अपनी बात

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Monday, November 30, 2015

बहसतंत्र का गड़बड़ झाला

छुट्टी का दिन था| कोई काम नहीं था, सो दोपहर के भोजन के बाद हाथ में चाय का प्याला लिए बैठक में जमा हुआ था| परिवार के अन्य सदस्य भी आस-पास ही थे| आदमी बड़े परिश्रम और अभ्यास से समय का सदुपोग सीखता है, लेकिन समय को बरबाद करने का अवसर भाग्य से ही मिला करता है| आज बहुत दिन के बाद ऐसा ही मौक़ा हाथ लगा था|

अपने से ही अपना परिचय कराने की नौबत आ गई थी| आस-पास की सभी चीज़ें अजनबी सी लग रहीं थी| हर चीज़ न जाने कितने दिन के बाद अच्छी या बुरी लग रही थी| कमाल का अहसास था|

अरसे के बाद एक हसरत भरी निगाह दर-ओ-दीवार पर डाली तो महसूस हुआ कि कमरा बहुत बदरंग सा हो गया है| जगह-जगह पलस्तर उधड़ गया है| ईंटों का पीलापन अधिक ही मुखर हो रहा है| चूने की पपड़ियाँ उतरने लगी हैं| ऊब और उदासी का माहौल बना हुआ है| यह हाल तो शायद काफी दिन से रहा होगा, किन्तु मैं ही अपने कामों में व्यस्त रहा था, इसीलिए नज़र से चूकता रहा|

ख्याल आया कि काफी समय से दीवारों की देखभाल नहीं हुई है, मरम्मत नहीं हुई है| रंगाई-पुताई की ज़रूरत फौरी तौर पर महसूस होने लगी|

 ध्यान आया कि कुछ वर्ष पहले जब पुताई हुई थी, तब सारी दीवारें साफ़ और उजली दिखाई देने लगीं थी| सब जगह शान्ति का प्रतीक, भारत के तिरंगे के ठीक बीचो बीच विद्यमान सफ़ेद रंग हुआ था| लोहे की खिड़कियों पर पहले लाल रंग का प्राइमर किया गया था और फिर उसके ऊपर भी सफ़ेद रंग पोत दिया गया था| कमरा अचानक रोशनी से भरा-भरा दिखाई देने लगा था| ताजे पुते चूने की सोंधी-सोंधी गंध हफ़्तों तक कोने-कोने को महकाती रही थी| अफसोस, समय की धारा निरन्तर बहती रही| धीरे-धीरे दीवारों की रंगत पीली पड़ने लगी| एक दो बरसातों के बाद सीलन की गंध भी लगातार बनी रहने लगी थी| थोड़ी दिक्कत तो हुई थी, पर धीरे धीरे आँखें पीलेपन की अभ्यस्त हो गयीं और नथुने सीलन की गंध के| बेतुकी बदसूरती आम लगने लगी थी, सच लगने लगी थी|

चूँकि, बात ध्यान में आ चुकी थी इसलिए कार्रवाई करना अपरिहार्य जान पड़ा| दीवारों को मजबूत रहना था और सुन्दर दिखना था तो रंगाई-पुताई कराना लाजमी था| सोचा, घर के सभी सदस्यों के साथ इस विषय में संवाद किया जाए| घर के सभी सदस्य इकट्ठा थे ही, चर्चा आरम्भ हो गयी| विषय यही था कि दीवारों पर कौन सा रंग किया जाए| हमने सबसे पहले दबी जबान से प्रस्ताव रखा, “ऐसा माना जाता है कि सफ़ेद रंग सभी रंगों को मिलकर बनता है इसलिए...”

बात पूरी होने से पहले ही उसका क़त्ल कर दिया गया| पता लगा कि सफ़ेद रंग चलन से बाहर हो चुका है, उसमें फैशन स्टेटमेंट नहीं बनता, पिछड़ापन दीखता है|

बच्चों ने सलाह दी कि आजकल एक ही कमरे में अलग-अलग रंगों की दीवारें प्रचलन में हैं| हमें इसमें भी कोई दिक्कत नहीं लगी| हम घर में चार प्राणी हैं तो चारों की पसंद का रंग एक-एक दीवार पर हो सकता था| चारों रंग एक साथ जचेंगे या नहीं, इसकी संभावना और आवश्यकता पर चर्चा करने की ओर ध्यान ही नहीं गया|

सौभाग्य से कमरे में दीवारें केवल चार थीं लेकिन दुर्भाग्य से वे चारों दीवारें सामान आकार की न थीं| समस्या सामने आयी कि किसकी पसंद का रंग छोटी दीवार पर पुते और किसकी पसंद का बड़ी दीवार पर|

छोटी बेटी ने कुछ लाड़ से हमारी गर्दन को अपनी बाहों से घेरते हुए और हल्का सा दबाव बनाते हुए कहा, “पप्पा, मुझे छोटे होने का हक़ मिलना मिलना चाहिए| सबसे पहले चुनने का अधिकार मेरा ही हो|”

बड़े बेटे ने बात काटी, “और, जो छोटा नहीं है उसका कोई हक़ नहीं? बड़ी आयी अधिकार वाली|”

बातचीत शुरू होते ही गतिरोध पैदा हो गया| आपस में ही संवाद बोझिल हो जाए तो हालात भयानक हो जाते हैं| मै कुछ सोच पाता उससे पहले ही छोटी बेटी ने झट से सुझाव दे दिया, “ठीक है, अगर आपस में तय नहीं कर पाते, तो चलो पड़ौस में रहने वाले शर्मा अंकल से पूछ लेते हैं कि उनकी राय क्या है|”

बाहरी शक्तियों की ताकत का अहसास होने लगा| बेटे ने कुछ उलझाते हुए कहा, “क्यों, यहाँ रहना हमें हैं या शर्मा अंकल को| और वैसे भी, अगर राय लेनी ही है तो वर्मा अंकल की क्यों नहीं ली जा सकती|”

हालात काबू से बाहर होने की कगार पर थे| खून में उबाल आने लगा था| स्वर ऊँचे होने लगे थे| सलाह-मशविरा बहस में बदलने लगा था| मुद्दा गर्माते देख बात की दिशा बदलने की नीयत से हमने कहा, “चलो छोड़ो, कमरे की दीवारों का रंग बाद में तय करेंगे| पहले छत का रंग तय कर लेते हैं| वह तो सब की सांझी हो सकती है|”

छत के रंग को लेकर समस्या और भी गहन हो गयी| पत्नी ने रीति-रिवाज की टेक लेते हुए सलाह दी, “परम्परा का घ्यान रखते हुए छत सफ़ेद रखी जा सकती है|”

बेटी वैयक्तिकता की झंडाबरदार बनी हुई थी| उसने राय दी, “छत को चार हिस्सों में बाँट कर, उस पर चार अलग-अलग रंग किये जा सकते हैं|”

बड़े बेटे को यह बात अच्छी नहीं लगी| उसने तीखे स्वर में विरोध किया, “फिर तो जिस व्यक्ति का दीवार के जिस किसी हिस्से पर जैसा रंग करने का मन हो, वैसा रंग पोत डाले| मन की इच्छा तो इसी तरह पूरी हो सकती है|”

उसने आगे सुझाया, “चारों रंगों को बराबर मात्रा में मिलाकर जो भी रंग बने उसे छत पर पोत दिया जाए| जहाँ नास, वहाँ सवा सत्यानास|”

बेटी ने अपनों से अधिक अजनबियों की बुद्धि और इच्छा पर भरोसा दिखाते हुए अपने पुराने नज़रिए को फिर से प्रकट किया, “कम से कम छत के रंग को लेकर तो बाहर के लोगों की राय ले ही ली जाए|”

बेटे ने सुना तो सिरे से उखड़ गया, “हाँ, क्यों नहीं! यू.एन.ओ. में ले जाओ इस मामले को भी, कर दो सब गड़बड़-झाला|”

इसी बीच हमारे मित्र चकौड़ी दास का आगमन हुआ| उनके पूछने से पेश्तर सबने अपने अपने ढंग से प्रसंग को उनके सामने प्रस्तुत करना शुरू कर दिया| पूरी बात सुनकर उन्होंने सम्मति व्यक्त की, “देखो, मामला गंभीर हो चला है| एकराय बनने के आसार कम ही हैं| अगर और कुछ न हो, तो ऐसा करो कि छत पर कोई भी रंग न रखो| जो पहले से लगा हुआ है उसे भी खुरच कर उतार दो|

इस बात पर भी काफी चिल्ल-पौं मचने लगी| मुद्दे की प्रमुखता दीवार की अपनी आवश्यकता से हट कर लोगों की इच्छा पर आ गयी थी| जुमले उछलने लगे थे| घर का हर व्यक्ति स्वयं को दलित, पीड़ित और कुचला हुआ साबित करने लगा था, क्योंकि उसकी बात नहीं मानी जा रही थी|

हमने कुछ उकताकर और कुछ घबराकर कहा, “चलो ऐसा करते हैं, फिलहाल दीवारों और छत पर रंग कराने का विचार ही त्याग देते हैं| जो जैसा है, वैसा ही बना रहे|”

तो, बात तय हो गयी| चकौड़ी दास जी इस निर्णय के साक्षी बने| न जाने क्यों साक्षी की ज़रुरत भी महसूस होने लगी थी| दीवारों की दरारें और भी अधिक गहरी दिखाई देने लगीं थीं| सबका ग़रूर सुरक्षित था| दीवारों की नियति दीवारें जानें|

बात तय तो हो गयी, लेकिन मानी किसी ने नहीं| हाल यह है कि जब, जिसका, जहाँ मन होता है जोर-ज़बरदस्ती से, धोखे से, जिद्द से और विवेकहीनता से अपनी मर्जी का रंग छिटका देता है| मामला केवल दीवारों तक सीमित रहता तो भी गनीमत थी, अब तो घर के फर्नीचर, कपड़े और फर्श भी इस व्यवहार से बच नहीं पाते हैं| कभी-कभी तो घर के निवासियों के चेहरे भी सुबह को बिस्तर से चाहे-अनचाहे रंगों में रंगे हुए जागते हैं|

घर के अन्दर एक छोटा सा भारत तैयार हो गया है|

 

2 comments:

  1. छोटा सा भारत नहीं बल्कि घर के अन्दर तो पूरा का पूरा भारत ही नजर आ रहा है

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  2. वन्दना जी, बिल्कुल सही बात कही है आपने| बस एक विचार प्रकट करने की कोशिश की थी| आपने व्यंग्यार्थ ग्रहण किया, लेख सफल हुआ|

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