अपनी बात

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Thursday, December 17, 2015

थार के पार (३)

सर्दियों में दोपहर गर्म होती हैं लेकिन रात के समय तापमान शून्य तक पहुँच जाता है| गर्मियों में पारा पचास डिग्री छू जाता है| भयंकर अंधड़ चलते रहते हैं| चेहरा ढके बिना बाहर निकलना संभव नहीं होता| राह चलते आदमी गर्मी की वजह से गिर कर मर जाते हैं लेकिन लोग फिर भी वहाँ रहते हैं, काम करते हैं, अपनी जगह से प्यार करते हैं, अपनी भूमि का सम्मान करते हैं, अपनी सांस्कृतिक पहचान पर गर्व करते हैं|
 
यहाँ के निवासी आपने इतिहास को अपने साथ लिए चलते हैं| मैने स्वयं उन्हें राजा गंगासिंह की न्यायप्रियता के किस्से कहते सुना है| राजा गंगा सिंह के प्रति बीकानेर की जनता में अपार श्रद्धा है| उनसे जुडी अनेक कथाएँ यहाँ प्रचलित हैं|
 
एक कथा के अनुसार उनके राज्य की सीमा में ढोल-नगाड़े बजाने की मनाही थी| उनके होने वाले समधी ने शहर में प्रवेश करने के बाद भी ढोल-नगाड़े बजाए तो उन्होंने उनकी गिरफ्तारी का आदेश दे दिया| नियम सभी के लिए समान थे| किसी की भी सिफारिश नहीं मानी गयी| प्रथा थी विवाह के बाद दामाद कुछ भी मांग सकता था| जब इस प्रथा के पालन का समय आया तो राजा गंगासिंह ने अपने दामाद को आगाह किया किया कि नियम तोड़ने अलावा कुछ भी मांग ले| दामाद ने अपने ससुर की न्याप्रियता का सम्मान करते हुए अपने पिता की रिहाई नहीं माँगी| बाद में किसी समय जब आम रिहाई की गयी तभी उन्हें कारावास से मुक्त किया गया| यहाँ के लोग बताते हैं कि उन्होंने ही पंजाब से पानी लाकर श्रीगंगा नगर तक नहर का निर्माण कराया था| इस उद्योग के चलते उनका खाजाना खाली हो गया लेकिन उन्होंने रत्ती भर परवाह नहीं की| उन्होंने अपने सेठों की मदद से रेवाड़ी से बीकानेर तक रेलवे लाइन बिछवा दी थी| कहते हैं, उन्होंने दिल्ली में बीकानेर की गाड़ी के रुकने के लिए प्लेटफ़ॉर्म भी खरीद लिया था| ऐसे प्रजापालक थे राजा गंगासिंह|
 
गट्टे की सब्जी, मंगोड़ी की सब्जी, पापड की सब्जी, कच्ची हल्दी की सब्जी, कढी, दाल, बाटी, चूरमा, केर सांगरी का साग, बाजरे की खिचडी और राब, बूरा-गेहूँ-जौ-चने और बाजरे की रोटी और बहुत सारा घी यहाँ के भोजन का अंग है| भोजन में तेल और मिर्च का जम कर प्रयोग होता है| किसान और चरवाहे रोटा या रोटला बनाकर रख लेते हैं जिसे प्याज-लहसुन की चटनी के साथ खाया जाता है|
 
रोटा बनाने की प्रक्रिया बड़ी दिलचस्प है| एक छोटी फुटबॉल जितना मंडा हुआ आटा लेकर एक डेढ़ से दो इंच मोटी गोल रोटी बनाई जाती है जिसे रेत पर लकड़ी जला कर सीधे आग में दबाकर ही पकाया जाता है| पंद्रह बीस मिनट में रोटा पककर तैयार हो जाता है| उसकी सतह कड़ी और भीतरी भाग मुलायम होता है| चारकोल की भीनी भीनी गंध वाला यह रोटा सभी लोग मिलबांट कर शौक से खाते हैं|
 
शराब का काफी प्रचलन है| देसी-अंगरेजी शराब के अलावा स्थानीय शराब का भी खूब प्रयोग होता है| शेखावाटी क्षेत्र की बनी हुई सौंफ की शराब पिछले कईं सौ सालों से खूब पसंद की जाती रही है| एक मित्र बता रहे थे कि घर में मृत्यु हो जाने पर बारहवें दिन शोकभंग की दावत का आयोजन किया जाता है जिसमें खूब इसरार के साथ शराब पी और पिलाई जाती है| इन्हीं मित्र ने एक दिन बातों बातों में अपनी पुत्री के विवाह की तैयारियों का ज़िक्र किया| तैयारी की प्रगति दिखाने के लिए उन्होंने अपने पलंग के बक्से का ढक्कन उठाया जिसमें तरह तरह की शराबें जमा थीं| कहने लगे कि बाकी सब तो ऊपर वाला कराएगा लेकिन यह इंतज़ाम तो आदमी को खुद ही करना पड़ता है|
 
एक अन्य मित्र को हृदय रोग हो गया था| स्थिति गंभीर हो गयी थी| काफी दिन अस्पताल में रहना पड़ा| पेस-मेकर लगा| उन्हें देखने गया तो उन्होंने अपनी बीमारी का विस्तार से वर्णन किया फिर प्रसन्न होकर डाक्टर का पर्चा दिखाया| मैं हैरान था कि डाक्टर का पर्चा दिखाना प्रसन्नता की वजह कैसे हो सकता था| जब अंतिम पंक्ति पर नज़र पड़ी तो सारा माजरा समझ में आया| डाक्टर ने तीस से साठ मिलीलीटर शराब प्रतिदिन लेने की अनुमति दे रखी थी|
 
जिंदादिली इस क्षेत्र की खासियत है| लोग जीवन को जीना जानते हैं| जीवन की तहों में छुपी मस्ती को खोजना जानते हैं -
 
मुझे पीने दे, पीने दे कि तेरे जाम –ए– लाली में
अभी कुछ और है, कुछ और है, कुछ और है साकी|

2 comments:

  1. पाठकों के लिए वीरभूमि राजस्थान का दर्शन करवाना अत्यंत सराहनीय कार्य | गंगासिंह,राजस्थान के खान- पान तथा मदिरा के बारे में राजस्थानी ग्रामीण लोगों की जिंदादिली को बहुत ही रोचक ढंग से वर्णन किया गया है|ऐसी रचनाएँ प्रतीक्षायोग्य होती हैं।

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    1. धन्यवाद, मिश्र जी| आप सरीखे पाठकों के लिए ही और आप सरीखे पाठकों के उत्साह-वर्द्धन के फलस्वरूप ही लेखन की निरंतरता प्रतिष्ठित होती है|
      राजस्थान की भूमि बड़ी विलक्षण है| प्रस्तुत लेख-श्रृंखला वहाँ के आचा-विचार-व्यवहार-मान्यता-परम्परा का दर्शन करने का प्रयत्न मात्र है| थार के पार (भाग ४) में एक ठेठ राजस्थानी ग्रामीण किशन सिंह के माध्यम से वहाँ के सामान्य जन का खाका खींचने का प्रयत्न किया है| देखिएगा, आपको अच्छा लगेगा|
      आपका,

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