अपनी बात

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Sunday, November 15, 2015

दो रुपये की दाढ़ी

गर्मी आई, बरसात आई और सर्दी भी आकर चली गयी| हमें लगता रहा कि ज़िंदगी में कुछ हो ही नहीं रहा है| न कोई हलचल, न कोई हंगामा| पिंजरे में तोता है तो सही, लेकिन कतरनों का गट्ठा भर है| न बोलता है, न पंख फड़फड़ाता है| चोंच मारने का तो सवाल ही नहीं उठता| मन में आया कि कुछ किया जाए| एक ही ढर्रे पर चल रही सूखी-सूखी सी ज़िंदगी में बदलाव का छिड़काव किया जाए| घर बदलने की सोची तो यह डर लगा कि नया मकान मालिक न जाने कैसा हो! घर का फर्नीचर बदलने की सोची तो सेलरी स्लिप की याद ने डरा दिया| नौकरी बदलने के तो ख्याल भर से पसीने छूटने लगे|
 
पत्नी से इस विषय में सलाह ली तो उन्होंने मुस्कराते हुए झट कह दिया, “कुछ भी कर लो|”
 
जो उन्होंने न कहते हुए भी कह दिया था, वह इस प्रकार था - ‘वैसे भी जो हालात इस समय हैं, उनके और भी अधिक बिगड़ने की तो कोई गुंजाइश अब बाकी नहीं है|’
 
उन्होंने लगे हाथ यह सम्पुट भी लगा दिया, “और कुछ न बने तो दाढ़ी ही रख लो|”
 
बात सुनकर कालेजे में चुभन महसूस हुई तो हमने नासमझी की दवाई का कॉम्बिनेशन धीरज के साथ बनाकर गले से उतार लिया| यह दवा रामबाण है| चूक की कोई संभावना नहीं| इस दवा के प्रभाव से हमने बड़े से बड़ा जहर उतरते हुए देखा है| जिस बिच्छू के काटे का मंतर न हो, उसका विष इस कॉम्बिनेशन की एक खुराक से उड़न छू! हमारा भी चित्त तुरंत शांत हो गया| इधर चित्त शांत और उधर बस लो हो गया निर्णय| सलाह को हुक्म माना और तैयारी शुरू कर दी|
 
सबसे पहले बदलाव के आधार को परखने की ठहरी| बदलाव की नींव चूँकि चेहरे पर ही रखी जानी थी, इसलिए चेहरे की छटा को तसल्ली से शीशे में निहारा| हालात कोई ख़ास उत्साहजनक न थे| दिल घबराकर बैठ जाता, उससे पहले इमारतों के निर्माण के लिए ज़मीन की साफ़-सफाई करते मजदूर ध्यान में घूम गए| फिर क्या था, पत्नी और आयकर विभाग की नज़रों से बचाकर रखे गए पैसों को खोज निकाला| उनसे विलायती साबुन की बट्टी खरीदी| बट्टी को घर लाकर उसे अपने चेहरे पर देर तक रगड़ा| आईने के सामने खड़े होकर स्वयं को आलोचक की निगाह से देखा| उम्मीद थी कि आईना टूक-टूक हो जाएगा, लेकिन कमबख्त ऐन मौके पर दगा दे गया| एक खरोंच तक नहीं आई बेहया पर|
 
हफ्ता बीतते बीतते चेहरे की खूँटियाँ झाड़-झंखाड़ में बदलने लगीं| यथासमय, जतन से रखे गए पनामा के ब्लेड को कागज़ की तहों में से निकाला| ध्यानपूर्वक रेजर पर चढ़ाया| सावधानी के साथ दोनों गालों को चिकना करना शुरू किया| मूँछ और ठोडी के बालों का ज्यों ही सांस्कृतिक समन्वयन संपन्न हुआ, केश-उच्छेदन की कार्रवाई को तुरंत रोक दिया| रोकना ही था, फ्रेंचकट दाढ़ी तैयार जो हो गयी थी|
 
एकांत में आईने के सामने चेहरे को दांये-बांये, ऊपर-नीचे, वक्र-अतिवक्र कोणों पर रखकर अपनी कला को परखा| एकाध बाल काटने की ज़रुरत महसूस हुई, तो वह भी किया| चेहरा कोई ख़ास भला मालूम न हो रहा था| लग रहा था जैसे ठुड्डी पर रूई चिपकाकर उसे काले रंग में रंग दिया हो, लेकिन परिवर्तन की मर्यादा रखते हुए चेहरे को अपनी और ईश्वर की ‘माडर्न आर्ट’ का सम्मिलित प्रयास मानकर सराहा| पत्नी और बच्चों ने देखा तो उन्होंने भी ठहाका मारकर हँसते हुए हमारे नए रूप की प्रशंसा में अपना योगदान दिया|
 
आगे चलने से पहले लगे हाथ यह भी बता दें कि हमने फ्रेंचकट को ही तरजीह क्यों दी| सबसे बड़ा कारण तो इस शब्द में जुड़ा ‘फ्रेंच’ शब्द है| हमें लगा कि इस शब्द के साहचर्य से फ़्रांस के कैफे एवं रेस्तरां, जेंटलमैन, वाइन, खुशबू, भाषा, कला एवं संस्कृति, पुनर्जागरण और सम्पन्नता से अनायास ही जुड़ जाने का अभूतपूर्व मौक़ा हाथ आ गया है| अगर इस जुड़ाव को और भी अधिक स्पष्ट रूप से समझना हो तो वह इस प्रकार है – कैफे एवं रेस्तरां के स्वप्न देखते हुए लल्लू के धुंआते चाय के खोखे से छुटकारा मिलेगा| सुबह से शाम तक साक्षात् गैस का गोदाम बने देसी धुर्रों की गैस विसर्जन की क्रिया का शिकार बनने से छूटेंगे, जेंटलमैनों की संगति होगी| नमक चाट कर हलक से उतारे जाते देसी ठर्रे की महक से बचकर वाइन की चर्चा का मौक़ा मिलेगा| फ्रांसीसी परफ्यूम के स्मरण मात्र से गलियों के किनारे पर दीवार के साथ बहती द्रवीभूत दुर्गन्ध से छुटकारा होगा| सड़ियल और पिलपिली मानसिकता वाले लोगों की गालियों से गंधाती भाषा से बचकर मोसियरों की सुसंस्कृत भाषा की महिमा से संपर्क का रास्ता निकलेगा| दीवार बनी सांझी माई की प्रतिमा को कलाकृति मानने की मजबूरी समाप्त होगी और कला एवं संस्कृति का उद्भव होगा| पुनर्जागरण होगा जिससे सैंकड़ों सालों से सुषुप्त चेतना आँख खोलेगी| सुबह को शाम की, और रात को सुबह की रोटी की चिंता दूर होगी, सम्पन्नता पाँव पसारेगी| सबसे बढ़कर फ्रांस जैसे महनीय राष्ट्र के साथ मानसिक तौर पर सम्बन्ध की स्थापना का सपना पूरा होने के आसार दिखाई देने लगे|
 
याद तो उस समय फ्रेंची शब्द भी आया, जिसका तात्पर्य एक ऐसे वस्त्र से होता है जो पहनने और देखने वाले दोनों इज्जतदार पक्षों की इज्जत बनाए रखने के काम आता है| वैसे, फेंचकट दाढ़ी भी एक प्रकार की फ्रेंची ही है जो भीतरी सतह पर नंगे प्राणियों की सम्मान-रक्षा में सतत् संलग्न रहा करती है| मज़े की बात यह है कि ऐसे लोगों की संख्या काफी कम है इसीलिए विशिष्टता का विशेषाधिकार उन्हें सहज ही मिल जाता है| हमारे मित्र चकौड़ी दास अक्सर कहा करते हैं कि देश में प्रजातंत्र स्थापित होने का फ़ायदा उन्हें ही अधिक रहता है जो गिनती में कम हैं| यद्यपि हम जैसे लोग जो बौद्धिकता, समानता और धर्म-निरपेक्षता के पैरोकार होने का दावा करते हैं, उनकी बात को न तो गंभीरता से लेते हैं और न इस बात से सहमति जताते हैं|
 
मित्रों ने परिवर्तन का राज जानने में जमीन आसमान एक कर दिया| सवाल पर सवाल दागे| हम बारबार कहते रहे कि इस परिवर्तन का आधार ‘परिवर्तन की इच्छा’ के अतिरिक्त कुछ नहीं है, पर किसी ने एक न सुनी| आजकल शब्दों में नवीन अर्थ और घटनाओं में नवीन सन्दर्भ घुसेड़ने का प्रचलन हो गया है, हम भी उसी के शिकार हुए| शाम तक शहर में प्रचलित कहानी के अनुसार बदलाव का मुख्य कारण हमारी कंजूसी और अमरीकियों की चांद पर बस्ती बसाने की इच्छा की तरह बढ़ती हुई महंगाई को ठहराया गया| बात जब तक हमारे पास पहुँची तब तक उसने ब्रह्मज्ञान का रूप धारण कर लिया था| बात के सिरों में से सिरे निकलने लगे थे|
 
मामला समझ के बाहर था| हमने कुहनी घुटने पर और ठोढी हथेली पर टिकाकर देर तक इस पहेली को हल करने का प्रयत्न किया कि हमारी कंजूसी और बाजार की महंगाई फ्रेंचकट रखने का कारण कैसे हो सकती है| जब हमारे चिंतन के चलते पड़ौसियों के कपाल भी दुखने लगे, तब हमने सच्चे ब्रह्म-जिज्ञासुओं की तरह अपने ज्ञानी मित्रों की शरण में जाने का निश्चय किया| उनसे जो कहानी पता चली वह इस प्रकार थी –
 
"हम, यानि शुक्ल जी दाढ़ी बनवाने के लिए नाई (पेशे के अर्थ में, इस शब्द का जाति से कोई लेना देना नहीं है) की दुकान पर गए| हमेशा के तरह घर से चलते हुए हमारी श्रीमती जी ने दाढ़ी बनवाई के आठ रुपये हमारी जेब में डाल दिए| एक भी पैसा फालतू न था| दूकान पर जाकर पता चला कि दाढ़ी बनवाने के रेट आठ रुपये से बढ़ाकर दस रुपये कर दिए गए हैं| हमें असमंजस में पाकर दूकान मालिक से सलाह दी कि आठ रुपये की दाढ़ी तो अभी बनवा ली जाए और और बाकी बची दो रुपये की फिर कभी| इसरार करने पर भी उसने हमारे ट्रैक रिकार्ड को देखते हुए दो रुपये काम उधारी पर करने से साफ़ इनकार कर दिया| मरता क्या न करता, उसकी बात माननी ही पड़ी|"
 
तो, यह जो फ्रेंचकट दिखाई दे रही है, वह दो रुपये की बची हुई दाढ़ी है|
 
कहानियां तो बनती रहती हैं, लेकिन मुझे मानने में कतई ऐतराज नहीं है कि मैं छोटा सा नाचीज प्राणी हूँ| इतना जरूर है कि कागज़ की सात तहों के भीतर रखे मेरे ब्लेड में अभी भी काफी धार बाकी है| कहने को कोई कुछ भी कहे, सोचने को कोई कुछ भी सोचे, लेकिन सच यहाँ है कि ब्लेड की धार किसी की मेहरबानियों की मोहताज नहीं है जो दो रुपयों की छूट के बदले अनचाहा करने को मजबूर कर देगा| दाढ़ी रखी है तो अपनी मर्जी से रखी है| जिस दिन मन होगा, उस दिन पहला मौक़ा मिलते ही मूँड डालूँगा| मेरे इतिहास का फैलाव कुछ ज्यादा है भी नहीं| बहुत हुआ तो कुछ घंटों में मेरी और मेरी बदलाव की दास्तान को भुला दिया जाएगा|
 
पर, ऐ यहाँ वहाँ चिपकी फ्रेंचकट दाढ़ियों, तुम्हारे सावधान होने का समय आ गया है| तुम अपने को चाहे जो मानों, ज़माना तुम्हारी कीमत केवल दो रुपये मानने लगा है|
 
चित्र http://www.amusingtime.com से साभार
 

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