अपनी बात

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Tuesday, December 22, 2015

नायक हैं या खलनायक


पुरानी फिल्मों में एक बहुत आम दृश्य हुआ करता था| मार-पिटाई वाली प्राय: सभी फिल्मों में होता था| होता यह था कि कहानी का नायक गुंडे बदमाशों के बीच फँस जाता था| घोड़ों पर सवार खलनायक और उसके चेले-चपाट उसे चारों ओर से घेर लेते थे| नायक घेरे को तोड़कर जाने न पाए, इसके लिए हर ओर से एक रस्सी का फंदा बनाकर उसके ऊपर फेंकते थे| नायक फंदों में फंसा होता था| उसके दुश्मनों के हाथ में रस्सी का दूसरा सिरा हुआ करता था जिसे वे धीरे धीरे खींचते थे| नायक तड़पता था, चीखता था| उसके माथे की नसें उभर आती थीं और शरीर से खून बहने लगता था| नायक के दर्द को थियेटर में बैठा हर आदमी महसूस करता था| नायक की कसमसाहट हर दर्शक को अपनी ही लगती थी|
 
अबोध था, इसलिए रस्सी के फंदे बस ‘रस्सी के फंदे’ ही दिखाई देते थे| अब उम्र बढ़ी है तो रस्सी के फंदों का सच सामने आने लगा है| जो गांठें पहले दिखाई नहीं देती थीं वे भी साफ़ साफ़ दिखाई देने लगी हैं| कसमसाहट और तड़पन किस तरह जकड़ को कही अधिक मज़बूत और यंत्रणादायक बना देती है, स्पष्ट दिखाई देने लगा है|
 
विवशता की अंतिम सीमा वह होती है, जब पता चलता है कि रस्सी के फंदे तो हमारे चारों ओर फँसे ही हुए हैं लेकिन उनके सिरे भी हमारे अपने ही हाथों में हैं, हम स्वयं उन रस्सियों को खींच रहे हैं| जाने-अनजाने अपनी गति को हम स्वयं रोके हुए हैं| अपने ही हाथों अपना दम घोंट रहे हैं| विडम्बना यह है कि एक ओर स्वयं को छुड़ाने के लिए हाथ पैर मार रहे होते हैं और दूसरी ओर पूरे बल से फंदे को कसते हुए अपनी छटपटाहट को और अधिक यंत्रणामय बना रहे होते हैं|
 
यंत्रणा की पराकाष्ठा वह होती है जब हम यंत्रणा का आनंद लेने लगते हैं| विवशता की चरम परिणति वह होती है जब हम विवशता को जीने लगते हैं| बंधन की अति वह होती है जब हम बन्धनों और वर्जनाओं में ही अपने जीवन का अर्थ खोजने लगते हैं| हम आज़ाद होना ही नहीं चाहते| गुलामी के लिए बड़ी बड़ी संज्ञाएँ बनाते हैं – परम्परा, रीति-रिवाज, एकता, समानता, सम्बन्ध, रिश्ते, व्यावहारिकता और न जाने क्या क्या| गुलामी को महिमामंडित करते ही समय निकल जाता है|
 
हम अपने लिए सुभीते की ज़िंदगी चाहते है| हम चाहते हैं कि हमारे आस-पास सांत्वना देने वाले लोग रहें| हम चाहते हैं कि दुनिया जाने कि हम पर कितना अत्याचार हो रहा है और हम कितनी घृणास्पद ज़िंदगी जीने को मजबूर किये जा रहे हैं| दूसरों की अपने प्रति सहानुभूति, अनुग्रह, करुणा और तरस की भावना हमारे लिए घृणित सा सुविधा क्षेत्र तैयार कर देती हैं| हम कीच में लोटते पशु की तरह उसी में रम जाते हैं| बाहर के संघर्ष से डरकर असुविधाओं को सुविधा के रूप में देखने लगते हैं|
 
आत्मदया हमारे जीवन की सबसे खतरनाक भावना होती है| हम अपने ऊपर ही दया करने लगते हैं| हम स्वयं को हाथी के रूप में नहीं देखते हैं जिसके पैरों में अर्गला पड़ी हुई है, जिसकी गति अवरुद्ध है, जो जंगल को गाह पाने में असमर्थ है, जो भोजन पानी के लिए दूसरों का मोहताज है| हम स्वयं को जार में बंद मछली की तरह महसूस करते हैं जो जार टूटते ही मर जायेगी| हम अपने ऊपर दया करते हैं और ईश्वर से मनाते हैं कि हमारा जार कभी न टूटे और जार में बंद चक्कर काटते रहते हैं|
 
आत्मसमर्पण शायद मनुष्य जीवन की सबसे बड़े विडम्बना है| शायद सबसे बड़ा वरदान भी| क्या है, इस बात पर निर्भर करता है कि हम हम ‘आत्म’ का समर्पण दूसरों के सामने करते हैं या ‘आत्म’ को स्वयं समर्पित होते हैं| हम प्राय: डरते हैं अपनी जिम्मेदारी अपने आप उठाने से| सोचते हैं कि अगर असफल हुए तो किसे दोष देंगे| अपनी बलि देने से डरते हैं, इस लिए बलि का बकरा खोजते हैं| सारी ज़िंदगी बीत जाती है इसी खोज में|
 
जानते है, हमारे जीवन की सबसे दयनीय अवस्था क्या होती है? वह अवस्था जब हम यह तय ही नहीं कर पा रहे होते हैं कि हम नायक हैं या खलनायक| हम यह निश्चित नहीं कर पाते कि हम अन्याय के विरोध में हैं या उसके समर्थन में| हम सुरक्षित दूरी पर रहना चाहते हैं और अपने मन में मानने लगते हैं कि हम तटस्थ हैं, किसी के साथ नहीं हैं| असल में एक बात ‘सही के साथ होना’ है और दूसरी बात है ‘सही के साथ न होना’ जिसका अर्थ ही ‘गलत के साथ होना’ होता है|
 
बंधन और आज़ादी का संघर्ष शाश्वत है| हर काल में होता रहा है| हर सतह पर होता रहा है| अर्जुन भी तो बंधनों में फंसा हुआ था, लेकिन उसके साथ कृष्ण थे| जिन्होंने बताया कि बंधनों से आज़ाद होना है तो केवल रस्सी को काट देने से काम नहीं चलेगा| रस्सियाँ तो आपस में जुड़ती चली जाती हैं| फंदे मज़बूत, विशाल और तीखे होते चले जाते हैं| हाथ काटने पड़ेंगे| रस्सी को खींचने वाले हाथ काटने होने| चाहे वे हाथ अपने हो या पराये|
 
कृष्ण क्या अर्जुन से अलग थे? दोनों एक दूसरे के भीतर थे, एक दूसरे में समाये थे, एक दूसरे से बने थे, एक दूसरे के लिए बने थे| मैं धीरे धीरे समझ रहा हूँ कि बंधनों से मुक्त होना है तो मानना होगा कि कृष्ण मेरे भीतर ही हैं| उनकी खोज में निरंतरता लानी होगी| बंधनों से छूटने के लिए कम से कम इतना तो करना ही होगा| अगर और भी कुछ नहीं, तो इतना तो समझना ही होगा कि नायकत्व और खलनायकत्व – दो अलग विचार हैं|


चित्र https://oshogeetadarshanvol1.wordpress.com से साभार
 

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