अपनी बात

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Saturday, December 19, 2015

थार के पार (४)

किशन सिंह, गाँव राईसर, बिक्कानेर, राजपूत

 
रेगिस्तान में रोज़ सात से आठ घंटे का पैदल चलना हो ही जाता है| सुबह तम्बू उखाड़े जाते हैं और शाम को लगाए जाते हैं| दोनों स्थान होते तो अलग-अलग हैं लेकिन प्रतीत एक जैसे ही होते हैं| लगता है कि दिनभर घूम-घाम कर वहीं तम्बू लगा लिए गए हैं, जहाँ से सुबह उखाड़े गए थे| लक्ष्य पर पहुँचना इतनी संतुष्टि अवश्य देता है कि चलो, आज का सफ़र पूरा| मरुभूमि की यात्राओं के दौरान न जाने कितनी बार सोचा है कि लक्ष्य से अधिक आकर्षक लक्ष्य तक पहुँचाने की प्रक्रिया होती है|
 
चित्र: डाक्टर विधुकेश विमल
जन्म और मरण में क्षणिक सुख-दुःख होता है, पर असली आनंद तो जीवन में होता है, जीवन जीने में होता है| सुख-दुःख, क्रोध-शान्ति, उत्थान-पतन सभी तो देखते-सहते हैं हम अपनी यात्रा में| जीवन के सफर में प्रेम-घृणा, आशा-निराशा, दया-क्रूरता, आदर-निरादर, विश्वास-अविश्वास जैसे अनेक युग्मों को जीते हैं| इनके मिश्रण और भी अनेकानेक भावनाओं से हमें परिचित कराते हैं| यहाँ अधिकतर भावनाएँ दूसरों के अवलंबन पर विकसित होती हैं| वे दूसरे हमारे जीवन का महत्त्वपूर्ण भाग बन जाते हैं|
 
मरुधारा की इस यात्रा में भी अनेक साथी थे, जिनके साहचर्य में सफ़र अधिक सुहावना होता गया| प्रमुख पथ-प्रदर्शक के रूप में किशनसिंह हमारे साथ थे| लगभग साठ वर्ष की वय, इकहरा और मंझोला शरीर, बड़ी-बड़ी खिचड़ी मूँछें, मिंची-मिंची सी छोटी-छोटी आँखें, उठी हुई नाक, धूप में तपा हुआ साँवला रंग, गहरी झुर्रियों से भरा हुआ मस्तक, पतली लेकिन सुडौल टाँगें और झुके हुए कमजोर कंधे उनके शरीर की रचना पूर्ण करते हैं| सर पर लहरिया साफा, कन्धों पर पट्टीदार कुर्ता, ऊँची धोती, पाँवों में स्थानीय चमरौंधा जूता और हाथ में लाठी – यह उनकी वेशभूषा रहती है| कभी-कभी कंधे पर चादर भी आ जाती है जो उनके व्यक्तित्व को और भी अधिक प्रखर बना देती है|
चित्र: डाक्टर विधुकेश विमल
 
किशनसिंह हिन्दी नहीं बोल पाते हाँ, थोड़ी बहुत समझ अवश्य लेते हैं| उनके साथ बातचीत प्राय: कुछ इस तरह होती है – वे लगातार राजस्थानी बोलते हैं जिसे हममें से कोई नहीं समझता और हम लगातार हिन्दी बोलते हैं जिसे वे किस हद तक समझते हैं इसकी तो हमें जानकारी नहीं है लेकिन हमारा अनुमान है कि बात का आशय वे पूरा समझ जाते हैं| अपनी बात कहने के बाद उनके उत्तर में से हमें कुछ बुनियादी शब्द समझने होते हैं| उन शब्दों को जोड़-जाड़ कर एक वक्तव्य बनाना होता है| मसलन, एक दिन यह पूछने पर कि रास्ता कैसा है और कितना लंबा है, उन्होंने जो उत्तर दिया उसमें हमने ये कुछ शब्द पकड़े – ‘पटड़ो, नैर, एक, लंच टैम, पाँच कोस|’ हमने अनुमान लगाया कि हमारे प्रश्न का जवाब इस प्रकार है – ‘रास्ता नहर की पटरी के साथ है| एक बजे तक हम दोपहर के भोजन के लिए नियमित स्थान पर पहुँच जायेंगे| यह दूरी यहाँ से लगभग पाँच कोस की है|’ कोस का अर्थ समझाने के लिए हमने इंटरनेट का इस्तेमाल किया जिससे पता चला कि कोस दूरी नापने का एक भारतीय माप है। प्राचीनकाल में ८,००० हाथ की दूरी को कोस कहा जाता था| आजकल यह लगभग सवा तीन किलोमीटर का माना जाता है|
 
किशन सिंह से हम लोग अक्सर उनकी ज़िंदगी के बारे में पूछते रहते हैं| उनके परिवार, बाल-बच्चों के बारे में दरियाफ्त करते रहे हैं| उनकी जीवन शैली का पता लगाने के कोशिश करते रहते हैं| लेकन वे कभी अपने बारे में खुलकर नहीं बताते| उन्हें बातचीत के केंद्र में रहना लुभाता नहीं| रास्ते चलते लोग जब उनका परिचय पूछते हैं, तब वे जवाब देते हैं, “गाँव राईसर, बिक्कानेर, राजपूत|”
 
एक साल उनका लड़का बिक्रम भी हमारे साथ आया था| उसने बताया कि किशन सिंह के चार बच्चे हैं जिनमें एक पुत्री और तीन पुत्र हैं| सभी संताने बाल-बच्चेदार हैं| किशनसिंह के घर में पचास बीघे की अच्छी-खासी खेती है| ऊँट हैं, ऊँट-गाड़ियाँ हैं| किशन सिंह ऊंटों को साधने के मामले में विशेषज्ञ माने जाते हैं| एक दिन मैंने ऐसे ही परिहास में कहा कि मैं सोचता हूँ कि एक ऊँट का बच्चा खरीद कर छोड़ दूँ| जब बड़ा हो जायेगा तो उसपर सवारी का आनंद लिया करूंगा|

चित्र: डाक्टर विधुकेश विमल
किशन जी तुरंत बोले, “थे बच्चा नी, बच्ची खरीदो|”

उन्होंने बताया कि ऊँट की अपेक्षा ऊँटनी ज़्यादा समझदार होती है| उसे सिखाना आसान है| अच्छा प्रशिक्षण मिले तो वह नाचना और थिरकना सीख जाती है| ऊँटनी की सवारी, ऊँट की अपेक्षा अधिक आरामदायक होती हैं| उन्होंने वादा किया कि वे मेरी बछड़ी की देखभाल करेंगे और उसे सवारी के लिए ज़रूरी प्रशिक्षण दे देंगें| ऊँटों के बारे में बात करते हुए उनकी आँखों की चमक एकाएक कई गुनी बढ़ जाती है| उनका एक ऊँट जिसका नाम बड़े प्यार से वे ‘राजू’ पुकारते हैं, हमारे साथ था| कारवाँ रुकते ही उसके चारा-पानी के इंतज़ाम में लग जाते हैं| सबसे अच्छी झाड़ी के पास उसे बाँधते हैं| खाना खाते हुए हमेशा अपनी थाली में से एक रोटी निकालकर उसके सामने ज़रूर डालते हैं|
 
ऊँट बड़ा विचित्र जानवर है, उसकी हरकतें भी बड़ी विचित्र होती हैं| गर्दन सीधी करके दूर क्षितिज को ताकता हुआ बैठता है तो लगता है जैसे कोई दार्शनिक विचारमग्न मुद्रा मैं बैठा हुआ हो| कभी कभी पिछले पैर भीतर की ओर मोड़कर बैठता है तथा अपने अगले पैरों के बीच छाती पर बनी स्टैंड जैसी रचना पर अपने शरीर को टिका लेता है| कभी रेत पर वो लुटलुटी लगाता है कि लगता हैं जैसे रेतीले अंधड़ का उत्स वहीं से हो| लटका हुए होंठ, शरीर के अनुपात में आवश्यकता से अधिक छोटे कान, रातभर जुगाली की आवाज़, पट्टीनुमा पूँछ, लम्बे लम्बे पैर और बिल्कुल आहट रहित चाल – कुछ ऐसा होता है यह विचित्र प्राणी| हमारे मित्र पंकज जोशी अक्सर मज़ाक में कहते हैं कि इस पशु की वजह से ही विश्व-साहित्य को कालिदास जैसा महाकवि मिला था| ना यह होता, ना कालिदास ‘उट्र, उट्र’ चिल्लाते और ना घर से निकाले जाते और ना ही अद्भुत काव्यों का निर्माण हो पाता|
 
डीज़ल पैट्रोल की गाड़ियाँ आ जाने के बाद भी ऊँट इस क्षेत्र में यातायात का प्रमुख साधन हैं, विशष रूप से कच्चे इलाकों में तो वह आज भी वह अकेला ही प्रभावी साधन माना जाता है| सामान ढोने के लिए ऊँट-गाड़ियों का प्रयोग भी किया जाता है| ये होती तो बैलगाड़ी जैसी ही हैं, लेकिन उससे ऊँची होती हैं| इनमें हवाई जहाज के टायर डाले जाते हैं| उम्र बढ़ी, पदच्युति हुई, उपयोगिता ख़त्म हुई तो हवा से ज़मीन पर पटक दिए गए| कहाँ वायुयान और कहाँ ऊँट-गाड़ी! ऊँट-गाड़ी में बैठकर चलना दुनिया की सर्वाधिक बेआराम यात्रा है| यह यात्रा और भी अधिक असुविधाजनक और अशोभनीय हो जाती है अगर आपका ऊँट ग्वार का भूसा खाता हो और आपके उसके ठीक पीछे बैठे हों| इसीलिये हमारे एक साथी ऊँट-गाड़ी को ओपन गैस चेंबर (गैस की खुली कोठरी) कहते हैं|
 
किशन जी की रास्तों की जानकारी अद्भुत है| एक बार जिस रास्ते से निकल जाए मानो दिमाग में उसका नक्शा खुद जाता है| एक अन्य ऊँटवान मेलसिंह कहते हैं, “गरूजी, किशनसिंह रे दिमाग में कम्पूटर फिट है|” सच में ऐसा ही है| रास्तों का ध्यान रखने की आदत बचपन से ही पड़ी है| जब छोटे थे भेड़-बकरियाँ चराया करते थे| थोड़े बड़े हुए तो मरुस्थल में भटकने का शौक जागा| कईं कईं दिन तक भटकते रहते थे, कभी अकेले तो कभी किसी के साथ| एक दिन उन्होंने स्वयं बताया, “गरूजी, तीस तीस कोस फिरोडूं था|” न जाने कितनी बार जाने-अनजाने पाकिस्तान की सीमा के भीतर चक्कर लगा आये थे| यह तब की बात है जब सीमा पर तारबाड़ नहीं हुआ करती थी| वे बातचीत करते हुए पबनी, सतपाल और खाजूवाला आदि सीमाचौकियों तक की अपनी यात्राओं का कई बार ज़िक्र करते हैं| मैंने स्वयं महसूस किया कि उनका दिशा-ज्ञान बहुत स्पष्ट है| जहाँ पहचान के लिए कोई चिह्न नहीं होता, अपने सहज ज्ञान से ही राह तय करते हैं| एक दिन तो मै चकित ही हो गया जब उन्होंने बताया कि जवानी के दिनों में वे बीकानेर से गोमुख तक की यात्रा भी कर चुके हैं, पैदल|
 
किशनसिंह का सम्मान हमारे लश्कर में प्रमुख सेनापति जैसा है| अंतिम निर्णय उन्हीं के द्वारा लिए जाते हैं| डेरा कहाँ लगना है, कौन व्यक्ति क्या काम करेगा – वे ही तय करते हैं| जब वे ‘मदनिया’ कहकर अपने सहयोगी मदनसिंह को आवाज़ देते हैं तो मदनसिंह पुकार पूरी होने पहले उनके सामने आ खड़ा होता है| यह बात अकेले मदनसिंह पर ही नहीं अपितु सब पर लागू होती है| कभी कभी दल के सहयोगी कर्मचारी-वर्ग में कोई झगड़ा झंझट हो जाता है तब उसका निस्तारण भी उन्हीं के द्वारा किया जाता है|
 
तीनों समय रसोइये के भोजन तैयार देने के बाद किशनसिंह अपनी देखरेख में मेज़ लगवाते हैं| करीने के साथ भोजन के पात्र सजवाते हैं| सारी तैयारी हो जाने पर आलोचक की निगाह से अंतिम बार देखते हैं और फिर सामने आकर कहते हैं, “गरूजी, खानो लग ग्यो|” वे चाहते हैं कि दल में सबसे बड़ा होने के नाते मैं ही सबसे पहले अपना भोजन परोसूँ| मुझसे पहले कोई थाली उठा ले तो उनके चेहरे पर बेचैनी का भाव आ जाता है| कभी कभी मैं उन्हें भोजन के लिए आमंत्रित करता हूँ तो कहते हैं, “हुकुम, थे पहल जिम्मो|” सैकड़ों सालों की राजशाही के चिह्न हटते हटते ही हटेंगे|
 
चित्र: डाक्टर विधुकेश विमल
पूली नंबर ८ पर एक मंत्रीजी की दुकान है| उसे नहर विभाग का कारिन्दा पुष्करसिंह चलाता है| दूकान पर देशी शराब भी मिल जाती है| हम वहाँ दोपहर के भोजन के लिए रुके थे| मुझे याद है उस दिन रसोई के सहायक मंसी राम ने उस दूकान से खरीदकर दोपहर में ही शराब पी ली थी| वह भी बेहिसाब मात्रा में| बहककर तरह तरह के तमाशे करने लगा| कूद-फाँद करने लगा| किशन जी ने उसे लताड़ लगाते हुए समझाया कि शराब पीना कोई बुरी बात नहीं है| ज़रूर पीनी चाहिए लेकिन तब जब आप कुछ काम न कर रहे हों, ऐसा नहीं की ड्यूटी के दौरान ही नशे में धुत्त हो जाओ| लेकिन मंसी ने उनकी बात को हलके में लिया| थोड़ी देर बाद पास के किसी गाँव से कच्ची दारू की दूसरी खेप ले आया और उसका सेवन करके शाम के समय नशे में कहीं गायब हो गया| सर्दियों में अन्धेरा जल्दी हो ही जाता है| सब खा-पीकर आराम करने चले गए लेकिन मंसी का कहीं अता-पता न था| पास में ही नहर थी जिसकी वजह से इस बात की भी संभावना थी कि कहीं वह नहर में न गिर गया हो| ज़ाहिर है कि वह राजस्थानी आदमी था इसलिए उसके तैरना जानने की संभावना लगभग शून्य थी| हमें यह घटना अभी तक ज्ञात न थी|
 
मैं और जोशी जी सोने की तैयारी कर रहे थे कि किशनजी ने तम्बू के सामने पहुँचकर हाँक लगाई, “गरूजी, मंसी गम ग्यो|”
 
हम दोनों चिंतित होकर बाहर निकले तो पता चला कि यह सूचना मात्र थी| किशन जी ने पहले ही सभी लोगों को छोटे छोटे दलों में बाँट कर अलग अलग दिशाओं में जहाँ उसके मिलने की संभावना थी, भेज दिया था| बाद में मंसी मिल भी गया| हमारे दल के साथ वह मंसी का आखरी दिन था| इसके बाद अगले ही दिन उसे दंडस्वरूप काम से बर्खास्त करके वापस भेज दिया गया| सेनापति ने अपना निर्णय ले लिया था|
 
किशनजी अल्पाहारी प्राणी हैं| मुझे आश्चर्य होता है कि वे दो तीन रोटियाँ खाकर भी किस तरह इतने ऊर्जावान और चपल बने रहते हैं| सूखा हुआ रोटे का टुकड़ा और थोड़ा सा गुड़ वे अपनी जेब में डाले रखते हैं जिसे समय मिलने पर पानी से गटक जाते हैं| उन्होंने बताया कि घर में तो अक्सर वे रोटी भी नहीं खाते, केवल दूध पीकर ही लंबा समय निकाल देते हैं| ‘बाजरे रा खीच’ उनका प्रिय भोजन है और रात को सोने से पहले ‘एक पाव दारू’ उनकी आदत|
 
बाबा रामदेव चौदहवीं शती के महान चमत्कारी संत थे| राजस्थान के पाँच प्रसिद्ध पीरों में उनका स्थान अन्यतम है –
 
पाबू हडू रामदे ए मंगलिया मेहा |
पांचू पीर पधारजौ ए गोगा जी जेहा ||
 
हिन्दू उन्हें बाबा रामदेव और मुसलमान रामसा पीर कहकर पूजते हैं| ये तोमर वंशी राजपूत थे तथा इनका जन्म राजस्थान के पोखरण के निकट स्थित एक रुणिचा नामक स्थान पर इनका जन्म हुआ था| इन्होंने तत्कालीन समाज में फ़ैली हुई छुआछूत, अत्याचार जैसी कुरीतियों का विरोध किया| राजस्थानी लोक में बाबा रामदेव को कृष्ण का अवतार माना जाता है|
 
एक दिन हमें बहुत सुबह मुँह अँधेरे ही निकलना था| सर्दी भयानक थी, दाँत कटकटा रहे थे| अँधेरे का समय था, हाथ को हाथ न सूझता था| घना कोहरा था जो बेदर्दी के साथ बरस भी रहा था| जोशी जी का मेदा मिर्च और तेल से पूरित भोजन के आगे आत्मसमर्पण कर चुका था| उन्होंने उस दिन पैदल न चलकर ऊँटगाड़ी में ही बैठना पसंद किया| उस दिन यह राज़ खुला कि किशन जी बाबा रामदेव के भक्त हैं| उनकी भक्ति का सबसे मजेदार नमूना उसी दिन दिखाई दिया| हुआ यह था कि ठण्ड के चलते उन्होंने कई शामों के ‘एक पाव’ सुबह-सुबह ही लगा लिया था| बकौल जोशी जी, इसके बाद तो उन्होंने सारे रास्ते बाबा रामदेव के भजन तारस्वर में सुनाए| एक के बाद एक भजन उनकी वाणी से निसृत होते रहे –
 
घर ऊजल घवली धजा, निरमल ऊजल नीर|
राजा ऊजल रामदे, परचा ऊजल पीर।।
राम कहूं क रामदे, हीरा कहूं क लाल।
ज्यांनै मिलिया रामदे, वां नै किया निहाल।।
 
फिर जैसे जैसे दिन निकला, सुरा का प्रभाव कम हुआ उनके भजनों की तीव्रता भी कम हुई| अंत में जिस तरह ईंधन समाप्त होने पर मोटर गाड़ी घरघराकर रुक जाती है, उसी तरह किशन जी की भक्ति पर लगाम लगी और वे शांत हो गए| इस घटना के बाद कई दिनों तक वे सबसे शर्माते रहे, बच बच कर घूमते रहे|
 
यात्रा समाप्त हुई और किशनजी से बीकानेर में पुन: भेंट हुई तो वे बिल्कुल बदले हुए थे| चेहरे का तेज गायब हो चुका था| आवाज़ की खनक समाप्त थी| मुखमुद्रा में बना रहना वाला अधिकार कहीं गुम हो गया था| किशनजी अपने प्रभाव के स्थान से दूर होकर सारी आभा खो बैठे थे| जंगल का शेर पिंजरे में बंद खरगोश बन गया था, सहमा और चकित सा| उन्हें इस रूप में देख कर मन में हूक सी उठी, लेकिन मैं जानता था कि रेतीले अनंत मैदानों में पहुँचाते ही उनकी रगों में फिर से खून दौड़ने लगेगा, उनकी आवाज़ की खनक लौट आयेगी, वे फिर से ‘मदनिया’ कहकर पुकारेंगे और मदनसिंह पुकार पूरी होने से पहले उनके सामने हाज़िर हो जाएगा|
 

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