अपनी बात

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Tuesday, December 15, 2015

थार के पार (२)

नहर के आस-पास जहाँ कभी रेत के टीले और ऊबड़-खाबड़ रेतीले मैदान हुआ करते थे अब हरे भरे खेत हैं| मोठ, चना, ग्वार, गेहूँ, मेथी जैसी फसलें उगती हैं| सर पर साफा बांधे किसान और रंगबिरंगे चमकीले लहंगें-चोली पहने हुए उनके परिवार की महिलाएँ फसल काटने में व्यस्त हैं| सर उठाकर ऊपर देखने की फुर्सत भी नहीं है| आजकल ग्वार की कटाई चल रही है| इस बार ग्वार का मूल्य काफी काम है| चार साल पहले ग्वार दो से तीन हज़ार रुपये के भाव से बिकता था| इसके बाद एक साल विदेशी संस्थाओं द्वारा खरीद किये जाने से भाव बढ़कर तीस हज़ार रुपये तक पहुँच गया| जहाँ कच्ची मिट्टी की दीवारों पर छप्पर डालकर घर बनाये जाते थे, वहाँ पक्के मकान ‘ठोक’ दिए गए| घर-घर में थ्रेशर जैसे यंत्र आ गए| मोटर साइकिलें दरवाज़े पर खड़ी हो गयीं| बच्चों के दाखिले प्राइवेट स्कूलों में हो गए| अगले साल हर खेत में ग्वार बोया गया जिसका परिणाम यह हुआ कि भाव अपने पुराने स्तर पर लुढ़क गया| आशा जो दिन न दिखाए थोड़ा है| सुनहरी रेल-पेल रुक गयी| औसत का सिद्धांत सक्रिय हो गया| जीवन फिर से मूलभूत स्थिरता पर लौट आया|
 
मार्ग से लगती हुई छोटी सी बावड़ी है जिसके पास एक अकेला पेड़ खड़ा हुआ है| तना सूखा और खुरदुरा है, पत्तियों का आकार अस्पष्ट सा है लेकिन उसका पूरा का पूरा विग्रह अपने आप में एक सपनीलापन समेटे हुए है| माथे तक घूँघट डाले एक छरहरी काया तांबे के मटके में पानी भरने का उपक्रम कर रही है| उसकी बाजू का गोदना और ठोढी पर बने तिल साफ़ दिखाई दे रहे हैं| उसकी कोहनी तक चढ़ी हुई चूड़ियाँ, कमर पर लटकी हुई ओढ़नी, पैरों में गिलट के कड़े और नंगे पैर आकर्षित करते हैं| चित्र लेना चाहता हूँ| हँस कर अनुमति देती हैं| कहीं कोई ग्रंथी नहीं, हिचक नहीं, है तो नितांत सरलता|
 
रेतीले खेतों के बीच रास्ते हैं जिन पर ऊँट गाड़ियाँ तो चलती ही है, ट्रैक्टर और सवारी गाड़ियाँ भी दौड़ती हैं| भेड़-बकरियों के बड़े-बड़े रेवड़ घूमते हैं| साथ चलने वाली गाड़ी के पहिए रेत में फंस जाते हैं| राह से गुजर रहा ट्रैक्टर चालक अपने साथी के साथ रुक जाता है| मदद करता है| सलाह देता है| जब तक गाड़ी नहीं निकलती वहीं रुका रहता है| यहाँ के आदमी के लिए मेरे मन में सम्मान बढ़ता ही चला जाता है|
 
कहीं दूर से ‘पधारो म्हारे देस’ की सदा सुनाई देती है| उठान सुरीली तो उतनी नहीं हैं लेकिन उसकी कशिश बरबस दिल को मोह लेती है| साथ बजती सारंगी का स्वर अपनी ओर खींचता सा महसूस होता है| मन्त्रमुग्ध होकर आवाज़ के दिशा में खिंचा चला जाता हूँ| पाँच-सात लोग सुबह के कुहासे में घेरा बनाए बैठे हैं| एक पकी हुई उम्र का दाढीवाला आदमी सर पर साफा बांधे बैठा है| अपनी कड़ी लेकिन अभ्यस्त उँगलियों को तारों पर फिरा रहा है| गाते हुए बीच बीच में तान लेता है तो उसका दायाँ हाथ अनायास ही उसके कान पर पहुँच जाता है| एक आदमी इशारे से बैठने को कहता है| एक छोटा बालक टाट का पुराना टुकड़ा मेरे सामने बिछा देता है| पास ही पतीली में चाय उबल रही है| एक पुराने स्टील के गिलास में चाय दी जाती है| चाय की भाप मेरे चश्मे पर जम जाती है| लोग मुस्कराने लगते हैं| संगीत यथावत् चलता रहता है| गायक मस्त होकर गाता है –
 
मोरिया आछो बोलियों रे ढलती रात ने,
मोरिया आछो बोलियों रे ढलती रात ने, रात ने , रात ने
, म्हारे हिवडे में बेगी रे गुजार मोरिया
आछो बोलियों रे ढलती रात ने ||
 
रास्ते में मिलने वाले लोग बिना बात-चीत किये आगे नहीं बढ़ते| ‘किसू गाँव’ एक बेहद प्रचलित प्रश्न है जिसका अर्थ है कि आप किस गाँव से आये हैं| मैं जवाब में अक्सर ‘दिल्ली’ कह देता हूँ| देहरादून कहने पर उन्हें समझाना पड़ता है कि देहरादून कहाँ है| अंत में बात यहीं आकर ख़त्म होती है कि दिल्ली के पास है| इसलिए शुरू में ही दिल्ली कहा और बात ख़त्म| शॉर्टकट से काम चलाना हमारी पीढ़ी का सत्य है| बात को आगे बढ़ाने की कला लुप्त होती जा रही है|
 
सीमा के निकट ही चौतीस गाँव हैं| ये गाँव मुख्यत: जाटों के हैं| हमारा मार्गदर्शक किशन सिंह बताता है कि यहाँ रेत के ढूह हुआ करते थे| भारत में सीमापार से होने वाली घुसपैठ की रोकथाम के बहुत सारे उपायों में से एक के तहत सरकार ने जाटों को बसाने के लिए ये गाँव आबंटित किये थे| उन्होंने अपने परिश्रम से इस निर्जन बियाबान को स्वर्ग के टुकड़े में बदल दिया है|
 
पुलिया नंबर १८ पर पानी का पम्प है| यह पम्प सीमा चौकी पर पानी की आपूर्ति के काम आता है| इसके संचालक महावीर सिंह ने यहीं अपनी छोटी सी दूकान भी खोल ली हैं जिस पर साबुन, तेल, दाल, मसाले और तम्बाकू मिल जाते हैं| महावीर ने बहुत प्यार से अपने घर चलने का आमंत्रण दिया| समय की कमी होते हुए भी उसके आग्रह को टालना उचित न लगा| तड़के ही ऊँट पर बैठ कर उसके घर मिलने चला गया| खेत के बीचोबीच निर्मित नीले रंग से पुता घर दूर से ही दिखाई दे रहा था| घर के द्वार पर नीम का पेड़ लगाया हुआ था| उस पर दो-तीन बेलें चढ़ी हुई थीं| महावीर की माँ और पत्नी ने बहुत प्यार से दूध-रोटी का नाश्ता कराया| उसका बच्चा पास ही के सरकारी स्कूल में पढ़ता है| बच्चे ने उत्साह के साथ अपनी किताब की कवितायेँ अभिनय के साथ सुनाई| पिता के आदेश पर ए, बी, सी, डी का पाठ भी बालक ने सकुचाते हुए सुना दिया| वाह अंगरेजी, वाह! तू धन्य है!
 

चित्र : डा. विधुकेश विमल
महावीर के पिता चौधरी उम्मेद सिंह बड़े धार्मिक पुरुष हैं| जब उन्हें पता चला कि मैं हरिद्वार के बहुत निकट रहता हूँ, वे भी मेरे पास आकर बैठ गए| उनकी दृष्टि से साफ़ था कि वे अपने घर आये अतिथि को माँ गंगा के प्रतीक के रूप में देख रहे हैं| उनके चेहरे की गहरी झुर्रियों में ही परिवार की सफलता और सदाशयता का राज़ छिपा हुआ था| उनकी बेबाक और बेलाग उक्तियाँ जीवन के अनुभवों की आँच में तपी हुई थीं| उन्होंने गीता-रामायण की व्याख्या और अपनी दृष्टि से उनका विवेचन सुनाया| बड़े वार्ता-रसिक व्यक्ति हैं| अपनी बात को प्रमाणित करने के लिए लोक के किस्से और इतिहास-पुराण के सन्दर्भ प्रस्तुत करते हैं| बातचीत को नियंत्रित करने की ऐसी कला बहुत कम लोगों में देखने को मिलती है| मुझे हैरानी हुई जब उन्होंने कहा कि वे पढ़े लिखे नहीं हैं| बाद में उनके पुत्र ने बताया कि वे तो अपना नाम तक नहीं लिख सकते|
...क्रमश:

2 comments:

  1. बहुत सुंदर एवमं सटीक लेखन ।
    पढ़कर ऐसा लगा,मानो आपबीती देख रहे हों ।
    साधुवाद ।

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    1. धन्यवाद, शास्त्री जी| राजस्थान है ही ऐसी लुभावनी जगह| कोशिश करता हूँ कि यात्रावृत्त सफ़र का रोजनामचा न बने| जो दीखता है उसके पार देखने की कोशिश भर है| एक दो दिन में इस यात्रा का तीसरा भाग भी प्रकाशित कर दूंगा| आपका,

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