ मांग रहा है| कवितायें नीलामी में बिक रही हैं| चौपड़ की बाजियों में जर, जोरू और ज़मीन दाँव पर लगाए जा रहे हैं| भूखे पेट रोटी का हक़ माँग रहे है| बूढ़े पेड़ काटकर अलावों में जलाने के लिए टालों में डाल दिए जाते हैं|
आज भी साल के आखरी दिन छोटा सा बच्चा उन उँगलियों की खोज में है जो मछलियों के लिए छोटी छोटी आटे की गोलियां बनाकर पानी में डालती थी, गौरय्या के सामने रोटी के नन्हें टुकड़े उछल देती थीं, उलझे बालों को धीरे-धीरे सहलाकर सुलझाती थीं और आँखों में काजल डालकर बदनज़र से बचाने के लिए माथे पर काला टीका लगा देती थीं|
क्या नया हो गया, अब तो कोई बताए!
फिर भी, सभी पाठकों को नववर्ष की शुभकामनाएँ!
आपका अपना,
अरविन्दनाभ शुक्ल

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