अपनी बात

"ब्लॉग, जो विधाओं की सीमा से परे होकर अभिव्यक्ति की बात करता है, जो विचार की बात करता है चाहे वह कहानी, हास्य, व्यंग्य, कविता, समीक्षा, लेख, डायरी, भाषण, निबंध जैसे किसी भी रूप में हो; जहाँ भावना की प्रधानता भाषा से किसी भी रूप में न्यून नहीं है; जिसके विषय में घर, परिवार से लेकर फिल्म, नाटक, साहित्य, समाज, खेल, राजनीति, अर्थशास्त्र, कला आदि सभी आ जाते हैं|"

Friday, November 6, 2015

परदे के पीछे

गुरु को आचार्य भी कहा जाता है| ‘आचार्य’ का निर्वाचन होता है – ‘आचरण को सुधारने वाला’| हज़ारों साल पहले ऋषियों-मुनियों ने यह शानदार बात कह दी थी| मतलब सीधा सा है, अध्यापक, शिक्षक, उस्ताद, मुदर्रिस, टीचर और मास्टर – ये सभी आचार्य हैं| इन सब का काम आचरण को सुधारना है| पढ़ाने–लिखाने से उनका क्या मतलब! विडम्बना देखिए, महाराज जी तो अपनी बात कह कर निकल लिए, पर बेचारे मास्टरों का इससे क्या भला हुआ? जब इतनी गजब की बात कह ही दी थी, तो कुछ ऐसी व्यवस्था भी तो करनी थी कि देश के हर हैडमास्टर को इस बात का पता चल जाता| जंगल में मोर नाचा किसने देखा! माना कि कुछ ज़्यादा बस में न था तो भी कुछ ले-दे कर ही यह बात अपने ज़माने के एजुकेशन कोड में लिखवा दी होती| उस आधार पर काम के बोझ तले दबे हुए आज के मास्टरों के पास जवाब देने के लिए कम से कम एक ठोस बहाना तो होता|
 
हैडमास्टर लोग आज भी उनकी जान के पीछे हाथ धोकर पड़े रहते हैं - खड़े होकर क्यों नहीं पढ़ाते, कक्षा में शोर क्यों है, लडके ऊँघ क्यों रहे हैं| मार्च – अप्रैल आता नहीं और रिज़ल्ट की चिंता सिर पर सवार हो जाती है| जनगणना हो या मतगणना, पोलियो अभियान हो या मतदाता बढ़ोतरी अभियान, झोंक दिया जाता है असहाय मास्टरों को| एक अकेली मजबूर जान और हज़ार काम!
 
कोई पूछे, अगर पढ़ाना ही होता तो मास्टर क्यों बनते! वकील बन कर जज को पढ़ाते, व्यापारी बन कर ग्राहक को पढ़ाते, नेता बन कर जनता को पढ़ाते, स्टार बनकर निर्देश को पढ़ाते| हालात ज़्यादा ही खराब हो जाते तो छात्र बनकर मास्टर को पढ़ाते| वैसे, राज़ की बात तो यह है – ‘मास्टर कोई भी बनता नहीं है, बस ऊपर से बनाकर भेजा जाता है’| आदमी चाहे कितना भी फटीचर क्यों न हो, उसके चयन में कुछ तो रूचि-सम्पन्नता होती ही है|
 
कुछ भी हो, क्लास में पढ़ाना (यहाँ ‘पढ़ाने’ को ‘होने’ का ही पर्यायवाची मान लिया जाना चाहिए) होता एक मजेदार अनुभव है, खासतौर से स्कूलों में| लडके वो वो उस्तादियाँ दिखाने हैं कि तबीयत बाग़ बाग़ हो उठती है|
 
थोड़ी देर के लिए मान लीजिए कि आप एक मास्टर हैं| दर्जे में खड़े हैं| लड़कों को इमला दे रहे हैं| कोने में ‘बिखरे बालों वाला’ एक लड़का बड़ी संजीदगी से अपनी कापी पर झुका हुआ लिख रहा है| उसकी तत्परता देखकर आप अपनी अध्यापन कला पर मुग्ध हुए हुए जाते हैं| आपका मन करता है कि इसा जहीन बालक के सिर पर हाथ फेर कर आशीर्वाद दिया जाए| आप करते भी ऐसा ही हैं| लड़का नब्बे अंश के कोण पर झुकी अपनी गरदन उठाता है| आपको देखता है| उसकी दृष्टि कुछ विचित्र सी हैं, मानों आपको पहचानने की कोशिश कर रहा हो| आपकी नजर उसकी कॉपी पर पड़ती है| कॉपी का बीच का पेज खुला हुआ होता है| खुले पेज पर एक विचित्र सी, किसी अन्य ग्रह के वानर जैसी तस्वीर बनी हैं| आप तस्वीर को देखकर उसकी कला-कुशलता पर मुग्घ नहीं होते| कारण, तस्वीर के नीचे आपका नाम लिखा हुआ होता है| आपकी भँवें तन जाती हैं| लड़का तुरंत खड़ा हो जाता है| अपने माथे को घुटनों तक लटकाकर “सारी सर” कहता है, फिर डर से काँपने लगता है| आप स्टैण्डर्ड कार्रवाई करते हैं| लड़के की लानत मलामत करते हैं| उसके संस्कारों को मामले के बीच में घसीटते हैं| उसे बेशर्म, जंगली, गैर-जिम्मेदार आदि उपाधियों से नवाजते हैं| सारी जमात हँसी से फट जाना चाहती है, पर आपके डर से चुप रहती है| आप आग भरी निगाहों से लड़कों की तरफ घूरते हैं| सभी लड़कों के चेहरे तन जाते हैं, पर आँखों में चुलबुली मुस्कराहट अपनी हाजिरी उसी तरह दर्ज कराती रहती हैं, जिस तरह सरकारी स्कूल के कमरों की टपकती हुई छत वर्षा के मौसम की सूचना दिया करती है|
 
अंत में, आप लड़के को अपनी मेज के पास बुलाते हैं| खड़खड़ाते हुए कोरे कागज़ पर एक चिट्ठी लिखने लगते हैं| जितनी देर आप लिखते रहते हैं, लड़का आपकी चिरौरी करता रहता है| दया की भीख माँगता है| वह जानता है, चिट्ठी नहीं उसकी मौत का परवाना लिखा जा रहा है| आप उसकी ओर ध्यान दिए बिना अपने काम में लगे रहते हैं| लगभग आधा कागज़ कलम से लाल कर देने के बाद बड़े अधिकारसूचक ढंग से अपने पिताजी के हस्ताक्षर कराकर लाने की हिदायत के साथ पुर्जा लड़के को पकड़ा देते हैं| आप संतुष्ट हैं कि लड़के को सजा मिल गयी| उसकी एक-एक मुद्रा से पश्चात्ताप की हजार-हजार धाराएँ बह रहीं हैं जिससे उसके पैरों के आस-पास पछतावे और ग्लानि का तालाब सा बन जाता है| उसका चेहरा पीला और आँखें निस्तेज हो जाती हैं| लड़का एक बार फिर “सॉरी सर” कहता है और मुड़कर अपनी सीट की तरफ चल पड़ता है|
 
इसी बीच में एक और हरकत होती है, जिसका आपको पता ही नहीं चलता| आप खुश हैं कि लड़के के छक्के छुड़ा दिए| आपको यकीन हैं कि बाकी छात्र इस घटना से सबक लेंगे और ऐसी उद्दंडता करने से पहले हजार बार सोचेंगे| अफसोस! आपका ख्याल गलत निकलने वाला है| लड़का आपकी चिट्ठी लेकर अपनी सीट पर जाने के लिए घूमता है, और ज्यों ही उसकी पीठ आपकी तरफ होती है, वह अपने साथियों की तरफ देखकर अपनी दाईं आँख धीरे से दबाता है| उसके होठों की कोरों पर मुस्काराहट खेल जाती है| इसके बाद वह मंथर गति से चलते हुए अपनी कुर्सी पर जाकर बैठ जाता है| कक्षा में लड़के मुस्कराने लगते हैं| कुछ ही क्षणों में मुस्कराहट जोरदार कोलाहलपूर्ण हँसी में बदल जाती है| आप सोचते हैं कि जमात के लडके कुसूरवार की खिल्ली उड़ा रहें हैं| आप कुछ दरियादिली और कुछ गंभीरता दिखाते हुए एक हाथ उठाकर उन्हें शांत होने के लिए कहते हैं और फिर अपने हाथ में गाइड उठाकर लड़कों को नोट्स देने में रत हो जाते हैं|
 
आप तल्लीनता से अपने काम में लगे हुए हैं| क्लास में शान्ति छाई हुई है| आपकी नजर क्लास के कोने में जाती है| ‘बिखरे बालों वाला’ वह शैतान लड़का भी बाकी सभी के साथ नोट्स लेने में लगा हुआ है| आप मन ही मन अपनी ‘बाल-व्यवहार’ की कुशलता के कायल हुए जाते हैं| आप प्रसन्न होते हैं कि एक भटके हुए को रास्ता दिखा दिया| पर, क्या कभी खरगोश के सींग उगे हैं? क्या चिड़िया का दूध किसी माई के लाल को हासिल हुआ है? अगर आप आत्म-सम्मोहन का चश्मा अपनी आँखों से हटाकर उस लड़के के पास जाते और देखते तब आपको पता चलता कि लड़का नोट्स नहीं लिख रहा है, बल्कि अपने पिताजी के हस्ताक्षरों की नक़ल करने की कोशिश में लगा हुआ है| चिट्ठी वाला मामला भी तो उसे निपटाना है ना!
 
आप आप इसे जुर्म कहें, बचपना कहें, नाफ़रमानी कहें, पर सच यही है| जब दर्द हद से ज़्यादा बढ़ जाता है, तभी मज़ा देता है| बच्चे नई नई उस्तादियाँ सीख रहें हैं, और हम वही ढाक के तीन पात!
 
बकौल शायर –
कुछ नया करने की कोशिश में पुराने हो गए
बाल चांदी हो गए, बच्चे सयाने हो गए|
 
 

No comments:

Post a Comment