अपनी बात

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Monday, December 14, 2015

थार के पार (१)

अभी-अभी थार मरुस्थल की यात्रा से लौटा हूँ, लम्बी पैदल यात्रा से| बीकानेर के पास एक स्थान है मेहरासर, जहाँ से सात दिन की पैदल यात्रा शुरू हुई और लगभग एक सौ पैंसठ किलोमीटर के सफ़र के बाद सांचू सीमा चौकी पर समाप्त हुई|
 
सांचू सीमा चौकी का भी अपना इतिहास है| यह सीमा चौकी भारत-पाकिस्तान सीमा पर १९६५ में स्थापित हुई और उसके बाद लम्बे समय तक पाकिस्तान के कब्जे में रही| १९७१ के युद्ध में भारत के जांबाज़ सिपाहियों ने इस पर पुन: अधिकार कर लिया| तबसे बी.एस.एफ. ही इसकी देखभाल कर रही है| अब इसके आसपास दूसरी चौकियाँ भी बन गईं हैं| वे सब भी बी.एस.एफ. की देखरेख में हैं| यहाँ के सहायक कंपनी कमांडर से बातचीत की तो पता चला कि आर्मी वाले कभी-कभी दौरा करने आते हैं| लोगों ने बताया कि वे जब आते हैं आते हैं तब कुछ छोटी मोटी सुविधाएं जैसे मोबाइल फोन की ‘कनेक्टिविटी’ बंद करा कर चले जाते हैं| अवसाद और ऊब सिपाहियों के चेहरों और बात-चीत में साफ़ दिखाई देती हैं| इस बात का मलाल बी.एस.एफ. के सभी सिपाहियों के मन में रहता है कि उन्हें फ़ौज जैसी सुविधाएं और वेतन नहीं मिलते| परिणाम यह है कि अधिकतर सिपाही देशसेवा के जज़्बे से अधिक बेरोजगारी की वजह से ही इस फ़ोर्स में आते हैं - यह जानकर झटका सा लगा| देशप्रेम और आदर्शवाद की अमूर्त प्रतिमा जो अपने घर की सुविधाओं के बीच बैठ कर मन में तैयार की थी, खंडित सी होती प्रतीत हुई|
 
रेत का फैलाव है लेकिन रेगिस्तान के बीचो-बीच एक बड़ी सी नहर भी है| यह नहर राजस्थान की जीवन रेखा कहलाती है| पहले इसका नाम ‘राजस्थान नहर’ था जिसे बाद में बदल कर ‘इंदिरा गांधी नहर परियोजना’ कर दिया गया| ‘इंदिरा गांधी नहर’ का उद्गम ब्यास एवं सतलज नदी के संगम पर बने हरिके बैराज से होता है| यह नहर हनुमान गढ़ जिले से राजस्थान में प्रवेश करती है| मुख्य नहर की लम्बाई ६४९ किलोमीटर है| इस नहर से पश्चिमी राजस्थान के गंगानगर, बीकानेर, जोधपुर और जैसलमेर जिलों की मुख्य रूप से सिंचाई की जाती है| सिंचाई के अलावा तटवर्ती गावों में पीने का पानी भी इसी नहर से मुहैया कराया जाता है| बड़ी नहर से जुड़ी हुई उप-नहरों का जाल सा बिछा हुआ है| छोटी नहरों में पानी लगातार नहीं आता| दस-दस दिन के अंतर पर आता है पर, फिर भी लोग संतुष्ट दिखाई देते हैं| नहरों के साथ कीकर के वृक्षों का सिलसिला सा चल पड़ता है| नहरों के दोनों तरफ खूब पेड़ उग गए हैं| ये जंगल बी.एस.एफ. और सिंचाई विभाग ने लगाए हैं| लेकिन इनकी देखभाल का जिम्मा स्थानीय निवासियों ने लिया हुआ है| लकड़ी काटना सख्त मना है अलबत्ता, स्वयं सूखकर और टूटकर गिरी हुई काष्ठ का प्रयोग करने के लिए ग्रामीण स्वतन्त्र हैं| पेड़ों के लगने से आकाशीय जल में बढ़ोतरी हुई है| पिछले कुछ सालों से अच्छी बारिश हो रही है|
एक स्थानीय नागरिक ने बताया कि इस नहर ने बाकी राज्य को तो समृद्ध और हरा भरा बना दिया लेकिन हनुमानगढ़ ज़िले की टिब्बी और रावतसर तहसील के दर्जनों गांव की हज़ारों हैक्टेयर कृषि योग्य भूमि दलदल में तब्दील होने लगी है| लोगों के मकान भी इसी आपदा की भेंट चढ़ने लगे हैं| जीवन जटिलताओं से भरा हुआ है| अच्छा-बुरा, सही-गलत क्या और कैसे हो जाता है पता ही नहीं चलता| कुछ के लिए नहर वरदान है तो वहीं कुछ के लिए अभिशाप|
 
सिंचाई विभाग के एक नए नवेले सहायक इंजीनियर बताते हैं कि किसी रसूख वाले राजनैतिक व्यक्ति ने रेगिस्तान के बीच पानी वाले इलाके में अच्छी खासी ज़मीन बना ली है| उस ख़ास नहर में जो उनके खेतों के पास से निकलती हैं हर समय पानी चलाने के आदेश हैं| उन्हें सिंचाई के लिए लगने वाला कर देने से भी मुक्त किया गया है| पानी बंद कर देने लायक पानी अधिकारियों में नहीं है| शुरू में जो लोग दिहाड़ी पर भरती हुए थे, अब नहर विभाग में अधिकारी बने बैठे हैं| ज्यादातर लोग सेवानिवृत्ति की कगार पर हैं| उनकी तरफ से जो हो रहा है, होता रहे| एक का तो मुझे पता चला लेकिन ऐसे अनेक होंगे| उन पर अनुशासनात्मक कार्रवाई करके कौन अपनी जान को मुसीबत ले!
 
पिछले पाँच वर्षों में पाँच ही बार यह यात्रा की है| सोचता हूँ, ऐसा क्या है जो हर साल इस सफ़र पर निकल जाता हूँ| साँप (पीले रंग का छोटे आकार का प्राणी जो ज़हरीला होता है और जिसे स्थानीय भाषा में बांडी कहा जाता है), बिच्छू, कँटीली झाड़ियाँ, दाँतों में कसकसाता रेत का स्वाद, खुश्क हवा से खाल में पड़ती दरारें, एकाकीपन की दिल दुखा देने भावना, लगातार एक जैसा बना रहने वाला परिदृश्य, दूर-दूर तक लक्ष्य न दीखने पर मन में जनमता अवसाद, बेचैन कर देने वाला वीरानापन, उदासी और ठहराव को जनमता सर्वत्र व्याप्त बलुई पीलापन और उसपर कहीं कहीं झाड़ियों के रूप में उभरे बदसूरत से हरे चकत्ते जैसे यहाँ न आने के असंख्य कारण हैं| पर, फिर भी दिसम्बर आते-आते हर साल अपना सफरी झोला कमर पर टांग कर निकल पड़ता हूँ, मरुधारा की ख़ाक छानने के लिए|
...क्रमश:

2 comments:

  1. ‘इंदिरा गांधी नहर परियोजना’ का वर्णन अत्यंत जीवंत एवं रोचक है|
    जैसे यहाँ न आने के असंख्य कारण हैं--- अंतिम परिच्छेद भी काफी प्रभावशाली है|मरुभूमि के बारे में पढ़कर बहुत अच्छा लगा|

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  2. धन्यवाद, मिश्र जी| 'थार के पार' भाग २ और भाग ३ भी देखिएगा, शायद आपको अच्छे लगेंगे| यात्रावृत्त में सुबह क्या खाया और शाम को क्या किया के वर्णन से आगे निकालने की कोशिश की है| शेष दोनों भागों पर आपकी प्रतिक्रिया की प्रतीक्षा रहेगी| आपका,

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