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Sunday, November 22, 2015

बाकी चिंता ‘पाँच वाली’ पर

रेल ठकर-ठक् ठकर-ठक् करती हुई एक पटरी पकड़े सीधी अपनी गति से चली जा रही थी| खिड़की वाली सीट गेरुआ वस्त्र धारण किये एक महाराजजीनुमा तिलकधारी ने कब्जाई हुई थी| उनकी मुद्रा से लग रहा था कि सैकेंड क्लास स्लीपर में यात्रा करने का अभ्यास उन्हें कम ही था| उनका चेला भी साथ ही सफ़र कर रहा था| बराबर में ही थोड़ा हट कर बैठा हुआ था और बीच-बीच में अपनी कुछ ज़्यादा ही काली दाढ़ी पर हाथ फेरता जाता था| बेंत की बनी हुई पुराने तरीके की गोल कंडी में कुछ खाने-पीने का सामान रखा था जिसमें से थोड़ी थोड़ी देर बाद चेला कुछ फल निकाल कर महाराज को देता था और कभी-कभी महाराज स्वयं को कृतार्थ करते हुए अपने आप ही कुछ खाद्य पदार्थ निकाल कर अपने श्रीमुख में डाल लेते थे| महाराज की आँखें लगातार अधखुली अवस्था में थीं और चेले की आँखें कुछ अधिक ही खुली हुई और चपल थीं| दोनों यात्री अपनी-अपनी निगाहों से दुनिया को देख रहे थे|
 

आधा तीतर, आधा बटेर

 

आस-पास बैठे किसी भी यात्री ने अभी तक उनके खाद्य व्यवहार पर कोई टिप्पणी नहीं की थी| अचानक महाराज जी ने शाकाहार पर प्रवचन देना प्रारम्भ कर दिया, “शाकाहार सबसे उत्तम आहार होता है| सबसे सबसे बड़ा, सबसे बुद्धिमान और सबसे ताकतवर प्राणी हाथी शाकाहारी ही होता है|”
 
चेले ने तुरंत अनुमोदन किया, “सत बचन, गुरूजी! मशीनों की ताकत तक घोड़े की ताकत से मापी जाती है, वह भी शाकाहारी ही होता है|”
 
उसी कूपे में एक अधेड़ उम्र के सज्जन भी सामने की सीट पर अपने आप को समेट कर विराजे हुए थे| वे निरन्तर महाराज की ओर श्रद्धापूरित निगाहों से देख रहे थे| उनकी बेटी भी साथ ही बैठी हुई थी| वह अपने फोन पर कुछ टाइप कर रही थी| चेला उसकी इस मनमोहिनी मुद्रा को सबकी नज़रें बचा कर बीच-बीच में ताक लेता था|
 
लड़की के पिता श्रद्धा से अभिभूत होकर बोले, “महाराज, जब तक जान पर ही न बन आयी हो, जानवर को मारना अच्छी बात थोड़े ही है!”
 
एक लड़का जो बीस-बाईस की उम्र का था और उसके पिता जो शक्लोसूरत से किसी दफ्तर के बाबू दिखाई देते थे, अपने लोहे के बक्से पर पैर रखे बैठे थे| पिता अपने पुत्र को किसी कालेज में छोड़ने के लिए जा रहे थे और बीच-बीच में उसे मन लगाकर पढ़ने की नसीहत दे देते थे| लड़का अपने मोटे फ्रेम के चश्में को मुँह की भाप लगाकर बीच में साफ़ कर लेता था, शायद दुनिया अभी उसे पूरी तरह स्पष्ट नहीं दिखाई दे रही थी|
 
लड़के के पिता ने पुत्र से मुखातिब होकर अनायास ही सलाह दी, “बेटा, अपने खाने-पीने का ध्यान रखना| पोल्ट्री के अंडे शाकाहार ही होते हैं| उन्हें खाने में संकोच करने की कोई ज़रुरत नहीं है|”
 
कुल जमा चार लोकल पैसेंजर भी यहाँ वहाँ थोड़ी बहुत जगह का जुगाड़ किये बैठे थे| वे एक अपने एक साथी की गोद में सफरी तौलिया बिछा कर ताश की मैली सी गड्डी से अपना खेल जमाए हुए थे| उनके अभ्यस्त हाथों में पत्ते अनायास ही फिर रहे थे| कभी-कभार एक दूसरे को पत्ता फेंकने के लिए ललकारते थे तो कभी ‘ले बेटा’ कहकर जोर से अपना पत्ता ढेरी पर पटक कर फेंकते थे| आसपास के वातावरण से निर्लिप्त लगते थे, लेकिन थे नहीं|
 
उनमें से एक अपने हाथ के पत्तों को सावधानी से संभालते हुए बोला, “मांस खाने की मनाही करता कौन है? किसी भी धरम में उसकी मनाही नहीं है| जानवर मारने की ही तो मनाही हो सकती है, मरे हुए को पकाकर खाने में क्या दिक्कत है?”
 
किसी ने भी उसकी बात का जवाब नहीं दिया| लोकल पैसेंजरों के मुँह कौन लगे! ज़रा सी देर में बदतमीजी करना शुरू कर दें तो मुसीबत| भले आदमी की ज़िंदगी मुहाल है| दस इंच जगह के लिए लड़ने मरने पर उतारू हो जाते हैं| और, उस पर तुर्रा यह कि शान्ति बनाए रखने के लिए कश्मीर को पकिस्तान के हवाले कर देने की वकालत भी करते हैं|

 

दमड़ी की बुढ़िया, टका सिर मुँड़ाई

 
शुरू से ही, महाराज जी की नज़र ज्यों ही ताश खेलते सहयात्रियों पर पड़ती थी, उनके चेहरे पर हिकारत के भाव आ जाते थे| लगता था कि उनकी गुरुता इस घटना से खंडित हो रही थी| जब न रहा गया तो बोले, “बताइये! भारत कभी जगद्गुरू के रूप में विख्यात था| अब तो संस्कार, मर्यादा और ज्ञान का सम्मान बीते वक़्त की बात हो गयी है|”
 
पत्ते फेंटता हुआ आदमी इशारे को समझ कर क्षण भर के लिए रुका और फिर बोला, “सही बात है, लेकिन मेरी शिकायत ‘कभी’ शब्द के प्रयोग को लेकर है|”
 
चेला गुरु की रक्षा में उतर आया, “क्या शिकायत है, शिरिमान|”
 
अँगूठे को जीभ पर लगाकर पत्ते बाँटते हुए उसी लोकल पैसेंजर ने बात आगे बढ़ाई, “स्वामी जी, गुरु पैदा करने की परम्परा इस देश की जड़ों में इतनी गहराई तक समायी हुई है कि उसे किसी का ‘बाप’ (पाठकों से प्रार्थना है कि वे ‘बाप’ को ‘बाप’ ही पढ़े ‘बीप...’ नहीं| लेखक की रचनाएँ सभी आयु-वर्ग के पाठकों द्वारा पढ़ी जाती हैं) भी उखाड़ नहीं सकता|”
 
दूसरा लोकल पैसेंजर बोतल से पानी घूँट भरते हुए बोला, “स्वामी जी, भारत आज भी जगद्गुरु ही है| एक से एक गुरु इस धरती पर जनमता और पलता है| यहाँ की खासियत ही यह है कि विकास की प्रक्रिया रुकती नहीं| गुरु सारे जीवन ‘गुरु’ ही नहीं रहता धीरे धीरे गुरु-घंटाल हो जाता है|”
 
बात कहकर महाराजजी की ओर आँख का इशारा करते हुए वह अपने तीसरे साथी की ओर धीरे से मुस्कराया|
 
तीसरे लोकल पैसेंजर ने बात का सिरा थामते हुए कहा, “नटवरलाल भारत के ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया के ठगों के लिए गुरु जैसे ही हैं| बड़े से बड़ा ठग उनका नाम लेते हुए अपने कानों को हाथ लगाता है|”
 
चौथा लोकल पैसेंजर जो किसी स्कूल में शिक्षक लगता था, धीर गंभीर स्वर में बोला, “असल में, वे ऐसे प्राणी थे जिन्होंने न केवल ठगी को कला के रूप में प्रतिष्ठित किया, अपितु इस क्षेत्र में नवीन आयाम भी स्थापित किये| सुना है कि ये महानुभाव अपने सक्रियता के काल में तीन बार ताजमहल, दो बार लालकिला और एक बार राष्ट्रपति भवन तक बेच चुके हैं|”
 
लड़की शायद फोन से ऊब चुकी थी| बिना किसी की ओर देखते हुए बोली, “पुरुष तो पुरुष यहाँ की महिलाओं के नाम का डंका भी विश्वभर में बज रहा है| हमारे देश ने फूलन नामक दस्यु-सुन्दरी दी जिसने न केवल लोकल स्तर पर बल्कि नेशनल और इंटरनेशनल स्तर पर भी भारत को दुनिया की बैस्ट लेडी डकैत पैदा करने का सम्मान दिलाया|”
 
कूपे में पलभर के लिए सन्नाटा छा गया| कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी तो उसने खुद ही बात आगे बढ़ाई, “शोभा अय्यर ऐसी लेडी डॉन हैं जिन्हें दुनिया के अच्छे अच्छे डॉन अपना गुरु मानते हैं| साउथ की क्रिमिनल कम्यूनिटी में उनका सिक्का चलता है|”
 
इसके बाद सीधे-सीधे महाराज जी को संबोधित करते हुए बोली, “स्वामी जी, अर्चना शर्मा अपहरण की दुनिया की रानी के नाम से फेमस हैं| उनके नाम से बड़े-बड़े थर्राते हैं| क्राइम की दुनिया की पहली माफिया डॉन और गॉड मदर संतोकबेन जाडेजा भी हमारे देश की ही शान हैं| ये सब पूरे वर्ल्ड में गुरुओं की तरह पूजी जाती हैं|”
 
लड़की के भाषण से उत्साहित होकर उसके पिता ने सूचना दी, “भ्रष्टाचार के क्षेत्र में आज भारत इतनी उन्नति कर चुका है कि हार के डर से ओलम्पिक समिति के विलायती प्रशासक इस खेल को ओलम्पिक में शामिल करने से कतरा रहे हैं| खेल के खेल में सत्तर हज़ार करोड़ का रिकार्ड और किस देश में बन सकता है?”
 
लडके के पिता ने सूचना का भण्डार खोलते हुए कहा, “सुना है एक महाशय स्पेक्ट्रम घोटालों और सत्ता के गैरवाजिब इस्तेमाल की प्रतियोगिता में टाइम पत्रिका द्वारा दुनिया में दूसरे नंबर पर रखे गए थे| चाहे यूरिया हो या चारा, तोप हो या शेयर, अनाज हो या कोयला हमारे देश में सभी क्षेत्रों का सामान रूप से सम्मान रखा जाता है| गरज यह, समभाव और समानतावाद का उत्कर्ष देखना हो तो हमारे देश में देखें|”
 

घर का जोगी जोगड़ा, आन गॉंव का सिद्ध

 
महाराजजी को बोले हुए काफी देर हो गयी थी| उन्होंने ज्ञान का प्रकाश फैलाते हुए कहना प्रारम्भ किया, “एक समय था जब राजगीर, नालंदा और तक्षशिला जैसे विश्वविद्यालय भारत की आत्मा में ज्ञान की चेतना भरते थे| भारत में भाषा, साहित्य, धर्म, दर्शन, गणित, विज्ञान आदि का प्रचार प्रसार करते थे| और सबसे विलक्षण बात यह थी कि इसका उद्देश्य आजीविका कमाना या नौकरी पाना नहीं था, उद्देश्य था तो केवल ज्ञान का प्रसार|”
 
लडके के पिता ने अपनी कमीज की जेब से रुपये निकाल कर गिने| शायद अन्यमनस्कता प्रदर्शित करने का तरीका था|
 
“समय बदला, विचारकों और चिंतकों का देश लार्ड मैकाले के पंजे में आ गया| ज्ञान रोजगार से जोड़ा जाने लगा| योग्यता बाज़ार में बिकने वाली चीज़ हो गयी| अनुभव की बोलियाँ लगने लगीं| निष्ठा खरीदी बेची जाने लगी है| दो सौ साल बाद आज भी स्थिति वैसी ही है, उसमें कोई बदलाव नहीं हुआ|
 
लड़की ने फिर से अपने फोन पर टाइप करना प्रारम्भ कर दिया| उसके पिता अभी भी महाराजजी को श्रद्धापूरित दृष्टि से देख रहे थे|
 
“ज्ञान और अनुभव बाजार में अलग अलग दूकानों पर अलग अलग कीमत पर बिकता है| अगर साफ़ शब्दों में कहूँ तो अपने ज्ञान और योग्यता को या तो सरकारी क्षेत्र में बेचा जा सकता है या फिर निजी क्षेत्र में|”
 
लड़के ने एक बार फिर चश्मा साफ़ किया और बातचीत में अपना योगदान देते हुए कहना शुरू किया, “आज का युवा ‘सेवा’ और ‘समाजोत्थान’ जैसी आभासी दुनिया की चीज़ों से बहुत आगे निकल चुका है| किसी भी पेशे की बारीकियाँ सिखानेवाले संस्थान उससे इतना वसूल लेते है कि बहकाने वाले ऐसे मूर्खतापूर्ण विचारों के लिए लेशमात्र स्थान भी उसके मन में नहीं रह जाता|”
 
लडके के पिता ने अपनी छाती के छाले दिखाते हुए कहा, “डिग्री मिलने की प्रसन्नता डिग्री के साथ टंगे प्राइस टैग को देखते ही काफूर हो जाती है| डिग्री पाने की जद्दोजहद में जाने किस किस के तलवे चाटे जाते हैं| जाने किस किस को कितने रिश्वत दी जाती है| बैंक से एजुकेशन लोन पाने के लिए कितने हथकंडे अपनाए जाते हैं| कैपीटेशन फीस, डोनेशन और न जाने किन किन नामों से स्वयं को बीच बाज़ार लुटने के लिए छोड़ा दिया जाता है| हर साल थाली में एक सब्जी कम होती जाती है| अंत में तो बस नमक और मिर्च का ही सहारा रह जाता है|”
 
चौथा लोकल पैसेंजर जो किसी स्कूल में शिक्षक लगता था, धीर गंभीर स्वर में पुन: बोला, “वर्तमान समय में हमारी व्यवस्था नाममात्र की ही समाजवादोन्मुखी रह गयी है| सत्य तो यह है कि वैश्वीकरण और उदारवाद के चलते हम पूँजीवादोन्मुखी व्यवस्था के अंग हो गए हैं|”
 
गाड़ी धीमी होने लगी थी| सिग्नल पार हो गया था| स्टेशन आ रहा था|
 
लड़का अचानक जोश में आकर बोला, “अंकल, अपनी योग्यता को आज का युवा वहाँ बेचेगा जहाँ या तो उसकी उपयोगिता और सम्मान हो या फिर अच्छी कीमत| दुर्भाग्य से सरकारी क्षेत्र, जो कि बीमार इकाइयों का गुच्छा भर बन कर रह गया है, इनमें से कुछ नहीं दे पा रहा है| ऐसे में निजी क्षेत्र ही एक मात्र ऐसी संभावना के रूप में उभर कर सामने आता है जहाँ उन्नति है, सम्मान है, सुरक्षा है, ईमानदारी है और सबसे बढ़कर समय के साथ कदम मिलाकर चलने की इच्छाशक्ति है|”
 
गाड़ी झटके से रुक गयी| पहला लोकल पैसेंजर पत्ते समेटकर उठने का उपक्रम करते हुए अपने साथियों से बोला, “चलो तो फिर, शाम को ‘पाँच वाली’ पर मिलते हैं|”
 
सब पूर्ववत् अपने अपने कामों में लग गए| चर्चा ‘पाँच वाली’ के लिए स्थगित हो चुकी थी|
 
चित्र http://www.dainiksaveratimes.com/tag/jaunpur/ से साभार

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