अपनी बात

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Thursday, October 8, 2015

थोड़ी आशिकी भी

राह चलते, उस बाँकी कँटीली-कटारी पर नज़र पड़ी, तो दिल मचल गया| मन के समंदर में उम्मीदों की लहरें उठने लगीं| ऐसा उत्तेजक रूप! दिल अश-अश कर उठा| लगा, लाटरी का टिकट ही शरीर धारण करके चला आ रहा है| वो भी कोई ऐसी वैसी फटीचर टाइप की राज्य लाटरी नहीं, अपितु बम्पर से भी महा-बम्पर लाटरी का अकेला छपा हुआ टिकट! ऐसी लाटरी कि जिसके नाम खुले, उसे अपनी रूपराशि से सराबोर कर दे|

सहसा लगा, जिसे दुनिया रास्ता कहती है, वह तो साक्षात् घर है| कहा भी गया है - जहाँ गृहणी होती है, उसे ही घर माना जाना चाहिए| “गृहणी गृहमुच्यते|” रास्ता भी ऐसा, जिस पर घरों से लतियाए, जुतियाए और गरियाए गए रूपलक्ष्मी के चवन्नी छाप आशिकों के दिल दोनों ओर वैसे ही बिखरे पड़े थे, जैसे पेंशन के दफ्तर में पेंशानार्थियों की अर्जियां बिखरी रहा करती हैं| वास्तव में दोनों की नियति में कोई मूलभूत अंतर नहीं होता| दोनों को पड़े रहना होता है| रागदरबारी के लंगड़ की तरह धीरे-धीरे सत्य की लड़ाई लड़ते रहना होता है| ऐसी लड़ाई जिसमें हार और जीत का समान महत्त्व हुआ करता है| और भी अधिक बेहतर तथा असरदार तरीके से कहा जाए तो हार और जीत दोनों ही सामान रूप से महत्त्वहीन हुआ करती हैं| और, समान ही उनकी नियति भी हुआ करती है|

उस रूपसी के अंग-अंग से फूटती यौवन की मादकता मन और आत्मा को सुकून दे रही थी| पहुँचे हुए ज्ञानियों-ध्यानियों, ऋषियों-मुनियों के लिए भी यह समझना कठिन था कि नजर किस अंग पर डाली जाए| ध्यान से देखा तो पाया कि उनके बीच शास्त्रार्थ चल रहा है| वे निर्धारित करने का प्रयत्न कर रहे हैं कि किस अंग का महत्त्व अधिक है तथा किस अंग पर, किस समय दृष्टिपात करने से अक्षय फल की प्राप्ति होती है| भारतवर्ष के दिग् दिगंत में में व्याप्त दर्शनेच्छु, शास्त्रार्थ के समाप्त होने के बाद होने वाले निर्णय को जानने की जिज्ञासा में धृतराष्ट्र बने टेलीविजन रूपी संजय के सामने पद्मासन जमाए बैठे हैं| शास्त्रार्थ का सीधा प्रसारण किया जा रहा है| शास्त्रार्थ की लोकप्रियता के चलते टी.वी. चैनलों की बन आयी है| दर्शानाभिलाशियों की अभिलाष पूरी हो या न हो, लेकिन शास्त्रियों और शास्त्रियों के ज्ञान का प्रसारण करने वाले माध्यमों की पौ बारह है|
 
नाक तक खिंचा लाल-लाल घुंघटा और उसकी लाल-लाल परछाई में और भी ज्यादा लालमलाल होते हुए होंठ गजब किये दे रहे थे| होठों के पीछे से झाँकती दन्तावालियाँ ऐसी लग रही थीं, मानों किसी योग्य जौहरी ने माणिकों को टेक देने के लिए उनके पीछे की ओर मोती जड़ दिए हों| कोई न कोई तो भाग्यशाली होगा ही जिसके गले में इस रत्नावली को पड़ना है| सोचने में क्या बुरा है, कौन जानता है, हमारे ही भाग्य के दरवाजे खुलने को बेचैन हो रहें हों| जिस गर्दन को हमेशा अर्धचन्द्र देकर धकियाया ही गया हो, उस गर्दन पर ऐसी दिव्यमालिका के पड़ने की कल्पना मात्र ही फुरफुरी पैदा कर देती है| सारा ज़माना इस फरफुरी का शिकार बना दिखाई देता है|
 
होठों पर चिकनी सी मुस्कराहट और मुस्कराहट में घुला-मिला गजब का आमंत्रण!! कौन हतभाग्य होगा जो ऐसे आमंत्रण को पाकर भी अपनी टूटी-फूटी झोंपड़ी की चिंता में सारा जीवन होम देगा! दिलजले अपने अपने छप्परों में आग लगाकर किसी भी प्रकार के बंधन से मुक्त हो जाना चाहते हैं, जिसके चलते सुना है, बाजार में दियासलाइयों की कमी हो गयी है| जब भरा-पूरा सुख-साधन-संपन्न प्रासाद सामने हो तो वंश-युग्म-जड़ित, तृण-दल-सुशोभित, मेघ-जलाप्लावन-स्रोत छप्पर की परवाह ही कौन मूढ़ करता है|
 
आँखें यद्यपि दिखाई नहीं दे रहीं थीं, किन्तु उनके सामने की और निकलती चौंधियाहट भरी चमक उनकी आकर्षक सुन्दरता को विकीर्ण कर देती थी| ऐसा लगता था मानों हीरे की कनियों से प्रकाश की रेखा फूट पड़ी हो| चारों तरफ उजाला छाया था| इतना उजाला कि हाथ को हाथ न सुझ रहा था| विचित्र बात है, प्रकाश की न्यूनता और अधिकता, दोनों ही अन्धता की कारण हो सकती हैं|

कमर पर पड़ी वेणी कामदेव का फंदा बनी हुई थी| न जाने कितने चाहने वालों के मन उस कृष्णा रेखा के डोलने के साथ-साथ हिचकोले खाते थे| न जाने कितने कितने प्राण उस फंदे में फंसकर आत्मोत्सर्ग करने को तत्पर दिखाई देते थे| वैसे भी, ऐसे समय में, जब वेणियों का संहार अपने चरम पर है, विधाता की रचना-प्रक्रिया के उस अद्भुत निदर्शन को अपने मन के अजायबघर में स्थापित करने के लिए हर युवक-वृद्ध आतुर दिखाई दे रहा था|
 
और चाल! आय..हाय...हाय...हाय...हाय!! वो उसका नागिन की तरह बल खाकर चलना, ऐसा लगता था जैसे कलेजे पर राणा प्रताप की तलवार फिर गयी हो| गोरे-गोरे पांवों पर आलता लगा था| जमीन से पाँव उठा लेने के बाद भी देर तक जगमगाहट बनी रहती थी| पैरों में पड़ी पाजेब की झनकार देखने वालों के लिए उत्सव और सुनने वाले मन-मयूरों के लिए मेघ-गर्जन थी| पांवों के तलवे कभी कभी दिखाई दे जाते थे| अरसे के बाद खुरदुरी दरारदार एड़ियों की जगह मोतियों की पुंजीभूत आभा का रस लेने का मौक़ा मिला था| उस दिन समझ में आया कि बिना मिलावट के दूध में स्पेन का असली केसर घोल दिया जाता है तब उसकी क्या रंगत होती है| अभी तक तो हारसिंगार के फूल की सूखी डंडियाँ ही लल्लू हलवाई के यहाँ से लाये दूध में घोल कर पी जाया करते थे| उसमे भी, अगर कोई आसपास हो तो पूरी कोशिश करते थे कि केसर का भ्रम उत्पन्न करने वाली वह डंडी मूँछो पर चिपकी रह जाए| इसके बाद अतिथि की निगाहों में ईर्ष्या मिश्रित आश्चर्य एक उभरने का इंतज़ार किया करते थे| न जाने कितनी बार इस विधि से यह प्रश्न पूछे जाने के पात्र बने है-“वाह! आज के जमाने में केसर का दूध उड़ा रहे हो!!”
 
अब छोडिये भी रूप-वर्णन को! सब कुछ मैं ही बताऊँगा तो आप क्या करेंगे| इतने के बाद भी उससे ध्यान हटता है, तो सारी उम्र भाड़ ही झोंकी है| रही हमारी, तो हम पर तो अब किसी और का प्रभाव पड़ना बंद ही हो गया है| सूरदास की काली कमरी, चढ़े न दूजो रंग| लेकिन, असली बात तो यह कि बस वो दिन था और आज का दिन है, यार लोगों की आँखें हैं और सुन्दरी का उठान है| जिस दिन सुन्दरी से आँखें मिल जाती हैं, दिल बल्ले-बल्ले करने लगता है| सुन्दरी आँखें फेर लेती है तो चेहरे लटक जाते हैं| माशूका की एक दृष्टि पर अपना सर्वस्व निछावर करने को तैयार दीवाने अपनी जान हथेली पर लिए घूमते हैं| बकौल जिगर –
 
सिमटे तो दिल-ए-आशिक़
फैले तो ज़माना है

नोट:- सुन्दरी के बारे में खोज-बीन की पता चला कि उसका नाम सेंसेक्स है| उसके अंगों के नाम आई.टी., बैंकिंग, निर्माण, टेली-कम्युनिकेशन, इंजीनियरिंग, धातु, चीनी, सीमेंट आदि हैं| शास्त्रार्थ में रत ऋषियों को आजकल बाजार-विश्लेषक कहा जाता है| कमर में पड़ी वेणी सेंसेक्स मानी जाती है| पाँवों की पाज़ेब विविध कम्पनियाँ हैं| लाल घुंघटा भविष्य है, जिसकी तह में क्या छिपा है, कोई नहीं जानता|


चित्र - https://www.pinterest.com/pin/462815299178407185/ से साभार

2 comments:

  1. वाह ! क्या लाजवाब और बेमिसाल लेखनी है आपकी। …सेंसेक्स का श्रृंगारिक वर्णन अद्भुत है। .

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  2. पाठकों के बिना किसी भी रचना का कोई मूल्य नहीं रहता| उत्साह बढाने के लिए धन्यवाद| आपकी प्रतिक्रियाओं का इंतज़ार रहेगा|

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