अपनी बात

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Monday, November 23, 2015

देवता जाग गए

कल देवोठानी एकादशी थी| देवता जाग गए| जाग गए या जगा दिए गए| जो भी हो, लेकिन सच यह है कि देवता जाग गए| अभी कुछ दिन बीते बिहार के जागे थे, कल देश के जाग गए| कुछ ऐतराज के स्वर सुनाई दिए हैं ना! चलो, माना कि वे देवता देश के नहीं हैं, सो मित्रों की नाराज़गी के बचने के लिए कह लेते हैं, देश के हिन्दुओं के देवता जाग गए| अब समस्या देश के बाहर रहने वाले हिन्दुओं की है| सवाल यह है कि उनके जागे कि नहीं जागे| देश के बाहर के हिन्दुओं की तो समस्या है ही, उनके देवताओं की समस्या उनसे भी भारी है| वे देवता इस दुविधा में हैं कि उन्हें जागना है कि नहीं| बात सीधी सी है, वे ही देवता कभी एक ही नाम से अलग अलग धर्मों के होते हैं, और कभी अलग अलग नामों से| उधर हिन्दुओं में भी एक देवता जो एक हिन्दू का है, लेकिन दूसरे हिन्दू का नहीं है, वह जागा कि नहीं|

हिन्दू और उसका देवता वाला विचार आँखों में खटक रहा है| मामला उलझ रहा है, उलझ रहा है तो जाए भाड़-चूल्हे में| सारे मामले सुलझाने के ज़िम्मेदारी इस अकेली जान की थोड़ी ही है| यहाँ एकादशी पर देवताओं को गीत सुना सुना कर जगाया जा रहा है| खेत खलिहान में उन्हें काम करने के लिए चलने को कहा जा रहा है| अनाज फटकने और साफ़ करने की दावत दी जा रही है| बदले में रोटी बेलकर और सेंककर खिलाने का लालच दिया जा रहा है| चावल के आटे से लक्ष्मीदेवी के पैरों के निशान बनाए जा रहे हैं और उन निशानों को गेरू से सजाया जा रहा है| बारह रुपये किलो की शकरकंदी और सत्रह रुपये किलो के सिंघाड़े उबालकर उनके खाने-पीने का इंतज़ाम किया जा रहा है| इतना थर्ड क्लास आयोजन और देवताओं को यह चुनने का भी अधिकार नहीं कि उठना है या नहीं| एक कप बैड टी तक का इंतज़ाम नहीं| जाओ रे, पिछड़े हुए हिन्दुओं! और उससे भी ज्यादा धिक्कार तुम्हारे देवताओं पर जो इतने में ही मान जाते हैं|

तुम्हारे देवताओं से तो उनके देवता ज़्यादा शानदार हैं| रेडियो पर बोलते हैं, टेलीविजन पर दिखते हैं, मंच पर चीखते हैं, सभाओं में कभी किसी को और कभी किसी को गरियाते हैं, कालिख पोत कर गधे पर उलटा बिठाने की धमकियाँ देते हैं और अँधेरे में सभी से हाथ मिलाते हुए अगले दिन के नाटक की योजना बनाते हैं| वे शकरकंदी और उबले सिंघाड़े नहीं खाते, वे माल खाते हैं| ...अरे, ये कौन नामुराद चिल्ला रहा है कि चारा भी खाते हैं! चुप रहो! अपनी जुबान खिंचंने का ज़रा भी डर है, तो चुप रहो|

तुम्हारे देवता जागते हैं तो बेहूदे तरीके से शादियाँ होती हैं, बेसुरे बन्ने बन्नी गाये जाते हैं, शुभ कारज के षड्यंत्र बनाए जाते हैं, बेशऊरी से कारज किये जाते हैं और उनके देवता जागते हैं तो लाठियाँ भंजती हैं, गोलियाँ चलती हैं, नारे लगते हैं|

अरे जनमत की उपेक्षा करने वाले लोगों, कुछ तो शर्म करो| और कुछ नहीं तो अपनी ज़बान तो बंद रखो| देखो, किताब पढ़ने वाले, अखबार बांचने वाले और टेलीविजन पर प्रचार करने वाले लोग भी उनके देवताओं की मान-स्थापना करने में मगन हैं| तुम उनसे ज़्यादा तो नहीं जानते हो, ना!

ध्यान से सोचो और बताओ, किसके देवता उठने पर देवोठानी एकादशी मनाई जानी चाहिए?

चित्र अनीता कपिल के फेसबुक अकाउंट (https://www.facebook.com/anita.kapil.92?fref=ts) से साभार

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